स्मगलिंग का नाम लेते ही हमारे जेहन में सोना, चाँदी, नशे की चीजें, हथियार जैसी चीजें ही आती हैं। लेकिन कभी किताबें भी तस्करी होतीं थीं।
रूस में 1864 से 1904 के दौरान लिथुआनिया में रूसी का प्रसार करने के लिए लिथुआनिया भाषा/लिपि में लिखी किताबों पर बैन लगा दिया गया था। रूस साम्राज्य का यह कदम लिथुआनिया के लोगों उनकी जड़ों से काटने का प्रयास था।
लिथुआनिया भाषा की किताबें पकड़ी जाने पर सजा का प्रावधान था। लिथुआनिया के लोगों ने रूसी साम्राज्य के इस दमनकारी आदेश का मुक़ाबला करने के लिए विदेश में लिथुआनिया भाषा में किताबें छापी और उनको तस्करी करते हुए लिथुआनिया में पहुँचाया। एक तिहाई किताबें पकड़ी जाती थीं । किताब तस्करी करने वालों को फ़ाइन, सजा होती थी, उनको साइबेरिया भेजा जाता था। इसके बावजूद किताबों की तस्करी चलती रही।
किताबों की तस्करी करने वालों में जुर्गिस बिलिनिस (1846-1918) प्रमुख थे। उनको किताबों की तस्करी के राजा कहा जाता था। उन्होंने लिथुआनिया की किताबों की तस्करी का काम पेट पालने के लिए शुरू किया था। बाद में उनको इसमें मज़ा आने लगा। उनको आभास हुआ क़ि यह काम किसी राष्ट्रसेवा से कम नहीं है।
कुछ दिन में पढ़ने लिखने वाले लिथुआनियाई समाज में बिलनिस का नाम कानो-कान प्रसिद्ध हो गया। उनको कई बार किताबों की मुँहमाँगी क़ीमत मिल जाती थी,कभी वे किसी जरूरतमंद को मुफ़्त ही किताबें दे देते थे। किताबों की तस्करी के नए-नए तरीक़े अपनाने वाले बिलक़िस का तस्करी का अन्दाज़ हर बार बदल जाता था।
कुल 32 साल किताबों की तस्करी करने वाले बिलक़िस छह बार पकड़े गए। उनकी पिटाई भी हुई, जेल भी गए लेकिन उनको पता चल गया था कि उनका काम केवल तस्करी नहीं है, वह एक भाषा को विलुप्त होने से बचाने के अभियान में लगे हैं। इस अभियान की कामयाबी में उनके देश की आज़ादी छिपी है।
बाद में 1904 में लिथुआनियाइ भाषा की किताबों पर प्रतिबंध हटा लिया गया। लिथुआनिया की आज़ादी में लिथुआनियाई भाषा की किताबों की तस्करी का प्रमुख योगदान माना गया और लिथुआनिया के आज़ाद होने के बाद बिलक़िस के जन्मदिन को किताब स्मग्लर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है।
किताब तस्करी दिवस के बारे में पढ़ते हुए इस बारे में और जानकारी मिली। 30 के क़रीब किताब स्मगलिंग से जुड़ी सोसाइटी थीं। इनमें एक से लेकर सत्तर तक सदस्य थे। बुक स्मग्लर्स का ब्लॉग है। मूलतः ब्लॉगर होने के चलते ब्लॉग से लगता है कि ये तो अपने ही आदमी हैं। उसी में गिव ये बुक साइट भी है। इसमें किताबों को स्कूल और जेलों तक पहुँचाने की योजनाएँ हैं। उनके प्रोजेक्ट हैं। इनके लिंक टिप्पणी में दिए हैं। उनको तसल्ली से पढ़ना है।
इस बारे में रोचक जानकारी हिंदी दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में छपे ज्ञानेश उपाध्याय जी के लेख के हवाले से मिली। लेख की फ़ोटो यहाँ मौजूद है।
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