Sunday, March 30, 2025

आकांक्षा युवा बनाम दैवीय उपवास

 बेरोजगारी का नया नाम ‘आकांक्षा युवा’ हो गया। मतलब अब उम्रदराज लोगों को बेरोजगार कहलाने का हक नहीं। आकांक्षा युवा की उम्र तय होने के बाद उस उम्र से अधिक लोगों को बेरोजगार मतलब आकांक्षा युवा कहलाने का हक नहीं होगा।

‘आकांक्षा युवा’ का मतलब यह भी कि अब युवतियों को बेरोजगार कहलाने का कोई हक नहीं। लड़कियों को घर तक सीमित रखने का सुंदर उपाय। आधी आबादी की समस्या निपट गई एक झटके में ।
क्या पता आने वाले समय में भुखमरी के लिए ‘दैवीय उपवास’ जैसा कोई शब्द चलन में आ जाये। भूख से मरने वालों के लिए कहा जाएगा -“पाँच लोगों पर देव कृपा हुई।”
भाषा के जुगाड़ से सदियों पुरानी समस्या चुटकी बजाते हल हो सकती हैं।

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Friday, March 28, 2025

सर्विसिंग का आन लाइन रिव्यू

 चार दिन पहले गाड़ी सर्विसिंग के लिए देने गए। 25 साल की हो गई सैंट्रो सुंदरी। इंसान होती तो शादी के लिए चिंता होने लगती। जीवन साथी खोजने के लिए मैट्रीमोनियल में विज्ञापन शुरू हो जाते। यार-दोस्तों से कहने लगते -"कोई सही लाइफ़ पार्टनर मिले तो बताना। इसकी भी शादी हो जाए तो ज़िम्मेदारी पूरी हो।"

