Friday, October 09, 2015

ड्राइवरी का पेशा बहुत अच्छा है


शमीम खान और अब्दुल हफीज
सुबह देर हुई आज निकलने में। मन किया न जाएँ टहलने। पर फिर निकल ही लिए। पहले सोचा पैदल चला जाए लेकिन फिर साईकिल स्टार्ट करके निकल लिए। निकलते हुए साढ़े छह बज गए थे सो फैक्ट्री के सामने पटेल की चाय की दुकान तक ही गए।

दुकान पर चाय पीते हुए लम्बी दाढ़ी वाले ड्राइवर अब्दुल हफीज से मुलाकात हुई। 52 साल के अब्दुल हफीज छिंदवाड़ा के रहने वाले हैं। खुद का ट्रक है। चेन्नई से 1700 किमी 3 दिन में जबलपुर आ गए।

हाईस्कूल तक पढ़ाई किये हफीज के चार बेटियां एक लड़का है। लड़का उसी खानदान का नाम रोशन करने की हिंदुस्तानी बीमारी की उपज है। दो बच्चियों के बाद अब्दुल हफीज ने कहा-'ऑपरेशन करा लो,खत्म करो।' पर बुजुर्गों ने कहा वारिस हो जान दो पहले। वारि्सके इंतजार में दो बेटियां और हुईं। अग्रिम उपहार। बेटा हाईस्कूल में पढ़ता है। दो बेटियों की शादी हो गयी।

17 साल की उम्र से ड्राइवरी सीखे अब्दुल हफीज ने नया ट्रक साल भर पहले खरीदा। 17 लाख का। आते-जाते घर जरूर रुकते हैं। हफ्ते में एक चक्कर घर का जरूर लगाते हैं। पूरी नींद लेते हैं। अच्छा खाना खाते हैं। कोई नशा नहीं। बस कभी-कभी पुड़िया खा लेते हैं।

अब्दुल हफीज ने बताया-’ड्राइवरी का पेशा बहुत अच्छा है। लेकिन कुछ ड्राइवरों के चलते बदनाम होता है। इस लाइन में आदमी नशा (दारु,गांजा) न करे, रंडीबाजी न करे और जुआ न खेले तो इससे अच्छा कोई पेशा नहीं कम पढ़े लिखे लोगों के लिए।’


 मेरा नाम लिखते शमीम
52 साल के अब्दुल हफीज की दाढ़ी की उम्र 15 साल है। दाढ़ी और ड्रेस जिस तरह की पहने थे उससे ड्राइवर की छवि से अलग तबके के आदमी लगते हैं। बोले भी-'इसके चलते लोग इज्जत से बात करते हैं।' शरीर में सबसे ज्यादा देखभाल दाढ़ी की ही करनी पड़ती होगी फिर, एक और बच्चे की तरह। यह सुनकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले-'हाँ, देखभाल तो करनी पड़ती है।'

जिस गाँव में रहते हैं अब्दुल हफीज वहां 25% घर मुसलमानों के और 75% हिंदुओं के हैं। लेकिन कोई तनाव कभी नहीं होता। उनके घर के सामने ही तीन पीढ़ियों से बना मन्दिर है। किसी ने आजतक उस पर एक कंकर तक नहीं फेंका।

छिंदवाड़ा की बात चली तो वहां के सांसद कमलनाथ की भी बात हुई। बोले-'बहुत काम करवाया कमलनाथ ने। अभी सरकार बदल गयी तो थोड़ा धीमा है काम पर होता रहता है। उनकी सबसे अच्छी बात यह कि वो यह नहीँ देखता कि आप उसके वोटर हो कि नहीं। सबका काम करवाता है। दिल्ली में छिंदवाड़ा हॉउस है। जो भी जाता है उसके पास उसकी सुनता है। काम भी करवाता है। इसीलिये वह कभी हारता नहीं वह।

चेन्नई से जबलपुर 1700 किमी 3 दिन में आने की बात पर बोले-रोड अच्छा है इसलिए आ गए। जबकि टाटानगर से जबलपुर 700 किमी में लोग हफ्ता लगा देते हैं। रोड ठीक नहीं। साथ के शमीम की तरफ इशारा करते हुए बोले-ये तो हमसे एक दिन बाद चले थे चेन्नई से। 48 घण्टे में ही खड़ी कर दी गाडी जबलपुर में।

