कुछ लोगों को कुणाल कामरा की कामेडी बेहूदी होने की हद तक सस्ती लगती है।
कुणाल कामरा की कामेडी सस्ती होने का कारण यह भी हो सकता है कि उनको डर होगा कि मंहगी कामेडी लोग समझ न पायें तो लोग बुरा भी नहीं मान पाएंगे। बवाल भी नहीं होगा। बवाल नहीं होगा तो क्या फ़ायदा कामेडी का?
नाले की गैस से रोजगार चलाने वाले और (a+b) स्क्वायर से 2ab बचा लेने वाले समाज के लोग ऊँची कामेडी कैसे समझ पायेंगे। उनके लिए ख़ासतौर पर ग़रीबी रेखा के नीचे वाली कामेडी का जुगाड़ किया गया है। आज बहुतायत ऐसे ही लोगों की है। यही सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है।
अब यह बात तो गांधी जी भी कहते थे -“ग्राहक भगवान होता है।”
ग्राहक की सेवा के लिए सस्ती, तुरंत समझ में आने वाली कामेडी कुणाल कामरा वाली खबर ने औरंगज़ेब वाली खबर को पटकनी दी है।
बड़ी बात नहीं कल को कुणाल कामरा माननीय के साथ नाश्ता करते हुए मुस्कान वाला पोज देते हुए दिखें।
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