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Wednesday, October 23, 2024

ज़रा बच कर रहो बे

 जो दिखाई देता है सबको, वो सब सच मत कहो बे, 

बड़ा बवाल समय है चल रहा , ज़रा बच कर रहो बे। 


उकसा रहे हैं आज जो तुमको , कल वही फँसा देंगे ,

लीडरों, हुक्मरानों से, दूर का रिश्ता ही भला है बे  ।


 धमकाता रहता  है  हरदम ही  ,दीगर अवाम को 

बड़ा  कमसिन दिमाग़ , बुज़दिल रहनुमा मिला है बे ।


-कट्टा कानपुरी 


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Saturday, February 26, 2022

कवि के इंतज़ार में बिम्ब

 सुबह होती है

जम्हुआई लेते हुये उठता है फ़ेसबुकिया कवि
इधर-उधर के स्टेटस ठेलता है,हड़काया जाता है
बैठ गये सुबह-सुबह लैपटाप लेकर---
भागता है बेचारा चाय का कप लिये हाथ में
स्कूल जाते बच्चे की ड्रेस प्रेस करता है
इस बीच कविताओं के तमाम बिम्ब
उसके दिमाग में आते हैं।
वह सबसे कहता है-अभी नहीं
भाग जाओ कोई देख देख लेगा घर में
तो बवाल होगा,
थोड़ी देर बाद मिलना फ़ेसबुक पर।
बिम्ब फ़ेसबुक पर कवि के इंतजार में
मुंह बाये बैठे हैं।
उन बेचारों को क्या पता कि
कवि को प्रेस करने के बाद
चाय बनाने के लिये दौड़ा दिया गया है।
-कट्टा कानपुरी

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Tuesday, February 08, 2022

कुछ ज्यादा ही कड़ा होता है इम्तहान मोहब्बत का

 


पिट चुका है कई बार वो उठाईगिरी के चक्कर में ,
हर बार कहा उसने, इसमें साजिश है रकीबों की।
कुछ ज्यादा ही कड़ा होता है इम्तहान मोहब्बत का,
ऐन इम्तहान के पहले सिलेबस बदल जाता है।
मोहब्बत के न जाने कितने इम्तहान हुये मेरे
हर बार सुना परचा आउट था इम्तहान दुबारा होगा।
पीटा मुझे बे- बात के तेरे मोहल्ले वालों ने,
तू कहे हो तो इसे मोहब्बत के खाते में चढ़ा लूं!
-कट्टा कानपुरी

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Saturday, January 01, 2022

नए साल की शुभकामनाएँ



आओ जी नये साल जी आओ,
यहीं कहीं तुम भी सेट हो जाओ।
सबके सालों जलवे देखे हमने
अपना भी जलवा दिखलाओ।
मौज करो तुम खूब चकाचक,
मस्ती औ खुशहाली बरसाओ ।
दुख-सुख तो चलते रहते हैं,
कुछ अच्छा अच्छा करवाओ।
ज्यादा कुछ चहिये न हमको,
हंसी-खुशी से रहो, गुजर जाओ।
आओ जी नये साल जी आओ,
यहीं कहीं तुम भी सेट हो जाओ।
-कट्टा कानपुरी

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Thursday, November 04, 2021

उजालों के गीत बहुत गाये गये!


जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं है तो और क्या है जी!
कम रोशनी ज्यादा उजाले से भन्नाई रहती है,
अंधेरों में आपस में कोई दुश्मनी नहीं हो्ती।
आज उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे ने रोशनी से जरा सी छेड़छाड़ की,
उजाले ने रपटा लिया उसे बहुत दूर तक!
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।
-कट्टा कानपुरी

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Tuesday, October 26, 2021

सब कुछ लिख दिया जाने के बाद भी

 सब कुछ लिख दिया जाने के बाद भी,
बहुत कुछ लिखने को बचा रह जाता है।

हम बिस्कुट भिगो के चाय में खाते ही नहीं,
इसीलिये वो नामुराद डूबने से बच जाता है।
ऊंची बात कहने वाले तो कई होंगे यार,
अपन का तो रोजमर्रा की बातों से नाता है।
-कट्टा कानपुरी

