कोई भी म्यूज़ियम देखते हुए मुझे कन्हैया लाल नंदन' जी की कविता 'समय और हम' का यह अंश याद आता है:
"शताब्दियाँ
होकर रह जाती हैं
इतिहास की तहरीर
और इतिहास
खंडहरो में बदल जाते हैं
सोते रहते हैं दस्तावेज
शताब्दियों के सीने पर पसरे हुए
और उसी सीने से
सभ्यताओं के
जनाजे निकल जाते हैं।"
किसी भी बड़े म्यूज़ियम में जाइए तो बड़े-बड़े राजे-महाराजे, कभी जिनके साम्राज्य ईरान से तूरान तक पसरे रहते होंगे, जिनके राज्य में सूरज कभी तथाकथित रूप डूबता नहीं होगा, छोटे-छोटे कमरों के कोनों में पड़े मिलते हैं। जिनके दर्शन करने के लिए आम लोग कभी तरस जाते होंगे उनकी मूर्तियाँ बीस-तीस रुपए के टिकट पर सार्वजनिक दिखाई के लिए मौजूद रहती हैं। जो राजा कभी आपस में ज़िंदगी भर लड़ते रहे उनकी तस्वीरें शांति से एक-दूसरे के आसपास रखी रहती हैं।
म्यूज़ियम वह जगह होती है जहां कई शताब्दियाँ एक छोटी सी इमारत में समाई रहती हैं। दशकों के किस्से एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड पड़े रहते है।
कोलम्बो म्यूज़ियम के मुख्य हिस्से को देखते हुए भी यही अहसास हुआ। म्यूज़ियम के इस हिस्से में कोलम्बो के इतिहास से जुड़ी अनेक घटनायें और स्मृतियां संजोई गयी हैं। म्यूज़ियम में भगवान बुद्ध की विविध समय की मूर्तियाँ, हथियार, सिक्के, कलाकृतियाँ, गहने, बरतन, कपड़े, हथकरघे, तिजोरी जैसी तमाम चीजों के माध्यम से श्रीलंका का इतिहास संजोया गया है। श्रीलंका में मानव जीवन के विकासक्रम का भी चित्रण म्यूज़ियम में है।
म्यूज़ियम को देखने की फ़ीस श्रीलंका के 1500 रुपए प्रति व्यक्ति थी। हिंदुस्तानी 500 रुपए से कुछ कम।
म्यूज़ियम की स्थापना 1 जनवरी, 1877 को सीलोन के अंग्रेज गवर्नर सर विलियम हेनरी ग्रेगरी ने की थी। 1942 में इसे श्रीलंका का नेशनल म्यूज़ियम बनाया गया।
म्यूज़ियम में प्रवेश करते ही श्रीलंका की उन धरोहरों का विस्तार से ज़िक्र है जिनको विदेशी लोग अपने शासन के दौरान श्रीलंका से लूट कर ले गए थे और अपने यहाँ सजाकर रख लिया है। श्रीलंका सरकार ने अपनी धरोहरों को उन देशों की सरकारों से वापस पाने के लिए कोशिशें की हैं जिनको उन देशों के लोग लूटकर ले गए थे। कुछ धरोहरें वापस हो गयीं हैं कुछ वापस आनी हैं।
ऐसी ही धरोहरों में प्रमुख है श्रीलंका के कैंडी साम्राज्य की तोप। हीरे-जवाहरात से जुड़ी इस तोप को डच लोगों ने 1765 में लूट लिया था और उसे नीदरलैंड ले गए थे। 1875 में इसे अमस्टर्डम, नीदरलैंड के म्यूज़ियम में रखा गया। श्रीलंका सरकार ने 1964 के बाद से इस गन को वापस पाने के लिए प्रयास शुरू किए। एक प्रोजेक्ट बनाकर तोप की बनावट और उस पर सिंहली भाषा में लिखावट के आधार पर सिद्ध किया यह तोप श्रीलंका से लूटकर लाई गयी है। तोप वापसी की बातचीत चल रही है। फ़िलहाल उसकी प्रतिकृति श्रीलंका के नेशनल म्यूज़ियम में उसके इतिहास के साथ रखी है।
इस तोप के अलावा कम से कम एक सोने की चाकू और दो बंदूके भी डच लोगों की लूट में शामिल थीं। उनकी भी वापसी के प्रयास हो रहे हैं। ये तो वे चीजें थीं जिनका पता चल गया इसके अलावा और तमाम चीजें होंगीं जो लूट ली गयीं और जिनका पता नहीं चला।
