Monday, March 17, 2025

लड़कन के बीच रहत हन हम


कल दोपहर शहर जाना हुआ। सैंट्रो सुंदरी निकाली। झाड़-पोंछ कर निकल लिए।
अस्पताल के पास कुछ बच्चे मोबाइल को झाड़ू की तरह की स्टिक में फँसाए फोटोबाज़ी कर रहे थे। शायद रील जैसा कुछ बना रहे थे। हम उनको रील बनाते छोड़कर आगे बढ़ गए।
कालपी रोड पर सन्नाटा था। इतवार होने के कारण तीनों फैक्टरियाँ बंद थीं। इक्का-दुक्का गाड़ियाँ दिख रहीं थी सड़क पर। कालपी रोड के किनारे कुछ खंभे अभी भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार के आख़िरी दिनों में बनाए साइकिल पथ की निशानी के तौर पर गड़े थे।
समाजवादी सरकार के आख़िरी दौर में तय किया गया कि साइकिल पथ बनाएँ जाएँ। इसके लिए नई सड़कों की जगह कहाँ से आती? लिहाज़ा बनी हुई सड़कों को दोनों तरफ़ थोड़ा-थोड़ा घेर कर साइकिल पथ बना दिए गए। उन पर साइकिल तो नहीं चलीं लेकिन फ़लों, सब्ज़ी के ठेले खड़े होते रहे कुछ दिन। बाद में सरकार बदल गयी। खम्भे उखड़ गए। अब भी कहीं-कहीं गड़े हुए खम्भे बीते दिनों के साइकल पथ की याद दिलाते हैं।
अपने यहाँ योजनाएँ आमतौर पर इसी तरह बनतीं हैं, इसी तरह अमल होता है। सड़क संकरी करके साइकिल पथ बना दिया, किसी एक योजना का पैसा दूसरी में घुसा दिया। किसी कोटे में रिज़र्वेशन बढ़ा दिया भले ही सीटें कम हो गयीं। चुनाव में घोषणा कर दी इत्ते पैसे देंगे सबको, ये करेंगे, वो करेंगे। चुनाव बाद बताएँगे -"पैसे खतम हैं, योजना लागू करने के लिए योजना बनानी पड़ेगी।"
आगे सड़क किनारे नुक्कड़ पर एक बुजुर्ग अपनी दुकान पर तिरंगा झंडा लगाए बैठे थे। काफ़ी दिन से मैं इस दुकान को देख रहा था। सोचा कभी दुकान वाले से बात करेंगे। आज भी दुकान देखते हुए आगे बढ़ गए। सोचा लौटकर बात करेंगे।
सड़क पर एक स्कूटर वाला दूसरे स्कूटर को पैर से ठेलते दिखा। शायद आगे वाले का पेट्रोल ख़त्म हो गया होगा। पीछे वाला किस तरह आगे वाले को ठेल रहा था उसे देखकर लगा उनका नारा रहा होगा -"साथी लात लगाना।"
लौटते हुए फुटपाथ पर एक आदमी अपनी साइकल पेड़ के नीचे रखे ऊँघ रहा था। उसके पास छोटा बैनर लगा था जिसमें लिखा था -"बवासीर, खूनी, बादी, मस्से, कमजोरी,वातुरोग, शीघ्र पतन, स्वप्नदोष, हाइड्रोसील, लिकोरिया, चोट, मोच, दर्द, सायटिका की अचूक दवा मिलती है।"
बैनर देखकर लगा पेड़ के नीचे एक नहीं कई अस्पताल एक साथ खुले हैं। एक अकेला पेड़ के नीचे लेता आदमी सैकड़ों डाक्टरों के बराबर है।
मैंने रुककर उससे बात की तो पता चला कि पिछले कई सालों से इन रोगों की दवा देता रहा है। ऐसा कोई मरीज़ नहीं मिला उनको जिनकों उनकी दवा से फ़ायदा न हुआ हो। शर्तिया फ़ायदे की दवा है उनकी। नाम पूछने पर बताया -'ए के शुक्ला।'
समान नामराशि होने के कारण गर्व की अनभूति हुई की हमारे नाम राशि का आदमी पेड़ के नीचे लेटे हुए इतने रोगों का शर्तिया इलाज करता है।