लेकिन हमारी सैंट्रो सुंदरी कोई इंसान नहीं। जिस उम्र में इंसान नई ज़िंदगी के सपने देख रहा होता है उस उम्र में गाड़ी के लिए लोग पूछते हैं -"इसे बेंच क्यों नहीं देते?" कई लोग हंसते भी हैं -"अभी तक बदली नहीं गाड़ी।"
कानपुर में 25 साल बाद भी हमारी सैंट्रो सुंदरी सड़क पर धड़ल्ले से चल रही है। दिल्ली NCR में होती तो अब तक बिक जाती, कट-पिट जाती। बड़े शहरों की चकाचौंध न जाने कितनों की क़ुर्बानी की नींव पर टिकी होती है।
बहरहाल परसों जब गाड़ी लेने गए तो वहाँ मौजूद बच्ची ने कहा -"रिव्यू अच्छा दे दीजिएगा।"
हमने मज़े लेते हुए कहा -"क्यों रिव्यू अच्छा देंगे? एक तो गाड़ी समय पर नहीं दी, दूसरे सुबह-सुबह चाय भी नहीं पिलाई।"
उसने फ़ौरन बग़ल से चाय लेकर गुजरते बच्चे को आवाज़ देकर मेरे लिए चाय मंगाई। पानी भी। गाड़ी तो तैयार हो ही रही थी। बोली -"रिव्यू दे दीजिएगा। अच्छा सा।"
हमने फिर मज़े लिए -"हमको रिव्यू देने आता ही नहीं। कैसे देंगे?"
उसने फ़ौरन मेरा मोबाइल हाथ में लेकर रिव्यू वाला लिंक खोला और फ़ोन मेरे सामने कर दिया। मैंने पूछा -"अच्छा बताओ क्या लिख दें -गाड़ी देर से दी?"
उसने कहा -"रेटिंग 5 कर दीजिए। कुछ अच्छा सा रिमार्क लिख दीजिए।"
हम रिव्यू वाले लिंक में कुछ लिखने और रेटिंग देने के पहले कुछ सोचने सा लगे। इधर-उधर देखने लगे। बच्ची को लगा कि हमको समझ नहीं आ रहा कैसे रेटिंग दें। उसने मेरे हाथ से मोबाइल ऐसे ले लिया जैसे विश्वकप के फ़ाइनल में मदनलाल ने गेंद कपिलदेव के हाथ से ले ली होगा। इसके बाद फ़ौरन रेटिंग 5 डालकर कहा -"अब कुछ अच्छा सा लिख भी दीजिए।"
हमने कुछ लिखा और इसके बाद बच्ची से कहा -"तुमने ज़बरदस्ती रेटिंग 5 की है मेरे मोबाइल से। हम तुम्हारी शिकायत करेंगे। तुम्हारे फ़िंगर प्रिंट भी हैं मेरे मोबाइल में।"
बच्ची हंसने लगी। उसकी हंसी से मुझे लगा कि उसने मेरी शिकायत वाली धमकी को उसी तरह लिया जिस तरह सरकारें अपने ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय की चेतावनियों को लेती हैं या फिर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही की धमकियों को भ्रष्टाचारी लेते हैं।
हमने पूछा -"तुम्हारी रेटिंग में कुछ लोगों ने खबर रेटिंग भी की है। किसी ने एक, किसी ने दो। लेकिन इससे फ़रक क्या पड़ता है तुमको अच्छी रेटिंग से?"
उसने बताया -" अच्छी रेटिंग से पैसे बढ़ते हैं। प्रमोशन होता है।"
हमने देखा कुछ लोगों ने ख़राब रेटिंग भी की थी। किसी ने एक, किसी ने दो। औसत 4.8 था। उसने बताया -"खराब रेटिंग मिलने पर हम लोगों को डाँट पड़ती है।"
हम गाड़ी सर्विसिंग हमेशा इसी जगह कराते हैं। कभी देखा नहीं किसने क्या रेटिंग दी। सर्विसंग कराई, पैसे दिए, चले आए।
लेकिन अब बदले समय में रेटिंग का चलन शुरू हुआ है। रेटिंग भी सेवा लेने वाले की
मन :स्थिति पर निर्भर करती है। श्रीलंका के जिस होटल में रुकना मुझे सबसे अच्छा अनुभव लगा उसके बारे में कुछ लोगों ने कम अच्छी रेटिंग भी दी है। जो सरकार तमाम लोगों को सबसे भ्रष्ट, साम्प्रदायिक, बेहूदी, तानाशाही मनोवृत्ति वाली लगती है वही दूसरे तमाम लोगों को सबसे शानदार, स्वर्णयुग लाने वाली लगती है।
बहरहाल बच्ची ने जब बताया कि अच्छी रेटिंग से उसकी तनख़्वाह बढ़ सकती है तो पूछा -"तुमको कितने पैसे मिलते हैं?"
उसने उसने जो पैसे बताए वह आज कल के अकुशल मज़दूर की मज़दूरी से भी बहुत कम हैं। एक अकुशल, अनपढ़ मज़दूर की मज़दूरी से भी कम पैसे एक पढ़े-लिखे ग्रेजुएट को मिलते हैं। यह सामान्य चलन है आज के समय का। एक अकुशल मज़दूर को मिट्टी खोदने के काम के जो पैसे मिलते हैं कई प्राइवेट स्कूलों के टीचर उससे आधे में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। देश का निर्माण का काम ऐसे ही किफ़ायती तरीक़े से हो रहा है।
बच्ची से और बात हुई तो उसने बताया कि चार साल से काम कर रही है। स्टेशन के पास हूलागंज से आती है शास्त्रीनगर। दो बड़े भाई भी कुछ-कुछ काम करते हैं। एक सीमेंट की पुरानी बोरी बेंचता है, दूसरा ई रिक्शा चलाता है। पिता रहे नहीं।
बहरहाल, हम अच्छा रिव्यू देकर गाड़ी लेने के पहले देखने गए। पता चला गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हुई। बैटरी डाउन हो गयी थी। गाड़ी की बैटरी पहले टनाटन चल रही थी। सर्विसिंग के बाद शायद बैटरी ने समर्थन वापस ले लिए। शायद वह सर्विसिंग से नाराज़ हो गयी हो। क्या पता दो दिन वहाँ रहने के दौरान किसी ने उससे छेड़खानी की हो। बैडटच किया हो उससे किसी ने। उसको सदमा लगा हो। कुछ भी हो सकता है।
आजकल कोई भी स्त्रीलिंग किसी भी जगह सुरक्षित नहीं है। कल ही किसी पुलिस वाले ने कहा -"उसने स्तन दबाए तो उसको पता नहीं था कि वह महिला है, उसने समझा वह छात्रा है।" एक जज साहब कह ही चुके हैं -"लड़की के स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना दुष्कर्म नहीं है ।"
हम गाड़ी को वहीं छोड़कर चले आए हैं। बैटरी चार्ज हो रही है। दो दिन हो गए। अच्छा रिव्यू देने के बाद हम सर्विस सेंटर की बुराई भी नहीं कर सकते। कुछ कहेंगे तो अगला कह सकता -"आपने सर्विस और व्यवहार को अच्छा बताया है। अब शिकायत बेमानी है।"
यह कुछ ऐसा ही है जैसा आजकल सरकारें कहती हैं -"हमें जनता ने चुना है। हमारा जो मन आएगा करेंगे। हमारी बुराई का किसी को कोई हक़ नहीं है भले ही वो कोई मसखरा ही क्यों न हो।
लोकतंत्र में मसखरी का सर्वाधिकार सरकारों के लिए सुरक्षित है।

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Thursday, March 27, 2025

होटल लाया बीच में जन्मदिन और विदाई


 

