चार दिन पहले गाड़ी सर्विसिंग के लिए देने गए। 25 साल की हो गई सैंट्रो सुंदरी। इंसान होती तो शादी के लिए चिंता होने लगती। जीवन साथी खोजने के लिए मैट्रीमोनियल में विज्ञापन शुरू हो जाते। यार-दोस्तों से कहने लगते -"कोई सही लाइफ़ पार्टनर मिले तो बताना। इसकी भी शादी हो जाए तो ज़िम्मेदारी पूरी हो।"
लेकिन हमारी सैंट्रो सुंदरी कोई इंसान नहीं। जिस उम्र में इंसान नई ज़िंदगी के सपने देख रहा होता है उस उम्र में गाड़ी के लिए लोग पूछते हैं -"इसे बेंच क्यों नहीं देते?" कई लोग हंसते भी हैं -"अभी तक बदली नहीं गाड़ी।"
कानपुर में 25 साल बाद भी हमारी सैंट्रो सुंदरी सड़क पर धड़ल्ले से चल रही है। दिल्ली NCR में होती तो अब तक बिक जाती, कट-पिट जाती। बड़े शहरों की चकाचौंध न जाने कितनों की क़ुर्बानी की नींव पर टिकी होती है।
बहरहाल परसों जब गाड़ी लेने गए तो वहाँ मौजूद बच्ची ने कहा -"रिव्यू अच्छा दे दीजिएगा।"
हमने मज़े लेते हुए कहा -"क्यों रिव्यू अच्छा देंगे? एक तो गाड़ी समय पर नहीं दी, दूसरे सुबह-सुबह चाय भी नहीं पिलाई।"
उसने फ़ौरन बग़ल से चाय लेकर गुजरते बच्चे को आवाज़ देकर मेरे लिए चाय मंगाई। पानी भी। गाड़ी तो तैयार हो ही रही थी। बोली -"रिव्यू दे दीजिएगा। अच्छा सा।"
हमने फिर मज़े लिए -"हमको रिव्यू देने आता ही नहीं। कैसे देंगे?"
उसने फ़ौरन मेरा मोबाइल हाथ में लेकर रिव्यू वाला लिंक खोला और फ़ोन मेरे सामने कर दिया। मैंने पूछा -"अच्छा बताओ क्या लिख दें -गाड़ी देर से दी?"
उसने कहा -"रेटिंग 5 कर दीजिए। कुछ अच्छा सा रिमार्क लिख दीजिए।"
हम रिव्यू वाले लिंक में कुछ लिखने और रेटिंग देने के पहले कुछ सोचने सा लगे। इधर-उधर देखने लगे। बच्ची को लगा कि हमको समझ नहीं आ रहा कैसे रेटिंग दें। उसने मेरे हाथ से मोबाइल ऐसे ले लिया जैसे विश्वकप के फ़ाइनल में मदनलाल ने गेंद कपिलदेव के हाथ से ले ली होगा। इसके बाद फ़ौरन रेटिंग 5 डालकर कहा -"अब कुछ अच्छा सा लिख भी दीजिए।"
हमने कुछ लिखा और इसके बाद बच्ची से कहा -"तुमने ज़बरदस्ती रेटिंग 5 की है मेरे मोबाइल से। हम तुम्हारी शिकायत करेंगे। तुम्हारे फ़िंगर प्रिंट भी हैं मेरे मोबाइल में।"
बच्ची हंसने लगी। उसकी हंसी से मुझे लगा कि उसने मेरी शिकायत वाली धमकी को उसी तरह लिया जिस तरह सरकारें अपने ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय की चेतावनियों को लेती हैं या फिर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही की धमकियों को भ्रष्टाचारी लेते हैं।
हमने पूछा -"तुम्हारी रेटिंग में कुछ लोगों ने खबर रेटिंग भी की है। किसी ने एक, किसी ने दो। लेकिन इससे फ़रक क्या पड़ता है तुमको अच्छी रेटिंग से?"
