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Wednesday, July 03, 2024

हर कश्मीर वासी अपने कश्मीर का 'ब्रांड एंबेसडर' है



आज अपने कनपुरिया साथी अतुल अरोरा Atul Arora की पोस्ट में नियाग्रा फाल के फ़ोटो देखे। सात साल पुराने। फ़ोटो देखकर हमको अपने कश्मीर के नियाग्रा फाल की याद आ गयी। पिछले साल कश्मीर यात्रा के दौरान देखा था यह झरना। यात्रा अपने बेटे अनन्य Anany Shukla के Firgun Travels के सौजन्य से की गयी थी। इसमें चालीस साल से ऊपर की उम्र के 'युवा' शामिल थे। इसके कुछ किस्से हमने पिछले साल लिखे थे। बाक़ी के आलस्य के चलते यादों के तहख़ाने में जमा हो गए थे। अब उनको निकालकर, धो-पोंछ कर पेश किया जा रहा है।
पिछली रात सोनमर्ग से लौटते हुए देर हो गयी। खा-पीकर , यादें साझा करते हुए अपने-अपने हिसाब से सो गए। ( पोस्ट का लिंक टिप्पणी में ) सुबह जल्दी निकलने का निर्देश था। लेकिन सुबह कौन जल्दी निकलता है। नाश्ता करते, सामान लादते, बस में बैठते और निकलते क़रीब दस बज गए। हमारी मंज़िल थी अहरबाल झरना ।
श्रीनगर से क़रीब दो घंटे की दूरी पर स्थित कुलगाम ज़िले में स्थित है। बस में बैठे तो सभी यात्रियों के गाने-डांस और अंत्याक्षरी का समा बंध गया। कुछ देर की मौज-मस्ती के बाद एक जगह बस रुकी। यह एक केसर की दुकान थी। सभी लोग बस से उतरकर केसर, कहवा, मेवों वग़ैरह की ख़रीदारी में जुट गए। दुकान वाले मुफ़्त कहवा पिलाकर ख़रीदारों का स्वागत कर रहे थे। लोग देखादेखी ख़रीदारी करते जा रहे थे। दुकान पर केसर के तमाम लाभों की फ़ेहरिस्त लगी थी।
जब लोग ख़रीदारी में जुटे थे अपन बाहर सड़क का मुआयना करने निकल आए।अमरनाथ यात्रा के चलते सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम थे। जवान बख़्तरबंद गाड़ियों के साथ रास्ते की निगरानी कर रहे थे। कई बख़्तरबंद वाहन हमारी संस्थान वीएफजे में बने थे। संस्थान की पट्टी वाहनों पर लगी थी।
ख़रीदारी से निपटकर लोग फिर बस में आए। आगे की यात्रा शुरू हुई। कुछ देर बाद बस मुख्य सड़क छोड़कर क़स्बे की पतली सड़क पर आ गयी। वहाँ भी बस्ती में कुछ-कुछ जगहों पर बख़्तरबंद गाड़ियों में जवान सुरक्षा में मुस्तैद थे।
बस पतली सड़कों पर बलखाती हुई, धीरे-धीरे लहराती, नख़रीले जैसे अन्दाज़ में मटकती हुई अहरबाल झरने के पास पहुँची। नीचे उतरकर हम लोगों ने बदन तोड़ अंगड़ाई लेकर पैर सीधे किए और झरने की तरफ़ बढ़े। झरने के पास तक जाने के लिए टिकट लेना था।नैसर्गिक सौंदर्य को देखने के लिए भी पैसे देने पड़े यह अपने आप में विडम्बना है। लेकिन है तो है।
मुझे डर है कि कहीं आगे चलकर धूप, हवा और बारिश जैसी प्राकृतिक और सहज सुलभ सुविधाओं का उपयोग करने पर भी कोई टिकट न लग जाए। इससे पहले कि ऐसा हो, अधिक से अधिक जगहें घूम ली जाएँ।
अहरबाल झरना झेलम की सहायक नदी वेशा नदी पर स्थित है। इसकी ऊँचाई २२६६ मीटर ऊँचाई है। अपनी ख़ूबसूरती के कारण इसकी तुलना नियाग्रा के जलप्रपात से की जाती है। जिस ऊँचाई और मात्रा में इससे पानी गिरता है उससे १०० मेगावाट बिजली बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह जगह जीवाश्म जैव विविधता से भरपूर है और विशिष्ट स्थानों पर घने जीवाश्म नमूनों से भरा है। 488 से 354 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। मतलब लगभग 488 से 364 लाख पीढ़ी पहले के लोग। उस समय फेसबुक रहा नहीं होगा वरना कोई लिखता इसके भी किस्से।
जैसे-जैसे झरने के पास जाते गए, ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा होता गया। झरने की तरफ़ सुरक्षा के लिहाज़ से रेलिंग और तार लगे हुए हैं। सबसे नीचे पहुँचकर झरने के एकदम पास तक पहुँचे। रेलिंग के पीछे से झरने की ख़ूबसूरती निहारते रहे, देखते रहे, सौंदर्य-चकित होते रहे। पास से देखा फिर थोड़ी दूर से देखा। हर तरफ़ से अनोखे सौंदर्य के दर्शन हुए।
झरने में बहता पानी बहुत खूबसूरत लग रहा था। ऐसी ख़ूबसूरती को सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है, बयान करना नामुमकिन है। कर भी दिया जाए तो उसे उसी रूप में महसूस करने की कोशिश में इतना 'सौंदर्य-नुक़सान' होगा जिसकी क्षतिपूर्ति असम्भव है।
एक जगह खड़े होकर देखने पर झरने के मुहाने पर ऐसा लगा मानो पानी की एक लहर इठलाती हुई एक तरफ़ से आई , एक लहर दूसरी तरफ़ से मटकती हुई आई और मुहाने पर दोनों का गठबंधन हो गया। मानों दो लहरों का गठबँधन हो गया हो मुहाने पर और वे आगे गृहस्थ के रूप में बहने लगे हों।
मेरे बेटे अनन्य ने झरने के पास लगे कँटीले तार को देखकर उसको फ़ोटो खींचते हुए कहा - ' beauty in cage पहरे में ख़ूबसूरती।'
कहने को तो कश्मीर के बारे में यह भी कहा जाता है -'एक दिल है कश्मीर सा, खूबसूरत मगर तबाह।' लेकिन हम तो इसकी ख़ूबसूरती पर ही फ़िदा हैं।
बहुत देर तक झरने के किनारे खड़े हम लोग अलग-अलग ग्रुप में फ़ोटो खिंचाते रहे। हर कदम पर झरने की ख़ूबसूरती अलग तरह से दिखती रही। फिर-फिर लौटकर आगे-पीछे देखते रहे।
लौटते समय एक जगह कश्मीर के कुछ लोग बैठे दिखे। उनसे बातचीत शुरू हुई तो उसने पूछा -' कश्मीर मोहब्बत से भरा हुआ है। आप ही बताओ आपको कश्मीर कैसा लगा?'
हमने कहा -'बहुत ख़ूबसूरत। बहुत अच्छे लोग हैं यहाँ के। '
उसने कहा -'मैंने खुद पढ़ाई की है वहाँ।बाहर। मगर मुझे कश्मीर से अच्छा कोई प्लेस नहीं लगा। कश्मीर एक तरह से जन्नत है।'
कश्मीर के बारे में पूछने वाले यह पहले कश्मीरी नहीं थे। मुझसे कश्मीर से जुड़े तमाम लोगों ने कश्मीर के बारे में पूछा है -'आपको कश्मीर कैसा लगा?'
हमारे यह कहने पर कि कश्मीर बहुत अछा लगा उनके चेहरे पर संतुष्टि भरे भाव के बाद अक्सर यह सवाल भी होता है -'फिर कश्मीर के बारे में लोग ख़राब बातें क्यों कहते हैं?'
मेरे पास इसका कोई मुकम्मल जबाब नहीं होता लेकिन अक्सर यही कहते रहे कि लोगों को यहाँ के बारे में पता नहीं। वे यहाँ आए बिना सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी राय बना लेते हैं। कश्मीर वाक़ई बहुत खूबसूरत है। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं।
कश्मीर के बारे में कश्मीर के लोग जब पूछते हैं तो उनके चेहरे पर जो भाव होता है वह उसी तरह के होते हैं जैसे कोई अपनी सबसे बेहतरीन चीज़ उपलब्धि दिखाते हुए किसी की राय पूछे -'आपको यह देखकर कैसा लगा?'
यह सवाल मुझसे कश्मीर के लोगों ने कश्मीर में भी पूछा, कश्मीर से दूर पांडीचेरी में भी पूछा। स्कूल जाती मेडिकल की तैयारी करती लड़की ने भी पूछा, नौकरी करते युवा ने पूछा, आटो चलाते हुए चालक ने पूछा और झरने किनारे अपने बच्चे के साथ बैठे पिता ने भी पूछा। सबके सवालों में यह कोशिश दिखी कि लोग कश्मीर को उसी तरह खूबसूरत और मोहब्बत वाली जगह समझें जैसी वह है, जैसी कश्मीर के लोग मानते हैं।
इस लिहाज़ से हर कश्मीर निवासी चाहे, वह जहां भी हो, कश्मीर का 'ब्रांड एंबेसडर' है। वह भरसक प्रयास करता है कि लोग कश्मीर की अच्छाई और मोहब्बत के पैग़ाम को समझें।
विदा होते समय उसने हमको अपने घर खाने के लिए निमंत्रित भी किया। हमने बताया कि हम तमाम लोग हैं ,आगे जाना है हमको।
उसने 'तमाम लोग' वाली बात को पकड़ कर कहा -'कितने भी लोग होंगे, सबका इंतज़ाम हम करेंगे।'
हमने दरियादिल प्रस्ताव के आभार व्यक्त करते हुए आगे जाने की बात का हवाला देकर उससे विदा ली।