होटल लाया बीच में दो दिन रुकने के बाद हम लोगों को वहाँ से विदा होना था। सुबह-सुबह हम लोग एक बार फिर समुद्र तट पर गए। हमारे साथ की शांता जी और मालती जी हमसे पहले वाली सुबह में जागकर, अपना नियमित योगासन निपटाकर, चटाई समेत चुकी थीं। सब लोग समुद्र तट पर गए। वहाँ टहले। फ़ोटोबाज़ी, वीडियोग्राफ़ी की। लौटते समय रास्ते में मुदिल्ला (mudilla ) के फूल मिले।
मुदिल्ला फूल के बारे में पता चला कि ये फूल शाम को खिलता है, सुबह मुरझा जाता है। यह जानकारी होने पर हमने इसे रात के समय भी देखा था। रात को एकदम कड़ियल, गबरू ज़वान जैसा लग रहा था फूल। सुबह उसी फूल के हाल नई पेशन स्कीम वाले रिटायर बुजुर्ग सरीखी हो गयी थी। छूते ही बिखर गया।
यह भी पता चला कि फूल ज़हरीला होता है। मतलब विषकन्या घराने का फूल। विषफूल कहना ज़्यादा सही होगा। फूल की ख़ूबसूरती देखकर ऐसा कहीं से नहीं लगता कि यह ज़हरीला भी होता होगा। लेकिन कुछ सच ऐसे होते हैं जिनको सच मानना ही पड़ता है।
लौटकर हम लोग तैयार हुए। तैयार होकर हम लोग नाश्ते के लिए नीचे आ रहे थे तो अपन एक बार फिर कमरे में गए यह देखने के लिए कि कहीं कोई सामान तो नहीं छूट गया। देखा तो छुटका, पर्स में रखा जाने वाला शीशा, बरामदे की रेलिंग में रेलिंग में रखा था। शीशे की पीठ समुद्र की तरफ़, चेहरा कमरे की तरफ़ था। उसको देखकर लगा कि बेचारा रुआँसा सा हमारी राह देख रहा था। कोई भी सामान छूट जाता है तो ऐसे ही अपने से बिछुड़े लोगों की राह ताक़त है। उस शीशे के हाल देखकर अन्दाज़ लगा कि किसी मेले में बिछुड़ गए लोगों के क्या हाल होते होंगे।
नाश्ता करके हम लोग निकलने वाले थे कि वहाँ होटल के बैंड वाले दिखे। उस दिन हमारे साथ के राजेश टंडन जी का जन्मदिन था। टंडन जी ने केक काटा। सब लोगों ने बैंड वाले के साथ दोहराते हुए गाना गाया -'हैप्पी बर्थ डे टू यू।' होटल की एक बच्ची ने होटल की तरफ़ से टंडन जी को माला पहनाई। सबने केक खाया। यह राजेश टंडन जी का पहला जन्मदिन था जो विदेश में मनाया गया।
जहां जन्मदिन मनाया जा रहा था वहीं पर एक तितली का बड़ा सा पोस्टर था। सभी जोड़ों ने अपने जोड़ीदार के साथ और अकेले लोगों ने खुद के साथ तितली के सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचाए। होटल के स्टाफ़ ने फ़ोटो खिंचाते समय हम लोगों के हाथ तितली के परों की दिशा में करने का पोज बनाकर बताया। हमने भी फ़ोटो खिंचाए तो अपन का पोज वैसा वैसा नहीं था जैसा बताया गया था। अपन हमेशा गड़बड़ कर देते हैं।
वहाँ से चलने के पहले हम लोगों ने होटल के स्टाफ़ और बैंड वालों को टिप दी । चलने के पहले होटल की स्टाफ़ कुसुम ने बार-बार हम लोगों से गूगल पर रिव्यू लिखने के लिए कहा। हमने होटल के रजिस्टर में तो फ़ौरन अच्छी सी अंग्रेज़ी में लिख दिया। जब हम रिव्यू लिख रहे थे तो अच्छे-अच्छे अंग्रेज़ी शब्द याद करके लिखने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अच्छे क्या ख़राब, चलताऊ शब्द तक याद नहीं आ रहे थे। सब मानों कह रहे थे कि वैसे याद नहीं करते, आज बड़ी याद आ रही है -मतलबी कहीं के। हम रिव्यू का पन्ना भर रहे थे उधर बस का हॉर्न बज रहा था। हम दस्तख़त करके बस की तरफ़ लपके।
गूगल पर रिव्यू बाद में, काफ़ी बाद में लिखा। चीजों जो रह जाती हैं वो काफ़ी दिन तक रह ही जाती हैं।
हम लोग केवल दो दिन ही रहे होटल लाया बीच में। इन दो दिनों में लाया बीच की इतनी यादें जमा हो गयीं हैं कि उनको बहुत दिन तक फेंटते-याद करते रहेंगे। यादें उलटने-पलटने से तरो-ताज़ा होती रहती हैं। जो यादें दोहराई नहीं जातीं वे कब 'जेहन-बदर ' हो गयीं, पता ही नहीं चलता।
होटल से विदा होने के बाद हम लोग गाते-गुनगुनाते आगे बढ़े। बस में बैठते ही गाने की शुरुआत हनुमान चालीसा से होती। इसके बाद बाक़ी गाने पूरे माहौल पर क़ब्ज़ा कर लेते। कभी-कभी गानों की अंत्याक्षरी भी होती। चलते समय जब बस इधर-उधर होती तो यह तय करना मुश्किल हो जाता कि वह गाने की धुन पर ठुमक रही है या सड़क के उतार-चढ़ाव के कारण हिल रही है।
हमारी अगली मंज़िल एक आयुर्वेदिक नर्सरी थी।

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Wednesday, March 26, 2025

अफ़वाह फैलाने की न्यूनतम दर

 आजकल टीवी पर जस्टिस वर्मा, कुणाल कामरा पर बातचीत खबरें चल रहीं हैं। औरंगज़ेब पीछे हो गए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कुणाल कामरा के आफिस में तोड़फोड़ औरंगज़ेब के मक़बरे की नेट प्रैक्टिस है। उधर राणा सांगा पर हुई बयानबाज़ी भी सर उठाने की कोशिश कर रही है लेकिन उसको उतना समर्थन नहीं मिला जितना मुग़लबादशाह की खबर को मिला था।