लौटते हुए तिरंगे वाली दुकान पर आए। दुकान पर बैठे बुजुर्ग टहलने निकल गए थे। उनकी पत्नी दुकान के बाहर बैठी थी। दुकान क्या थी वह सीमेंट के पाइप और फुटपाथ के सहारे टिके लकड़ी के टूटे तख़्त पर टिका हुआ इंतज़ाम था। चाय, पान मसाला जैसी चुटुर-पुटुर चीजें रखीं थी दुकान पर।
बात करने पर पता चला कि सात-आठ साल से यहाँ दुकान रखे हैं ये लोग। झाँसी के रहने वाले हैं बुजुर्ग लालाराम। पहले गणेश फ्लावर मिल में काम करते थे। साबुन बनाने की फ़ैक्ट्री थी। मिल बंद हो गयी तो यहाँ दुकान डाल ली। तीन बच्चे हैं, तीनों अपने-अपने काम से लगे हैं।
"लड़कन के बीच रहत हन हम "- दुकान के बाहर बैठी शीला ने कहा।
सड़क किनारे दीवार से सटी टूटी-फूटी बरसाती ढँकी जगह पर रहते हैं मियाँ-बीबी। बच्चे भी आसपास ही कहीं रहते हैं। बुजुर्ग महिला ने अपना मायका चिरगाँव बताया। हमने सोचा मैथिली शरण गुप्त के बारे में पता करें लेकिन उनका नाम लेने पर शीला देवी ने एकदम अनसुना सा कर दिया। जानती नहीं होगी गुप्त जी को । हमने सोचा कि अच्छा हुआ राष्ट्र्कवि आज नहीं हैं वरना अपनी उपेक्षा से दुखी होकर एक खंड़काव्य लिख देते।
दुकान के पास एक बकरी, मुर्ग़ा और कुछ मुर्गियाँ टहल रहीं थीं। पता चला एक बकरा भी था जिसे नए साल के दिन किसी ने चुरा लिया। चार मुर्गियाँ हैं, अंडे देती हैं। अंडे और चाय बेचकर किसी तरह गुज़ारा होता है। सरकार की तरफ़ से मिलने वाला पाँच किलो राशन बेटा पहुँचा जाता है।
सड़क किनारे, सूनसान जगह अकेले रहते रात में डर नहीं लगता? सवाल के जबाब में शीला देवी ने कहा -" सड़क चलती रहती है। लोग आते-जाते रहते हैं। सिपाही गस्त करते हैं। इस लिए डर नहीं लगता।"
चाय के दाम पाँच रुपए हैं लेकिन लोग बहुत कम आते हैं पीने। फ़ैक्ट्री सामने और बग़ल में होने के बावजूद वहाँ के लोग नहीं आते। कभी-कभी कोई राहगीर आते-जाते चाय पी लेता है।
बातचीत के दौरान किसी क़िस्म की कोई दीनता वाली बात नहीं की बुजुर्ग महिला ने। चुपचाप, शांत भाव से बात करते हुए जबाव देती रहती रहीं।
मेरी समझ में बहुत कठिन और अभाव ग्रस्त जीवन है इन बुजुर्गों का। लेकिन उनकी बातचीत से इसका कोई संकेत नहीं मिला। ऐसा लगा जैसे जी रहे हैं वैसे ठीक है।
अपने देश में करोड़ों लोग इस तरह का जीवन न जाने कब से जी रहे हैं जो विकास के किसी भी मायने से सुखी जीवन नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोग जी रहे हैं, न जाने कब से।

वापस लौटते समय देखा कि बच्चे अभी भी रील बनाने में लगे थे। अब उनके पास बड़ा कैमरा भी दिखा। हम उनसे बात करके आगे बढ़ गए। आगे बढ़ने के बाद सोचा कि उनकी रील बनाते हुए फ़ोटो लेनी चाहिए थे। हमने फिर कार के रीयर व्यू मिरर से उनकी इमेज की फ़ोटो ली। बच्चे लोगों को कड़ी धूप में रील बनाने में न जाने क्या हासिल होता है। यही सोचते हुए हम वापस घर आ गए। 


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