Wednesday, October 21, 2015

मौज लेने का मौका कोई छोड़ता नहीं

फर्रुखाबाद कानपुर से 135 किलोमीटर दूर गंगा किनारे बसा शहर है। आलू की सबसे बड़ी मण्डी होगी शायद यह भारत की। फतेहगढ की छावनी भी प्रसिद्ध रही है।

शहर में घुसे तो बस स्टैंड के पास एक जगह ठेले पर भुने आलू बिकते देखे। आलू की सबसे बड़ी मण्डी है यहां और यहीं आलू को बालू में भूनकर और फिर सरेआम उसके कपड़े (छिलका) उतार कर उसको चटनी और नमक के पॅकेज के साथ बेंचा जा रहा था।

  जो आलू शहर को इतना राजस्व दिलाता है उसी की बीच शहर में ऐसी बेइज्जती खराब होती देखी।
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वहीं जगह भूल गए। एक फोटो कॉपी की दूकान पर एक बुजुर्गवार एकदम खाली बैठे थे। उनसे रास्ता पूंछा तो लपककर आये। उनको डर सा भी कि उनसे पहले कोई दूसरा न रास्ता बता दे। खाली बैठे आदमी से रास्ता पूंछना किसी बेरोजगार को रोजगार देने सरीखा पुण्य का काम होता है।


डूबते सूरज की रौशनी में कुछ बच्चे छत पर पतंग उड़ा रहे। कुछ बच्चियां छत की दीवार पर झुकी हुई उन बच्चों को पतंग उड़ाते देख रहीं थीं। उनके पीछे उन बच्चियों की माताएं/मौसियां/चाचियाँ देख रहीं थीं कि उनकी बच्चियां क्या देख रहीं हैं। सूरज भाई इस सब कारोबार को अरबों मील ऊपर से सुलगते हुए देख रहे थे।
गंगापुल का रास्ता पूँछकर पुल पर आये। अभी तक हम इसको घटियाघाट के नाम से ही जानते आये हैं। सबसे पूंछा भी इसी नाम से। लोगों ने बताया भी। लेकिन घाट पर जो सूचना पट्ट लगा था उसमें oघटिया घाट का नाम × निशान से काटकर उसके आगे पांचाल घाट कर दिया गया था। पांचाल माने दौपद्री के डैडी के राज्य के नाम पर घाट का नाम रख दिया गया है। यह मेरे लिए बस एक सुचना की तरह रजिस्टर हुआ बकिया नाम मेरे जेहन में 'घटिया घाट' ही जमा हुआ है।

 गंगा पुल के ऊपर से ही गंगा जी की अतल जलराशि निहारते रहे कुछ देर। नदी में कुछ लोग नाव चला रहे थे। कुछ नहा रहे थे।पुल के पास का पानी हरा/नीला सा दिख रहा था। दूर का ललछौंहा सा होने लगा था। दूर के पानी का लाल होना यह बता रहा था कि सूरज भाई नदी में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लगता है इस बात की भनक नदी के पानी को लग गयी थी क्योंकि नदी का पानी अपने को सूरज के रंग में रंगकर उसके स्वागत के लिए अपने को तैयार करने लगा था जैसे नई सरकार के आने की भनक मिलते ही नौकरशाही आने वाली सरकार के रुख के मुताबिक़ खुद को ढालने लगती है।

 घाट की तरफ देखा सूरज भाई पेड़ों के पीछे से मुस्करा रहे थे। पेड़ों के पीछे सूरज भाई को देखकर ऐसा लग रहा था मानों कोई फुलझड़ी जला दी हो किसी ने दिन में। पेड़ों पर किसी ने आग लगा दी हो और पेड़ हल्के-हल्के मुस्कराते हुए सुलग से रहे हों।

दीवार पर बबासीर के इलाज का विज्ञापन लगा हुआ था। एक ही इंजेक्शन से बबासीर के जड़ से इलाज की बात लिखी थी। 5 और 22 तारीख को डाक्टर के मिलने का दिन लिखा था। अब मुझे सूरज भाई के मुस्कराने की वजह समझ में आई। वे मुझे विज्ञापन देखते देख मुस्करा रहे थे और शायद कह भी रहे हों मजे लेते हुए--'अरे कहाँ जा रहे। कल जाना जड़ से इलाज करवाकर।' एक बार फिर मुझे लगा कि मौज लेने का मौका कोई छोड़ता नहीं।

वहां से चले और भतीजी के यहाँ पहुंचे। उसकी शादी के बाद पहली बार आज उसके घर आएं। इतने दिनों तक न आने का आत्मीय उलाहना सत्र दो मिनट में ही निपट गया।इसके बाद सबसे मिल-मिलाकर, खा-पीकर, नियमित आते रहने का और फोन करते रहने का वायदा करके अब वापस लौट रहे हैं। कानपुर अभी 160 किमी दूर है। :)

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