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Saturday, September 11, 2021

अंधविश्वास के खिलाफ़, उनको लिखनी है एक गजल

 अंधविश्वास के खिलाफ़, उनको लिखनी है एक गजल

सुबह से कर रहे इंतजार, पंडित का मुहूरत के लिये।

-कट्टा कानपुरी

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Friday, September 10, 2021

सुबह से मेरी तारीफ़ों के पुल

 सुबह से मेरी तारीफ़ों के पुल उसने बांध रखे हैं

इतना उतर गये हैं हम, उसकी निगाह से ! 🙂
-कट्टा कानपुरी

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Monday, September 06, 2021

हमारी हर बेवकूफी को 'बड़ी समझदारी' का नाम मिला

 हमारी हर बेवकूफी को 'बड़ी समझदारी' का नाम मिला,

बेवकूफ कहलाये हमने जब भी अकल की बात कही।
-कट्टा कानपुरी

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Friday, April 19, 2019

कचरा अपने मगज का

 कचरा अपने मगज का, मन में ही धरो लुकाय,

देखि अठिलैंहैं लोग सब, औरौ देहैं छितराय।


भला जो देखन मैं चला, भला मिला न कोय,

फ़िर जो देखा ध्यान से, मुझसे भला न कोय।


मंहगाई की मार को, मानो सब हैं गये भुलाय,

अब चुनाव हाल ये, कछु और न देखा जाय।

-कट्टा कानपुरी

Tuesday, September 11, 2018

हम सो गए हैं बड़ी देर से, नींद बड़ी गहरी है

हम सो गए हैं बड़ी देर से, नींद बड़ी गहरी है,
खबरदार, जो गुडनाइट के बहाने जगाया तो।
मिला था पेट्रोल मुझे, मुख्तसर से सपने में,
डपट दिया - लुट जाएगा अकेले नजर आया तो।
ठीक है शेर बढिया है, बड़ा डम्प्लाट भी है
खफा हो जाएंगे गर, किसी ने मुझे बताया तो।
-कट्टा कानपुरी

Wednesday, July 11, 2018

राजनीति की मुश्किल समझो भैया


राजनीति की मुश्किल समझो भैया,
कैसे आयें नेता अच्छे,बढिया भैया।
ढेर पईसा चहिये चुनाव लड़ने को,
वोटर को दारू-पानी चहिये भैया।
जाति-वाति भी तो देखनी पड़ती है,
नेता मतलब लिकड़मी हो भैया।
सीधा-साधे को तो सब खा जायेंगे,
नेता तो बाहुबली ही चहिये भैया।
ऐसे में तो कुछ केस बनेंगे ही जी,
कुछ में सजा तो हो जायेगी भैया।
अब उनको भी यदि बैन करोगे जी,
कैसे फ़िर अपना देश चलेगा भैया।
राजनीति तो वैसे ही मुश्किल है जी,
अब ये नया लफ़ड़ा भी झेलों भैया।
जनता की सेवा कित्ती मुश्किल है,
राजनीति की मुश्किल समझो भैया।
-कट्टा कानपुरी

Sunday, May 13, 2018

आओ साथी चाय पिलाएं

चित्र में ये शामिल हो सकता है: कॉफ़ी कप
आओ साथी चाय पिलाएं

आओ साथी चाय पिलाएं,
थोड़ा बातें-सातें हो जाएं
गप्प लड़ायें ऊंची वाली
थोड़ी लंतरानी भी हो जाये।
बिल्ली उचकती ढाई टांग पर,
सूरज की किरणें दुलरायें,
बन्दर गड़बड़ काट रहे हैं,
उछल रहे हैं डाल-डाल पर।
हमने चाय पिलाई तुमको
अब थोड़ा सा फौरन मुस्काओ
चाय और स्वादिष्ट लगेगी
सुबह और खुशनुमा हो जाये।
-कट्टा कानपुरी

