Sunday, October 18, 2015

संगम -नौका विहार

कल जब संगम गए तो विचार बना नौका विहार भी किया जाये। घाट पर सैंकड़ो नावें। किनारें खडी नावों और उनके बगल में ढेर गन्दगी। एक जगह एक जन नदी के एकदम किनारे पानी में बैठे लुटिया से नदी से पानी लेकर नहा रहे थे। एक पट्टी बंधे पैर को अपने बाकी 'शरीर बदर' सा किये थे जिससे कि उस पैर की पट्टी न भीगे। उनके साथ के यात्री नदी की गन्दगी को कोसते हुए उनके नहाने का इंतजार करते हुए समय बिता रहे थे।

हमको नाव के पास आते देखकर कई लोग हमारी तरफ लपके। उन लपके लोगों में से एक ने हमसे पूछा- "आप कैसे आये हो? कार से, ऑटो से, रिक्शा से, साइकिल से या पैदल?" हम सोचे भला हुआ यह नहीं पूछा कि एक तांग से आये या डेढ़ टांग से। उसने बताता कि आने वाले साधन के हिसाब से नावों के नम्बर लगते हैं वहां।


हमने किस सवारी से आये हैं यह बताने के पहले उससे पूछा-"सबेरे से कित्ती पुड़िया मसाला खा चुके हो?" वह बोला- पांच। उसका पूरा मुंह मसाला लाल हो चुका था। दांत पूरे घिसकर मसूड़ों से मिलने को बेताब। दिन में 20-25 पुड़िया खा जाता हमने टोंका तो बोला- "आपने कहा बस आज से बन्द।" ऐसे न जाने कितनी बार बन्द कर चुका होगा वह मसाला।

हमको जो नाव वाला बच्चा मिला उसका नाम था इंद्रजीत निषाद। झूंसी में रहता है। आठ साल से नाव चला रहा है। नाव खुद की है। जब बनवाई थी तब 45 हजार की पड़ी थी। आज 65 से 70 हजार रूपये की पड़ेगी नयी नाव।

नदी किनारे का नाव का हिसाब बताते हुए बताया इंद्रजीत ने कि हर साल 11 महीने ठेका होता है घाट का। इस बार ठेका बाबू सिंह को मिला है। अस्सी लाख का। संगम तक नाव ले जाने के लिए चाहे जितने का रेट तय हो पर नाव वाले को केवल अस्सी ही रूपये मिलते हैं (पिछले साल तक 60 रूपये मिलते थे)। सवारी और कुछ इनाम दे दे उसकी बात अलग।


इस बीच देखा सूरज भाई अपनी किरणों के गट्ठर को नदी के पानी में डालकर धो रहे थे। जैसे लोग नदी के पानी में अपने कपड़े पूरी लंबाई में फैलाकर धोते हैं वैसे ही सूरज भाई सारी किरणों को नदीं में फैलाये हुए थे। गंगा की लहरें नदी में पड़ी किरणों को हिला-डुलाकर और उजला बना रहीं थीं। सूरज भाई उन उजली किरणों को हवा के झोंको से सुखाकर पूरी दुनिया में भेजकर रौशनी फैला रहे थे।


गंगा और यमुना के संगम के पास उड़ते पक्षियों के बारे में इंद्रजीत ने बताया -"ये साइबेरियन पक्षी हैं। अक्टूबर के करीब हर साल आते हैं। जनवरी के बाद होली मनाकर चले जाएंगे।" उनके लिए खाने के बीज बेंचने वाले लोग नाव में वहां पूछते घूम रहे थे।

"यमुना का पानी नीला गंगा का मटमैला है। यमुना गहरी है। दिल्ली आगरा से आती है। गंगा का प्रवाह तेज है। गहराई कम है। उत्तराखण्ड, हरिद्वार, कानपुर होते हुए आती हैं। यहां संगम होता है दोनों का जहां सरस्वती हैं पर दिखती नहीं। जहां अभी हम हैं संगम के पास वहां गहराई 30 फ़ीट है। "---इंद्रजीत ने गाइड की तरह बताया।

कमाई का गणित बताते हुये इंद्रजीत ने बताया -" कुम्भ मेले के समय लोगों ने एक चक्कर के 32 हजार तक रूपये लिए। मैनेजर, ड्राइवर, नाव के ठेकेदार और नाव वाला सबमें बंटता है पैसा। सबसे कम मिलता है नाव वाले को। हमको उसमें 800 रूपये देकर अलग कर दिया। बाकी सब पैसा उनमें बंट गया।"

दक्षिण भारत से आने वालों से खूब पैसा वसूलते हैं ठेकेदार। एक-एक यात्री से 100-120 वसूलते हैं। 20-20 लोग बैठाते हैं पर नाव वाले को वही 80 रुपया फेरा देता हैं।हजारों नावें चलती हैं घाट पर।समझ लीजिये ठेकेदार की कमाई।


