Sunday, March 23, 2025

विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ


 कल विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलने की खबर आई तो उनसे हुई एकमात्र मुलाकात की याद फिर से आई।

वर्धा में तीसरी राष्ट्रीय ब्लागर संगोष्ठी के हुई थी। महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा पहली राष्ट्रीय ब्लागर संगोष्ठी इलाहाबाद में 2009 में हुई थी। इसका उद्घाटन नामवर सिंह जी ने किया था। देश के तमाम सक्रिय हिंदी ब्लागर आए थे। अद्भुत अनुभव था। इसके आयोजन में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की सक्रिय भूमिका थी।
उन दिनों लिखा-पढ़ी की दुनिया में ब्लाग का बड़ा हल्ला था। बाद में दूसरे तमाम हल्लों की तरह ब्लागिंग का शोर भी धीमा हुआ। लोग दूसरे माध्यमों की तरफ़ मुड़ गए।
दूसरी संगोष्ठी 2010 में वर्धा में हुई थी। वहाँ आलोक धन्वा जी और राजकिशोर जी मुलाकात हुई थी । तीसरी संगोष्ठी 2013 भी वर्धा में हुई थी। उस समय तक सिद्धार्थ त्रिपाठी वर्धा छोड़ चुके थे। लेकिन गोष्ठी के आयोजन के लिए ख़ासतौर वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति भूषण राय जी के अनुरोध पर ख़ासतौर से गोष्ठी कराने आए थे। विभूति भूषण राय जी के वर्धा विश्वविद्यालय से हटने के बाद ब्लागर गोष्ठी का सिलसिला ख़त्म हो गया।(तीसरी संगोष्ठी के विवरण का लिंक टिप्पणी में।)
तीसरी ब्लागर संगोष्ठी में विनोद कुमार शुक्ल जी से 21 सितम्बर, 2013 को रात को मुलाकात हुई थी। काफ़ी देर बातें हुईं। विनोद जी ने धीमी आवाज़ में कई संस्मरण सुनाए। जबलपुर के दिनों की यादें साझा कीं। परसाई जी से जुड़े कई संस्मरण सुनाए। थोड़ा ऊँचाई सुनाई देता था उस समय भी उनको। हम लोग ऊँची आवाज़ में उनसे बातचीत कर रहे थे। वे शांत, धीमी आवाज़ में जबाब दे रहे थे। बाद में संकोच के साथ उन्होंने हम लोगों से कहा -"जो बातें हम लोगों ने की उनको साझा न करें।" हमने नहीं किया। अब तो याद भी नहीं क्या-क्या बातें हुईं थीं। बस यही याद है ख़ूब बातें हुईं थीं।
वर्धा में मुझे याद है Shailesh Bharatwasi भी साथ थे। उस समय उन्होंने प्रकाशन का काम शुरू ही किया था। बाद में उनके प्रकाशन से विनोद जी की किताबें भी आईं। एक कविता संग्रह 'केवल जड़ें हैं' में उनकी साठ के दशक में लिखीं कविताएँ उनके हस्तलेख में भी हैं। अनूठा कविता संग्रह है यह।
कल जब विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान की घोषणा हुई तो उनके साथ की फ़ोटो खोजी। नहीं मिली। संतोष त्रिवेदी के पास थीं। आज उन्होंने भेजीं।ये फ़ोटो याद हैं एक संवेदनशील कवि के साथ की। एक संवेदनशील इंसान के साथ की। विनोद जी लेखन पर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। उनको ज्ञानपीठ का सम्मान मिलने के बाद और भी बहुत कुछ लिखा-कहा जाएगा। उनको सम्मान मिलना हम सबके लिए एक ख़ुशनुमा अनुभव है।
विनोद जी को ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त होने की फिर से बधाई। अनंत शुभकामनाएँ।
विनोद जी की एक कविता जो मुझे बहुत पसंद है:
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
-विनोद कुमार शुक्ल
कविता संग्रह 'कवि ने कहा ' से

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