Friday, November 17, 2017

आये भैया कोई हीरो आये

आये भैया कोई हीरो आये,
हमारे देश को आगे ले जाये।
हमें निठल्ले ही रहना है,
हीरो देश का गर्व बढाये।
उसको मेहनत करना होगा,
भला-बुरा सब सुनना होगा।
पकड़ी गयी गड़बड़ी कोई तो,
रोल विलेन का करना होगा।
सारे खतरे हीरो के होंगे,
सब कुछ उसको करना होगा।
हम केवल जयकार करेंगे,
उसको तो बस खटना होगा।
जिसको शर्ते मंजूर आगे आये,
हीरो की ड्यूटी में लग जाये।
-कट्टा कानपुरी

Saturday, November 04, 2017

मन कर रहा कि अब उठे

मन कर रहा कि अब उठे , फ़ौरन नहा के आ जाएँ
लेकिन सोचते हैं कि दौड़ के दूकान से दूध ले आएं।
बाहर बगीचे में फूल खिला है अपने पूरे जलवे से
मन किया निकालें कैमरा, फूल को कैद कर लाएं।
आइडिये उछल रहे हैं सबेरे से स्वयं सेवकों की तरह,
हल्ला मचा रहे हैं हमको लगाएं, पहले हमको लगाएं।
देश की चिंता भी करने को बहुत पड़ी है यार इकठ्ठा
चूक गए तो कहीं और कोई ' देश चिंता' न कर जाए।
काम इतने इकठ्ठा है बेचारा,परेशान है दिन इतवार का,
फिर सोचेंगे क्या करें पहले, चाय एक कप और हो जाए।
-कट्टा कानपुरी

Thursday, October 26, 2017

बहुत कुछ लिखने को बचा रह जाता है

सब कुछ लिख दिया जाने के बाद भी
बहुत कुछ लिखने को बचा रह जाता है।
हम बिस्कुट भिगो के चाय में खाते ही नहीं
इसीलिये वो नामुराद डूबने से बच जाता है।
ऊंची बात कहने वाले तो कोई होंगे यार,
अपन का तों रोजमर्रा की बातों से नाता है।
-कट्टा कानपुरी

