कल ज्ञान चतुर्वेदी जी का नया उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' पढ़कर ख़त्म किया। पिछले साल छपा यह उपन्यास पिछले क़रीब महीने भर से लगातार साथ रहा। टुकड़ों-टुकड़ों में पढ़ते भी रहे। शुरुआत बहुत रोचक रही। फिर ठहराव आया पढ़ने में। पिछले हफ़्ते एहसास हुआ कि पढ़ने की गति काफ़ी धीमी है। स्पीड बधाई। कल क़रीब सौ पेज फटाफट पढ़ते-पलटते हुए किताब पूरा हो गयी।
312 पेज की किताब पढ़ने का सुकून हासिल हुआ। मेरी समझ में यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है आज के समय में जब मोबाइल, सिनेमा, यूट्यूब, रील्ज़ और खुद के छिटपुट लेखन के राक्षस 'पठन यज्ञ' में विघ्न डालने के लिए निरंतर सामने, आसपास मौजूद हों।
उपन्यास की कहानी सबसे अच्छी तरह से उपन्यास के पीछे कवर वाले पेज में ही बताई गयी है :
" यह उपन्यास ऐसे तीन प्रेमियों की कथाओं से शुरू होता है, जिन्हें अब भी लगता है क़ि वे प्रेम कर रहे हैं, लेकिन दरअसल वे कर रहे हैं तानाशाही, क़ब्ज़ा और क्रूरता। सम्बंध उनके लिए दलदल बन चुका है, जिससे निकलने को उनकी रूह छटपटाती रहती है जिसने कभी सारी दुनिया को छोड़कर प्रेम का वरण किया है; लेकिन जब तक वे अपनी इस छटपटाहट को समझ पाते, एक चौथा प्रेमी कक्षा में प्रवेश करता है जिसे लगता है उससे बढ़ा प्रेमी कोई है ही नहीं। यह देशप्रेमी है, देश का बादशाह, जिसे लगता है कि प्रेम बस एक ही होता है -देशप्रेम, बाक़ी हर प्रेम उसकी राह में बस रुकावट पैदा करता है। असली कथा यहीं से शुरू होती है........"
ज्ञान जी ने उपन्यास की भूमिका में इस उपन्यास के लिखे जाने की कहानी विस्तार से बयान की है। उपन्यास में वर्णित कथाओं के कच्चे माल के स्रोत के बारे में बताते हुए ज्ञान जी लिखते हैं :
"मेरे मरीज़, दोस्त, परिचित लोग और उनके द्वारा समय-समय पर साझा की गई कहानियाँ काम आईं। मरीज़ को डाक्टर के संवेदनशील होने का विश्वास हो जाए, उसे भरोसा हो जाए कि डाक्टर पर भरोसा किया जा सकता है तो वो उसको अपने जीवन के उन अंधेरे-उजियारे पक्षों का साझा बना लेता है जो उसके नितांत अपने हैं, जिन्हें अपने-अपनों से भी कभी साझा नहीं किया है। तो यूँ समझें कि उपन्यास की प्रेमकथाएँ पिछले चार-पाँच दशकों में मुझ तक टुकड़ों-टुकड़ों में इस सबके ज़रिए ही पहुँची हैं। ये किसी एक या दो लोगों की प्रेमकथाएँ नहीं। ये तो कई थीं जो मिलकर एक हो गईं।"
यहाँ दो बार 'डाक्टर' शब्द के प्रयोग से एहसास होता है कि लोग केवल डाक्टरों से ही अपनी बातें साझा करते हैं। जबकि मेरा अनुभव है कि भरोसे के लिए इंसान होना ही काफ़ी है। मेरे ऐसे तमाम अनुभव हैं जहां लोग ज़रा सी देर में खुलकर अपनी तमाम अंतरग बातें साझा कर देते हैं अगर उनको सुनने वाले पर भरोसा हो। ज्ञान जी भी यह बात समझतें होंगे और मानते होंगे लेकिन चूँकि यह बात उन्होंने डाक्टर होने के आते लिखी इसलिए ऐसा लिखा।
वैसे तो प्रेम में तानाशाही का चलन काफ़ी पुराना है। कबीरदास जी कहते हैं :
नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ॥
(हे प्रिय ! ( प्रभु ) तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं ! फिर न तो मैं किसी दूसरे को देखूं और न ही किसी और को तुम्हें देखने दूं !)