मोबाइल पर मुस्कान, सौरभ, साहिल की खबरें चल रहीं हैं। कैसे मुस्कान ने क़त्ल किया अपने पति को, कैसे मिली अपने पुराने प्रेमी से, कैसे डांस किया पति के साथ उसे मारने से पहले इस पर तमाम वीडियो टहल रहे हैं।
उधर सुशांत राजपूत का केस बंद हो गया। इधर मुस्कान केस शुरू हुआ। अगर मुस्कान और उसका परिवार सिनेमा से जुड़ा होता तो शायद सुशांत के केस की जगह ले लेता। तब शायद अर्णव जी चीखते हुए इस पर रिपोर्टिंग करते। क्या पता कभी फिर खुले सुशांत की केस फ़ाइल जैसे अभी छत्तीस गढ़ के मुख्यमंत्री जी की फ़ाइल फिर से खुली। आरूषि हत्याकाण्ड तो नहीं लगता अब फिर खुलेगा। हो सकता है तीन-चार सौ साल बाद कभी खुले।
आजकल हर तरफ़ पेड प्रोमोशन का ज़माना है। अफ़वाहें फैलाने तक के पैसे मिलते हैं लोगों को। प्रति ट्विट, पर मेसेज भुगतान मिलते हैं लोगों। अफ़वाहों और किसी के विरोध में खबरों का कैसे भुगतान होता है, क्या रेट है पता नहीं। कितने लोगों को अफ़वाह उद्योग में रोज़गार मिला है इसकी भी जानकारी आनी चाहिए। अखबारों में विज्ञापन आने चाहिए - "हमारी सरकार ने अफ़वाह को उद्योग का स्तर प्रदान किया। इतने लोगों को इस रोज़गार से जोड़ा। घर बैठे पैसे कमाने के मौक़े दिए।"
न्यूनतम वेतन की दर की तर्ज़ अफ़वाह फैलाने की न्यूनतम दर तय होनी चाहिए। घटिया पैरोडी का प्रतिशब्द मेहनताना तय होना चाहिए। पारदर्शी होना चाहिए सब कुछ। जैसे गूगल, फ़ेसबुक विज्ञापन और पेड प्रमोशन करते हैं उसी तरह ट्रोलर्स को भी पैसा मिलना चाहिए। हरेक को अपने पसीने का पैसा मिलना चाहिए।
नहीं क्या?

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सुविधा संरक्षण का सिद्धांत


 पिछले हफ़्ते एक किताब आनलाइन आर्डर की थी। डिलीवरी वाले दिन सुबह से ही संदेश आ गया-"आज दस से बारह बजे के बीच आपका सामान डिलीवर होगा।"

ग्यारह बजे के क़रीब मोबाइल पर फ़ोन आया- "अपना सामान ले लीजिए।"
मैं घर के बाहर ही खड़ा था। मैंने कहा -"अरे, मैं बाहर ही खड़ा हूँ। आओ तो।"
दो मिनट बाद डिलीवरी बालक मोटरसाईकिल पर आया। पीछे बड़ा बैग। दाएँ-बाएँ भी गठरी में सामान। सर पर हेलमेट। कोई पर्वतारोही जैसे रोज़ी-रोटी के पहाड़ पर चढ़ने के लिए निकला हो।
हम जब तक गेट खोलकर बालक तक पहुँचे उसने मेरी किताब अपने एप में 'डिलीवर्ड' दिखा दी थी। मोटरसाईकिल पर बैठे-बैठे किताब थमा दी। चलने ही वाला था कि हमने बातचीत की गरज से कहा -"हमको किताब मिलने के पहले ही डिलीवर हो गयी। बड़ी तेज स्पीड है तुम्हारी।"
उसने कहा -"अरे आप जैसे लोग सपोर्ट कर देते हैं तो डिलीवरी का काम आसान हो जाता है। आप बाहर नहीं आते तो मोटरसाइकिल खड़ा करता। घर के अंदर जाता। पूछता। खोजता। तब डिलीवर करता।"
बालक ने बताया कि उसके पास 140 पैकेट थे डिलीवर करने को। हर पैकेट पर दस रुपया डिलीवरी के मिलते हैं। दिन भर में इतने पैकेट बाँट देने हैं। बताते हुए बालक अगली डिलीवरी के लिए निकल लिया।
बचपन में हम लोग पोस्टमैन पर निबंध पढ़ते थे। पोस्टमैन एक सरकारी कर्मचारी होता है। वह दरवाज़े-दरवाजे जाता है। डाक बाँटता। अब पोस्टमैन का काम डिलीवरी एजेंट करने लगे हैं लेकिन उन पर निबंध नहीं आता शायद। पता नहीं पोस्टमैन पर भी निबंध आता है कि नहीं आजकल।
ब्लिंकिट जैसे एप पर भी सामान डिलीवर करने के लिए बालक लोग आते हैं। उनको दस मिनट में डिलीवरी करना होता है। इस चक्कर में डिलीवरी करने वाले बच्चे हड़बड़ाए, घबराए दिखते हैं। कहीं देर हुई तो पैसा न काट लिया जाए। इस चक्कर में डिलीवरी बालक तनाव में भी आ जाते होंगे। किसी की तबियत भी ख़राब हो सकती है इस चक्कर में। इस तरह की सुविधाएँ लगातार अमानवीय होती जा रहीं हैं। पैसे वाले लोगों की सुविधा के लिए बनने वाला हर साधन सेवा के काम में 'जुते' लोगों के लिए अमानवीय होता जा रहा है।
आइंस्टाइन के ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत की तर्ज़ पर शायद सुविधा संरक्षण का सिद्धांत काम करता है। दुनिया में कुल सुविधा की मात्रा स्थिर रहती है। एक को मिलने वाली सुविधा किसी दूसरे की सुविधा के बदले होती है।
हम भी कहाँ सुबह-सुबह सिद्धांत की बातें करने लगे। आपका भी समय बरबाद किया। समय संरक्षण का सिद्धांत भी तो है न -"एक पोस्ट को पढ़ने में लगा हुआ समय किसी दूसरी पोस्ट को पढ़ने के समय की क़ीमत पर होता है।"
ये सिद्धांत की बात तो लफ़्फ़ाज़ी सी है। बैठे-ठाले की लंतरानी। लेकिन यह सोचा है कि कोई डिलीवरी बालक आएगा तो लपक के सामान ले लेंगे। जितनी जल्दी सामान लेंगे उतना उसको सहूलियत होगी।

