Thursday, September 11, 2025

आर्ट एंड क्राफ्ट सोसाइटी में कविता पाठ



 कल all India art and craft society में काव्य पाठ का आयोजन था। Alok Puranik जी ने बताया कि उनको भी कविता पढ़नी है। बोले -"श्रोताओं के इंतजाम की ज़िम्मेदारी कवि की ख़ुद है। आप फुरसतिये हैं। क्या करेंगे घर में बैठकर। आ जाइए सुनने कविता।"

हम गए। साथ में-" दुख बाँटने से हल्का होता है ध्यान में रखते हुए Kamlesh Pandey जी को भी ले गए।"
कमलेश पांडेय पुराने 'मेट्रोवीर' हैं। वर्षों तक मेट्रो की यात्रा करने के बावजूद आजकल 'मेट्रो फोबिया' से ग्रस्त थे। गाड़ी से ही आते-जाते हैं। लेकिन कल उनको 'सड़क जाम फोबिया' ने ' मेट्रो फोबिया से मुक्त होने में सहायता की। वे हमारे साथ मेट्रो से गए। एक फोबिया ने दूसरे फोबिया को पटकनी दी। सूत्र बना -"फोबिया फोबिया को पटकता है।"
मेट्रो में घुसते ही वरिष्ठ नागरिकों की सीट पर बैठे नौजवानों हमारे लिए सीट छोड़ दी। उनके इस वलिदान पर मोहित होते हुए हमने अपने देश के सारे युवाओं को 'संस्कारी क्लीन चिट' देते हुए हमने सोचा कि यहाँ नेपाल जैसा लफड़ा होने की संभावना नहीं है।
मंडी हाउस पर मेट्रो बदलते हुए स्वचालित सीढ़ियों पर लोगों की भीड़ देखते हुए हमने कल्पना की कैसे हम खड़े-खड़े, बिना पसीना बहाए ऊँचाई पर पहुँच सकते हैं। दुनिया के तमाम भूखे, बदहाल लोगों की भीड़ ऐसे ही किसी लिफ्ट का इंतजार करते हुए ज़िन्दगी बिताती रहती है। उनके उद्धारक उनको आश्वासन देते रहते हैं -'बस मंजिल क़रीब ही है। वे हल्ला मचाते रहते हैं -" देश का नेता कैसा हो, फलाने जी जैसा हो।"
तय समय से ठीक पंद्रह मिनट देर पहुँचे हम लोग। हाल में कुर्सियाँ लग चुकी थीं। कवियों और श्रोताओं का 'गोल कुर्सी सम्मेलन' सा था कार्यक्रम। हमारे वहाँ पहुँचते ही बिना कार्यक्रम शुरू हो गया।
सबसे पहले आलोक पुराणिक जी को कविता पाठ का मौक़ा मिला। उन्होंने दुनिया में बाजार के महत्व बताने के लिए अमिताभ बच्चन जी विज्ञापनों का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे अस्सी साल का रात के साढ़े ग्यारह बुजुर्ग अपनी आवाज में सात रुपये मिलने की सूचना देता है।
इसके बाद उन्होंने अपनी व्यंग्य रचना का पाठ किया जिसमे कस्टमर केयर सुविधा का उपयोग करते हुए आतंकवादियों से निपटने का उपाय बताया गया था। उनकी यह क्लासिक व्यंग्य रचना सुनकर श्रोताओं ने तालियाँ बजाकर स्वागत किया।
आलोक पुराणिक जी के बाद रचना गर्ग गोयल जी ने कविता पाठ करने के पहले बताया कि कैसे महिला होने के नाते उनको एक के साथ एक फ्री स्कीम के तहत गर्ग और गोयल दोनों सरनेम इस्तेमाल करने की सुविधा हासिल हुई। इसी बात को जाति छोड़ो अभियान का कोई कार्यकर्ता सुनता तो कह सकता था -"महिला होने के कारण दो बेड़ियों में जकड़ी हैं रचना जी।"
रचना जी ने अपनी कविताएँ पढ़ीं। एक कविता में फूल सा बनने का आह्वान करते हुए कहा :
"फूल हो तुम, फूल सा ही खिलना
काँटों में रहकर भी गुल सा ही खिलना
बहारें , तूफ़ान, मुश्किलें सब आनी -जानी हैं
बिन मौसम के भी मुस्कराते ही रहना।"
जिंदगी की किताब को पढ़ने का अपना तरीका बताया रचना जी ने :
"हम किताबों के पन्ने खोलते चले गए