ये 'न देखूँ न देखने दूँ' वाला मामला है( न खाऊँगा न खाने दूँ वाला नारा भी शायद यहीं से निकला होगा)। यही प्रेम की तानाशाही है।
रोचक अन्दाज़ में शुरू हुए इस उपन्यास में अलग-अलग तानाशाहों के किस्से हैं। उनकी सनकें हैं। राजा-रानी, रस्तोगी-पायल, पूनम-कुशल, बादशाह-देश, सूरज-नायब जान ये पाँच जोड़े हैं प्रेम की तानाशाही के नाटक के। इनमें पहले चार जोड़े प्रेम में तानाशाही करते हैं। पाँचवा जोड़ा प्रेम करता है।
राजा-रानी जोड़े में राजा प्रेम की तानाशाही में मार-पीट भी करता है, रस्तोगी-पायल में रस्तोगी शक करता है, पूनम-कुशल वाले जोड़े में पूनम कुशल के ऊपर रूठने-मान जाने वाले अन्दाज़ में तानाशाही करती है। बादशाह-देश वाले युग्म में तानाशाही की कहानी को व्यापक रूप दिया गया है। इसमें बादशाह सनक और बेवकूफ़ी में ऊलजलूल हरकतें करता है, जनता उसे स्वीकार करती है। इसी एक सनक में प्रेमबंदी का आदेश भी है जिसे पहली नज़र में नोटबंदी से जोड़ा जा सकता है लेकिन न भी जोड़ें तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। सनक तो किसी भी बात पर किसी को हो सकती है।
रस्तोगी-पायल प्रकरण में यौन विवरण भी डालने की कोशिश की गयी। अंग्रेज़ी और दूसरी पश्चिम की भाषाओं में यौन विवरण सहजता से आते हैं। मारखेज के उपन्यास 'एकांत के सौ साल' में कई यौन विवरण हैं ( कौटुम्भिक व्यभिचार) जिनको पढ़कर लगता है कि अगर हिंदी में ऐसा कुछ लिखा जाए तो लेखक की तो ऐसी-तैसी कर दें लोग। इस सीमा के चलते ही शायद ज्ञान जी ने यौन विवरण शर्माते हुए व्यंग्यात्मक शैली में टाइप लिखे हैं।
उपन्यास पढ़ने में मुझे शुरू में रोचक लगा। बाद में प्रेमबंदी लागू होने के बाद दोहराव और जबरदस्ती लम्बा करने की कोशिश करने वाला लगा। यह भी हो सकता है कि मेरी उपन्यास को जल्दी पढ़कर ख़त्म न कर पाने की खीझ के कारण ऐसा लगा हो। लेकिन लम्बे-लम्बे वार्तालाप पढ़कर यही लगा कि यहाँ अपनी विवरणात्मक क्षमता का पूरा उपयोग उपन्यास को लम्बा करने में किया गया है ।
यह विवरणात्मक अन्दाज़ शायद ज्ञान जी की शैली भी है। एक बात को कई तरह से कहने का अन्दाज़। इस तरह नहीं समझ में आया तो ऐसे समझो। ये भी नहीं आया समझ में तो ऐसे समझो। अच्छा अब ये लो इधर से देखो। अब तो समझ में आया? पाठक के लिए आसान पाठ टाइप का लेखन। पहले एक बात कही फिर उसके कई भाष्य। हर तरह का अन्दाज़ उपलब्ध है अपने पास। कहाँ से बच के जाएगा पाठक बेचारा। समझना तो पड़ेगा बच्चू को।
प्रेमबंदी के बहाने इस उपन्यास में आज के समय में दुनिया में लोकतंत्र के बहाने पनपती तानाशाही और जिनके हाथ में सत्ता है उनकी हरकतों का सटीक चित्रण किया गया है। शासक की चापलूसी, उससे डर का भाव, किसी तरह जान बचाने के लिए जो-जो करम किए जाते हैं उनका विस्तार से वर्णन हुआ है उपन्यास में। शासक अपने दुश्मनों को निपटाने में किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं उनका चित्रण भी है।
