Thursday, March 27, 2025

होटल लाया बीच में जन्मदिन और विदाई


 

होटल लाया बीच में दो दिन रुकने के बाद हम लोगों को वहाँ से विदा होना था। सुबह-सुबह हम लोग एक बार फिर समुद्र तट पर गए। हमारे साथ की शांता जी और मालती जी हमसे पहले वाली सुबह में जागकर, अपना नियमित योगासन निपटाकर, चटाई समेत चुकी थीं। सब लोग समुद्र तट पर गए। वहाँ टहले। फ़ोटोबाज़ी, वीडियोग्राफ़ी की। लौटते समय रास्ते में मुदिल्ला (mudilla ) के फूल मिले।
मुदिल्ला फूल के बारे में पता चला कि ये फूल शाम को खिलता है, सुबह मुरझा जाता है। यह जानकारी होने पर हमने इसे रात के समय भी देखा था। रात को एकदम कड़ियल, गबरू ज़वान जैसा लग रहा था फूल। सुबह उसी फूल के हाल नई पेशन स्कीम वाले रिटायर बुजुर्ग सरीखी हो गयी थी। छूते ही बिखर गया।
यह भी पता चला कि फूल ज़हरीला होता है। मतलब विषकन्या घराने का फूल। विषफूल कहना ज़्यादा सही होगा। फूल की ख़ूबसूरती देखकर ऐसा कहीं से नहीं लगता कि यह ज़हरीला भी होता होगा। लेकिन कुछ सच ऐसे होते हैं जिनको सच मानना ही पड़ता है।
लौटकर हम लोग तैयार हुए। तैयार होकर हम लोग नाश्ते के लिए नीचे आ रहे थे तो अपन एक बार फिर कमरे में गए यह देखने के लिए कि कहीं कोई सामान तो नहीं छूट गया। देखा तो छुटका, पर्स में रखा जाने वाला शीशा, बरामदे की रेलिंग में रेलिंग में रखा था। शीशे की पीठ समुद्र की तरफ़, चेहरा कमरे की तरफ़ था। उसको देखकर लगा कि बेचारा रुआँसा सा हमारी राह देख रहा था। कोई भी सामान छूट जाता है तो ऐसे ही अपने से बिछुड़े लोगों की राह ताक़त है। उस शीशे के हाल देखकर अन्दाज़ लगा कि किसी मेले में बिछुड़ गए लोगों के क्या हाल होते होंगे।
नाश्ता करके हम लोग निकलने वाले थे कि वहाँ होटल के बैंड वाले दिखे। उस दिन हमारे साथ के राजेश टंडन जी का जन्मदिन था। टंडन जी ने केक काटा। सब लोगों ने बैंड वाले के साथ दोहराते हुए गाना गाया -'हैप्पी बर्थ डे टू यू।' होटल की एक बच्ची ने होटल की तरफ़ से टंडन जी को माला पहनाई। सबने केक खाया। यह राजेश टंडन जी का पहला जन्मदिन था जो विदेश में मनाया गया।
जहां जन्मदिन मनाया जा रहा था वहीं पर एक तितली का बड़ा सा पोस्टर था। सभी जोड़ों ने अपने जोड़ीदार के साथ और अकेले लोगों ने खुद के साथ तितली के सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचाए। होटल के स्टाफ़ ने फ़ोटो खिंचाते समय हम लोगों के हाथ तितली के परों की दिशा में करने का पोज बनाकर बताया। हमने भी फ़ोटो खिंचाए तो अपन का पोज वैसा वैसा नहीं था जैसा बताया गया था। अपन हमेशा गड़बड़ कर देते हैं।
वहाँ से चलने के पहले हम लोगों ने होटल के स्टाफ़ और बैंड वालों को टिप दी । चलने के पहले होटल की स्टाफ़ कुसुम ने बार-बार हम लोगों से गूगल पर रिव्यू लिखने के लिए कहा। हमने होटल के रजिस्टर में तो फ़ौरन अच्छी सी अंग्रेज़ी में लिख दिया। जब हम रिव्यू लिख रहे थे तो अच्छे-अच्छे अंग्रेज़ी शब्द याद करके लिखने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अच्छे क्या ख़राब, चलताऊ शब्द तक याद नहीं आ रहे थे। सब मानों कह रहे थे कि वैसे याद नहीं करते, आज बड़ी याद आ रही है -मतलबी कहीं के। हम रिव्यू का पन्ना भर रहे थे उधर बस का हॉर्न बज रहा था। हम दस्तख़त करके बस की तरफ़ लपके।
गूगल पर रिव्यू बाद में, काफ़ी बाद में लिखा। चीजों जो रह जाती हैं वो काफ़ी दिन तक रह ही जाती हैं।
हम लोग केवल दो दिन ही रहे होटल लाया बीच में। इन दो दिनों में लाया बीच की इतनी यादें जमा हो गयीं हैं कि उनको बहुत दिन तक फेंटते-याद करते रहेंगे। यादें उलटने-पलटने से तरो-ताज़ा होती रहती हैं। जो यादें दोहराई नहीं जातीं वे कब 'जेहन-बदर ' हो गयीं, पता ही नहीं चलता।
होटल से विदा होने के बाद हम लोग गाते-गुनगुनाते आगे बढ़े। बस में बैठते ही गाने की शुरुआत हनुमान चालीसा से होती। इसके बाद बाक़ी गाने पूरे माहौल पर क़ब्ज़ा कर लेते। कभी-कभी गानों की अंत्याक्षरी भी होती। चलते समय जब बस इधर-उधर होती तो यह तय करना मुश्किल हो जाता कि वह गाने की धुन पर ठुमक रही है या सड़क के उतार-चढ़ाव के कारण हिल रही है।
हमारी अगली मंज़िल एक आयुर्वेदिक नर्सरी थी।

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