Saturday, March 22, 2025

गरीब आदमी की मरन है


 कल शहर से घर आते हुए एक लड़का घोड़े पर बैठकर जाता दिखा। घोड़े की ऊँचाई कम थी। शायद खच्चर रहा हो। कह नहीं सकता।

आजकल आदमी के बारे भी इत्मिनान से कुछ कहना मुश्किल तो जानवर के बारे में कैसे कह सकते हैं?
बच्चा घोड़े पर एक तरफ़ पैर करके बैठा था जैसा कभी पुराने जमाने में स्कूटरों में महिलाएँ बैठती थीं। दूसरे घोड़े की बाग उसके हाथ में थी। दूसरा घोड़ा पहले का अनुसरण करते हुए दुलकी चाल से चला जा रहा था- "महाजनों एन गत: सा पंथा।"
कभी घोड़े आम सवारी होते थे। सेनाओं की ताक़त घुड़सवारों की संख्या से तय होती थी। अब घोड़े इक्का-दुक्का ही दीखते हैं सड़कों पर। समय के साथ बदलता है बहुत कुछ। पहले न्यायाधीश का मतलब ईमानदार होता था। अपनी तनख़्वाह में गुज़ारा करने वाले, न्याय करने वाले। अब ऐसे लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं। अब ज़्यादातर जजों का तनख़्वाह से गुज़ारा नहीं हो पाता। बेचारों को अलग से मेहनत करके केस सेटल पैसे कमाने पड़ते हैं।
घोड़े की बात से कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित 'घोड़े वाले' याद आ गए। वे कानपुर में चुनाव लड़ते थे। घोड़े पर चलते थे। अख़बार वाले उनको 'राबिनहुड ऑफ इंडिया' बताते हुए लेख लिखते थे। दीक्षित जी भाषण देते हुए मज़ेदार जुमले बोलते थे:
1. जब लड़का सरकारी नौकरी में आता है तो घर वाले कहते हैं क्या फायदा ऐसी नौकरी का जिसमे ऊपरी कमाई न हो। वही लड़का जब बाद में घूस लेते हुये पकड़ा जाता है तो कहते हैं हाथ बचाकर काम करना चाहिये था। मतलब सब चाहते हैं लड्डू फूटे चूरा होय ,हम भी खायें तुम भी खाओ।
2. आगे की मोर्चे हमको आवाज दे रहे हैं। कोई गलत काम करने से पहले सोचो कि आगे की पीढियां सवाल करेंगी कि अब्बा जान -अब्बा जान यू हैव बिट्रेड द कन्ट्री (आपने देश के साथ धोखा किया है)
3. देश में आज लल्लू, जगधर छाये हुये हैं। ये जनता को धोखा दे रहे हैं। जनता सब समझती है लेकिन कुछ बोलती नहीं है। इसीलिये ये जनता को लूट रहे हैं।
4. चुनाव में आदमी नहीं पैसा जीतता है। नोट से वोट खरीदे जाते हैं। जब तक देश में घोड़ेवाले की तरह के आम आदमी के चुनाव जीतने के हालात नहीं बनते तब तक देश की हालत नहीं सुधर सकती।
दीक्षित जी की पार्टी के दो स्थायी सदस्य थे। एक वे खुद दूसरा उनका घोड़ा। वे कहते कि अगर वे चुनाव जीते तो घोड़े के साथ लोकसभा में जायेंगे। लोग पूछते कि लोकसभा में उनका घोड़ा कैसे रहेगा! इसपर वे जबाब देते:
"जिस संसद में सवा पाँच सौ गधे जा सकते है वहां मेरा एक घोड़ा क्यों नही रह सकता है!"
एक बार दीक्षित जी से उनके घर पर मिला था। हरसहाय इंटर कालेज के पीछे गली में तिमंज़िले पर रहते थे। घर वाले नाराज़ रहते थे उनसे। नीचे दरवाज़े पर खड़े-खड़े कुछ देर बात हुई। उन्होंने कविता सुनाई :
"चलो न मिटते पद चिन्हों पर, अपने रास्ते आप बनाओ।"
(दीक्षित जी के बारे में लिखी पोस्ट टिप्पणी में दिए लिंक में जाकर पढ़ सकते हैं)
