पिछले दिनों ज्ञान चतुर्वेदी जी के नए उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' पढ़ते हुए इसके पढ़ने की सूचना फ़ेसबुक पर लगाई तो अलंकार रस्तोगी Alankar Rastogi ने टिप्पणी में लिखा:
"ज्ञान सर हम सबके प्रिय हैँ.. उनके साथ हम जैसे नौसीखिए को भी पढ़िए ताकि आपको superiority काम्प्लेक्स होता रहे .. 

"
यह एक तरह की आत्मीय धमकी टाइप है कि हमारा उपन्यास नहीं पढ़ा तो ठीक नहीं होगा। कोई मित्र लेखक जब अपनी किताब पढ़ने के लिए कहता है तो इसका असल मतलब होता है कि पढ़कर तारीफ़ करो। लेखक अगर बड़ा हुआ तो उसकी तारीफ़ के अलावा और कुछ लिखा गया तो लेखक लिखने वाले की समझ पर सवाल उठाते हुए कहता है -" यह समझ में नहीं आया। आज नहीं आया पच्चीस साल बाद समझ में आएगा। बहुत ऊँची बात कही गयी है इसमें। लिखने वाले की समझ में नहीं आई यह उसकी समझ की कमी है। लेखक के लिखने में कोई कमी नहीं है।"
कुछ और तगड़ी नेटवर्किंग वाले समझदार लेखक तो किसी के कुछ लिखने के पहले ही कुछ बड़े माने जाने वाले लेखकों से आशीर्वाद नुमा तारीफ़ लिखकर उनसे सम्भावना युक्त होने की भविष्यवाणी लेकर सबको दिखा देते हैं। अब इसके बाद कुछ और लिखने के लिए कुछ बचता नहीं है।
वैसे भी साथी लेखकों के बारे में कुछ कहने/लिखने का मतलब तारीफ़ करने के सिवा और कुछ होता नहीं है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। मेरी कुछ किताबों के बारे में बड़े-बड़े लोगों ने बिना पड़े इतनी तारीफ़ की है कि अब हमें अपनी तारीफ़ें झूठ लगती हैं।
अलंकार रस्तोगी जी के उपन्यास के बारे में कुछ लिखते हुए ये जो ऊपर के तीन पैराग्राफ़ जिस तरह से लिखे उस तरह से बड़े लोग साथी/नए लेखकों की किताबों की भूमिका लिखते हैं। आठ पैराग्राफ़ में इधर-उधर की बातें लिख कर चलते हुए आधे पैराग्राफ़ में लेखक के बारे में लिखकर सम्भावना व्यक्त करके शुभकामनाएँ दे देते हैं।
अलंकार रस्तोगी के उपन्यास 'पंडित भया न कोय' की सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी भूमिका किसी बड़े लेखक से नहीं लिखवाई है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वे अपना उपन्यास इसी साल पुस्तक मेले में ही लाना चाहते होंगे। भूमिका लिखवाते किसी से तो शायद अगला साल लग जाता ।
अलंकार के इस पहले उपन्यास के बारे में कम लोगों ने लिखा है। एकाध लेख साथी लेखकों ने लिखे हैं। बड़े लेखकों को वैसे भी फ़ुरसत और मन कम ही होता है साथी लेखकों के बारे में लिखने का।
अलंकार ने जो लिखा " हम जैसे नौसीखिए को भी पढ़िए ताकि आपको superiority काम्प्लेक्स होता रहे .. " तो उसके बारे में सचाई यह है कि हमको ज़बरदस्त जलन और inferiorty कम्पलेक्स हुआ कि हाय हम न लिख पाए उपन्यास और 'ई लिख मारिन।'
हम इसको पढ़ते हुए 'जेनुइन' जलन के शिकार हुए। इसी जलन के कारण मन तो कर रहा है कि उपन्यास की 'जेनुइन' खिंचाई करके रख दें। लेकिन यह सोचकर कुछ दिन बाद लखनऊ में ही बसना है, मन की बात लिखने से परहेज़ कर रहे हैं। वैसे भी 'मन की बात' कहने का हक़ हर एक को थोड़ी होता है।
उपन्यास कुल जमा 192 पेज के उपन्यास के 11 पेज भूमिका, सूची आदि में निकाल कर कहानी बची 181 पेज में। इतने में कुल 33 अध्याय। मतलब औसतन साढ़े पाँच पेज में एक अध्याय। सारे अध्याय एक के बाद एक करके जुड़े हुए हैं। इसलिए उपन्यास आराम से पढ़ा गया।
उपन्यास के शिक्षा जगत के किस्से बयान किए गए हैं। मास्टर अमन के स्कूल में ज्वाइन से शुरू करके दो मिनट की शोक सभा में ख़त्म होता है उपन्यास। इस बीच अलग-अलग अध्यायों में स्कूलों से जुड़े किस्से बयान किए गए हैं। ये किस्से आम तौर पर थोड़ा इधर-उधर करके लगभग हर स्कूल की कहानी है। अलंकार के साथी अध्यापक अगर उपन्यास को पढ़ेंगे तो कोई न कोई ज़रूर कहेगा कि ये उसके बारे में लिखा न, ये हमारे बारे में क्यों लिखा भई?