फिर शमीम से बात होने लगी।35 साल के शमीम 8 वीं पास हैं। 2 साल पहले शादी हुई। अभी बच्चे नहीं हैं। 3 भाई हैं कुल। दो भाई कपड़े का काम करते हैं। अब्बा रिक्शा चलाते थे। अब जब से सब बच्चे काम करने लगे तबसे छोड़ छोड़ दिया। 62 साल के हैं लेकिन सेहत इत्ती अच्छी की आपसे भी कम उम्र के लगें। अभी फोन कर दें तो फौरन आ जायेंगे एक्टिवा पर।


कौन लिखाई ज्यादा खूबसूरत है बताएं
अब्बा से बात होते हुए दादा जी तक पहुंची। दादा जबलपुर में हवलदार थे। मालगुजार। 7 फुट के थे। खूब तगड़ा शरीर। 1962 में जब दंगा हुआ तो उनको पाकिस्तान भेज दिया गया। जब यहां लोग मारे जा रहे थे तो दादा चले गए जान बचाने के लिए। यहां हवेली में सोना-चांदी जो थी जमीन में गाड़ के।

दादा पाकिस्तान पहुंचकर नौकरी करने लगे। यहां उनके बहनोई का इंतकाल हो गया। दादा बहनोई को मानते बहुत थे। आने के लिए वीसा की अर्जी लगाई। वीसा मिला नहीं। फिर वो पैदल रेलवे लाइन के किनारे-किनारे चलते हुए जहां तक रेल मिली नहीं आये। फिर रेल पर बैठकर वापस जबलपुर। यहां हवेली पर सरकार का कब्जा हो गया था। जमीन खोदकर लोग सब माल निकाल ले गए थे।

फिर दादा ने क्या किया? यह पूछने पर शमीम बोले-किया क्या। मंदिर पोती, मस्जिद पोती। रिक्शा चलाया। जिंदगी गुजारी। जिनकी कल तक हवेली थी वो फुटपाथ पर रहे।

शमीम के दादा की कहानी सुनकर मुझे पाकिस्तान के प्रख्यात लेखक मुस्ताक अहमद युसूफ़ी 'खोया पानी' के मिर्जा जी याद आये जो कि बंटवार के बाद पाकिस्तान गए थे। साथ में हिंदुस्तान में छूटी अपनी हवेली की फोटो ले गए थे। किसी से बहस होती तो उसको दिखाते हवेली की फोटो और कहते-ये छोड़ के आये हैं।

खोया पानी अद्भुत व्यंग्य उपन्यास है। इसका हिन्दी अनुवाद लफ़्ज पत्रिका के संपादक तुफ़ैल चतुर्वेदी ने किया है। नेट पर हमारे मित्र काकेश ने टाइप करके डाला है। लिंक मैं नीचे दे रहा। पढ़िए मजा आएगा।

इस बीच अब्दुल हफीज चले गए।अपने ट्रक के पास। शमीम ने बताया उनको बॉडी बिल्डिंग का शौक था। स्टेडियम में दौड़ते लोगों को देखकर बोले-हम भी ऐसे सुबह दौड़ते थे। अब सब छूट गया।

धर्म की राजनीति के मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए शमीम ने कहा-जहां रहे वहां के हिसाब से चलना समझदारी है। अब कहीं कुछ हो रहा और आप वहां हैं नहीं तो आप दूर रहकर क्या कर लोगे? यह भी तो नहीं पता कि सच क्या है।

उर्दू की बात चली तो बोले-हमारी पढ़ाई उर्दू मीडियम में हुई। हिंदी भी आती है। पर अंग्रेजी में हाथ तंग है। मेरा नाम चाय की दुकान की पीठ पर कागज रखकर बताया। बोले- हमारी उर्दू की राइटिंग अच्छी थी। पर जब से स्टेयरिंग पकड़ी तब से कलम छूट गयी।

हमने कहा-'इतना घूमते हो। लिखा भी करो उसके बारे में। ' बोले-'अरे लिखने को तो बहुत है।एक से एक किस्से।कितनी जगहें देखते हैं।लिखें तो गजब हो जाये।' हमने कहा-' लिखा करो न ।'

इसके बाद वो चले गए फैक्ट्री गेट की तरफ। मैं मेस की तरफ। इस तरह यह रहा आज का ‪#‎रोजनामचा‬
आपका दिन चकाचक बीते। शुभ हो। मङ्गलमय हो।

काकेश का लिंक खुल नहीं रहा। उपन्यास ’खोया पानी’ इस लिंक पर पढा जा सकता है: http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx…

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