आए जो जो पसंद मोड़ते चले गए
पढ़ा हर एक पन्ने को बड़े गौर से
जो रास नहीं आए, छोड़ते चले गए।"
पीयूष श्रीवास्तव जी आदिवासी समाज में बड़ा काम किया है। उन्होंने अपने शीघ्र प्रकाशित होने वाले उपन्यास के एक अंश का पाठ किया। एक आम अभावग्रस्त परिवार के बच्चे के बचपन का चित्रण था इस अंश में।
विनय विक्रम सिंह ने आर्ट एंड क्राफ्ट सोसाइटी के अनुसार रंग की प्रकृति से जुड़ी मुक्त छंद कविता सुनाई। इसके बाद प्रेम के आधुनिक संस्करण का जिक्र करते हुए व्यंग्य कविता का पाठ किया।
आमंत्रित कवियों के कविता पाठ के बाद आर्ट एंड क्राफ्ट मंच से जुड़े लोगों ने भी मौके और श्रोताओं का फ़ायदा उठाते हुए कविता पाठ किया। आज के समय में अभिव्यक्त की दुविधा का जिक्र करते हुए पढ़ी गई ये कविता देखिए :
"आज जब लफ़्ज़ों ने आकर फुसफुसाया
कि हमें कह दो
हमें यार किसी कविता में रख दो
मैंने कहा
-नहीं ऐसे ही ठीक हो।
गर कह दिया तो मतलब हो जाएगा
तुम्हें तोला जाएगा
उसे पता नहीं क्या समझ आयेगा
और तुम्हारे साथ मैं भी बेकार नप जाऊँगा।
अभी खामोशी में हूँ
तो ज़िंदा हूँ
तुम्हें कह दिया
तो मैं भी बेकार जाया जाऊँगा।"
इसके बाद बासु कुमार जी के साथ और लोगों ने भी कविताएँ पढ़ीं। संचालक ने अपनी कविता पढ़ने से पहले डिक्लेमर सुनाया -इसका नेपाल की घटना से कोई संबंध नहीं है। 'परेशानी से भरा समय ' कविता का अंश देखिये (पूरी कविता वीडियो में) :
बेईमान पिता परेशान है कि ठगे न जायें बच्चे
अंधे भीड़ परेशान है कि खतरे में है रोशनी।
परेशान है तानाशाह कि उठ रहे हैं सिर
हत्यारे परेशान हैं कि अब नहीं भय
आदमी परेशान है कि मिलता नहीं आदमी
चोर परेशान है कि बेईमान है साहूकार
संत परेशान है कि सुनता नहीं ईश्वर
ईश्वर परेशान है आस्था के उन्माद से।
कवि सम्मेलन के बाद लोग एक दूसरे मिलते-जुलते विदा लेते चलते गए। हमने समय का उपयोग करते हुए आर्ट गैलरी में मौजूद कलाकृतियाँ देखीं। कलाकृतियों के दाम चार हज़ार से एक लाख रुपये तक दिखे। कुछ पर दाम नहीं लिखे थे -बातचीत के बाद तय करने का टैग लगा था। कुछ मेटल का काम भी था वहाँ। एक आरामफ़र्मा इंसान की कलाकृति भी थी वहाँ। कलाकृति का टाइटल था -'लम्हे फुर्सत के' - कीमत अनुरोध पर। सोचा कि बात करके इसको खरीदने का मन बनायेंगे।
आर्ट गैलरी के बाहर सबसे खूबसूरत कलाकृति के रूप में किसी का बनाया हुआ केक रखा था। लोग अपने आप काटकर केक खाते जा रहे थे। स्वादिष्ट केक के बनाने वाले और उसको वहाँ रखने के लिए हम यहाँ से शुक्रिया अदा कर रहे हैं।
बाहर निकलकर हम लोगों ने एक दुकान पर चाय पीने के लिए बैठे। चाय के दौरान सेल्फी एक्सपर्ट कमलेश पांडेय जी ने तीनों लोगों को कैमरे में क़ैद किया। पास स्थित मेट्रो के पास आलोक पुराणिक जी को विदा किया। पटेल नगर से मेट्रो पकड़कर बरास्ते राजीव चौक होते हुए नोयडा सिटी सेंटर आए। वहाँ से पैदल चलते हुए कैलाश धाम आए। कमलेश पांडेय जी अपनी कार लेकर और हम पैदल अपने-अपने ठिकाने की तरफ़ बढ़ गए। पहुँच भी गए।
-कुछ कविताओं के वीडियो पोस्ट के साथ लगे हैं।

https://www.facebook.com/share/v/1AfUf69ueg/

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