Friday, June 20, 2014

जिस तट पर प्यास बुझाने में अपमान प्यास का होता हो



आज जामुन 15 रूपये पाव मिल रहे थे। जो लोग कह रहे थे कि मंहगे हैं उनसे गुप्ताजी बता रहे थे- "परसों बीस रूपये पाव थे। साहब से पूछ लीजिये।"

हम सोचे हमसे कोई पूछेगा लेकिन किसी ने पूछा नहीं तो हम दफ्तर चले आये चुपचाप सर झुकाए हुए। यह कविता पंक्ति बिना किसी कारण याद आ गयी-

जिस तट पर प्यास बुझाने में अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा रह जाना बेहतर है।


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