कैंडी की तोप की लूट का कारण खोजने पर पता चला कि जब डच लोगों ने श्रीलंका पर क़ब्ज़ा किया तो स्थानीय लोगों ने उनके उत्पीड़न और बंधुआ मज़दूरी के ख़िलाफ़ लगातार विरोध और विद्रोह किया। कैंडी के राजा कीर्ति श्री सिंहा ने 1761 में शुरू हुए विद्रोही गुरिल्ला युद्द का खुला समर्थन किया। इस पर डच लोगों ने कैंडी पर हमला किया और लूटपाट की। 1765 में कुछ समय कैंडी पर डच लोगों का क़ब्ज़ा रहा। बाद में कैंडी साम्राज्य के प्रतिरोध के कारण डच लोग पीछे हट गए। लेकिन 1765 में लूट हुआ सामान डच लोग नीदरलैंड ले गए।
बाद में फ़्रांसीसी क्रांतिकारियों ने डच म्यूज़ियम की अधिकांश चीजों को क़ब्ज़े में ले जाकर फ़्रांस के म्यूज़ियम में रख लिया। लेकिन कैंडी की तोप और दूसरी चीजें नीदरलैंड में ही रह गयीं।
म्यूज़ियम के अंदर के श्रीलंका के राजा का सिंहासन, पावदान, तलवार और मुकुट भी भी मौजूद है। यह सिंहासन सन 1693 में सीलोन (श्रीलंका) के तटीय भाग में राज्य करने वाले डच गर्वनर Thomas Venree ने कैंडी राज्य के राजा Wimaladharmasuriya II को उपहार में दी थी। बाद में छह राजा इस सिंहासन में बैठे। सन 1815 में अंग्रेजों ने राजा को पकड़ा और सिंहासन और दूसरी चीजें इंग्लैड भेज दीं गयीं। बाद में अंग्रेजों ने 1934 में सिंहासन और 1936 में तलवार सीलोन को लौटा दी। इस मामले देखा जाए तो अंग्रेज डच लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा ईमानदार हैं जिन्होंने लूटी हुई चीजें जल्दी लौटा दी।
सिंहासन ऐतिहासिक रूप से अमूल्य है लेकिन सिंहासन और पावदान का कवर मैला सा लगता है। सोचा कि काश यह साफ़-सुथरा होता। लेकिन किसी देश का इतिहास किसी की सोच से थोड़ी चलता है।
श्रीलंका की ऐतिहासिक धरोहरों को विदेशियों द्वारा लूटे जाने के किस्से देखकर एक बार फिर लगा कि मनुष्य का इतिहास ताकतवर द्वारा कमजोर का लूट का इतिहास रहा है। आजकल भी यही हो रहा है। जिसके पास ताक़त है उसने अपनी शर्तों पर कमज़ोरों पर क़ब्ज़ा किया।
श्रीलंका ने जिस तरह अपनी धरोहरों को वापस लाने की मुहिम चलाई, कुछ में सफल भी हुए वे लोग उसी तरह काश हमारे देश की भी वे सभी चीजें वापस आ पातीं जो लोग यहाँ से लूटकर ले गए थे।
सिंहासन के बग़ल में तिजोरी भी थी। जिसमें क़ीमती सामान रखे जाते होंगे। कुछ ताम्बे के बक्से भी मौजद थे वहाँ जिनमें गहने रखे जाते होंगे। वहाँ दीवारों पर कई पेंटिंग्स भी लगी थीं जो अपने समय का इतिहास बता रहीं थीं।
म्यूज़ियम के एक हिस्से में पत्थर की कुछ मूर्तियाँ, बरतन और दीगर सामान थे। एक जगह खरल-मूसल और सिलबट्टे भी रखे थे। सिलबट्टा देखकर मुझे याद आई अनूप सेठी जी की कविता :
पति-पत्नी
आपस में घिसकर
सिलबट्टा हो जाते हैं।
साथ ही याद आया फ़ेसबुक का साढ़े तीन साल पुराना #सिलबट्टा प्रकरण भी याद आया। इसमें स्त्री अस्मिता को लेकर तमाम पोस्ट लिखीं गयीं थीं। बाक़ायदा परिचर्चाएँ आयोजित हुईं थीं। काफ़ी दिन हलचल रही सिलबट्टा हल्ले की।
म्यूज़ियम के शताब्दियों में पसरे इतिहास को मिनटों में देखकर हम बाहर निकल आये। जितना देखा उससे ज़्यादा अनदेखा छोड़ आए।
म्यूनियम से बाहर आकर हमने वहीं की कैंटीन में चाय-नाश्ता किया। फ़ोटो बाज़ी की और आगे बढ़ गए। हमारी अगली मंज़िल कोलम्बो का हनुमान मंदिर थी।

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