कोलम्बो का नेशनल म्यूज़ियम देखने के बाद हम लोग वहाँ का प्रसिद्ध हनुमान मंदिर देखने गए। हनुमान जी की राम-रावण युद्ध में प्रमुख भूमिका रही है।सीता जी का पता लगाने के लिए वे सबसे पहले लंका गए। बाद में लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर संजीवनी बूटी लाए। बाद में राम दरबार में सबसे प्रमुख स्थान मिला। राम जी की रक्षा की ज़िम्मेदारी हनुमान जी की है। हनुमान चालीसा में लिखा है :
राम दुआरे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।
हनुमान जी की आज्ञा के बिना राम दरबार का पत्ता भी नहीं हिलता था। राम कहानी के बारे में उत्तर भारत के लोग आमतौर पर केवल रामचरित मानस को जानते हैं। दुनिया में राम को लेकर सैकड़ों रामायण हैं जिनमें राम कथा से जुड़े विविध प्रकरण अलग-अलग तरह से बताए गए हैं।
तमिल में कम्बन रामायण में हनुमान जी के लंका से वापस आने का प्रकरण लिखते हुए कम्बन जी राम जी की सीता के समाचार जानने के लिए व्यग्र हैं। हनुमान जी उनकी इस व्यग्रता को समझते हैं। उनको सीता जी के बारे में समाचार पाने के लिए आतुर हैं। हनुमान जी उनकी व्यग्रता को समझते हैं। ऐसे में अगर हनुमान जी राम जी विस्तार से बताते कि कैसे मैंने समुद्र पार किया, कैसे सुरसा मिली, कैसे विभीषण मिले, कैसे अशोक वाटिका पहुँचा, कैसे सीता दर्शन हुए तो इतनी देर में राम जी के बेहाल हो जाते। इसलिए हनुमान जी राम जी को देखते ही कहते हैं :
"देखा मैंने सीता को।"
हनुमान जी के मुँह से 'देखा' सुनते ही राम जी को निश्चिंत हो जाते हैं। यह मानव मन की उस प्रवृति को दर्शाता है जिसमें उसको परेशानी के समय दुनिया भर की कहानी सुनने का धैर्य नहीं होता। वह अपनी परेशानी का निदान मिलने वाली खबर सुनने के लिए अधीर होता है। लफ़्फ़ाज़ी सुनने का उसका मन नहीं होता।
लेकिन आज की त्रासदी यही है आज के समय में दुनिया भर के तमाम लीडरान लफ़्फ़ाज़ी की दुकान खोले बैठे हैं। जनता त्रस्त हैं लेकिन वे लफ़्फ़ाज़ी हांकने में लगे हैं।
कम्बन रामायण से जुड़ा यह प्रकरण मुझे जबलपुर में हमारे महाप्रबंधक रहे टी.टी.एस. कृपावेंकटेशन जी ने बताया था।
कोलम्बो का हनुमान मंदिर अंजनेयार मंदिर के नाम से जाना जाता है। अंजनी पुत्र का मंदिर मतलब हनुमान मंदिर। पंचमुखी हनुमान की मूर्ति है। पाँच मुख मतलब पाँच तरफ मुँह वाली मूर्ति। हनुमान मंदिर रथ की आकृति का है। 30 जून, 1996 को स्थापित यह मंदिर श्रीलंका का प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है।
हनुमान जी के पाँच मुख उनके विभिन्न दिशाओं में विविध रूपों को दर्शाते हैं। इनमें पूर्वमुखी हनुमान जी बुद्धि की शुद्धता और सफलता , दक्षिणमुखी नरसिंह जी विजय और अभय , उत्तरमुखी वर्ष समृद्धि , पश्चिम मुखी गरूण सौभाग्य और ऊर्ध्व मुखी हयग्रीव ज्ञान और संतति प्रदान करने वाले हैं।
यह दुनिया का एकमात्र मंदिर भी कहा जाता है जिसमें अंजनेयर के लिए एक रथ है। पवनपुत्र हनुमान जी के लिए रथ की व्यवस्था की गयी है।