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कुणाल कामरा की कामेडी

 कुछ लोगों को कुणाल कामरा की कामेडी बेहूदी होने की हद तक सस्ती लगती है।

कुणाल कामरा की कामेडी सस्ती होने का कारण यह भी हो सकता है कि उनको डर होगा कि मंहगी कामेडी लोग समझ न पायें तो लोग बुरा भी नहीं मान पाएंगे। बवाल भी नहीं होगा। बवाल नहीं होगा तो क्या फ़ायदा कामेडी का?
नाले की गैस से रोजगार चलाने वाले और (a+b) स्क्वायर से 2ab बचा लेने वाले समाज के लोग ऊँची कामेडी कैसे समझ पायेंगे। उनके लिए ख़ासतौर पर ग़रीबी रेखा के नीचे वाली कामेडी का जुगाड़ किया गया है। आज बहुतायत ऐसे ही लोगों की है। यही सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है।
अब यह बात तो गांधी जी भी कहते थे -“ग्राहक भगवान होता है।”
ग्राहक की सेवा के लिए सस्ती, तुरंत समझ में आने वाली कामेडी कुणाल कामरा वाली खबर ने औरंगज़ेब वाली खबर को पटकनी दी है।
बड़ी बात नहीं कल को कुणाल कामरा माननीय के साथ नाश्ता करते हुए मुस्कान वाला पोज देते हुए दिखें।

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Tuesday, March 25, 2025

श्रीलंका के बेंटोटा बीच पर


 कछुआ संरक्षण संस्थान देखते हुए क़रीब-करीब शाम हो गयी थे। अगला स्पॉट श्रीलंका का प्रसिद्ध बेंटोटा बीच था।

चूँकि हम दो दिन से लाया बीच होटल के पास के समुद्र तट पर कई बार टहल चुके थे इसलिए कुछ लोगों का मत हुआ कि वापस होटल लौटा जाए। होटल वहाँ से क़रीब दो घंटे की दूरी पर था। लेकिन 'कुछ लोगों' से कुछ ज़्यादा लोग बेंटोटा समुद्र तट देखने की इच्छा वाले निकल आए। लिहाज़ा हम लोगों की बस चल पड़ी बेंटोटा बीच की तरफ़।
बेंटोटा बीच श्रीलंका का प्रसिद्ध समुद्र तट है। यह अपनी सुनहरी रेत, साफ नीले पानी और ताड़ के पेड़ों से घिरी तटरेखा के लिए प्रसिद्ध है। यह धूप सेंकने, तैरने और विंडसर्फिंग, जेट स्कीइंग और स्नोर्कलिंग जैसे पानी के खेलों का आनंद लेने के लिए एक आदर्श स्थान है।
बेंटोटा नाम की नदी भी है वहाँ। नाव सफ़ारी के लिए एकदम सही है, जहाँ पक्षियों, मगरमच्छों और जल मॉनीटरों सहित विविध वन्य जीवन को देखने का मौका मिलता है। आगंतुक कयाकिंग और नदी में मछली पकड़ने जैसे जल खेलों में भी शामिल हो सकते हैं।
बेंटोटा बीच हनीमून मनाने वालों और जोड़ों के लिए भी एक लोकप्रिय गंतव्य है। शांत वातावरण, शानदार रिसॉर्ट्स और सुंदर सूर्यास्त के साथ मिलकर एक रोमांटिक माहौल बनाता है। समुद्र तट पर मोमबत्ती की रोशनी में डिनर का आनंद लें या अपने प्रियजन के साथ तट पर आराम से टहलें। हालाँकि हममें से कोई इस सुविधा का लाभ उठाने का सुपात्र नहीं था। लोग या तो वर्षों पहले के शादी-सुदा था या फिर कुंवारे थे।
जब हम बेंटोटा बीच पर पहुँचे तो सूरज डूबने के लिए तैयार हो रहा था। समुद्र में उतरते हुए अपनी किरणों की आख़िरी खेप वह समुद्र किनारे भेज रहा था।
वहाँ लोग समुद्र किनारे टहलते , नहाते, फ़ोटो खिंचाते दिखे। एक बच्चा समुद्र किनारे की गीली रेत में गड्डा करके आराम से गड्डे की कुर्सी जैसी बनाकर बैठ गया था। समुद्र की लहरें किनारे की तरफ़ आतीं, उसको भिगोते हुए और आगे की तरफ़ जाती फिर वापस समुद्र में मिलने के लिए लौट जातीं। वह बच्चा आराम से गड्डे की कुर्सी में बैठा लहरों को आते-जाते देखते आनंदित होता रहा।
कुछ देर बाद शायद वह गड्डे में बैठे-बैठे बोर हो गया तो गड्डे से निकलकर बाहर आया और भागता हुआ समुद्र की तरफ़ भागता चला गया और पानी में नहाने लगा। उसके परिवार के लोग भी उसके साथ थे।
बच्चे के गड्डे में बैठे रहने और फिर बोर होकर उठने और पानी में जाने को देखकर मुझे लगा कि कोई समाज भी बहुत दिनों तक पतन के गड्डे में बैठा नहीं रह सकता। कभी न कभी वह पतन से ऊबकर बाहर आएगा और आगे बढ़ेगा।
वहीं पास में कुछ विदेशी धूप स्नान कर रहे थे। समुद्र किनारे आधी चौड़ाई के तख़्त डाले पीठ के बल लेते हुए आसमान की तरफ़ आँख मूँदकर लेटे हुए थे। बीच-बीच में इधर-उधर नज़ारे गुज़ारते हुए मुआयना भी चलता रहा उनका।
हमारे साथ के लोग समुद्र के किनारे खड़े होकर फ़ोटो खिचा रहे थे, वीडियो बना रहे थे। हमने भी समुद्र के किनारे खड़े होकर अपनी आवाज़ में कमेंट्री करते हुए वीडियो बनाया।
वहाँ कुछ बच्चे पतंग भी उड़ा रहे थे। दो पतंगे आसमान में अग़ल-बग़ल उड़ती हुई एक-दूसरे के पास टहल रहीं थीं। शायद दोनों के बीच पेंच-विराम था इसलिए एक दूसरे को काटने के लिए पतंगों के पेंच नहीं लड़ रहे थे।
चूँकि सूरज समुद्र में डूब रहा था इसलिए समुद्र के पानी के साथ तरफ़ पीठ फ़ोटो खिंचाने में फ़ोटो/ वीडियो काले-सफ़ेद आ रहे थे। इसका उपाय लोगों ने ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो खिंचाते हुए किया। उनमें से कुछ फ़ोटो देखकर लगा कि ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो की भी बात ही कुछ और होती है। एकाध फ़ोटो समुद्र तट के लंबवत खड़े होकर भी खिंचवाए जिनमें लोगों की शक्लें पहचान में आ रहीं थीं लिहाज़ा बिना किसी हिचक के कहा जा सकता था कि फ़ोटो अच्छे आए हैं।
डूबते सूरज की रोशनी में समुद्र तट की सुनहरी रेत और समुद्र का पानी चमकता दिख रहा था। ऐसा लग रहा था मानो सूरज विदा होते समय रेत और पानी को चमकदार सुनहरी रोशनी की टिप दे रहा हो।
समुद्र किनारे के वीडियो बनाते हुए विदेशी सैलानी जब कैमरे के सामने आते तो उँगलियाँ अपने आप कैमरा को ज़ूम कर देतीं। हमारे साथ के लोग शिकायत भी करते सुनाई दिए एकाध वीडियो में -"शुक्ला जी हमारी फ़ोटो नहीं ले रहे हैं।"
थोड़ी देर बाद शाम हो गयी और हम लोग वापस होटल की तरफ़ चल दिए।

