Shamim Uddin Ansari जी ने आज ब्याज के बारे में जानकारी देते हुए लिखा:
ब्याज के बारे में क़ुरआन में में सख़्त तम्बीह आई है। ब्याज लेने वाला ऐसा है जैसे उसने ख़ुदा और उसके रसूल से युद्ध छेड़ दिया हो -
“…जबकि ख़ुदा ने तिजारत को हलाल किया और ब्याज को हराम।” (2/275)
“ख़ुदा ब्याज को मिटाता है और दान को बढ़ाता है…” (2/276)
“ऐ ईमानवालों, ख़ुदा से डरो और जो ब्याज बाक़ी रह गया है, वह छोड़ दो अगर तुम सचमुच ईमान वाले हो।” (2/278)
“अगर ऐसा नहीं करते तो ख़ुदा और उसके रसूल से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ।…” (2/279)
(इसलिए मुसलमान बैंक से मिलने वाले ब्याज को भी अलग कर देते हैं)
इस पर मुझे पाकिस्तान के मशहूर लेखक मरहूम मुस्ताक अहमद यसुफ़ी साहब की लिखे किताब पापबीती के वो अंश याद आए जो ब्याज से सम्बंधित थे:
*भारत विभाजन के पहले के तीन-चार सौ वर्षों में ख़ासकर, भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों ने तिजारत को अपनी क़लंदरी (फ़क़ीरी) की शान के ख़िलाफ़ समझा। इसलिए कि उनकी आशंका कि ज़रा सी भूल-चूक या लापरवाही से कहीं मुनाफ़ा न हो जाए।
*मरहूम (स्वर्गीय) वालिद साहब पाकिस्तान आने लगे तो अपने पोस्ट आफिस सेविंग बैंक अकाउंट में साढ़े चार हज़ार रुपए छोड़ आए थे जो उनके हिसाब से सूद की रक़म बनती थी। वे किसी ऐसे मुसलमान के यहाँ दावत खाना तो बड़ी बात है, पानी पीना भी हराम समझते थे, जिसके बारे में उन्हें मालूम हो कि वह अपने एकाउंट पर सूद लेता है।
*उन्होंने एक दिन इमाम अबू हनीफ़ा का क़िस्सा सुनाया था कि एक शख़्स को दफ़न करने के बाद लोग एक मकान की दीवार के साये में खड़े हो गए। मगर इमाम अबू हनीफ़ा दूर चिलचिलाती धूप में खड़े रहे। किसी ने पूछा हज़रत! आप साये में क्यों नहीं आ जाते? इमाम साहब ने जबाब दिया उस मकान का मालिक मेरा क़र्ज़दार है। अगर मैं उसकी दीवार के साये से फ़ायदा उठाऊँ तो डरता हूँ कि क़यामत के दिन इसका शुमार सूद में न हो जाए।
Shamim Uddin Ansari जी की ब्याज पर लिखी पोस्ट के बहाने 'पापबीती' फिर से निकाल ली। पढ़ते हुए एक बार फिर से लगा कि क्या अन्दाज़-ए-बयां है मुस्ताक अहमद युसुफ़ी साहब का। इनकी हर किताब बार-बार पढ़ने लायक़ है उसमें भी 'पापबीती' सबसे ख़ास है।
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