ज्ञान चतुर्वेदी Gyan Chaturvedi जी के सातवें उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' कुछ पंच वाक्य यहाँ पेश हैं। उपन्यास पर पाठकीय प्रतिक्रिया का लिंक टिप्पणी में दिया है।
1. प्रेम को व्यक्त करने में सदियों से यही दिक़्क़त रही है ; भाषा ऐन मौक़े पर हाथ खड़े कर देती है। और शब्द मुँह छुपाए इक दूजे को ठेलते हैं कि या 'वो शब्द' कहाँ ग़ायब है जो प्रेम को सटीक व्यक्त कर सके।
2. जो पूरा ही अभिव्यक्त हो गया तो वो प्रेम ही क्या? हर बार कुछ न कुछ कहने से छूट जाना ही प्रेम की इस तड़प को बरकरार रखता है।
3. तानाशाह एक बेहद अकेला शख़्स होता है। उसे अकेले में ही मज़ा आता है। वह भीड़ में भी अकेला होता है। अकेलेपन में बेहद सुरक्षित महसूस करता है वो। पास खड़ा दूसरा आदमी उसे भयभीत करता है कि यह कहीं उसकी जगह लेने के गुंताड़े में तो नहीं।
4. हर प्रेमकथा में तानाशाही का बीज अंतर्निहित होता है। प्रेम में डूबकर दूजे के समक्ष बेशर्त समर्पण उसको अपने ऊपर अनियंत्रित अधिकार सौंप देता है। गहन समर्पण होता है प्रेम, और हर गहन समर्पण में ग़ुलामी और तानाशाही के बीज मौजूद रहते हैं।
5. चेहरे अक्सर छिपाते ज़्यादा हैं बताते कम हैं।
6. तानाशाही में लिंगभेद नहीं होता। तानाशाह पुरुष भी हो सकता है , स्त्री भी ; उभयलिंगी भी।
7. तानाशाही कभी शाश्वत नहीं होती। तानाशाह को लगता ज़रूर है कि उसकी तानाशाही हमेशा रहने वाली है पर वह रहती नहीं; तानाशाही के अंत का तानाबाना उसकी बनावट में पहले से ही निहित होता है।
8. हर प्रेम अंतत: तानाशाही में बदल सकता है; देशप्रेम भी।
9. औरत होने के कारण पत्नी के कदम बहक भी सकते हैं। औरत के कदम होते ही ऐसे हैं। ज़रा में बहक जाते हैं। पत्नी को पुरूष नाम की बला से बचाकर रखना पति का बड़ा दायित्व है।
10. दुनिया का हर पुरूष लम्पट है, हर स्त्री पर उसकी बुरी नज़र है और अपनी स्त्री को इससे बचाना हर पति का कर्तव्य है।
11. नैतिकता को स्त्री की टांगों के बीच सीमित कर दो तो निगरानी आसान हो जाती है।
12. देश बादशाह की सनक से चलने का आदी हो चुका था। उसकी सनक ही देश का क़ानून बन जाती थी। देश में संविधान होने का फिर क्या मतलब? यही तो मज़ा था कि संविधान बादशाह की ऐसी सनकों के आड़े नहीं आता, वह उनसे बचकर चलता था; बादशाह की हर सनक संविधान सम्मत हो जाती थी।
13. अनुयायी बनने में यही सुभीता रहता है कि खुद को सोचना नहीं पड़ता; सहमत होना पड़ता है बस। हाँ, सहमति की भाषा, मुहावरा और कहन गढ़ने की स्वतंत्रता आपको दी जाती है।
14. तानाशाह इतना लोकतांत्रिक है कि भक्तों को भजन के बोल और धुन खुद तय करने देता है।
15. मानव मन पर प्रेम का सदियों से क़ब्ज़ा है; जैसा चाहे, वैसा नचाता है प्रेम। वो ऐसा तानाशाह है कि एक बार किसी को ग़ुलाम बनाने की ठान ले तो फिर किसी की सुनता नहीं।
16. प्रेम में पड़ा व्यक्ति अलग दिखता है। प्रेम का तानाशाह अपने ग़ुलाम का चेहरा ही बदल देता है; नूर बरसने लगता है उस पर और ग़ज़ब बात ये कि जो नूर प्रेम के बादशाह के चेहरे पर, वही प्रजा के।
17. जो नागरिक प्रेम करता मिले, अंदर कर दो स्साले को। जब प्रेम के ग़ुलाम ही न बचेंगे तो अकेला बादशाह क्या कर लेगा?