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Monday, March 24, 2025

कछुआ संरक्षण संस्थान


 मदु नदी में वोटिंग के बाद हम लोग पास में ही स्थित एक ज्वेलरी शाप में गए। वहाँ मौजूद व्यक्ति ने हम लोगों को जेम स्टोन पहचानने और उनको भट्टी में गरम करने का तरीक़ा बताया। यह भी कि उनकी दुकान से लेने पर वे सर्टिफिकेट देते हैं। कभी भी ख़राब निकलने पर वापसी की गारंटी। यह भी कि वे खुद जेम स्टोन तैयार करते हैं। कोई बिचौलिया भी नहीं है इसलिए उनके यहाँ जेम स्टोन कम दाम पर उपलब्ध हैं।

हमारे साथ के लोगों में से कुछ ने कुछ ख़रीदारी की। हम वहाँ रखी फ़ैक्स मशीन जैसी मशीन को देखते रहे। वह मशीन अलग-अलग देशों के नोट्स को जाँचने की मशीन थी। हमारे सामने कई देशों के नोट जाँचे गए। एक छुटकी सी मशीन को यह सब करते देखकर ताज्जुब हुआ।
ज्वेलरी शाप से निकलकर हम लोग लंच करने के लिए एक होटल गए। शाकाहारी खाना। एक दिन पहले हमारी शादी की सालगिरह मनाई गयी थी। उसके उपलक्ष में लंच हम लोगों की तरफ़ से था। 16 लोगों का लंच का खर्च 58400 श्रीलंकाई रुपए हुआ। भारत के हिसाब से लगभग 17000 रुपए। 1062 रुपए प्रति व्यक्ति। होटल अच्छा था। विदेश के लिहाज़ से ठीक ही कहा जाएगा।
खाना खाकर हम लोग एक कछुआ संरक्षण संस्थान देखने गए। एक स्वयं सेवी संस्था द्वारा संचालित उस संस्थान में कछुओं की देखभाल की व्यवस्था थी। आजकल आए दिन चीनी माँझे से लोगों की गर्दन और दूसरे अंग कटने की खबरें आती हैं। उसी तरह मछुआरों के जाल से कछुओं के अंग कट जाते हैं। वहाँ कई कछुए ऐसे दिखे जिनके कुछ -कुछ अंग कटे थे। किसी का एक पैर कटा, किसी का आधा, किसी के दो, किसी के तीन, किसी के चारों पैर कटे दिखे । मतलब अलग-अलग तरह के दिव्यांग कछुए। जिन कछुओं के चारों पैर कटे थे वे तैरने में बिल्कुल असमर्थ , पानी के बहाव के साथ इधर-उधर हो रहे थे।
कछुओं के शिकार भी लोग करते हैं। उनके संरक्षण के लिए यह संस्थान काम करता है। कछुए समुद्र किनारे अंडे देते हैं। उनको लोग ले जाते हैं। विविध तरीक़े से उनका उपयोग करते हैं। इससे कछुओं की जनसंख्या पर असर पड़ता है। उनका अस्तित्व ख़तरे में है। यह संस्था समुद्र किनारे कछुओं के अंडों को बीनकर अपने यहाँ ले जाकर ऐसे वातावरण में रखते हैं जिससे कछुए पैदा हो सकें। उनकी जनसंख्या बढ़ सके।
भारत में कछुआ वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित है। संरक्षित क्षेत्र वाराणसी शहर से होकर रामनगर किले से मालवीय रेल/रोड ब्रिज तक बहने वाली गंगा नदी का 7 किमी लंबा हिस्सा है। इसके अलावा 'कछुआ पुनर्वास योजना' के तहत सारनाथ (वाराणसी) और कुकरैल वन (लखनऊ) में कछुआ प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं।
वहाँ लोगों को विभिन्न तरीक़ों के कछुओं की जानकारी दी। उनके बारे में बताया। कछुए की औसत उमर 300 साल होती है। आदमी की सौ की उमर का तीन गुना। वहाँ पैर कटे-फटे पानी में तैरते कछुओं को देखकर हम सोचते रहे कि आठ दस साल की उमर का कछुआ कैसे आने वाले दो-तीन सौ साल जिएगा।
कछुआ संरक्षण संस्थान को को देखने का टिकट 2000 श्रीलंका रुपए था। मतलब 580 भारतीय रुपए। हम लोगों में से कुछ लोगों ने टिकट लिया, कुछ ने कहा -हमें नहीं देखना। लेकिन बाद में उनमें से कुछ लोग भी अंदर आ गए और कछुआ दर्शन किया। कुछ उसी तरह का मामला था जैसे हम लोग बिना प्लेटफ़ार्म टिकट के स्टेशन टहल आते हैं।
वहाँ हमने कछुए का अंडा भी देखा। एकदम टेबल टेनिस की गेंद के आकार का। नरम प्लास्टिक सरीखा अंडा। वहाँ मौजूद रखवाले ने बताया कि वे लोग कछुए के अंडों को आधा मीटर बालू के नीचे दबा देते हैं। उन अंडों से 48 दिन से 70 दिन में बच्चे पैदा होते हैं। उन बच्चों को वे लोग पानी में डाल देते हैं। बच्चों को रात के समय पानी में डालते हैं ताकि कछुए के नवजात बच्चों को पंछी लोग खा न जाएँ।