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Wednesday, October 04, 2023

जीरो प्वाइंट पर शिलाजीत

 



श्रीनगर से सोनमर्ग में रास्ते में जगह-जगह जवान तैनात दिखे। अमरनाथ यात्रा के कारण कड़ी सुरक्षा थी। सड़क पर खड़े, हथियार लिए, चौकन्ने जवानों की सख्त ड्यूटी।
जीरो प्वाइंट सोनमर्ग का पर्यटन स्थल है। लोग घूमने आते हैं। जहां गाड़ियां रुकती हैं उसके थोड़ा आगे जाने पर जमी हुई बर्फ। लोग ऊपर तक जाकर बर्फ देखते हैं। फोटो खिंचवाते हैं। चले आते हैं।
जहां गाड़ियां रुकती हैं और जहां बर्फ शुरू होती है दोनों के दरम्यान तमाम ढाबे, अस्थाई दुकानें हैं। उनमें चाय-पानी, नाश्ते का सामान और दीगर स्थानीय चीजें मिलती हैं। अलावा इसके तमाम फेरी वाले पहुंचते ही पास आकर चीजें दिखाने लगते हैं। जहाँ आदमी वहां बाजार।
गाडी से उतरकर बर्फ के पास जाते हुए आसमान और आसपास ऊंचे-ऊंचे पेड़ देखते हुए आगे बढ़े। थोड़ी ऊंचाई और चढ़ाई पर जाते हुए ऊंचाई के कारण आक्सीजन की कमी लगी। सांस लेने में तकलीफ भी। हम बर्फ की शुरुआत से करीब बीस-पच्चीस मीटर पहले एक ढाबे पर ही बैठ गए। लोगों को जमी हुई बर्फ पर चढ़ते, उतरते,फिसलते और फोटो खिंचाते देखते रहे। चाय के लिए भी बोल दिया ढाबे वाले को।
जीरो प्वाइंट की बर्फ ऐसी जमी हुई थी मानों उसको पीट-पीट कर जमा किया गया हो। पीटते हुए धमकाया भी गया हो-'खबरदार जो धूप की संगत में पिघलने की कोशिश की।'
स्थानीय लोग इस जमी हुई बर्फ से अपने हिसाब से कमाई कर रहे थे। तमाम लोग स्लेज लिए खड़े थे। स्लेज पर बैठाकर बर्फ में फिसलपट्टी की तरह घुमा रहे थे। कई फोटोग्राफर अपने साथ बढिया कैमरे लिए फोटो, वीडियो बना रहे थे। साधारण सी वेशभूषा में स्थानीय लोग हाई क्वालिटी कैमरे लिए अपने मोबाइल स्टूडियो खोले खड़े थे। दो मिनट में खूबसूरत फोटो, वीडियो बनाकर आपके मोबाइल में दे रहे थे। अकेले और जोड़े में लोगों के पोज भी बना रहे थे। एक फ़ोटोग्राफर ने बर्फवारी का सीन बनाने के लिए नीचे झुककर थोड़ी बर्फ खोदी। फोटो खिंचाने वाले के हाथ में ऱखकर उछालने को कहा। बर्फ उछालते हुए उसका फोटो, वीडियो बनाया। कुछ और पोज में फोटो लिए। थोड़ी देर में प्रोसेस करके, सबका वीडियो बनाकर थमा दिया। सबके हजार या शायद पंद्रह सौ लिए। पचीसो फोटोग्राफर वहां यह काम कर रहे थे।
बर्फ में चलते हुए लोग फिसल भी रहे थे। स्लेज वाले और फोटोग्राफर और साथ के लोग उनको संभालकर नीचे ला रहे रहे थे।
हम ढाबे में एक कुर्सी पर बैठे बर्फबाजी, स्लेजबाजी और फोटोबाजी के कौतुक देख रहे थे। हमको अकेला और शायद थका हुआ बैठा देखकर एक आदमी शिलाजीत बेचने आया। शिलाजीत के फायदे और असली शिलाजीत होने की बात बताते हुए उसने शिलाजीत खरीदने के लिए कहा।
शिलाजीत की तमाम खूबियां होती हैं। लेकिन उसको मर्दानगी से इतना ज्यादा जोड़ा जाता है कि उसके बाकी सब गुण गुमनाम हो जाते हैं। हाल यह है कि इंसान खुले आम शिलाजीत खरीदते हिचकता है। कहीं लोग उसको कममर्द न समझ लें।
शिलाजीत के बाद उसने पेट कम करने की दवा का विज्ञापन शुरू किया। शायद उसको अंदाजा हुआ होगा कि अगला पेट के कारण दमफूल जाने की वजह से यहीं बैठा है। दवा लेते ही पेट आधा हो जाएगा की गारंटी के बावजूद जब वह असफल रहा तो चुपचाप आगे जाकर दूसरे ग्राहक को शिलाजीत और मोटापा कम करने की दवा बेंचने का प्रयास करने लगा।
घूमने की जगहों और खासकर काश्मीर में मैने पाया कि आप जहाँ पहुंचते हैं, बाजार आपके पास पहुंच जाता है। होटल में, पानी में, नदी किनारे, पार्क में। किसी भी जगह पहुंचे नहीं कि बाजार आपकी मिजाज पुर्सी के लिए हाजिर।
घुमाई और फोटोबाजी के बाद चायपानी करके लौटने की बात होने लगी। आहिस्ते-आहिस्ते लौटने का मन बनाते हुए लोग गाड़ियों तक आते गए। पीछे रह गए साथियों का इंतजार करते हुए फिर से प्रकृति को देखते, निहारते और कैमरे में भर्ती करते रहे। सब लोगों के आ जाने के बाद वापस चल दिये।
वापसी में चिंता थी कि कहीं देर न हो जाए और रात सोनमर्ग में ही गुजारनी पड़े। सोनमर्ग और पहलगाम में एक निश्चित समय के बाद वापस नहीं आने देते। सुरक्षा कारणों से।
रास्ते में एक जगह पत्थर गिर जाने के चलते गाड़ियां रुकी हुईं थीं। लम्बी लाइन लाइन। हम भी रुके। देरी होते हुए लगा कि कहीं यहीं न रुकना पड़े। लेकिन थोड़ी देर बाद जाम खुल गया। गाड़ियां तेज भागी। हम कुछ देर में उस जगह पहुंचे जहां हमारी बस खड़ी थी। गाड़ियों से उतरकर बस में पहुंचे। सरपट भागे। देर तक यही सोचते रहे कि कहीं यहीं न रुकना पड़े।
जिस जगह जाने के लिए हम लोग इतने इंतजाम करते हैं, वहीं ' ठहरना न पड़े ' सोचते हुए परेशान होने वाली बात भी मजेदार है। हम चुपचाप बैठे यही सोचते रहे कि शाम होने के पहले निकल जाएं सोनमर्ग से। रुकना न पड़े।
आगे थोड़ी देर बाद हमने पूछा अभी वह जगह कितनी दूर है जहां तक पहुँचने के बाद सोनमर्ग में रुकने की बन्दिश नही होगी। पता लगा कि वह जगह तो निकल गयी। पन्द्रह बीस मिनट पहले। सुनकर हमने जो सांस ली वह बाकी सांसों की तरह सामान्य ही थी लेकिन तसल्ली वाले भाव के चलते लोग उसको संतोष की सांस कहते हैं।
संतोष की सांस लेने के बाद हमने तसल्ली से बस के बाहर देखना शुरू किया। खूबसूरत नजारे देखते हुए श्रीनगर की तरफ़ बढ़ते गए। एक जगह रुककर नाश्ता-पानी किया। इसके बाद फिर बस में बैठकर चले तो अंधेरा होने लगा था। श्रीनगर पहुंचते-पहुंचते रात ने भी ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी।