उसने बताया -" अच्छी रेटिंग से पैसे बढ़ते हैं। प्रमोशन होता है।"
हमने देखा कुछ लोगों ने ख़राब रेटिंग भी की थी। किसी ने एक, किसी ने दो। औसत 4.8 था। उसने बताया -"खराब रेटिंग मिलने पर हम लोगों को डाँट पड़ती है।"
हम गाड़ी सर्विसिंग हमेशा इसी जगह कराते हैं। कभी देखा नहीं किसने क्या रेटिंग दी। सर्विसंग कराई, पैसे दिए, चले आए।
लेकिन अब बदले समय में रेटिंग का चलन शुरू हुआ है। रेटिंग भी सेवा लेने वाले की
मन :स्थिति पर निर्भर करती है। श्रीलंका के जिस होटल में रुकना मुझे सबसे अच्छा अनुभव लगा उसके बारे में कुछ लोगों ने कम अच्छी रेटिंग भी दी है। जो सरकार तमाम लोगों को सबसे भ्रष्ट, साम्प्रदायिक, बेहूदी, तानाशाही मनोवृत्ति वाली लगती है वही दूसरे तमाम लोगों को सबसे शानदार, स्वर्णयुग लाने वाली लगती है।
बहरहाल बच्ची ने जब बताया कि अच्छी रेटिंग से उसकी तनख़्वाह बढ़ सकती है तो पूछा -"तुमको कितने पैसे मिलते हैं?"
उसने उसने जो पैसे बताए वह आज कल के अकुशल मज़दूर की मज़दूरी से भी बहुत कम हैं। एक अकुशल, अनपढ़ मज़दूर की मज़दूरी से भी कम पैसे एक पढ़े-लिखे ग्रेजुएट को मिलते हैं। यह सामान्य चलन है आज के समय का। एक अकुशल मज़दूर को मिट्टी खोदने के काम के जो पैसे मिलते हैं कई प्राइवेट स्कूलों के टीचर उससे आधे में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। देश का निर्माण का काम ऐसे ही किफ़ायती तरीक़े से हो रहा है।
बच्ची से और बात हुई तो उसने बताया कि चार साल से काम कर रही है। स्टेशन के पास हूलागंज से आती है शास्त्रीनगर। दो बड़े भाई भी कुछ-कुछ काम करते हैं। एक सीमेंट की पुरानी बोरी बेंचता है, दूसरा ई रिक्शा चलाता है। पिता रहे नहीं।
बहरहाल, हम अच्छा रिव्यू देकर गाड़ी लेने के पहले देखने गए। पता चला गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हुई। बैटरी डाउन हो गयी थी। गाड़ी की बैटरी पहले टनाटन चल रही थी। सर्विसिंग के बाद शायद बैटरी ने समर्थन वापस ले लिए। शायद वह सर्विसिंग से नाराज़ हो गयी हो। क्या पता दो दिन वहाँ रहने के दौरान किसी ने उससे छेड़खानी की हो। बैडटच किया हो उससे किसी ने। उसको सदमा लगा हो। कुछ भी हो सकता है।
आजकल कोई भी स्त्रीलिंग किसी भी जगह सुरक्षित नहीं है। कल ही किसी पुलिस वाले ने कहा -"उसने स्तन दबाए तो उसको पता नहीं था कि वह महिला है, उसने समझा वह छात्रा है।" एक जज साहब कह ही चुके हैं -"लड़की के स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना दुष्कर्म नहीं है ।"
हम गाड़ी को वहीं छोड़कर चले आए हैं। बैटरी चार्ज हो रही है। दो दिन हो गए। अच्छा रिव्यू देने के बाद हम सर्विस सेंटर की बुराई भी नहीं कर सकते। कुछ कहेंगे तो अगला कह सकता -"आपने सर्विस और व्यवहार को अच्छा बताया है। अब शिकायत बेमानी है।"
यह कुछ ऐसा ही है जैसा आजकल सरकारें कहती हैं -"हमें जनता ने चुना है। हमारा जो मन आएगा करेंगे। हमारी बुराई का किसी को कोई हक़ नहीं है भले ही वो कोई मसखरा ही क्यों न हो।
लोकतंत्र में मसखरी का सर्वाधिकार सरकारों के लिए सुरक्षित है।
https://www.facebook.com/share/p/1GgazNS318/
No comments:
Post a Comment