Saturday, June 07, 2014

धरती की चम्पी मालिश सी करती हुई धूप




गाडी पटरी पर सरपट दौड़ रही है। सामने खेत सफाचट दिख रहे हैं। जुते हुए। बीच-बीच में पेड़ भी दीखते हैं। छोटे-छोटे।धुप सब जगह पसर गयी है। सब जगह कब्जा कर लिया है धुप ने। धूप मानो बाजार हो गयी। धरती की चम्पी मालिश सी करती हुई धूप धरती को धीरे-धीरे गर्म कर रही है। एक स्टेशन सर्र से निकल गया। बीच में एक जगह कुछ निर्माण कार्य सा हो रहा है। सीमेंट के पाइप सिगरेट के टुकड़ों सरीखे पड़े हैं इधर-उधर बेतरतीब। एक खेत में पम्प सेट पानी उगल रहा है। कुछ लोग खेत के बीच में विकर्ण बनाते हुए एक के पीछे एक चलते हुए खेत पार कर रहे हैं।

एक खेत अधसिंचा सा दिखा।भूरा भूरा।खेत का गीला हिस्सा सूखे हिस्से के मुकाबले इतराता सा दिखा। दूर बस्ती के मकान चहल पहल सी करते दिख रहे हैं। ट्रेन कोटा स्टेशन पहुंचने वाली है। सूरज भाई खिड़की से झांककर हेलो कर रहे हैं।
 
 

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