मदु नदी में वोटिंग के बाद हम लोग पास में ही स्थित एक ज्वेलरी शाप में गए। वहाँ मौजूद व्यक्ति ने हम लोगों को जेम स्टोन पहचानने और उनको भट्टी में गरम करने का तरीक़ा बताया। यह भी कि उनकी दुकान से लेने पर वे सर्टिफिकेट देते हैं। कभी भी ख़राब निकलने पर वापसी की गारंटी। यह भी कि वे खुद जेम स्टोन तैयार करते हैं। कोई बिचौलिया भी नहीं है इसलिए उनके यहाँ जेम स्टोन कम दाम पर उपलब्ध हैं।
हमारे साथ के लोगों में से कुछ ने कुछ ख़रीदारी की। हम वहाँ रखी फ़ैक्स मशीन जैसी मशीन को देखते रहे। वह मशीन अलग-अलग देशों के नोट्स को जाँचने की मशीन थी। हमारे सामने कई देशों के नोट जाँचे गए। एक छुटकी सी मशीन को यह सब करते देखकर ताज्जुब हुआ।
ज्वेलरी शाप से निकलकर हम लोग लंच करने के लिए एक होटल गए। शाकाहारी खाना। एक दिन पहले हमारी शादी की सालगिरह मनाई गयी थी। उसके उपलक्ष में लंच हम लोगों की तरफ़ से था। 16 लोगों का लंच का खर्च 58400 श्रीलंकाई रुपए हुआ। भारत के हिसाब से लगभग 17000 रुपए। 1062 रुपए प्रति व्यक्ति। होटल अच्छा था। विदेश के लिहाज़ से ठीक ही कहा जाएगा।
खाना खाकर हम लोग एक कछुआ संरक्षण संस्थान देखने गए। एक स्वयं सेवी संस्था द्वारा संचालित उस संस्थान में कछुओं की देखभाल की व्यवस्था थी। आजकल आए दिन चीनी माँझे से लोगों की गर्दन और दूसरे अंग कटने की खबरें आती हैं। उसी तरह मछुआरों के जाल से कछुओं के अंग कट जाते हैं। वहाँ कई कछुए ऐसे दिखे जिनके कुछ -कुछ अंग कटे थे। किसी का एक पैर कटा, किसी का आधा, किसी के दो, किसी के तीन, किसी के चारों पैर कटे दिखे । मतलब अलग-अलग तरह के दिव्यांग कछुए। जिन कछुओं के चारों पैर कटे थे वे तैरने में बिल्कुल असमर्थ , पानी के बहाव के साथ इधर-उधर हो रहे थे।
कछुओं के शिकार भी लोग करते हैं। उनके संरक्षण के लिए यह संस्थान काम करता है। कछुए समुद्र किनारे अंडे देते हैं। उनको लोग ले जाते हैं। विविध तरीक़े से उनका उपयोग करते हैं। इससे कछुओं की जनसंख्या पर असर पड़ता है। उनका अस्तित्व ख़तरे में है। यह संस्था समुद्र किनारे कछुओं के अंडों को बीनकर अपने यहाँ ले जाकर ऐसे वातावरण में रखते हैं जिससे कछुए पैदा हो सकें। उनकी जनसंख्या बढ़ सके।
भारत में कछुआ वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित है। संरक्षित क्षेत्र वाराणसी शहर से होकर रामनगर किले से मालवीय रेल/रोड ब्रिज तक बहने वाली गंगा नदी का 7 किमी लंबा हिस्सा है। इसके अलावा 'कछुआ पुनर्वास योजना' के तहत सारनाथ (वाराणसी) और कुकरैल वन (लखनऊ) में कछुआ प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं।
वहाँ लोगों को विभिन्न तरीक़ों के कछुओं की जानकारी दी। उनके बारे में बताया। कछुए की औसत उमर 300 साल होती है। आदमी की सौ की उमर का तीन गुना। वहाँ पैर कटे-फटे पानी में तैरते कछुओं को देखकर हम सोचते रहे कि आठ दस साल की उमर का कछुआ कैसे आने वाले दो-तीन सौ साल जिएगा।
कछुआ संरक्षण संस्थान को को देखने का टिकट 2000 श्रीलंका रुपए था। मतलब 580 भारतीय रुपए। हम लोगों में से कुछ लोगों ने टिकट लिया, कुछ ने कहा -हमें नहीं देखना। लेकिन बाद में उनमें से कुछ लोग भी अंदर आ गए और कछुआ दर्शन किया। कुछ उसी तरह का मामला था जैसे हम लोग बिना प्लेटफ़ार्म टिकट के स्टेशन टहल आते हैं।
वहाँ हमने कछुए का अंडा भी देखा। एकदम टेबल टेनिस की गेंद के आकार का। नरम प्लास्टिक सरीखा अंडा। वहाँ मौजूद रखवाले ने बताया कि वे लोग कछुए के अंडों को आधा मीटर बालू के नीचे दबा देते हैं। उन अंडों से 48 दिन से 70 दिन में बच्चे पैदा होते हैं। उन बच्चों को वे लोग पानी में डाल देते हैं। बच्चों को रात के समय पानी में डालते हैं ताकि कछुए के नवजात बच्चों को पंछी लोग खा न जाएँ।
वहाँ मौजूद पानी में तैरते कछुओं को लोग अलग-अलग तरह से छू कर, महसूस करके, उनके प्रति दया और आश्चर्य व्यक्त करते हुए उद्गार व्यक्त किए। कुछ कछुए पानी में तसल्ली से सोए हुए थे। हमारे कारण उनकी दोपहर की नींद में ज़रूर खलल पड़ा होगा। उनमें से ज़्यादातर बेमन से ही पानी में तैरने भी लगे। आपस में ज़रूर वे कह रहे होंगे कि अच्छी-भली नींद ख़राब कर दी हमारी।
क़रीब दो घंटे तक वहाँ रहने के बाद हम लोग बैंटोटा समुद्र तट देखने के लिए चल दिए।

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