Sunday, October 25, 2015

अरे बड़ी बदनामी हो रही है

आज घर से थोड़ा जल्दी चल दिए स्टेशन को। कल कुछ बवाल हुआ था। कुछ सड़कों पर आवा-जाही रोक दी गयी थी। सोचा पता नहीँ कौन सड़क पर कोई रोक दे और कहे इधर से नहीँ उधर से जाओ।

ऑटो गोविंदपुरी चौराहे पहुंचा तो एक पुलिस ने सिपाही हाथ देकर ऑटो रोका। बोला- 'हमको सब्जी मंडी छोड़ देना।' ऑटो वाले ने कहा-'हम सब्जी मंडी नहीं, गोविन्दपुरी स्टेशन जा रहे हैं।' इसके बाद वह बिना कुछ और पूछे ऑटो की अगली सीट पर बैठ गया -विनम्रतापूर्वक। उसके हाथ में बिस्तर जैसा कुछ सामान था। लगा शायद रात और दिन की लगातार ड्यूटी करके आ रहा है। इसके पहले भी शायद लिफ्ट लेकर ही आया हो।
जहाँ से स्टेशन के लिए मुड़ना था वहां ऑटो वालो ने ऑटो रोका। सिपाही उतर गया। आगे बढ़ गया। ऑटो आगे बढ़ाते हुए ऑटो वाले ने सिपाही को माँ की गाली दी। सिपाही उसकी आवाज 'सुनने की रेंज से बाहर' जा चुका था। ऑटो वाले की माँ शायद घर पर हो लेकिन उसकी गाली मुझे सुननी पड़ी।

स्टेशन पर पहुंचकर ऑटो वाला हमको छोड़कर और किराया लेकर वापस चला गया। रिक्शेवाले हमसे पूछने लगे-'किधर जाना है?' हमने कहा-' जबलपुर। चलोगे?' वो हंसने लगे। हम भी लग लिये और काम भर का हंस लिए। वे झाँसी पैसजर और चित्रकूट एक्सप्रेस से आने वाली सवारियों का इन्तजार करने लगे। हम प्लेटफार्म आ गए।

प्लेटफ़ार्म आने के पहले हमने इन्क्वायरी पर पूछना चाहा कि हमारा कोच किस जगह आएगा। दो महिलाएं थीं वहां। दोनों खाली थीं। हमने सोचा किससे पूंछे। फिर एक से पूछा तो उन्होंने बताया -'हम बता नहीं सकते।' यह तो हमें भी पता था कि वे बता नहीं सकती पर चूंकि हम थोड़ा जल्दी आ गए थे सो रेलवे की पूछताछ सुविधा का इम्तहान लेने लगे। एक महिला स्टॉफ ने जब 'हारी' बोल दी तो हमने दूसरी से भी पूछा ताकि उनको कोई शिकायत का मौका न रहे कि उनसे क्यों नहीं पूछा। मुझे पूरा भरोसा था कि उनको भी पता नहीं होगा। उन्होंने मेरे विश्वास की रक्षा की। (यह विश्वास की रक्षा वाला प्रयोग श्रीलाल शुक्ल जी ने एक लेख में किया था जिसमें उनकी पत्नी की चप्पलें मन्दिर में चोरी चली जाती हैं और वो लिखते हैं - चोरों ने विश्वास की रक्षा की)

प्लेटफार्म पर आये तो पता किया कोच प्लेटफार्म के अंत में आता है। हम वहीँ खड़े होकर गाडी का इन्तजार करने लगे। पता चला कि गाड़ी मात्र 6 मिनट लेट है और आने वाली है। ट्रेन का इन्तजार करते हुए गोविन्दपुरी का पुल देखते रहे। ढलान से उतरती हुई सवारियां ऐसे जा रहीं थीं मानो किसी फिसलपट्टी पर सरकती जा रहीं हों। कुछ गाड़ियां ऊपर की तरफ भी जा थीं।

इस बीच एक यात्री ने पास में आकर पूछा-'अंकल जी चित्रकूट एक्सप्रेस इसी प्लेटफार्म पर आ रही है?' हमने बताया -'हाँ आने वाली तो है। कहां जाना है?' वह बोला-' जाना है मैहर तक।' गाड़ी में आने में देरी से वह थोड़ा असहज सा हो रहा था। हमने कहा-' टाइम हो गया है। गाड़ी तीन किलोमीटर दूर सेंट्रल स्टेशन पर खड़ी है। जोर से आवाज देकर बुला लो।' इस पर वह हमसे सहज होकर बात करने लगा।

बात करते हुए वह बार-बार थूकता जा रहा था। हमने पूछा तो उसने बताया कि पान मसाला के दो दाने डाल लिए मुंह में उसी के चलते ऐसा हो रहा। यह भी बोला कि वह मसाला खाता नहीँ है। बस आज ही दो दाने खा लिए। हमने कहा-'ऐसे ही तो आदत पड़ती है।' इस पर उसने कहा-'हमारे साथ ऐसा नहीं होता। जो सोच लेते फिर वही करते हैं।'

पता लगा उसकी कानपुर में ससुराल है। लड़का 10 माह का है। उसका मंडन कराना है लेकिन परेशानी के चलते करा नहीं पा रहा। परेशानी के बारे में पूछने पर वह बोला -'ऐसे ही कुछ है। घरेलू।'

कुछ देर इधर-उधर की बात करते हुए उसने खुद ही बताया कि वह एक महीने से कानपुर में परेशान घूम रहा है। उसका छोटा भाई जो यहां डिग्री कालेज में पढ़ता है वह किसी लड़की को लेकर भाग गया था। उसी में कोर्ट कचहरी के चक्कर लग रहे हैं।

आगे बताया उसने कि लड़की के पिता ने लड़की के नाबालिग होने की बात कहकर रिपोर्ट लिखाई थी। पर मेडिकल में वह बालिग निकली और उसने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था कि वह अपनी मर्जी से गयी थी लड़के के साथ।

हमने कहा-'फिर अब क्या समस्या? जो थी वो निपट गयी।' इस पर वह बोला-' अरे बड़ी बदनामी हो रही है सब जगह।' पता चला कि लड़का बनिया है और लड़की अनुसूचित जाति की। शायद यही कारण रहा हो बदनामी का। पिता फ़ौज में हैं। शिलांग में पोस्ट हैं।'

और कुछ बात हो तब तक ट्रेन आ गयी। हम उसको छोड़कर ट्रेन की तरफ लपक लिये। अभी खाना खाकर लेटे हुए सोचा पोस्ट लिख दें।

ठीक किया न ? :)

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