Wednesday, March 26, 2025

सुविधा संरक्षण का सिद्धांत


 पिछले हफ़्ते एक किताब आनलाइन आर्डर की थी। डिलीवरी वाले दिन सुबह से ही संदेश आ गया-"आज दस से बारह बजे के बीच आपका सामान डिलीवर होगा।"

ग्यारह बजे के क़रीब मोबाइल पर फ़ोन आया- "अपना सामान ले लीजिए।"
मैं घर के बाहर ही खड़ा था। मैंने कहा -"अरे, मैं बाहर ही खड़ा हूँ। आओ तो।"
दो मिनट बाद डिलीवरी बालक मोटरसाईकिल पर आया। पीछे बड़ा बैग। दाएँ-बाएँ भी गठरी में सामान। सर पर हेलमेट। कोई पर्वतारोही जैसे रोज़ी-रोटी के पहाड़ पर चढ़ने के लिए निकला हो।
हम जब तक गेट खोलकर बालक तक पहुँचे उसने मेरी किताब अपने एप में 'डिलीवर्ड' दिखा दी थी। मोटरसाईकिल पर बैठे-बैठे किताब थमा दी। चलने ही वाला था कि हमने बातचीत की गरज से कहा -"हमको किताब मिलने के पहले ही डिलीवर हो गयी। बड़ी तेज स्पीड है तुम्हारी।"
उसने कहा -"अरे आप जैसे लोग सपोर्ट कर देते हैं तो डिलीवरी का काम आसान हो जाता है। आप बाहर नहीं आते तो मोटरसाइकिल खड़ा करता। घर के अंदर जाता। पूछता। खोजता। तब डिलीवर करता।"
बालक ने बताया कि उसके पास 140 पैकेट थे डिलीवर करने को। हर पैकेट पर दस रुपया डिलीवरी के मिलते हैं। दिन भर में इतने पैकेट बाँट देने हैं। बताते हुए बालक अगली डिलीवरी के लिए निकल लिया।
बचपन में हम लोग पोस्टमैन पर निबंध पढ़ते थे। पोस्टमैन एक सरकारी कर्मचारी होता है। वह दरवाज़े-दरवाजे जाता है। डाक बाँटता। अब पोस्टमैन का काम डिलीवरी एजेंट करने लगे हैं लेकिन उन पर निबंध नहीं आता शायद। पता नहीं पोस्टमैन पर भी निबंध आता है कि नहीं आजकल।
ब्लिंकिट जैसे एप पर भी सामान डिलीवर करने के लिए बालक लोग आते हैं। उनको दस मिनट में डिलीवरी करना होता है। इस चक्कर में डिलीवरी करने वाले बच्चे हड़बड़ाए, घबराए दिखते हैं। कहीं देर हुई तो पैसा न काट लिया जाए। इस चक्कर में डिलीवरी बालक तनाव में भी आ जाते होंगे। किसी की तबियत भी ख़राब हो सकती है इस चक्कर में। इस तरह की सुविधाएँ लगातार अमानवीय होती जा रहीं हैं। पैसे वाले लोगों की सुविधा के लिए बनने वाला हर साधन सेवा के काम में 'जुते' लोगों के लिए अमानवीय होता जा रहा है।
आइंस्टाइन के ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत की तर्ज़ पर शायद सुविधा संरक्षण का सिद्धांत काम करता है। दुनिया में कुल सुविधा की मात्रा स्थिर रहती है। एक को मिलने वाली सुविधा किसी दूसरे की सुविधा के बदले होती है।
हम भी कहाँ सुबह-सुबह सिद्धांत की बातें करने लगे। आपका भी समय बरबाद किया। समय संरक्षण का सिद्धांत भी तो है न -"एक पोस्ट को पढ़ने में लगा हुआ समय किसी दूसरी पोस्ट को पढ़ने के समय की क़ीमत पर होता है।"
ये सिद्धांत की बात तो लफ़्फ़ाज़ी सी है। बैठे-ठाले की लंतरानी। लेकिन यह सोचा है कि कोई डिलीवरी बालक आएगा तो लपक के सामान ले लेंगे। जितनी जल्दी सामान लेंगे उतना उसको सहूलियत होगी।

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