अंजनेयार मंदिर एक गली में है। बहुत चौड़ी नहीं है गली। फिर भी हमारे ड्राइवर मंजु ने अपनी बस को मंदिर के सामने से ले जाकर आगे एक मैदान में खड़ी कर दी। मैदान के आगे रास्ता नहीं था। बस को लौटते समय इंच-दर-इंच घुमाते हुए जिस तरह से चलाया उससे उसके धैर्य का अंदाज़ा लगा।
मंदिर के बाहर लोगों की लाइन लगी थी। पता लगा कि वे लोग दोपहर को मिलने वाले प्रसाद को पाने के लिए खड़े हैं। स्त्री-पुरुष-बच्चे सभी थे लाइन में। ज़्यादातर महिलाएँ थीं।
मंदिर के बाहर जूते-चप्पल उतारकर हम मंदिर के अंदर गए। आरती का समय हो रहा था। आरती हो रही थी। ज़्यादा भीड़ नहीं थी। लोग मंदिर के पास जाकर हनुमान जी की मूर्ति देख रहे थे। दूर से प्रणाम कर रहे थे। बग़ल में नवग्रह बने हुए थे। लोग उनकी पूजा करते हुए कुछ-कुछ चढ़ावा भी चढ़ाते जा रहे थे।
मंदिर के अंदर फ़ोटो लेने पर वहाँ पुजारी ने टोका। वीडियो बनाने को मना किया। हम मान भी गए क्योंकि तब तक हम काम भर की फ़ोटो ले चुके थे।
अंजनेयार मंदिर के सामने भी मंदिर देखने गए। वहाँ कम भीड़ थी। वहाँ भी लिखा था -यहाँ फ़ोटो लेकर और फ़ोन करके मंदिर की पवित्रता भंग न करें। लेकिन यह चेतावनी देखने के पहले ही हम एक फ़ोटो वहाँ की ले चुके थे।
मंदिर से बाहर आकर हमने देखा हमारी पादुकाएँ वहाँ नहीं थीं जहाँ हमने उतारी थीं। इधर-उधर खोजने पर एक आदमी ने बताया कि उसने उनको सुरक्षित आगे जमा किया है। सारे जूते-चप्पल उसके क़ब्ज़े में थे। हमने उसको अपने जूते-चप्पल की सुरक्षा के लिए कहा नहीं था लेकिन उसने खुद उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ले ली। अब सुरक्षा के बदले हमें उसको कुछ देना था।
हर जगह यही होता है। कुछ पाने के लिए कुछ देना पड़ता है। कुछ भी मुफ़्त नहीं होता। यूक्रेन की सुरक्षा का ज़िम्मा अमेरिका ने अपने आप ले लिए फिर बाद में बोला -अपने खनिज हमको दो। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। हर तरफ़ सुरक्षा का आश्वासन देकर सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाए लोग और ज़्यादा असुरक्षा का माहौल बनाए हुए हैं। गुंडो से रक्षा करने वाले लोग ज़्यादा गुंडई कर रहे हैं।
बहरहाल, जूते-चप्पलों की सुरक्षा का मेहनताना देकर हमने उनको वापस पाया। पहना।
बस की तरफ़ जाते हुए देखा कि मंदिर में दान देने के प्रकारों की सूची लगी हुई थी। 2000 से लेकर 120000 श्रीलंका रुपए के दान की सूची थी। मतलब लगभग 600 से 35000 भारतीय रुपए। अपने हिस्से का चढ़ावा हमारे साथ के लोग पहले ही चढ़ा चुके थे इसलिए हम दान सूची को बस निहारते हुए चलकर बस में बैठ गए।
वापस लौटते हुए देखा कि प्रसाद पाने वालों की लाइन लम्बी हो गयी थी। प्रसाद बाँटना शुरू हो गया था। हम मंदिर के सामने से होते हुए मुख्य सड़क पर आ गए।
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