आगे उसी गन्ने के रस की दुकान पर रस पिया जहां कुछ दिन पहले पिया था। पहले दिन तो नाम नहीं बताया था दुकान वाली महिला ने। लेकिन अगले दिन बात करने पर बताया था नाम - सुनीता। कल रस पीते हुए याद आया सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष से लौटी हैं। मन किया कि सुनीता का इंटरव्यू करके स्टोरी बनाएँ - "एक सुनीता ये भी।" लेकिन फिर सुनीता को गन्ने का रस बेचने में व्यस्त देखा तो मन को बरज दिया।
रस पीते हुए अलबत्ता कुछ बात हुई। अग़ल-बग़ल हर दस बीस मीटर पर गन्ने का रस बेचने वाले मौजूद हैं। सुनीता ने बताया -"क्या करें लोग? रोज़ी-रोटी का सवाल। हर कोई बेंच रहा है।" लेकिन किसी से कोई शिकायत नहीं सुनीता को। बोली -"भगवान जिसको जो देता है वो मिलता है। पेट भरने का मिल जाता है वही बहुत है।"
हमारे देखते एक कामगार महिला आई। ठसक के साथ रस पिया। चलते हुए बोली -"हमारे हिसाब में लिख लेना।" उसकी ठसक देखकर अच्छा लगा।
रस पीते हुए ही हमने आनलाइन ऑटो बुक कर लिए था। ऑटो वाला बग़ल में आकर खड़ा हो गया। रस पी रहे थे तो उससे भी पूछ लिया। पूछने हुए याद आया कि वह मुस्लिम है। नाम आया था -"अनीश अली।" लगा उसका रोजा होगा। लेकिन पूछने पर उसने बताया कि वो रोज़े से नहीं है। उसको भी रस पिलाया। चल दिए घर की तरफ़।
रास्ते में बिना पूछे अनीश ने अपने रोजा के बारे सफ़ाई देना शुरू किया। कहा - "रोजा का मतलब पाँच बार की नमाज़। काम के चलते यह मुश्किल। फिर भी दस रोजा रह चुके हैं।"
होते करते बात घर-परिवार की होने लगी। बताया कि उसके दो बच्चे चार साल और दस साल की उमर के होकर नहीं रहे। कोई बीमारी हो गयी थी जिसमें हड्डी ख़राब हो जाती हैं। बहुत इलाज कराया लेकिन बच्चे बचे नहीं। सुकून की बात कि तीसरा बच्चा ठीक है। दस साल का है। कोई बीमारी नहीं।
जितनी देर बात हुई उतने के लब्बो-लुआब यह कि गरीब आदमी की मरन है। जिसके पास पैसा है उसके साथ सब कुछ है। जिसके पास पैसा नहीं उसका साथ कोई नहीं देता। पैसे के सब साथी। हमने सोचा बात तो सही है। हर जगह पैसे वालों के साथ लोग खड़े हैं। सरकारें तक उनको फ़र्शी सलाम बजाती हैं।
अनीश ने बताया कि उसके पिता कबाड़ का काम करते हैं। पत्नी बीमार हैं। दवा दिलाकर आया ऑटो लेकर। घर बनवा रहा है। चकेरी के पास। सरिया लेना है घर के लिए।
उसने पूछा भी -"कामधेनु सरिया ले रहे हैं घर के लिए। ठीक है? ले लें?"
हमने बिना सोचे कहा -"हाँ ले लो। बढ़िया है।"
बाद में सोचा कि कामधेनु तो गाय का नाम है। समुद्र मंथन में निकली थीं। इसके पास ऐसी शक्तियाँ होती हैं जिससे हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। लेकिन यह तो हिंदू मिथकों के अनुसार है। क्या कामधेनु एक मुस्लिम की मनोकामना पूर्ण करती होंगी। क्या वे भी हिंदू-मुसलमान मानती होंगी?
रास्ते में बताया अनीश ने कि ऑटो उसका किराए का है। 500 रुपए रोज पर। सौ रुपए चार्जिंग के अलग।
चलते हुए अनीश ने कहा -"कोई नौकरी हो तो बताइएगा।"
हमने सोचा कि आजकल प्रधानमंत्री तो नौकरी के बारे में बता नहीं पा रहे हैं। हम क्या बताएँगे? लेकिन कहा कुछ नहीं।
घर आकर पैसे दिए। अनीश चला गया। लेकिन उसकी बात याद आ रही -"आजकल पैसे के सब साथी होते हैं। गरीब का कोई साथ नहीं देता। गरीब आदमी की मरन है। "

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