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Tuesday, October 03, 2023

श्रीनगर से सोनमर्ग



कश्मीर यात्रा के पहले दिन निशात बाग़ और डल झील देखे, घूमे। रात के खाने के दौरान सबसे परिचय, मुलाक़ात हुई| इसके बाद सब सोने चले गए।
अगले दिन सुबह सोनमर्ग जाना था। पिछली कश्मीर यात्रा में सोनमर्ग रह गया था। श्रीनगर से सोनमर्ग करीब 80 किलोमीटर दूर है| दो से ढाई घंटे की दूर। बस से जाना था। ड्राइवर और सहायक मिलाकर कुल 23 लोग।
सोनमर्ग मतलब सोने का घास का मैदान। तमाम जगहें हैं यहाँ देखने को। सबको देखने -घूमने में के लिए तो न जाने कितने दिन लगें लेकिन हम लोग सिर्फ़ एक दिन के लिए आए थे इसे देखने। एक तरह से पाला छूने। ज़्यादातर पर्यटन पाला छूने वाले ही होते हैं। कुछ घंटे के लिए देखी जगहों की यादों को जीवन भर सहेजते हैं। अपने -अपने यादों के हिस्से फ़्रीज करके देखते रहते हैं।
बस सबेरे ही होटल के बाहर लग गयी। सवा आठ बजे बस का फोटो और ड्राइवर का फोन नम्बर व्हाट्अप ग्रुप में आ गया। ड्राइवर का नाम आदिल। खूबसूरत, सुदर्शन जवान, तरासी हुई दाढी। बाद में पता चला कि ड्राइविंग के पहले अपना आर्केस्टा था। सेहत के कारण उसको बंद करके ड्राइविंग शुरू की।
बस भले सवा आठ बजे लग गयी लेकिन निकलते-निकलते दस बज गए। सब लोग चलो,चलो कहते हुए आराम-आराम से बैठे बस में तो पता चला ट्रिप लीडर नदारद।मालूम हुआ कि ट्रिप के एक सदस्य के लिए खाना लेने गए हैं होटल। अनन्य के आने के बाद बस चली सोनमर्ग के लिए।
बस स्टार्ट होते ही टूर भी स्टार्ट हो गया। साथ आये लोगों का आपस में छुटपुट परिचय तो हो गया था लेकिन तसल्ली से , तफसील वाली जानपहचान होनी बाकी थी। अनन्य ने सभी से अपने बारे में बताने को कहा।लोगों ने विस्तार से अपना परिचय दिया। कुछ लोग पहली बार ऐसी किसी यात्रा में निकले थे। उनको उनके बच्चों से जबरियन ठेल कर भेज था। ये बच्चे फिरगुन ट्रेवल्स के टूर का अनुभव ले चुके थे। उनको भरोसा था कि उनके घर वाले आराम से रहेंगे।
परिचय के बाद गानों की अंत्याक्षरी हुई। दो ग्रुप बन गये। गानों पर गाने गूंजते रहे बहुत देर जब तक कि गाने की जगह डांस ने नहीं ले ली। डांस का सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा देर तक। डांस करते लोगों ने दूसरे लोगों को जबरियन उठाकर ठुमके लगवाए। तेजी से लहराती, चलती बस ने भी लोगों को उन लोगों डांस करने में सहयोग किया जिनका हाथ डांस में तंग था। उनके खड़े होते ही बस उनको हिला- डुला देती जिससे उनकी मुद्रा अपने आप डांस मुद्रा में बदल जाती।
दो ढाई घण्टे बाद बस एक जगह रुकी। ढाबे के पास। बस रुकते ही लोग लपकते हुए नीचे उतरे। ढाबे के बगल में ही नदी बह रही थी। लोगों ने बताया सिंधु नदी है। नदी इठलाती हुई अपने में मस्त बह रही थी। उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि इतनी दूर से लोग उसके किनारे पर खड़े हुए उसको देखते हुए फोटो खिंचाने , वीडियो बनाने में तल्लीन हैं।
नदी बेपरवाह अंदाज में बह रही थी। उसको इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि लोग उसको देखते हुए, घूरते हुए और उसको तरह-तरह से अपने साथ लेते हुए फोटोबाजी कर रहे थे। सैकड़ों सालों से ऐसे न जाने कितने लोग उसको देखते आ रहे हैं। ऐसे सबको देखे तो बह चुकी नदी।
नदियों के उद्गम छोटे-छोटे सोते जलस्रोत होते हैं। उद्गम से निकलते हुए अनगिनत जलस्रोत नदी के जल में इजाफा करते हैं। इन जलस्रोतों से पानी ग्रहण करती हुई नदी आगे बढ़ती है। सबके सहयोग से नदी समृद्ध होती है। नदी का सौंदर्य सामूहिकता का सौंदर्य होता है।
सोनमर्ग पहुंच कर बस रुकी। आगे की यात्रा स्थानीय गाड़ियों से की जानी थी। गाड़ियों में बैठकर हम लोग आगे बढ़े। करीब घण्टे भर की मोटरबाजी के बाद हम उस जगह पर पहुँचे जिसको देखने तमाम लोग सोनमर्ग आते हैं। इस जगह का नाम ज़ीरो प्वाइंट है।

