एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।
गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांसवन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन
पीठ पर काँच के घर उठाए हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ।
जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ़ आभास को
मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक यही तो समय ने गढ़ा ।
एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।
-स्व. रामप्रकाश शुक्ल' शतदल'
*शतदल जी कानपुर के चर्चित गीतकार थे। देश के विभिन्न मंचो से काव्यपाठ करते रहे। कानपुर में नियमित शृंगार संध्या का आयोजन करते रहे। देश के प्रमुख गीतकारों को शृंगार संध्या में आमंत्रित करते रहे। इस गीत का ऑडियो मुझे शतदल जी के पुत्र मनीष शतदल ने उपलब्ध कराया। गीत का यूट्यूब लिंक ये रहा । सुनिए अच्छा लगेगा। संभव हो तो गीत के बारे में अपनी टिप्पणी भी लिखिए यूट्यूब पर।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/pfbid02yW9dUXQiaA9M4pXphZ3FTtX7PjKMaFaAc9N41fHKw9bF2ETupcHc5vv73HgU4qqHl
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