श्रीलंका घूमने के दौरान जहां-जहां घूमने जाते थे वहाँ की प्रमुख बातें व्हाटसएप पर खुद को मेसेज करके सेव कर लेते थे। बाद में तसल्ली से मेसेज, फ़ोटो और याद को मिलाकार उस जगह के बारे में लिख लेते थे।
इस बार भी वही किया हमने। मेसेज लिखते रहे। उनको देखकर कुछ पोस्ट भी लिखी। लेकिन एक दिन मैंने देखा कि पिछले दिनों के सब मेसेज ग़ायब थे। मोबाइल अपनी पार्टी के अपराधी को क्लीन चिट की तरह साफ़ था। देखा तो पता चला कि व्हाटसएप एक दिन बाद मेसेज डिलीट हो जाने की थी। फटाफट सेटिंग ठीक की। पुरानी बातें याद करके लिखीं।
ख़ैर, हम लोग श्रीलंका पहुँचने के तीसरे दिन लाया बीच होटल से सुबह का नाश्ता करके घूमने निकले। सबसे पहले मदु गंगा नदी देखने और उस पर बोटिंग करने गए।
मदु गंगा श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में एक उथली नदी है, जो बालापिटिया में समुद्र में मिलती है। कहानी के अनुसार, मधु डेल्टा में 64 द्वीप हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश जलमग्न प्रतीत होते हैं क्योंकि केवल 25 द्वीपों की रिपोर्ट की गई है। 15 द्वीपों में एक बड़ा भूभाग है। कुछ द्वीपों पर लोग रहते हैं, लेकिन सभी जंगल और झाड़ियों से ढके हुए हैं।
हम लोगों ने मदु गंगा नदी में नाव से सैर की। सोलह लोग एक नाव में। दो घंटे की बोटिंग के 28 डालर (लगभग 2400 रुपए मतलब क़रीब 8500 श्रीलंकाई रुपए) पड़े। नाव में बैठते ही नाव नदी में दौड़ने लगी। जगह-जगह नदी सड़कों पर बने पुलों के नीचे से गुजरती। पुल इतने नीचे थे कि उनसे सर टकराने से बचाने के लिए सर झुका लेना पड़ा। ऐसे कई पुल पड़े जहाँ अगर सर न झुका तो हमारे सर और पुल की सड़क का मिलन हो जाता। इस बात को सोचकर हर पुल के नीचे से गुजरते हुए गाना याद आता - "मिले जो सर हमारा तुम्हारा तो भरता बने सर हमारा।"
जैसे ही नाव किसी सड़क के नीचे से गुजरने को होती, नाविक और हमारा टूर सहयोगी -हेड्स डाउन (सर नीचे करिए) कहते हुए सबके सर झुकवा देता।
नदी में बोटिंग करते हुए कई द्वीप दिखे। उन द्वीपों में बाहर से आवाजाही के लिए साधन नाव है। द्वीप में बसे गाँवों में केवल दुपहिया सवारी का चलन है। कई सौ लोगों की आबादी है कुछ द्वीपों में। इन द्वीपों को देखकर मुझे श्रीनगर की डल झील में बसे कई गाँव याद आए।
नदी में एक जगह गणेश भगवान का मंदिर भी दिखा। छोटा सा मंदिर वीराने में, नदी के पानी में अकेलेपन का भाव लिए चुपचाप खड़ा था। हमारे साथियों ने गणेश जी को दूर से प्रणाम निवेदित किया।
वहीं पर भगवान बुद्ध भी मिले नदी में अपने मंदिर में । खुले में ।
नदी के बीच में एक जगह नाव पर एक दुकान लगी थी। उसमें नारियल पानी, चाय -कापी आदि बिक रहे थे। एक लड़का और दो लड़कियाँ दुकान चला रहीं थीं। हमने वहाँ रुककर नारियल पानी पिया। आगे बढ़े।
मदु नदी में हमको जगह-जगह मैंग्रोव (mangrove) के पेड़ दिखे। मैंग्रोव ऐसे झाड़ी या व पेड़ होते हैं जो खारे पानी या अर्ध-खारे पानी में पाए जाते हैं। अक्सर यह ऐसे तटीय क्षेत्रों में होते हैं जहाँ कोई नदी किसी सागर में बह रही होती है, जिस से जल में मीठे पानी और खारे पानी का मिश्रण होता है।
मदु नदी में कुछ जगहों पर मैंग्रोव के पेड़ इतने सघन थे कि लगा हम लोग मैंग्रोव की गली में आ गए हैं। एक जगह मैंग्रोव इतने सघन थे क़ि केवल नाव निकलने भर का रास्ता था उनके बीच। ऊपर छाए मैंग्रोव के पेड़ों की डालियों से बचने के लिए हम लोग सर झुकाकर बैठे तब निकलना हुआ।
पुल से नीचे से और मैंग्रोव के पेड़ों के बीच से झुककर निकलते समय मुझे हमको ने बाइबल की सीख याद आ रही थी -Submit to authority (समर्पण)
मैंग्रोव पेड़ों के बीच से गुजरते हुए मोबाइल में गाना बज रहा था -प्यार को प्यार मिले तो, नज़र कहीं लग न जाए।
क़रीब घंटे भर की बोटिंग के बाद हम लोग एक द्वीप पहुँचे सिनेमन द्वीप। यहाँ हमने दालचीनी का पेय पिया। मदु गंगा (नदी) क्षेत्र के स्थानीय लोगों की आय का मुख्य स्रोत दालचीनी उद्योग है। ताजा दालचीनी छीलने के लिए यहां लाई जाती है।
सिनेमन द्वीप पर काफ़ी देर रुके हम लोग। किनारे पर ही वहाँ एक पेड़ पर आम की तरह का फल दिखा। लोगों ने बताया कि यह ज़हरीला फल होता है। खाने के पंद्रह मिनट के भीतर खाने वाले की मौत हो जाती है। स्थानीय भाषा में उसका नाम 'बालजा' बताया लोगों ने।
सिनेमन द्वीप पर ही मछलियों से मालिश कराने का इंतज़ाम भी था। मछली मसाज के लिए लोग अपने पैर पानी में डाल के बैठ जाते थे। पानी के अंदर की मछलियां उनके पैर को अपने मुँह से चुटकी जैसा काटती होंगी। गुदगुदी भारी मालिश का अनुभव हुआ होगा।
वहीं पर एक छोटा घड़ियाल का बच्चा भी था। लोग उसको सर पर रखकर फ़ोटो खिंचा रहे थे। कुछ पैसे देकर। अपने साहब जी के बचपन के बारे में लोग बताते हैं कि वे मगरमच्छ पीछे लेकर चले आए थे। शायद उनके यहाँ भी सिनेमन द्वीप सरीखी व्यवस्था रही होगी जहाँ कुछ भुगतान करके लोग घड़ियाल को हाथ में, सर पर रखकर फ़ोटो खिंचा सकते हैं।
देखते-देखते दो घंटे का समय हो गया। हम लोग वापस लौट आए। मदु गंगा नदी में बोटिंग का प्यारा अनुभव हमारी याद में दर्ज हो गया था।

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