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Thursday, August 24, 2023

डल झील -शहर के अंदर बसा शहर



निशात बाग से निकलकर डल झील की तरफ़ बढ़े। बाग से बाहर निकलते ही क़ुल्फ़ी वाले को देखकर क़ुल्फ़ी खाने का मन हुआ। लेने गये तो सोचा सबके लिये ली जाये। एक बार में दस क़ुल्फ़ी ले गये। 25 रुपये की एक । बस में पूछा कौन -कौन खाएगा ? सब बंट गईं। अपने लिए लेने के मुड़े तब तक बस चल दी। लोगों ने कहा -‘ अब छोड़ो। देर हो रही।’
अपनी लाई हुई क़ुल्फ़ी मित्रों को खाते देखते रहे। चुपचाप। इसीलिए समझदार लोग कल्याण की शुरुआत ख़ुद से करते हैं।
बस सड़क पर टहलती हुई थोड़ी देर में डल झील के किनारे पहुँची। बस से उतरते ही सामने कुल्फी वाला दिखा। थोड़ी देर पहले कुल्फी खाने से वंचित जाने की याद ने ठेलिया तक पहुंचाया और हमने लपककर कुल्फी खरीदी। 20 रुपये की एक। कुल्फी खाते हुए शिकारे पर बैठे। बैठते ही चल दिये डल झील भ्रमण पर।
क़ुल्फ़ी बेचने वाला बालक भागलपुर का था।
शिकारे के चलते ही उसको अगल-बगल से छोटी नावों ने घेर सा लिया। हर नाव पर कोई न कोई छुटकी दुकान। किसी में चाय बिक रही है, किसी में कहवा, किसी में कुल्फी। जेवर, कपड़े, कलाकृतियां, फल मतलब की हर उस चीज की दुकान जो आप शिकारे पर बैठकर खरीद सकते हैं।
सामानों के अलावा कश्मीरी ड्रेस में फोटोबाजी वाले शिकारे भी मौजूद थे झील में। चलता-फिरता फोटो स्टूडियो। हमारे साथ के लोगों में से कुछ को उन लोगों ने उठाकर उन्होंने उनके फोटो खींचे और कुछ देर में प्रिंट भी थमा दिए।
हम इधर-उधर देखते हुए झील भ्रमण कर रहे थे। इस बीच बगल की नाव से कहवा भेज दिया गया। 40 रुपये का एक कप। इसके बाद कुल्फी भी आई। वो भी चालीस की ही। अपना माल बेचकर इधर-उधर हो गयी नाव।
नाव वाले ने बताया जाड़े में जब झील झम जाती है तो लोग यहां पर क्रिकेट भी खेलते हैं। दिसम्बर से जनवरी-फरवरी तक शिकारे ठहर जाते हैं। फिर मार्च से शुरू होती है चल-पहल।
उधर आसमान में सूरज भाई अपनी विदा वेला में रंगबिरंगे हो रहे थे। बहुरंगी परिधान धारण किये खूबसूरती से पूरी कायनात को टाटा-बॉय बॉय कर रहे थे।
झील में तैरता हुआ बाजार भी मिला। हर हाउसबोट पर एक दुकान। कपड़ों, जेवर, कलाकृतियां और तमाम तरह की दुकानें। दुकान पर बैठे लोग टकटकी लगाए हर शिकारे को ताक रहे थे। लेकिन लोग उनको देखते हुए चुपचाप आगे बढ़ते जा रहे थे।
आगे कुछ लोग मछली पकड़ने के लिए झील में कांटा डाले बैठे थे।
एक महिला एक छुटकी नाव में अपने बच्चे को बैठाए सरपट जाती दिखी। उसका झील में जाना ऐसे लगा जैसे कोई महिला भरे बाजार में स्कूटी पर बच्चे को बैठाए चली जा रही हो।
नाव वाले ने बताया यहां झील में कई गांव हैं। स्कूल हैं। अपने आप में पूरा शहर है झील। शहर जिसमें गांव भी हैं, स्कूल भी, दुकान भी, खेत भी । थाना भी, पोस्टआफिस भी , रहने को होटल भी।
एक बहुत बड़ा बाजार है डल झील। हजारों परिवारों को रोजगार देती है डल झील।
वेनिस के बारे में सुना है पानी के बीच बसा है। डल झील इस मामले में अनोखी है। एक शहर में बनी झील जो अपने में एक शहर है, एक बहुत बड़ा बाजार है।
लौटते हुए नाव वाले ने बताया कि एक फेरे का उसे 400 रुपये मिलता है। बाकी जो लोग अपनी खुशी से दे दें। हम लोगों ने भी अपनी खुशी से कुछ दिया और किनारे पर उतर गए।
बाहर बस हमारा इंतजार कर रही थी। हम बस में बैठकर होटल वापस आ गए। वहां रात का खाना हमारा इंतजार कर रहा था।