पिता राजगीर का काम करते हैं। एक मकान की खरीद में धोखा हो गया। कई लाख का नुकसान हो गया इसलिए इंद्रजीत नाव चलाने लगे। सबसे बड़े हैं घर में। इसके अलावा दो भाई और तीन बहनें हैं। एक बार पिता के साथ काम सीखा एक महीने। कन्नी पकड़ना सीख गए थे। पर फिर नाव चलाने लगे।

लेकिन सोचते हैं कि पिता का काम सीख लें और राजगीर का काम करें।

संगम पहुंचे । गंगा और युमना की लहरें एक दूसरे से गले मिल रहीं थीं। एक दूसरे को गर्मजोशी से हिला डुलाकर आगे पीछे कर रहीं थीं। दोनों का पानी अपने-अपने रंग को थोड़ा-थोड़ा छोड़ता हुआ एक नया मिलन का रंग बना रहा था। दो जीवनदायिनी नदियों का संगम हो रहा था।

संगम पर नावों पर पुजारी पूजा करा रहे थे। एक नाव पर कुछ महिलाएं संगम के पानी से स्नान करके गीले कपड़े उतारकर नए सूखे कपड़े पहन रहीं थीं। उनके साथ आये हुए लोगों से शायद उनके पर्दे के सम्बन्ध रहे होंगे। वे उन लोगों की तरफ घूँघट किये गीले ब्लाउज के ऊपर सूखे ब्लॉउज पहनते हुयी धोती की आड़ लेती हुई नाव पर सबके सामने कपड़े बदल रही थीं। इस तरह कपड़े बदलने का काम केवल महिलाएं ही कर सकती हैं।
हमसे बोला-"आचमन कर लीजिये। ।हम नदी का पानी अंजुरी में लेकर नदी को अर्पित करके बोले- 'हो गया हमारा आचमन।'

माघ महीने में जब ठेका खत्म हो जाता है तब नाव वालों को ठेकेदार को कमीशन नहीं देता होता। साल के एक महीने होता है ऐसा। सब कमाई नाव वाले की।अपने खुद के ग्राहक भी बनाये हैं इंद्रजीत ने। वे जब आते हैं तो उसको ही खोजते हैं। "आप परिवार सहित आइयेगा जनवरी में माघ मेले के समय। हम आपको घुमाएंगे।"- इंद्रजीत ने हमको न्योता दिया।

हम बोले-"तुम मसाला खाना छोड़ दो तब आएंगे।" बोला-"ऐसे ही आदत पड़ गयी। चार साल पहले एक जन के साथ रहते थे। वो एकाध दाना खिलाते थे। फिर हम भी खाने लगे।"

खुद की उम्र करीब 25 साल है इंद्रजीत की। बहन 17 साल की। उसकी शादी एकाध साल में करने के बाद तब खुद की शादी की योजना बताई इंद्रजीत ने। और भी न जाने कितनी बातें नदी, नाव,पानी और जिंदगी से जुडी हुईं।
लौटकर हम वापस आये। इंद्रजीत को पैसे देकर रिक्शे वाले संजय को खोजने लगे। बहुत देर तक वो मिले नहीं। हमें यह लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि हम कोई दूसरी सवारी लेकर चलें जाएँ और संजय यहां हमारा इंतजार करते रहें।

खैर मिले संजय। रिक्शे पर बैठे हमारा इंतजार कर रहे थे वे। बोले-"हम तौ कहि दीन रहे साढ़े सात तलक इंतजार करब। वहै हम रह द्याखत रहन। स्वाचत रहन कहां द्यार हुई गए।"

हम दोनों ने संगम तट पर ब्रेड पकौड़ा खाये। चाय पी। पहले दो पकौड़े एक ही कागज में दिए दुकान वाले ने। हमने कहा-"अलग अलग दे देव यार। उसने वही कागज फाड़कर आधा-आधा करके थमा दिया एक एक पकौड़ा। हमने चटनी मांगी तो उसने एक अलग दोने में दी। हमने सोचा पहले ही चटनी मांग लेते तो एक कागज बच जाता फटने से।

संगम पर तरह-तरह की दुकानों पर अलग-अलग सामान बिक रहा था। एक जगह एक आदमी माइक पर अपने दर्द से राहत देने वाले तेल की खूबी बताते हुए उसे बेच रहा था। उसका वीडियो भी बनाया हमने। अलग से दिखाएंगे उसे।

इसके बाद हम संजय के साथ लौटकर वापस आये।उनके किराये से अलग दस रूपये उनकी बिटिया के लिए दिए यह कहते हुए कि उसको हमारी तरफ से दे देना।

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