आज रपट जाएं तो


आज सबेरे निकले तो साइकिल मारे खुशी के लहराती हुई चल दी। टहलने की खुशी इतनी कि जरा सा पैडल मारते ही सरपट बढ गयी। सामने से स्कूल का बच्चा आ रहा था। हमने ब्रेक मारा। ब्रेक भी मारे कर्तव्यपरायणता के इत्ती जोर से लगा कि साइकिल रपटते हुये बची। ये तो कहिये कि ’पैर ब्रेक’ लगा के रोका गाड़ी को वर्ना साइकिल सहित सड़क पर गिरने के बाद गाना गाते रहते:
आज रपट जायें तो हमें न बचईयो
हमें जो बचईयो तो खुद भी रपट जईयो।
पप्पू की चाय की दुकान गुलजार थी। गोल टोपी लगाये एक आदमी बेंच पर आलथी-पालथी मारे बैठे सामने वाले से बतिया रहे थे। चाय का आखिरी घूंट पीने के बाद दोनों हाथ मिलाकर चल दिये। सामने अधबने ओवरब्रिज ने हमको गुडमार्निंग की।
मोड के आगे एक झोपड़ी के आगे कुछ बकरियां बंधी थीं। एक बकरी ठेलिया पर रखे प्लास्टिक के अधकटे ड्रम में मुंडी घुसाये पानी पी रही थी। जब तक हम जेब से कैमरा निकालकर फ़ोकस करें तब तक ’बदमाश बच्ची बकरी’ ( ब वर्ण की आवृत्ति के चलते अनुप्रास अलंकार है इसमें) अपने अगले पैर ड्रम से हटाकर, मुंडी बाहर करके ठेलिया से कूदकर तिड़ी-बिड़ी हो गयी।
पुल पर आवाजाही शुरु हो गयी थी। बीच पुल एक ऑटो वाला अपने ऑटो का ’पंक्चर पहिया’ बदल रहा था। गाना बज रहा था:
मोहे आई न जग से लाज
मैं इतना जोर से नाची आज
कि घुंघरू टूट गये।
वहीं खड़े होकर सोचा क्या ऑटो के पहिये पैर के घुंघरू के तरह होते हैं। सड़क पर ऑटो चलना नाचने सरीखा होता है?
पुल के नीचे देखा कि लोग बालू में कोई मंडप सरीखा बना रहे थे। शायद छठ पूजा के लिये। लेकिन भीड़ बहुत कम थी छ्ठ पूजा के लिहाज से। शायद पूरब की तरफ़ के लोग कम रहते हैं यहां। आर्मापुर में पूर्वी उत्तर प्रदेश , बिहार के लोग खूब रहते हैं। नहरिया किनारे खूब भीड़ होती है छठ के दिन।
पुल पर ही एक आदमी अपना टीम-टामड़ा समेटे समेटे जिस तरह तरह चला जा रहा था उससे दुष्यन्त कुमार की ये लाइने याद आ गईं:
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिदुस्तान है.
शुक्लागंज की तरफ़ से गंगा तट पर जाते हुये देखा चुनाव प्रचार के लिये लगे पोस्टर बैनर लगे थे। हरेक में महिला प्रत्याशियों के पहले उनके पति या फ़िर देवर का नाम छपा था। मने पत्नी के चुनाव के पति और भाभी के चुनाव के लिये देवर का जिक्र जरूरी लगा चुनाव लड़ने के लिये।
कोने में एक ठेका भांग का मिला। उसमें अनुज्ञापी का संतोष त्रिवेदी लिखा था। हमने फ़ोटो खैंच लिया दिखाने के लिये संतोष त्रिवेदी को और पूछने के लिये भी कि ये भी करते थे क्या?
आगे एक जगह एक लड़का साइकिल पर ग्राइंडर लगाये कैंची-चाकू पर धार लगा था। बताया कि बाप-दादे भी यही धंधा करते थे। खपरा मोहाल (स्टेशन के पास) में रहता है बालक दीपू। एक चक्कू पर धार लगाने के पांच रुपये लेता है। किसी के पास नहीं होता है तो कम भी ले लेता है। बताया कभी तीन-चार सौ कमाई हो जाती है, कभी सौ-दो सौ। पुस्तैनी धंधा अपनाने के पीछे कारण बताया - ’पिताजा करते थे तो हम भी करने लगे। कोई पेट से तो सीखकर नहीं आता।’
पढाई-लिखाई बिल्कुल नहीं की है दीपू ने। हमने कहा अब पढ लो, यहां आया करो इतवार को पढने। बच्चे पढाते हैं। वह बोला- ’हम सुबह निकल जाते हैं फ़ेरी लगाने। पढने के लिये कहां आयेंगे इत्ती दूर।’
गंगा दूर खिसक गयीं थीं। जहां महीने भर पहले पानी थी वहां अब बालू का कब्जा हो गया था।
लौटते हुये क्रासिंग के पास एक बच्चा साइकिल पर अपनी बहन को करियर पर स्कूल छोड़ने जाते दिखा। बच्ची का नाम कनिका और बच्चा लकी। बहन को भेजने के बाद बच्चा भी जायेगा स्कूल। बच्चों की फ़ोटो खींचते देख गोद में बच्चा लिये एक महिला बोली- ’का अखबार मां छपयिहौ फ़ोटू?’ हम महिला के सवाल के जबाब के बहाने उनसे बतियाने लगे।
पता चला कि जिस चाय की गुमटी के सामने खड़ी थी वो उनके मियां की थीं। नाम खुला उदित। महिला का नाम ऊषा। नाम हंसते हुये बताया तो संगत करने को कविता यादों के कबाड़खाने से फ़ुदकती हुई सामने आ गयी:
उषा सुनहले तीर बरसती
जय लक्ष्मी सी उदित हुई।
लगा कि देखो - ’उषा और उदित के नाम से कविता कित्ते पहले लिख गये हैं महाकवि। किसी को क्या पता था कि दोनों कानपुर के कैंट इलाके में चाय की दुकान पर भेंटायेंगे कभी।’
पास की ही एक झोपड़ी में रहते हैं। कानपुर में चाय की दुकान करने के पहले उदित अम्बाला में सब्जी बेंचने का काम करते थे। अम्बाला बहुत पसंद है ऊषा को। बोली कानपुर बहुत गंदा शहर है। पास बैठे चाय ग्राहक ने बताया कि कानपुर से गंदगी कभी खत्म न होगी। लेकिन कनपुरिया होने के चलते शहरप्रेम का मुजाहिरा करते हुये बोला- ’ जो एक बार कानपुर रह लेता है वह कभी यहां से जाना नहीं चाहता। यहां बहुत मद्दे में गुजारा हो जाता है आदमी का।’
कानपुर और कलकत्ते दोनों ही इस बात के लिये जाने जाते हैं। गरीब आदमी के गुजारे के लिये दोनो शहर सहज-शरणदाता हैं।
गोद में बच्चा लिए थीं उषा। बताया -'नाती है। साल भर का हो गया। '
तीन लड़के हैं। सब दिहाड़ी मजूरी करते हैं।
उदित ने बताया कि अम्बाला में सब्जी बेंचने का काम बढिया था।।लोग सब्जी खूब खरीदते थे। अच्छी आमदनी थी। कानपुर में आदमी दस रुपये में घर भर की सब्जी खरिदना चाहता है। सुबह रोज मंडी जाकर सब्जी लाना लफड़े का काम इसीलिए अब चाय की दुकान ही चला रहे हैं।
ऊषा सुबह उठकर अपने मियां की दुकान पर चाय लेते आयी थीं। मोमियां की थैली में चाय लेते हुये बोली - ’चाय बहुत बढिया बनाते हैं ये।’
हमें याद आया कि चाय तो हम भी बहुत बढिया बनाते हैं। लेकिन हमारे मानने से क्या होता है? पीने वाला कहे तब न ! हम रोज सुबह की चाय बनाते हैं लेकिन अक्सर ही कहा जाता है-’ बढिया चाय पिलाओ फ़िर चला जाये।’
लौटते हुये सड़क एकदम गुलजार हो गई थी। सूरज भाई एकदम ऊपर पहुंचकर चमकने लगे थे। सुबह हो गयी थी। आज छुट्टी होने के चलते सुबह और खुशनुमा लग रही थी।

