आजकल टीवी पर जस्टिस वर्मा, कुणाल कामरा पर बातचीत खबरें चल रहीं हैं। औरंगज़ेब पीछे हो गए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कुणाल कामरा के आफिस में तोड़फोड़ औरंगज़ेब के मक़बरे की नेट प्रैक्टिस है। उधर राणा सांगा पर हुई बयानबाज़ी भी सर उठाने की कोशिश कर रही है लेकिन उसको उतना समर्थन नहीं मिला जितना मुग़लबादशाह की खबर को मिला था।
मोबाइल पर मुस्कान, सौरभ, साहिल की खबरें चल रहीं हैं। कैसे मुस्कान ने क़त्ल किया अपने पति को, कैसे मिली अपने पुराने प्रेमी से, कैसे डांस किया पति के साथ उसे मारने से पहले इस पर तमाम वीडियो टहल रहे हैं।
उधर सुशांत राजपूत का केस बंद हो गया। इधर मुस्कान केस शुरू हुआ। अगर मुस्कान और उसका परिवार सिनेमा से जुड़ा होता तो शायद सुशांत के केस की जगह ले लेता। तब शायद अर्णव जी चीखते हुए इस पर रिपोर्टिंग करते। क्या पता कभी फिर खुले सुशांत की केस फ़ाइल जैसे अभी छत्तीस गढ़ के मुख्यमंत्री जी की फ़ाइल फिर से खुली। आरूषि हत्याकाण्ड तो नहीं लगता अब फिर खुलेगा। हो सकता है तीन-चार सौ साल बाद कभी खुले।
आजकल हर तरफ़ पेड प्रोमोशन का ज़माना है। अफ़वाहें फैलाने तक के पैसे मिलते हैं लोगों को। प्रति ट्विट, पर मेसेज भुगतान मिलते हैं लोगों। अफ़वाहों और किसी के विरोध में खबरों का कैसे भुगतान होता है, क्या रेट है पता नहीं। कितने लोगों को अफ़वाह उद्योग में रोज़गार मिला है इसकी भी जानकारी आनी चाहिए। अखबारों में विज्ञापन आने चाहिए - "हमारी सरकार ने अफ़वाह को उद्योग का स्तर प्रदान किया। इतने लोगों को इस रोज़गार से जोड़ा। घर बैठे पैसे कमाने के मौक़े दिए।"
न्यूनतम वेतन की दर की तर्ज़ अफ़वाह फैलाने की न्यूनतम दर तय होनी चाहिए। घटिया पैरोडी का प्रतिशब्द मेहनताना तय होना चाहिए। पारदर्शी होना चाहिए सब कुछ। जैसे गूगल, फ़ेसबुक विज्ञापन और पेड प्रमोशन करते हैं उसी तरह ट्रोलर्स को भी पैसा मिलना चाहिए। हरेक को अपने पसीने का पैसा मिलना चाहिए।
नहीं क्या?
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