यह भी हो सकता है कि विद्यालय के कुछ बच्चे इस उपन्यास को पढ़कर बिना किसी अपराध बोध के वो काम करने लगें जिनको करते हुए वे अब तक हिचकते थे।
हो तो यह भी सकता है कि कुछ बच्चे इसको पढ़कर आपस में कहें -"गुरु जी कितने पुराने जमाने की कहानी लिख़िन हैं। हमते पूछत तौ हम बताइत असल किस्सा आजकल के लौंडन का। ख़ैर लागत है गुरुजी हम लोगन की तरह ही बवाली रहे हुइहैं ।पता करौ आजकल इनकी गुंजन के का हाल हैं ।"
गुंजन के बारे में जानने के लिए उपन्यास पढ़ा जाए।
उपन्यास में अलंकार ने अपने शिक्षा जगत के लगभग सारे अनुभव निचोड़ के रख दिए हैं। अब अगला उपन्यास लिखने के लिए किसी नए इलाक़े का मुआइना करना होगा।
उपन्यास की भाषा में आम बोल चाल की भाषा है जिसमें अंग्रेज़ी के आम बोलचाल में प्रयोग किए जाने वाले शब्द बेझिझक आते , बिना 'में आइ कम इन सर ' कहे घुसते आए हैं। लेखक का अंग्रेज़ी का अध्यापक होने का इतना लाभ तो मिलना बनता है शब्द समुदाय को।
उपन्यास में लम्बे-लम्बे वाक्यों को पढ़ते हुए लगा कि छोटे वाक्य होते, चुस्त-दुरुस्त तो बेहतर होता।
उपन्यास विवरण वाले अन्दाज़ में लिखा गया है। पाठक को सब कुछ समझाते हुए। पाठक के लिए ऐसे स्कोप बहुत कम है जिसको समझने में उसको अपनी बुद्धि लगानी पढ़े और समझ में आने पर उसको लगे -"क्या ऊँची बात कही है।"
उपन्यास पढ़ते हुए शुरुआत पेंसिल से पंच वाक्य पर निशान लगाते हुए की थी। कुछ मुलाहिजा फ़रमाएँ:
1. सरकारी इमारतें भी गरीब की इंसान की तरह सीधे बचपन से बुढ़ापे में कदम रखती हैं।
2. सुविधा शुल्क युक्त लिफ़ाफ़े के हैसियत एक सरकारी विभाग में वही होती है जो आईसीयू में आक्सीजन की होती है।
इसके बाद पेंसिल कहीं इधर-उधर हो गयी और पंच वाक्य नोट करने रह गये।
सरकारी स्कूल की बुराइयाँ करते समय कहीं-कहीं अतिशयोक्ति भी नज़र आयी। 'दो इंच धूल से जमी फ़ाइलें' पढ़ते हुए लगा कि इतनी मोटी धूल देखे बिना रिटायर हो गए हम। बहरहाल लेखक को इतनी छूट लेने का हक़ तो हैइऐ है।
अलंकार रस्तोगी के पाँच व्यंग्य संग्रहों के बाद उनका पहला उपन्यास आया। इसके साथ वे उन कुछ चंद व्यंग्यकारों में शामिल हो गए जिनके उपन्यास भी आए हैं। यह हम जैसे मित्रों के लिए ऊपरी तौर पर ख़ुशी और अंदर-अंदर 'जेनुइन' जलन का कारण है।
आशा है आने वाले समय में उनके और उपन्यास आएँगे और हमारे लिए 'जेनुइन' जलन का का कारण बनेंगे। इसके लिए अलंकार को शुभकामनाएँ।
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