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Friday, August 25, 2017

चलो तुमको स्टेटस बनाते हैं

शेर लिखकर कहा, चलो तुमको स्टेटस बनाते हैं,
शेर फूट लिया कहकर - शेरनी को बताकर आते हैं।
एक चिरकुट सा लेख लिखा, अख़बार से खबर आई,
थोड़ा और घटिया बनाकर भेजो, फौरन छपवाते हैं
वो मिले राह में बोले इमेज इत्ती चौपट बनाई तुमने
लफ़ड़ा क्या है यार, लोग तुमको भला आदमी बताते हैं।
-कट्टा कानपुरी

Friday, August 18, 2017

ज्यादा उचको मती, वर्ना तारीफ कर देंगे

ज्यादा उचको मती, वर्ना तारीफ कर देंगे,
ऐंठ जो दिख रही, वो सब हवा हो जाएगी।
गुमान में गुब्बारे से मत फूले फिरो भईये,
कहीं कोई पिन चुभी, हवा निकल जायेगी।
ऐसे-वैसे देखे बहुत, लेकिन आप तो खास हो,
यही झूठ कहते-सुनते जिंदगी निकल जायेगी।
-कट्टा कानपुरी

Monday, August 07, 2017

आज नौकरी भी इंकलाब है


क्या खूब मजे का हिसाब है,
आज नौकरी भी इंकलाब है!
पता नहीं कब कहां रगड़ दें,
मालिकों का दिमाग खराब है।
कल जिस काम पर खुश थे,
आज उसी पर गर्म बेहिसाब हैं।
अरे चाय पियो यार मस्त रहो,
आज दुनिया का यही हिसाब है।
-कट्टा कानपुरी