वहाँ मौजूद पानी में तैरते कछुओं को लोग अलग-अलग तरह से छू कर, महसूस करके, उनके प्रति दया और आश्चर्य व्यक्त करते हुए उद्गार व्यक्त किए। कुछ कछुए पानी में तसल्ली से सोए हुए थे। हमारे कारण उनकी दोपहर की नींद में ज़रूर खलल पड़ा होगा। उनमें से ज़्यादातर बेमन से ही पानी में तैरने भी लगे। आपस में ज़रूर वे कह रहे होंगे कि अच्छी-भली नींद ख़राब कर दी हमारी।
क़रीब दो घंटे तक वहाँ रहने के बाद हम लोग बैंटोटा समुद्र तट देखने के लिए चल दिए।

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जिन्दगी ऐसी नदी है जिसमें देर तक साथ बह नहीं सकते

 रमानाथ अवस्थी जी अद्भुत गीतकार थे। उनके गाए गीतों के मुखड़े उस समय के लोगों के जेहन और ज़बान पर छाए रहते थे। जिन लोगों ने उनको आमने-सामने बैठकर सुना होगा, उनका जादू वे ही महसूस कर सकते हैं। रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत मुझे अक्सर याद आता है:

"आज इस वक्त आप हैं लेकिन,
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।"
यह गीत मैंने उनसे करीब 27-28 साल पहले (1998-1999 ) शाहजहांपुर के कवि सम्मेलन में सुना था । उस समय तक उनकी बाई पास सर्जरी हो चुकी थी। गाकर गीत कम पढ़ने लगे थे। स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। लेकिन हमारे आग्रह पर वे शाहजहांपुर आये। और गीतों के अलावा यह गीत उन्होंने गाकर पढ़ा था। तबसे मेरे मन में बसा है उनका यह गीत। मेरे पास इस गीत का आडियो मौजूद था। इसको वीडियो में बदलकर यूट्यूब में पोस्ट कर रहा हूँ ताकि अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। गीत का लिंक टिप्पणी में दिया है। सुनकर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। रमानाथ जी की बातचीत और गीत इस प्रकार है:
" कविता सुनाने से पहले दो शब्द कहने का मन है। कविता लिखना जितना कठिन है उससे कठिन है उसके साथ होना। हमारे मंच पर और हमारी आडियंस में बहुत अच्छे-अच्छे लोग विराजमान हैं। आप सबका मैं कविता के इस क्षण में स्वागत करता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपका अधिक से अधिक समय शब्द के साथ कटे। शब्द कभी हमको आपको धोखा नहीं देता। मैं आपसे एक बड़े दिल से प्रार्थना कर रहा हूं। आपका शहर (शाहजहांपुर) जहां एक बलिदानी शहर है वहीं पर इस शहर के कुछ कवियों ने अपनी कविता के द्वारा इस शहर को बहुत बड़ा नाम दिया है। दामोदर स्वरूप ’विद्रोही’ , अग्निवेश शुक्ल आपने इनको अवश्य ही सुना होगा। मैं बहुत प्रसन्न हूं कि श्रोताओं में आपके शहर के इतने गण्यमान कवि उपस्थित हैं। आप सबको मैं अपना स्नेह प्रदान करता हूं।
आप मुझको शान्ति से सुनेंगे तो मुझको बड़ा अच्छा लगेगा क्योंकि दिल से जो सुना जाता है वही भजन भी होता है और वही शब्द भी होता है। ये जो ताली या जो आशीर्वाद के बहाने जो ताली बजवाने का सिलसिला है, क्षमा करिये ये शुद्ध कवि को शोभा नहीं देता। जो कुछ मेरे पास शब्द हैं मैं आपको दे रहा हूं। आप मेरे पास शब्दों के पास होने की कृपा करें। बस! इतना ही मैं निवेदन करता हूं। आप अपने हाथों को कष्ट न दें। मैं आपसे बिल्कुल नहीं कहूंगा कि आप ताली बजाइये, आप मुझे आशीर्वाद दीजिये। ये मैं आपसे आग्रह बिल्कुल नहीं करूंगा। मेरा आग्रह है कि अगर आप मुझको सुनते हैं तो यही मेरे लिये आपका सबसे बड़ा आदर होगा,प्रेम होगा। मैं पहले कुछ पंक्तियां आपको सुना रहा हूं। उसके बाद दो-एक गीत आपको छोटे-छोटे सुनाना चाहता हूं। अगर आपका हिसाब-मेरा हिसाब ठीक रहा। पहले कुछ पंक्तियां हैं:
आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।
जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किसलिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।
आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥
-रमानाथ अवस्थी"