उपन्यास के शुरुआत में प्रेम की तानाशाही का चित्रण करते हुए फिर प्रेमबंदी शुरू होने पर उपन्यास में मसखरापन सा बिना किसी की अनुमति के दाखिल हो जाता है। प्रेमबंदी की बंदिशों को धता बताते हुए लेन-देन करके धड़ल्ले से प्रेम करते हुए लोग और उनके विवरण पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्यकार की तानाशाही चल रही है। प्रेम बेचारा अपनी तानाशाही की सत्ता का माखौल उड़ते चुपचाप देखता रहता है।
वैसे तो लेखक का हक़ है कि वह जो मन आए उसे लिखे लेकिन अपने सीमित अनुभव और समझ के अनुभव प्रेम की तानाशाही से शुरू हुए उपन्यास में बादशाह का शामिल हो जाना और उसमें नोटबंदी की तर्ज़ पर प्रेमबंदी आ जाने से उपन्यास सहज रूप से मौज-मज़े की तरफ़ मुड़ गया।
उपन्यास में गाली, गलौज नहीं हैं लेकिन सहज भैंचो, चूतिया और यार तकियाकलाम के रूप में जगह-जगह मौजूद हैं। मज़े की बात की राजा अपनी रानी को पीट रहा है तब भी पिटती हुई रानी अपने राजा से यार, यार करते हुए बात कर रही है। यह हमें अखरता है लेकिन क्या पता ऐसा होता हो। जिन लोगों ने ज्ञान जी को अपने अनुभव सुनाए हों उनमें इसी तरह होती हो प्रेम की तानाशाही।
उपन्यास का अंत कैसे हुआ यह जानने के लिए उपन्यास पढ़िये। सब कुछ हम थोड़ी न बताएँगे।
उपन्यास में घरेलू प्रेम में तानाशाही करने वाले तीनों जोड़े शादी-शुदा हैं। इसमें नयी उमर के प्रेम करने वाली पीढ़ी (जेनजी पीढ़ी) के प्रेम की तानाशाहियाँ जुड़ीं होती तो पाठकों की रेंज और बढ़ जाती। लेकिन फिर तो वह चेतन भगत की तरह पाठकों को टार्गेट करके लिखने का अन्दाज़ हो जाता।
यह मेरी अपनी पाठकीय टिप्पणी है। किसी का सहमत होना इससे क़तई ज़रूरी नहीं है, ज्ञान जी का तो क़तई नहीं। वे अपने लेखन के स्वयं प्रवक्ता हैं। जो उनकी नज़र होती है वही अंतिम होती है। किसी दूसरे के भरोसे नहीं रहते । यही उनका अन्दाज़ है और प्यारा है।
कुल मिलाकर रोचक उपन्यास है 'एक तानाशाह की प्रेम कथा।' ज्ञान जी का सातवाँ उपन्यास है यह। एक नए तरीक़े से लिखा गया उपन्यास। कमियाँ तो कोई भी बता सकता है। लेकिन 312 पेज का उपन्यास लिखा जाना अपने आप में बधाई का काम है। उसमें भी उपन्यास के काफ़ी हिस्से तक पढ़ने की रोचकता बनाए रहना इस उपन्यास की सफलता है। ज्ञान जी को इसके लिए बधाई। अब उनके अगले उपन्यास का इंतज़ार है।
(उपन्यास के पंच का लिंक टिप्पणी में)
उपन्यास - एक तानाशाह की प्रेम कथा
लेखक -ज्ञान चतुर्वदी
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
पेज -312
क़ीमत- 399
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