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Tuesday, August 22, 2023

निशात बाग मने खुशियों का बगीचा



निशात बाग में लोग ही लोग थे। पिछले साल जब इसे देखने आए थे तो मौसम सुहाना था। इस बार गर्मी थी। पिछली बार हम अकेले थे। इस बार लोग साथ थे। पिछले साल की तमाम बातें याद आ गईं।
निशात बाग का अर्थ होता है- खुशियों का बगीचा। देखकर सही में मन खुश हो गया। दिल बाग-बाग हो गया।
निशात बाग को सन 1634 में बनवाया मुगल महारानी नूरजहां के बड़े भाई अब्दुल हसन आसफ खां ने बनवाया था। बताते चलें कि इसके पहले 1619 में मुगल बादशाह जहांगीर अपनी बेगम को खुश करने के लिए शालीमार बाग बनवा कर उनको भेंट दे चुके थे। उसकी देखादेखी ही नूरजहां के भाईजान ने निशात बाग बनवाया होगा।
निशात बाग जब बना तब मुगल बादशाह शाहजहाँ गद्दीनशीन थे। बाग को बनवाने वाले अब्दुल हसन रिश्ते में उनके ससुर थे। उनकी बेटी मुमताज महल शाहजहाँ की बेगम थीं। बाग की खूबसूरती से शाहजहाँ बहुत खुश हुए होंगे और उनके मन में तमन्ना रही होगी कि यह खूबसूरत बाग उनके ससुर उनको भेंट कर देंगे। तमन्ना क्या ऐसा सुना जाता है कि शाहजहाँ ने तीन बार इस बात की मंशा जाहीर की। लेकिन उनके ससुर साहब ने ऐसा नहीं किया। बादशाह शाहजहाँ को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने बगीचे में पानी की सप्लाई रुकवा दी। बाग सूखने लगा।
बादशाह शाहजहां द्वारा उनको भेंट न किए जाने पर बाग की पानी की सप्लाई रुकवा देने का काम उसे तरह का है जैसे किसी कालोनी का मेन्टीनेंस देख रहे किसी को परेशान करने की मंशा से किसी के घर की मरम्मत न कराएं पानी रोक दें, बिजली काट दें, सीवर लाइन चोक करवा दें। मनमानी का ये शाही अंदाज सदियों पुराना है।
शाहजहाँ का यह अंदाज उसी तरह का था कि जैसे लड़के वाले लड़की वालों से जिंदगी भर भेंट-उपहार की आशा लगाए रहते हैं। गनीमत है कि निशात बाग भेंट न देने पर मुमताज महल को परेशान करने के किस्से नहीं मिलते। हुए भी होंगे तो उस समय दहेज विरोधी कानून बना नहीं था। महारानी कहाँ एफ़ आई आर दर्ज करवातीं?
पानी की सप्लाई रुक जाने से निशात बाग उजाड़ होने लगा। पानी बादशाह ने रुकवाया था तो बेचारे अब्दुल हसन साहब करते भी क्या ! सुनते हैं एक दिन उदास निशात बाग में एक पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। उनको उदास देखकर उनके वफादार नौकर ने शालीमार बाग से निशात बाग आने वाली पानी की सप्लाई खोल दी। पानी की आवाज सुनकर अब्दुल हसन ने घबड़ाकर नौकर से पानी की सप्लाई बन करनें को कहा। उनको डर था कि उनका दामाद बादशाह अपनी हुकूमअदूली से खफा होकर न जाने क्या बवाल करे?
लेकिन जब इस घटना के बारे में बादशाह शाहजहाँ को पता चला तो उसने नौकर और अपने ससुर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। बल्कि निशातबाग की पानी की सप्लाई चालू करवा दी। हो सकता है उनकी बेगम मुमताज महल ने भी कहा हो शाहजहाँ से –‘आपने मेरे पापा के बगीचे की पानी की सप्लाई क्यों रोक दी? फौरन चालू करवाइए उसे?’ उसकी बात मानकर ही शाहजहाँ ने अपना हुकूम वापस ले लिए हो।
अधिकार भाव से संचालित, मन माफिक काम न होने पर, नुकसान पहुंचाने वाले इस भाव से मनुष्य तो क्या देवता भी अछूते नहीं है। व्रत न करने पर पारिवारिक अहित, संपत्ति हरण और फिर व्रत करने पर सब कुछ बहाल हो जाने के किस्से इसकी पुष्टि करते हैं।
बहरहाल जो हुआ हो लेकिन आज के दिन निशात बाग में पानी की सप्लाई चालू है और श्रीनगर का यह सबसे बड़ा बाग मात्र 24 रुपए के टिकट पर आम जनता के देखने के लिए उपलब्ध है।
निशात बाग के पीछे एक झरना बहता है जिसका नाम गोपितीर्थ है। बगीचे में पानी इसी झरने से आता है। बगीचे में फूलों की दुर्लभ प्रजातियाँ , चिनार और सरू के पेड़ हैं। यह बगीचा इस इलाके का सबसे बड़ा सीढ़ीदार उद्यान है।
