Sunday, October 18, 2015

साझा चादर के दो खिचवैये होते हैं

सबेरे का समय। सिविल लाइन्स की सड़कें अभी भी उतनी ही चौड़ी हैं जितनी आज से 30 साल पहले थी। सड़क किनारे यह परिवार झूंसी से आया है खिलौने बेंचने। बुजुर्ग महिला ने बताया-"अंकल जी हम लोग रात को आये थे।" महिला को शायद यह पता रहा हो कि शहर ने आदमियों को अंकलजी ही कहा जाता है।

बच्चा जमीन पर बिछी चादर पर लेटे हुए खिलखिलाते हुए खेल रहा था। उसकी माँ आधी चादर ओढ़े बैठी अपने बच्चे को खेलते देखती खुश सी हो रही थी। बाकी की आधी चादर उसका पति ओढ़े सो रहा था। बीच-बीच में करवट बदलता तो चादर थोड़ा उसकी तरफ खिंच जाती जिसको कि उसकी पत्नी फिर ठीक करती।

 कहते हैं पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिये होते हैं। उसी तर्ज पर लगा मियां-बीबी के बीच साझा चादर के दो खिचवैये होते हैं।

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