18. दोनो सिस्टम एक साथ चल रहे हैं; लोकतंत्र भी, तानाशाही भी, दोनों सहअस्तिव में हैं और बधिया चल रहे हैं।
19. इधर आप तानाशाही से आजिज़ आने लगते हो, तभी कुछ ऐसा लोकतांत्रिक घट जाता है कि पनप रहे विद्रोह की हवा निकल जाती है। यहाँ ये पता करना सर्वदा असम्भव है कि इस देश में लोकतंत्र कब तो असली चेहरा है, कब एक मुखौटा।
20. यह देश हमेशा ही लोकतांत्रिक चमकीले मुखौटों की झिलमिल पर अश अश करता रहा है। फिर बादशाह के लोकतांत्रिक मुखौटे में तो देशप्रेम की एक मनमोहक झालर भी लगी है जो इसे और आकर्षक बनाती है।
21. दुश्मन से भी नफ़रत करने में जिसे संकोच हो उस देश की सोच में कहीं न कहीं गड़बड़ी है।
22. प्रेम की इबारत पानी पर लिखने जैसी कठिन होती है; लिखते ही मिट जाती है ; ये मिट न सके, बनी रहे, इसके लिए इसे हर पल लिखना होता है। हर पल प्रेम में न गुजरे तो प्रेम को पढ़ा नहीं जा सकता।
23. प्रेम पर अविश्वास इस सिस्टम की पहली शर्त है और नफ़रत पर भरोसा दूसरी।
24. तानाशाह अपने इरादों की भनक कभी स्वयं को भी नहीं लगने देता।
25. बादशाह में थोड़ा भी आदमी नहीं होता; उसमें ज़रा सा भी आदमी बकाया रह जाए तो उसकी बादशाहत ख़तरे में पड़ जाती है।
26. डरना तो दरबार में रहने की पहली शर्त है। सत्ता केंद्र के जितने क़रीब पहुँचो, डर (उतना ही) बढ़ जाता है।
27. दरबार आख़िर है क्या? डरे हुए लोगों का एक संगठित झुंड, बस। सब डरते हैं यहाँ, सब के सब ; हम बादशाह से, बादशाह हमसे, हम एक-दूसरे से, यहाँ तक कि हवा से भी कि हवा ख़िलाफ़ न चल पड़े।
28. डर का ही तो इस देश में आदर है, सभी किसी न किसी से डरते हैं।
29. सिंहासन सुनता नहीं क्योंकि बादशाह के कान ही नहीं है। चापलूस दरबारी ही उसके कान हैं। और ये कान बड़े समझदार हैं; बादशाह को वही बताते हैं जो वह सुनना चाहता है।
30. अपनी पूजापाठ करवाने में मग्न हो जाए तो देवता शक्तिहीन हो जाता है।
31. अन्धभक्तों की भीड़ का ही नाम तो दरबार है,बादशाह के अंध आस्तिकों की भीड़।
32. यह देश खलबली से जीवन रस ग्रहण करने का आदी हो चला है; खुद को कोड़े लगाकर आनंद लेने वाला मैसोकिस्ट। देश को नशा है खलबली का। वैसे कोई खलबली यहाँ लम्बी नहीं खिंचती; चार दिन बाद उसका कोई नामलेवा नहीं रहता, खलबली का नामोनिशाँ नहीं बचता; देश ऐसा हो जाता है मानों यहाँ कुछ हुआ ही न हो।
33. देश खलबली को खलबली तक ही सीमित रखने की कला सीख गया है। कोई खलबली लहर में तब्दील नहीं होने पाती है। देश किसी भी मुद्दे को लहर नहीं बनने देता; बने उससे पहले ही, हर खदबदाते मुद्दे में निरर्थक बहस की पिन गड़ाकर हवा निकाल देता है उसकी।
