Wednesday, October 28, 2015

यह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था है

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.आज अख़बार जल्दी आ गया। तीन बल्कि चार अच्छी खबरें दिखीं:

1. बैतूल में एक युवक की दोनों किडनी फेल होने पर गाँववालों ने मदद का बीड़ा उठाया। दो दिन में हजारों रूपये जमा किये।

2. सिंगापुर निवासी (पहले जबलपुर निवासी ) स्टेनली सेम्युल ने 2 साल में सिलुआ गाँव को आदर्श गाँव बनाया।

3. एक दम्पति के 14 हजार चोरी हो गए तो एक पुलिस टी आई ने अपने पास से और चंदा करके उनको पैसे दिए और कहा -जाओ इलाज करवाओ।

चौथी खबर के लिए सोच रहे हैं क्या लिखें? एक में पाकिस्तान से आई गीता ने इंदौर निवासियों को फ़्लाइंग किस दिया है और दूसरी में हरभजन सिंह और गीता बसरा एक संगीत समारोह में थिरकते दिखे। कल उनकी शादी होगी। आप तय कर लो। जो बेहतर लगे उसको शामिल कर लो चौथे नम्बर पर।

अख़बार देखकर जब निकले तो मेस के बाहर एक आदमी छोटी पुलिया पर मुंह ऊपर करके बैठ गया। हमें लगा सेल्फी लेगा। लेकिन वो सिर्फ बैठा ही रहा। लगता है एन वक्त पर इरादा बदल दिया होगा उसने।

पुलिया पर एक आदमी बैठा सामने सड़क को देख रहा था।उसके चेहरे से लग रहा था कि वह देकग भले सड़क को रहा हो पर सोच कुछ और रहा था। शायद घर-परिवार की कोई समस्या। उसको सड़क देखते देख हम भी देख लिए।

एक महिला सर पर टोकरी में करवा चौथ वाले करवे लिए बाजार में बेंचने जा रही थी। कंचनपुर। आमतौर पर वे पुलिया पर सुस्ताने को रूकती हैं। पर आज नहीँ रुकी। शायद इसलिए कि वहां पुलिया पर लोग पहले से ही बैठे थे। शायद आगे बस स्टैंड पर सुस्ताये वह।

फैक्ट्री के बाहर फुटपाठ पर कुछ बच्चे बैठे हुए हैं। इनमें से कुछ वे हैं जो भर्ती के लिए इंटरव्यू देने आये हैं। आजकल इंटरव्यू के लिए यह अच्छा किया गया है कि उसमें नम्बर नहीं रखे गए। सिर्फ पास-फेल का हिसाब। मेरिट उनके लिखित इम्तहान के नम्बरों से बनेगी।

ऐसे ही एक इंटरव्यू बोर्ड में हम भी थे कभी। अलग-अलग पारवारिक परिस्थितियों के बच्चे आते। किसी के पिता बचपन में नहीं रहे। कोई पंचर बनाता है। किसी ने 2002 में अहर्ता परीक्षा पास की। तब से नौकरी नहीं मिली। सब भूल गया अब। कोई खुद बच्चों को पढ़ाता है । कई जगह से इंटरव्यू के लिए बुलावा आया पर किराया न होने के कारण नहीं जा पाया। यहां आने के लिए भी 300 रूपये किराए के लिए आया है किसी मित्र से।
ऐसे में आज ट्रेनों में प्रीमियम किराए के नाम पर रेलवे के टिकटों के दाम बढ़ाने की खबर सुनी तो लगा कि अभी तो यह बच्चा आ गया किसी मित्र से उधार लेकर। प्रीमियम व्यवस्था लागू होने पर शायद मित्र के पास भी देने के लिए पैसे न रहें।

इंटरव्यू लेने वालों के भी मजेदार नजारे देखे मैंने। लोग वही पूछते हैं जो उनको आता है। वह नहीं जो इंटरव्यू देने वाले को आता है। कुछ-कुछ इंटरव्यू लेने वाले तो तब तक सवाल पूछते रहते हैं जब तक बताने वाले बेचारा हारी न बोल दे। उसके चुप होने पर ही पूछने वाले के चेहरे पर मुस्कान आती है। वे फिर अपने साथियों की तरफ देखते हुए मौन रूप में बताते हैं-देखो हमको इतना आता है (मन करता है पूंछे- बस इत्ता ही आता है)। कंडीडेट के बजाय अपना खुद का इम्तहान देते हुए लगते हैं ऐसे लोग।

चाय की दूकान पर चाय पीने पहुंचे तो कुछ बच्चे वहां चाय-नाश्ता कर रहे थे। कुछ ने नमस्ते भी किया। पता चला कि वे हमारे यहाँ चार्जमैन की पोस्ट पर नए भर्ती हुए हैं। कोई इलाहाबाद का कोई जौंनपुर का कोई भोपाल कोई मुगलसराय का। सब प्राइवेट नौकरी करके कुछ दिन आये हैं। 7000/8000 रूपये देते थे वे। यहाँ 30000/- रूपये मिलते हैं।

अकसर यह बात होती है कि प्राइवेट कंपनियां सरकारी कपंनियों की तुलना में सस्ते में सामान बनाती हैं। उस समय यह नहीं देखा जाता कि प्राईवेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को आर्थिक सुरक्षा कितना देती हैं। और भी इसी तरह की बातें।

ये कुकुरमुत्तों की तरह खुले प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों का ही प्रताप है कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्चे दिन में कालेज में पढ़ते हैं और शाम को पास होने के लिए कोचिंग। अपने अध्यापकों को 15-20 हजार रूपये महीना देकर वो बच्चों के घर वालों से लाखों वसूलते हैं। फिर वहां के पास हुए बच्चे चपरासी और दरबान की नौकरी के लिए मारामारी करते हैं। पिछले दिनों देखा मैंने कि चार बच्चे ऐसे हैं जो इंजिनियरिंग की डिग्री धारी हैं और ऐसे काम कर रहे हैं जिसकी अहर्ता आठवीं/दसवीं पास है।

यह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था है। उसकी गुणवत्ता है।

ओह कहां फंस गए हम भी आज बच्चों से बात करते हुए। देर हो गयी।

लौटते में देखा तो सूरज भाई आसमान पर ड्यूटी सम्भाल चुके थे। सुबह हो गयी थी। आप भी चलिए।मजे कीजिये। मस्त रहिये।

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