आजकल ऐतिहासिक बयानबाज़ी का दौर चल रहा है। कोई औरंगज़ेब की कब्र खोदने की बात कर रहा है कोई बता रहा हिंदू राजाओं ने भी कम ग़दर नहीं काटा है अपने समय में।
एक से एक धतकरम हुए बीते समय में। इस मामले में कोई किसी से कम नहीं रहा है। सत्ता प्राप्ति के लिए एक से एक चिरकुटई कर चुके हैं निपट चुके लोग। अच्छाइयाँ भी होती रहीं हैं। लेकिन अच्छाइयाँ कम आकर्षित करती हैं। बुराइयों पर फ़ोकस ज़्यादा रहता है।
सत्ता पाने के बाद बादशाहों/राजाओं ने जमकर मनमानी की है। सत्ता का नशा ही अलग होता है। तुलसीदास जी ने लिखा है:
"नहिं कोउ अस जन्मा जग माहीं,
प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।"
बयानबाज़ियों के चलते पुराने लोगों ख़ासकर औरंगज़ेब के बारे में काफ़ी पढ़ा/सुना। पता चला कि :
1. औरंगज़ेब ने दाराशिकोह के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए धर्म का उपयोग किया था।
2. अपने भाइयों को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसने क़ानूनी रास्ता अपनाया। उनको उनके द्वारा किए गए कामों की सजा के रूप में कानूनन सजा दिलवाते हुए मरवाया।
3. औरंगज़ेब के मन में दारा के प्रति ग़ुस्से का कारण यह था कि शाहजहाँ दारा को ज़्यादा प्यार करता था क्योंकि उसका चेहरा मुमताज़ महल से मिलता था। औरंगज़ेब को बचपन में बाप का प्यार नहीं मिला (माँ तो बच्चा पैदा करती ही चल बसी) इसलिए वह क्रूर, शक्की और निर्दयी होता चला गया।
औरंगेज़ब के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते लोग उसके ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते हुए भी उसके सच्चे अनुयायी हैं। वे सत्ता पाने के लिए धर्म का उपयोग कर रहे हैं। अपने विरोधियों को क़ानून का सहारा लेकर निपटा रहे हैं।सत्ता पाने के बाद अपने राजनीतिक बापों को उसी तरह किनारे कर रहे हैं जैसे कभी औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहाँ को किया था जिसने बचपन में उसके बजाए दाराशिकोह को ज़्यादा प्यार किया था।
औरंगज़ेब की कहानी से यह भी शिक्षा मिलती है कि आप भले ही राजा-महाराजा न हों लेकिन अपने बच्चों के साथ भेदभाव न करें।
औरंगज़ेब के बहाने यह भी सीख मिलती है अगर उस समय परिवार नियोजन लागू होता तो न तो शाहजहाँ के बच्चों को पैदा करते हुए मुमताज़ की मौत न होती और न ही औरंगज़ेब का जन्म होता। शाहजहाँ का बुढ़ापा आराम से कटता। देश-दुनिया का इतिहास शायद अलग होगा।
लेकिन इतिहास अगर कहीं ऐसा होता वैसा होता से थोड़ी चलता है। वह तो घट चुका होता है। घट हुए अघटा करना अभी सिर्फ़ कल्पना में ही सम्भव है। कल्पना में ही जाकर हम अतीत में जाकर उन तमाम लोगों को चपतिया सकते हैं जिनकी गलती का ख़ामियाज़ा हम आज भुगत रहे हैं।
आज तमाम खलिहर लोग बीती बातों पर कपड़े फाड़ते हुए ऐतिहासिक घटनाओं पर अपना ब्लड प्रेसर बढ़ाते अपने-अपने हिसाब से फ़तवे जारी करते हुए कई सुझाव देते हुए बीते समय के लोगों से बदला लेने के उपाय सुझा रहे हैं।
इस बारे में मशहूर समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने अपने लेख 'इतिहास और बदले का सिद्धांत ' में लिखा है :
"दो या तीन सौ साल में इतिहास का एक युग पूरा हो जाता है। तीन सौ साल से अधिक यह होता नहीं है। तीन सौ साल के बाद हरेक घटना अतीत-युग की हो जाती है। उसके साथ आप सीधी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते। उन दिनों के योद्धाओं से आप प्रेरणा ले सकते हैं लेकिन उनकी वीरता की आप वाहवाही नहीं ले सकते। उस पल की उपलब्धियों को आप आगे नहीं बढ़ा सकते। सिर्फ़ उनकी स्वस्थ धाराओं का नवीकरण और पुनर्जागरण कर सकते हैं। उन दिनों की ग़लतियों को आप सुधार नहीं सकते, जैसे मीरजाफ़र या जयचंद की गलती सुधार नहीं सकते, सिर्फ़ आगे के लिए सतर्क हो सकते हैं। इसी तरह उस युग के अपमानों का आप बदला नहीं ले सकते। होठों पर तटस्थ मुस्कान लिए आप उन पर थोड़ी देर मनन कर सकते हैं। बीते युग के असंख्य युद्धों और संधियों, जय-पराजय और मान-अपमान की घटनाओं को इतिहास के खेल के अनुरूप देखकर आपको अनुभव होगा कि आपकी छाती चौड़ी हो रही है, धमनियों में रक्त का प्रवाह तीव्र हो रहा है। हर युद्ध के बाद रक्त का मिश्रण होता है, और हमारी क़ौम तो दुनिया की सबसे हारी हुई क़ौम है।
तीन सौ साल बाद किसी की कोई संतान भी नहीं रह जाती है, सिर्फ़ वंशधर रह जाते हैं। किसी भी भाषा में परदादा और प्रपौत्र के आगे का सम्बंध जोड़ने वाला शब्द नहीं है। नाती,पोते,प्रपौत्र के बाद स्मृति नष्ट हो जाती है। इसलिए क़बीलाई संस्कृति में बदला लेने का अधिकारी नाती-पोते तक रहता है। युग बदलने से कर्म,विचार और भावनाओं का संदर्भ भी बदल जाता है। हमारे युग में मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने का लक्ष्य हो नहीं सकता क्योंकि हमारे युग का संदर्भ भिन्न है।"
इतिहास बदलने के लिए नहीं होता है, न बदला लेना के लिए। इतिहास से हम सीख ही ले सकते हैं और उसके अनुसार आचरण कर सकते हैं। आने वाले समय में अगर कभी इतिहास में दर्ज होने लायक़ हैसियत किसी की बनी तो वही बनेगी जैसे लोग हैं। इतिहास में पेड मीडिया नहीं चलते।
* औरंगज़ेब पर प्रख्यात इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने तमाम दस्तावेज़ों के विस्तृत अध्ययन के बाद पाँच भागों जो लिखा है उसका लिखा पढ़ने का लिंक टिप्पणी में दिया है। सारी गड़बड़ी वामपंथी इतिहासकारों ने की है मानने वालों की जानकारी के लिए कि सर यदुनाथ सरकार के औरंगज़ेब के बारे में किताब का पहला संस्करण 1912 में छपा था जब वामपन्थ की शुरुआत भी नहीं हुई थी।
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