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Sunday, March 23, 2025

विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ


 कल विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलने की खबर आई तो उनसे हुई एकमात्र मुलाकात की याद फिर से आई।

वर्धा में तीसरी राष्ट्रीय ब्लागर संगोष्ठी के हुई थी। महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा पहली राष्ट्रीय ब्लागर संगोष्ठी इलाहाबाद में 2009 में हुई थी। इसका उद्घाटन नामवर सिंह जी ने किया था। देश के तमाम सक्रिय हिंदी ब्लागर आए थे। अद्भुत अनुभव था। इसके आयोजन में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की सक्रिय भूमिका थी।
उन दिनों लिखा-पढ़ी की दुनिया में ब्लाग का बड़ा हल्ला था। बाद में दूसरे तमाम हल्लों की तरह ब्लागिंग का शोर भी धीमा हुआ। लोग दूसरे माध्यमों की तरफ़ मुड़ गए।
दूसरी संगोष्ठी 2010 में वर्धा में हुई थी। वहाँ आलोक धन्वा जी और राजकिशोर जी मुलाकात हुई थी । तीसरी संगोष्ठी 2013 भी वर्धा में हुई थी। उस समय तक सिद्धार्थ त्रिपाठी वर्धा छोड़ चुके थे। लेकिन गोष्ठी के आयोजन के लिए ख़ासतौर वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति भूषण राय जी के अनुरोध पर ख़ासतौर से गोष्ठी कराने आए थे। विभूति भूषण राय जी के वर्धा विश्वविद्यालय से हटने के बाद ब्लागर गोष्ठी का सिलसिला ख़त्म हो गया।(तीसरी संगोष्ठी के विवरण का लिंक टिप्पणी में।)
तीसरी ब्लागर संगोष्ठी में विनोद कुमार शुक्ल जी से 21 सितम्बर, 2013 को रात को मुलाकात हुई थी। काफ़ी देर बातें हुईं। विनोद जी ने धीमी आवाज़ में कई संस्मरण सुनाए। जबलपुर के दिनों की यादें साझा कीं। परसाई जी से जुड़े कई संस्मरण सुनाए। थोड़ा ऊँचाई सुनाई देता था उस समय भी उनको। हम लोग ऊँची आवाज़ में उनसे बातचीत कर रहे थे। वे शांत, धीमी आवाज़ में जबाब दे रहे थे। बाद में संकोच के साथ उन्होंने हम लोगों से कहा -"जो बातें हम लोगों ने की उनको साझा न करें।" हमने नहीं किया। अब तो याद भी नहीं क्या-क्या बातें हुईं थीं। बस यही याद है ख़ूब बातें हुईं थीं।
वर्धा में मुझे याद है Shailesh Bharatwasi भी साथ थे। उस समय उन्होंने प्रकाशन का काम शुरू ही किया था। बाद में उनके प्रकाशन से विनोद जी की किताबें भी आईं। एक कविता संग्रह 'केवल जड़ें हैं' में उनकी साठ के दशक में लिखीं कविताएँ उनके हस्तलेख में भी हैं। अनूठा कविता संग्रह है यह।
कल जब विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान की घोषणा हुई तो उनके साथ की फ़ोटो खोजी। नहीं मिली। संतोष त्रिवेदी के पास थीं। आज उन्होंने भेजीं।ये फ़ोटो याद हैं एक संवेदनशील कवि के साथ की। एक संवेदनशील इंसान के साथ की। विनोद जी लेखन पर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। उनको ज्ञानपीठ का सम्मान मिलने के बाद और भी बहुत कुछ लिखा-कहा जाएगा। उनको सम्मान मिलना हम सबके लिए एक ख़ुशनुमा अनुभव है।
विनोद जी को ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त होने की फिर से बधाई। अनंत शुभकामनाएँ।
विनोद जी की एक कविता जो मुझे बहुत पसंद है:
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
-विनोद कुमार शुक्ल
कविता संग्रह 'कवि ने कहा ' से

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