बगीचे में लोगबाग अकेले, दोस्तों-परिवार वालों के साथ टहल रहे थे। घुसते ही लोग फोटो खिंचवाने में जुट जाते। अलग-अलग पोज में फोटोबाजी। मियाँ-बीबी टाइप लोग एक-दूसरे से सट-सटा कर फोटोबाजी कर रहे थे।
बगीचे में घुसते ही बगीचे के सीन के साथ फ़ोटो खिंचाते लोग देखकर ऐसा लगा जैसे किसी मॉल में पहुँचकर लोग घुसते ही डलिया में सामान भरने लगते हैं यह सोचकर कि घर चलकर इसको कायदे से देखेंगे।
हमलोग ग्रुप में 20 लोग थे। सब लोग टहलते हुए एक बड़े लॉन में पहुंचे। सबने एक साथ फ़ोटो खिंचवाई। इसके बाद महिला साथियों ने रेल टाइप बनाकर अलग से फोटो खिंचवाई।
सबकी फोटो खिंचवाने के लिए पास बैठे कुछ युवकों में से एक का सहयोग लिया गया। फ़ोटो खींचने के बाद उसने पूछा -'कहां से आये हैं?'
हमने बताया -'कश्मीर से।'
उसने कहा-'कश्मीर से तो नहीं लगते। बोली से लगता नहीं।'
मतलब बोली भी इंसान का परिचयपत्र होती है। निवास स्थान प्रमाण पत्र।
फ़ोटो के बाद बगीचे की सैर की गई। बगल में खड़ी कुछ महिलाएं सनस्क्रीम के बारे में गुफ़्तगू कर रहीं थीं। किसी ने कहा -'कितनी भी पोत लो। लेकिन जरा देर में पिघल जाती है।'
आगे पानी के झरने के पास खड़े होकर लोगों ने फोटो खिंचवाई। हमारे ग्रुप के कुछ लोगों ने पानी में पड़े पत्थरों पर पैर रखकर दूसरी तरफ जाने की कोशिश की। उनकी जीवनसँगनियो ने उनको टोंका-'फिसल जाओगे।' कुछ मान गए। एकाध लोग नहीं माने और आहिस्ते से पत्थरों पर पैर रखकर पार हो गए। विजयी भाव चेहरे पर। उनकी जीवनसँगनियाँ अब उनको मुस्कराते हुए देख रहीं थी।
आखिर तक जाकर हम लोग लौट लिए। आहिस्ते-आहिस्ते टहलते हुए । हम तो टहलने आये थे। स्थानीय लोग तसल्ली से बाग में चादर बिछाए बैठे थे। पारिवारिक पिकनिक मना रहे थे।
एक महिला अपने परिवार के साथ लेटी हुई डंडी लगी गोल वाली लेमनचूस मुंह मे घुमाते हुए चूसती हुई तसल्ली से आपस में बतिया रही थी। जिस अंदाज में वह लेमनचूस मुंह में घुमा रही थी उसे देखकर मन किया उससे बात करके उसका वीडियो बनाएं। लेकिन फिर हिम्मत नहीं हुई। देखकर ही काम चलाया। आप भी कल्पना करके काम चलाइये।
पानी के फव्वारों में कुछ बच्चे भीगते हुए टहल रहे थे। उनके घर के लोग उनको देखे हुए थे। एक बच्चे ने तो एक फब्बारे के पानी निकलने वाली जगह पर उंगली रखकर उस फब्बारे का पानी बंद कर दिया। ऐसा लगा बच्चे ने फब्बारे का टेंटुआ दबा दिया हो। फब्बारे का दम घुटने लगा। उसका पानी बच्चे की उँगली के अगल-बगल से निकलकर छटपटाने लगा। थोड़ी देर में बच्चे ने फब्बारे से उंगली हटा ली। फब्बारा फिर से पानी बाहर फेंकने लगा।
बगीचे में तरह-तरह के फूल लगे हुए थे। एक सूरजमुखी का फूल बड़ा सा खिला था। उसके साथ लोगों ने फोटो भी खिंचाई। गेंदे के गबरू जवान फूल देखकर हमने घर में बगीचे का काम करने वाले को फोन किया कि यहां तो खूब फूल खिले हैं। वहां तुम बताते हो -'अभी मौसम नहीं आया।' उसने कहा -'आप वहां से बीज लेते आइये। हम लगाएंगे।'
बगीचे की खूबसूरती देखकर सोच रहे थे पुराने जमाने में बादशाह लोग कितने मजे में रहते थे। हुकूमत दिल्ली में और बीबी को उपहार में देने के लिए कश्मीर में बगीचा बनवा दिया।
बगीचे की कहानी बताई तो साथ की कुछ महिला साथियों ने कहा-'वो लोग अपनी बीबियों का ख्याल रखते थे। उनको बगीचे गिफ्ट करते थे। यहां हमारे ये तो एक गुलदस्ता नहीं देते कभी।'
इस शिकायत के जबाब ने दिया गया तर्क इतना लचर और काबिल-ए-खारिज था कि उसको न लिखना ही बेहतर। आप खुद अंदाज लगा लें।
करीब घण्टे भर निशात बाग की सैर करने के बाद हम बाहर आ गए और बस की तरफ बढ़ लिए।
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Monday, August 21, 2023

