Tuesday, October 20, 2015

चलते साथ मिलकर,चलेंगे साथ मिलकर

चलते साथ मिलकर,चलेंगे साथ मिलकर
तुम्हें रुकना होगा हमारी आवाज सुनकर।

ढोलक पर यह गीत हमने सुना दो दिन पहले इलाहाबाद से लखनऊ वापस लौटते हुए। बस से बारात वापस लौट रही थी। रास्ते में एक जगह एक ढाबे पर बस रुकी। ढाबे का नाम बटोही। वहां खाने-पीने और निपटने का इंतजाम था।

ढाबे के बाहर देखा एक आदमी एक बिजली के खम्भे के पास बैठा यह गीत गा रहा था। गाते हुए वह ढोलक बजाता काम पीटता ज्यादा जा रहा था। आते जाते लोग उसको पैसा देते जा रहे थे। कोई जेब में डाल दे रहा था कोई उसके साथ के बच्चे को पकड़ाता जा रहा था। गाने वाला इस सब से निर्लिप्त सा ढोलक बजाते हुये गाना निकालता जा रहा था।

इस बीच एक महिला ने एक दोने में मिठाई उसको पकड़ाई। गाने वाला रूक गया। मिठाई उसने हाथ से टटोली। फिर खम्भे के ऊपर बने सीमेंट के गोले में रख दी। उसके साथ का बच्चा पानी लेकर आया। लोगों ने अगले गीत की फरमाइश कर दी। एक ने कहा-'ओ दुनिया के रखवाले' सूना दो। ढोलक वाला ढोलक पीटते हुए गाने लगा।
बात हुई तो पता चला कि अनवर नाम है गायक का। छह साल का था जब आँख की रौशनी चली गयी। अभी 25 साल है उम्र। शादी हो गयी। पांच बच्चे हैं। गाने-बजाने का काम दो साल पहले से शुरू किया। साथ में जो बच्चा पैसे सहेज रहा था। वह शायद उसका बेटा था।

हमने उससे पूछा कि पांच बच्चे कर लिए। कैसे पालोगे उनको। बोला- 'अब नहीँ होंगे बच्चे। दवाई लिए हैं।'
और कुछ बात हो तब तक वह लोगों की फरमाईश पर ढोलक पीटते हुये गाना गाने लगा। जैसे वह ढोलक पीट रहा था उससे लग रहा था वह अपने कर्मपत्र और जनमपत्र के लेखक को पीट रहा हो।

 https://youtu.be/VvIWcFp3J9c

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