कल 'सैंट्रो सुंदरी' से शहर से वापस आते समय पीछे से खड़खड़ाट सुनाई दी। उतरकर देखा तो कार का पिछला पहिये का मुँह अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह फूला हुआ था। कुछ तार भी निकले हुए थे। पहिए के एक हिस्से की ऊपरी परत ने पहिए से समर्थन वापस लेकर अपना दल बना लिया था। यही हिस्सा चलते समय कार के मडगार्ड में लगकर आवाज़ कर रहा था।
पहले सोचा धीरे-धीरे चलते हुए घर तक आ जाएँ। लेकिन फिर आवाज़ ज़्यादा हुई तो ख़राब टायर बदलने का तय किया। कार की डिक्की से पाना निकाला और पहिए के नट खोलने चालू किए। बहुत दिन से न खुले होने के कारण नट कसे थे। खुल नहीं रहे थे।
हम और ज़ोर लगाएँ तब तक उधर से एक आदमी आकर बोला -'हम बदल दें टायर।' हमने कहा -'कित्ते पैसे लोगे?' वो बोला-'जो मन में आए दे देना।' हमने कहा -'खोलो।बदलो'
उसने कोशिश की। ज़ोर लगाते ही वो लुढ़क गया। हमने सोचा पिए होगा। वह लड़खड़ा कर उठा। खोल नहीं पाया नट तो हमने ज़ोर लगाया। नट ढीले हो गए। उसने नट खोले। इसके बाद उसने जैक लगाकर टायर निकालने का उपक्रम किया। वह भी ठीक से नहीं कर पा रहा था। फिर हमने लगाया। टायर निकाला। स्टेपनी वाला लगाया।
उस आदमी के हमारे साथ मेहनत करते हुए आसपास के दो लड़के उसकी पोलपट्टी खोलते हुए कुछ बोलते जा रहे थे। उनकी बातों से लग रहा था कि वह ऐसे ही घूमता रहता है। कुछ करता, जानता नहीं है। वह उन लड़कों को चुप कराने की कोशिश करते हुए जुटा था।
बहरहाल,टायर बदलने के बाद उससे बातचीत हुई। हमने पूछा -'क्या करते हो?'
बोला -'जो मिल जाता है। सब काम कर लेते हैं।'
बाद में बताया -'हम जाति के नाई हैं लेकिन दाढ़ी बनाना नहीं आता।'
नाम बताया श्यामलाल। उसकी खुद की दाढ़ी बेतरतीब थी। आज के समय में यह कोई ख़ास बात नहीं कि ख़ानदानी पेशा अपनाए ही।
उसके अन्दाज़-ए-बयां रोचक लगा तो और बातचीत की। उसने बताया कि उसके पिता एचएएल कैंटीन में वेंडर थे। चाय पिलाते थे लोगों को। उसने कुछ दिन चाय पी, पिलाई।
घर परिवार की बात चलने पर बताया उसने -'दो बीबियाँ हैं। दोनों छोड़ के चली गयीं हैं। एक फ़र्रुख़ाबाद , दूसरी ग़ाज़ियाबाद। दोनों से आठ-आठ बच्चे हैं। कुल मिलाकर सोलह। आठ लड़के, आठ लड़कियाँ।
हमने ताज्जुब किया दो बीबियों वाली बात पर तो बोला -'हमारे बाप के तो चार बीबियाँ थीं। हमारे तो दो ही हैं।
हमने पूछा -'जब तुम्हारे हाल इतने बेहाल हैं तो दूसरी बीबी कैसे कर ली?'
बोला -' दिल आ गया तो कर ली।'
फिर विस्तार से बताया -'दूसरी वाली हमारे पड़ोसी की बीबी थी। मुस्लिम है। उसके मियाँ नहीं रहे तो हमारे घर आ गई। पड़ोस के नाते हमारी बहू लगती थी। हमने मना किया तो बोली हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे। फिर हमने कर ली शादी उससे। '
अपनी बीबियों के बारे में बताते हुए बोला -'बड़ी वाली सीधी है। छोटी वाली लड़ाका है।'
एक आदमी जिसका आमदनी का ठिकाना नहीं, दो बीबियाँ कर ले, एक हिंदू एक मुसलमान। सोलह बच्चे। ताज्जुब की बात लगी मुझे। लोग यहाँ एक नहीं निभा पाते। छोड़ के चल देते हैं।
बच्चों के बारे में बताया -' बड़ा लड़का कहता है शादी कर दो। हम कहते हैं पहले कमाई का हिसाब बनाओ तब शादी करेंगे।'
यह भी बताया -'हम अपनी बेटियों को बेटों से ज़्यादा प्यार करते हैं।'
चलते समय हमने उससे पूछा कित्ते पैसे दें? बोला -'चाय-पानी भर के दे दीजिए।' हमने दिए उसने सलाम मुद्रा में ग्रहण किए। हमने कुछ और दिए।'
बेतरतीब दांत देखकर हमने पूछा -'मसाला खाते हो क्या?'
'नहीं मसाला नहीं खाते। चुनही तम्बाकू खाते हैं। कभी-कभी दारू पी लेते हैं जब मिल जाती है।' - श्यामलाल ने बताया।
चलते समय बोला -' हमको मोदी जी से मिलना है।'
हमको ताज्जुब लगा कि इसको मोदी जी से क्यों मिलना है? यह पूछ पाएँ तब तक वह लड़खड़ाते हुए चलना शुरू करके आगे चला गया। शायद चाय पीने।
बाद में पास में खड़े नारियल बेचते लड़के से कंफ़र्म किया तो उसने बताया यहीं पास में ही रहता है वो। दो बीबियाँ हैं। बच्चे भी उतने ही जितने बताए। ऐसे ही माँगता-घूमता रहता है। कहीं बारात-वारात में काम मिलता है तो कर लेता है।
आगे वह फिर मिला। उसके पास से गुजरते हुए गाड़ी धीमी की तो बोला -'आपकी पुलिस में कोई जान पहचान हो तो एक काम है।'
हमने काम पूछा तो उसने बताया -'हमारे बग़ल में रहने वाली औरत ने पड़ोस का लोहे का गेट चुराकर बेंच लिया है। उसकी शिकायत करनी है। बहुत बदमाश है वह। रोज लड़ती है।'
हमारी कोई जान पहचान नहीं है कहकर चल दिए। क्या पता शायद वह इसीलिए मोदी जी से मिलने की बात कर रहा हो। Dhirendra जी का मानना है कि श्यामलाल सबका साथ सबका विकास का पोस्टर बॉय हो सकता है। शायद इसीलिए उनसे मिलने की बात कर रहा है।
हमने घर में आकर श्यामलाल से मुलाकात का क़िस्सा बताया तो हमको सुनाया गया -'तुमको सब इसी तरह के लोग मिलते हैं।'
हम क्या कहें ? आप ही बताओ।

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