कोई किसी को जज नहीं करेगा



होटल में बतियाते गपियाते सवा तीन बजे गए। सबको कमरों में व्यवस्थित करने के बाद अनन्य ने ग्रुप में मेसेज किया:
आइए सब लोग 30 मिनट में नीचे रेस्टोरेंट में मिलते हैं। सब लोग अच्छे कपड़े पहनकर आएं। हम लोग खूबसूरत जगहें देखने जा रहे हैं।
इस पर किसी ने मजे लेते हुए पूछा :
‘क्या इसका मतलब यह है कि जब तुमने हमको रिसीव किया था तब हम अच्छे कपड़े नहीं पहने थे।’
अनन्य ने हंसते हुए जबाब दिये:
‘आप डैसिंग लग रहे थे।’
रेस्टोरेंट में सब लोगों के आने के बाद सबका आपस में परिचय हुआ। कोई भोपाल से आया था, कोई उडुपी से, कोई कोटा से , कोई अमृतसर से। कोई दिल्ली कोई कानपुर। सभी ने अपना परिचय देते हुए बताया उनको उनके बच्चों ने ठेल-ठाल कर लगभग जबरियन भेजा है कि जाओ घूमकर आओ। इन बच्चों में अधिकतर वे बच्चे थे जो अनन्य के साथ फिरगुन की ट्रिप पर जा चुके थे।इन बच्चो में अधिकतर बेटियां थीं। सबको भरोसा था कि उनकी तरह उनके मम्मी-पापा को भी ट्रिप में मजा आएगा।
रेस्टोरेंट में परिचय देते हुए लगभग सभी ने बताया कि वे फलानी जगह से आये हैं लेकिन मूलतः वे दूसरी किसी जगह से हैं। हमने बताया कि हम कानपुर से आये हैं और मूलतः भी कानपुर से ही हैं।
सबके परिचय के बाद अनन्य ने ट्रिप लीडर के रूप में ट्रिप का उद्देश्य बताया। उसने कहा:
“आपने अपने जीवन में बहुत कुछ किया होगा। अपने बच्चों के लिए और तमाम लोगों के लिए। अब आप इन छह दिनों में अपने लिए कुछ करेंगे। आपके बच्चों ने आपको यहां भेजा है, आपको एक गिफ्ट दिया है। यह मुझपर भरोसा है उनका। हम लोग बहुत सारी मस्ती करेंगे इन छह दिनों में जैसी हम लोग यंगस्टर के ग्रुप में करते हैं। हम घूमेंगे, बातें करेंगे, गाने गाएंगे, डांस करेंगे।
फिरगुन में हम अलग यह करते हैं कि लोगों के बारे में जानते हैं, उनसे दोस्ती बनाते हैं। जिस उम्र में आप लोग हैं उस उम्र तक आते-आते आपको लगता है कि जितने दोस्त बनने थे बन चुके। लेकिन जब आप इस तरह की ट्रिप करते हैं तो नए लोगों से मिलते हैं। नए दोस्त बनते हैं। उनकी कहानियां सुनते हैं। उनसे इंस्पायर हो सकते हैं। क्योंकि आपको नहीं पता कि दूसरे की लाईफ़ में क्या चल रहा है। उनके जीवन में क्या हुआ। तमाम अच्छी बातें। तो आप लोग बहुत सारी स्टोरीज अपने साथ लेकर जाते हैं। आप सभी को यहां देखकर बहुत मुझे बहुत खुशी हो रही है।मेरी ट्रिप लीडर के तौर पर 30 ट्रिप्स हो चुकी हैं। यह 31 वीं ट्रिप है। हम सब खूब मजे करेंगे।
आप सबसे मेरी एक ही रिक्वेस्ट है कि कोई किसी को जज नहीं करेगा। क्योंकि हमें नहीं पता किसका क्या बैकग्राउण्ड है। इतने सालों की जर्नी तय करके यहाँ तक आया है। अगर कोई ज्यादा फ़ोटो ले रहा है। कोई हंस रहा है। कोई गा रहा है। कोई ज्यादा फोटो ले रहा है। कोई खूब बातें कर रहा है कोई शांत है। तो हरेक चीज का एक रीजन होता है। तो हम किसी और को जज नहीं करेंगे। ढेर सारी यादें इकठ्ठा करेंगे। खूब मस्ती करेंगे। कोई रूल्स नहीं हैं। आइए चलते हैं।”
सबने ताली बजाकर अनन्य की बात की तारीफ की।
किसी को जज न करने वाली अनन्य की बात बड़ी अच्छी और मार्मिक भी लगी। अनुकरणीय भी। हम अपने रोजमर्रा की जिन्दगी में बिना जाने अपने आसपास के लोगों को बारे में राय बनाकर उनसे व्यवहार करते हैं। ऐसे में अक्सर उन लोगों के साथ और सच कहें तो खुद के साथ भी नाइंसाफी होती है क्योंकि अक्सर बाद में सच्चाई जानने के बाद पछतावा होता है।
होटल से निकलकर हम बस में बैठ गए। बस बाजार होते हुए डल झील के किनारे-किनारे होती हुई आगे बढ़ी। इतवार होने के कारण बाजार बंद था। दुकानों के बंद शटर के ऊपर लिखा था -save Dal Lake. शटर खुल जाने के बाद डल झील को बचाने का नारा शटर के साथ गोल होकर छिप जाता होगा।
डल झील को बचाने का मतलब उसको गन्दा न करने से है। तमाम लोग आते हैं, लोग उनको घुमाते हैं, डल झील के आसपास अनेक होटल हैं। अनगिनत दुकानें हैं। सब किसी न किसी तरह इसको गन्दा करने में सहयोग करते हैं। डल झील अनगिनत लोगों के लिए रोजगार का साधन है। यह बड़ा बाजार है। बाजार होने के चलते इसका गंदा होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। गंदगी करके फिर इसे बचाने के प्रयास देखकर मेराज फैजाबादी का शेर याद आता है:
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना,
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेंचना।
बाजार बंद होने के बावजूद सड़क पर भीड़ बहुत थी। जगह-जगह लोग ठेले लगाए खड़े थे। एक जगह तो प्रदर्शनी लगी थी।
सुरक्षा के लिए जगह-जगह सीआरपीएफ के जवान तैनात थे। झील के सामने सड़क पर कोई गाडी खड़ी होने की मनाही थी। पुलिस लगातार गस्त लगाती हुई, सायरन बजाते हुए गाड़ियां हटवा रही थी।
कुछ देर में हम निशातबाग पहुंच गए।