34. दबाव बनने से पहले ही बहस के वाल्व खुल जाते हैं; और दबाव खलास।
35. हर तानाशाह बचाव के रास्ते बनाकर रखता है।
36. तानाशाह को कौन बताए कि वह वास्तव में अंधा है? आँखों की छोड़िए बादशाह के कानों पर भी तानाशाही के पहरे हैं -असहमति की हल्की आवाज़ के प्रवेश की भी वहाँ सख़्त मुमानियत है।
37. नफ़रत पर टिका सिंहासन डगमगाता रहता है। तानाशाहियाँ नफ़रत के भरोसे चलती हैं परंतु प्रेम से हार जाती हैं।
38. प्रेम को जीतने का सबसे सरल रास्ता है उससे हार जाना ; प्रेम में वही जीतता है जो हार जाता है।
39. ....प्रेम में समर्पण चाहिए, युद्ध नहीं ; युद्ध छेड़कर प्रेम को नहीं जीता जाता।
40. आजकल नैतिकशास्त्र के साथ अर्थशास्त्र का बैलेंस बनाना पड़ता है; एक की तनख़्वाह से घर नहीं चलता, पत्नी को भी नौकरी के लिए घर से बाहर भेजना पड़ता है।
41. कोई भी कथा कभी ख़त्म नहीं होती, ख़त्म होने के बाद भी वो कहीं न कहीं चलती रहती है।
42. तानाशाही भी कभी अंत नहीं होती गो कि उसके अंत के बीज उसकी शुरुआत में ही पड़े होते हैं; ऐसा इसलिए कि तानाशाही के हर अंत के साथ ही उसकी एक और नई शुरुआत का बीज पड़ जाता है।
43. तानाशाह बनते ही हर प्रेमी, प्रेम से बाहर हो जाता है ; प्रेमकथा उसे खुद से बाहर कर देती है। अक्सर प्रेम कथाएँ इसी तरह टूटती-बिखरती हैं।
44. प्रेम की तानाशाही ज़बरदस्त है, वो अपने ग़ुलामों से पूरा समर्पण माँगता है; एक हो गए प्रेमी बाद में कभी दो हो जाएँ तो वो कान पकड़कर अपनी गली से बाहर कर देता है। प्रेम की तानाशाही में प्रेम के सिवाय और किसी चीज़ के लिए गुंजाइश नहीं।
45. जीतने की कोशिश में प्रेम में कुछ भी हासिल नहीं होता। यहाँ तो हारना होता है ; जो जितना बड़ा प्रेमी, वो उतना ही सब कुछ हारने को तत्पर।
46. बादशाहों को अक्सर भ्रम हो जाता है कि वे सब कुछ जानते हैं।
47. समाज में पंद्रह प्रतिशत भी प्रजा समझदार हो तो देश का भविष्य सुरक्षित है।
48. हर प्रेमकथा में मिलन से ज़्यादा हृदयस्पर्शी हिस्सा विछोह का होता है ; विरह में सुलगना विदग्ध अंत भी मिलन के बराबर ही सार्थक होता है। प्रेमकथाएँ प्रेम पर टिकी होती हैं; मिलन तथा विरह से कहीं बड़ी चीज़ होता है प्रेम।
49. कोई भी इलाक़ा बादशाह के बिना रह पाता है क्या? एक , दूसरा आ जाता है। दूसरा चला जाए तो कोई और। सारे बादशाह एक से। सारे तानाशाह तानाशाहों जैसे। सारे बादशाह,बादशाहों जैसे।
https://www.facebook.com/share/p/1GiZqTC5SA/
No comments:
Post a Comment