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Sunday, August 20, 2023

श्रीनगर एयरपोर्ट से होटल पैसेफिक

 


आज सुबह निकले कश्मीर के लिए। फ्लाइट सवा दस की थी। रात में कई बार जागकर समय देखा। अंततः सुबह साढ़े पांच बजे उठे। तैयार होकर नाश्ता करके साढ़े सात बजे निकले।
एयरपोर्ट समय पर पहुंचे। अंदर घुसने पर श्रीमती जी के पहचान पत्र के रूप में उनके आधार की फोटोकॉपी थी। सुरक्षा पर तैनात गार्ड ने कहा -'ओरोजिनल चाहिए।' हमने कहा -'यही है।'
उसने कहा -'इसको किसी राजपत्रित अधिकारी से अटेस्ट करवाओ। हमने फौरन बैग में मौजूद अपनी मोहर निकाली और फोटोकापी पर मार दी। उसने सिर्फ मोहर देखकर अंदर आने की अनुमति दे दी।'
इसके पहले कल कैंट एरिया में घुसने पर भी परिचय पत्र काम आया था।
सरकारी कागज और प्रमाणपत्र का जलवा ही अलग है।
एयरपोर्ट पर बोर्डिंग पास बनवाकर अंदर आये। एक जगह नाश्ता किया। तीन इडली 229 रुपये की। मद्रास में अम्मा की रसोई वाली योजना में इतने में 23 लोग नाश्ता करते हैं। लेकिन एयरपोर्ट की अलग ही दुनिया है, अलग ही दाम। हवा में उड़ने वालों की अलग ही दुनिया है।
एयरपोर्ट पर मित्र नीरज केला भाभी रेनू केला के साथ इंतजार कर रहे थे। जुलाई में रिटायर होकर पूरे मन से घूमने के लिए तैयार। हमारी फ्लाइट का टिकट रेनू भाभी ने ही कराया। जो टिकट हम तीस हजार रुपये में करा रहे थे, वो भाभी जी ने 25 हजार में करवा दिए। न जाने कौन-कौन कूपन लगाकर। नेट से खरीद भी एक कला है।
फ्लाइट समय पर ही चली। एयरइंडिया की कमान टाटा ग्रुप के हाथ में आने के बाद एयरहोस्टेस के ड्रेस बदली है। ड्रेस पहने व्योमबालायें एकदम घरेलू बालिकाएं लग रहीं थीं। जहाज हवा में उड़ा और दिल्ली के मकान माचिस के डब्बों के साइज में बदलते हुए ओझल हो गए। बादलों की भीड़ मिली। जहाज से बादल देखकर हमेशा ऐसा लगता है कि पूरी कायनात में सर्फ घोल दिया गया हो। सफेद और नीले बादल सर्फ के झाग और नीले पानी के घोल सरीखे लग रहे थे।
कुछ देर बाद एयरहोस्टेस ने नाश्ते के पैकेट थमा दिए। हमने पानी मांगा। उसने बताया इसी में है। पैकेट खोलकर देखा पानी की बोतल भी सैंडविच के साथ लेटी हुई थी। नाश्ता करके हाथ पोंछे ही थे कि जहाज नीचे उतरने लगा। थोड़ी देर में उतर भी गया।
एयरपोर्ट पर छोटे सुपुत्र अनन्य हमारा इंतजार कर रहे थे। उनकी फिरगुन कम्पनी की ट्रिप में हम पहली बार शामिल हो रहे थे। बालक ने उतरते ही सबको फिरगुन टोपी पहना दी यह कहते हुए कि यहाँ धूप तेज है। बच्चे बड़े होकर धूप से बचने के लिए इंतजाम करते हैं।
एयरपोर्ट पर सामान उठाया। बाहर निकलने के पहले फोटोबाजी हुई। भोपाल से आये पुनीत अग्रवाल जी सपत्नीक भी साथ में थे। सब लोग साथ होटल आये। बेटा बाकी के टूरिस्टों को लेने के लिए एयरपोर्ट पर ही रुक गया।
एयरपोर्ट से होटल आते हुए रास्ते में वही सब इमारतें दिखीं जो साल भर पहले दिखीं थीं। अंतर सिर्फ यह था कि पिछली बार स्वागत बरसात ने किया था इस बार धूप वेलकम कर रही थी। सूरज भाई भन्नाए हुए लग रहे थे। बहुत दिन से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। इसलिए शायद खफा लग रहे थे। लेकिन उनकी नाराजगी की चिंता नहीं। थोड़ी देर में खुश हो जाएंगे।
होटल वही था। जहां हम साल भर पहले रुके थे। जाना-पहचाना होटल। होटल में व्यवस्थित होकर चाय बनी। घर से लाई मठरी , लड्डू का लंच हुआ। आराम से बतियाते-गपियाते हुए आनन्दित हो रहे हैं। थोड़ी देर में ही निकलेंगे डल झील और श्रीनगर के बाग-बग़ीचे देखने।

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कानपुर से दिल्ली बजरिये तेजस और टैक्सी

 कल तेजस से दिल्ली आए। जिस बोगी में हम लोग थे वो आधी खाली थी। कानपुर दिल्ली शताब्दी इसके पहले चलती है। तेजस का किराया शताब्दी के किराए से ड्योढ़ा है। ज्यादातर लोग उसी से निकल जाते होंगे। तेजस से वही लोग चलते होंगे जिनको शताब्दी में रिजर्वेशन नहीं मिलता होगा या फिर जिनको सुबह उठना खलता होगा।

हमारा कारण दूसरा था। अर्मापुर से स्टेशन की दूरी और सुबह निकलने के सहज आलस के चलते तेजस से आये।
सुबह निकल तो लिए समय पर। लेकिन आगे जरीब चौकी रेलवे क्रासिंग बंद मिली। समय पर्याप्त बचा था लेकिन फिर भी जब तक क्रासिंग खुली नहीं, सोचते रहे कहीं गाड़ी छूट न जाये।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। एक मालगाड़ी गुजरने के बाद क्रासिंग खुल गयी। आगे अनवरगंज के पास पंकज बाजपेई सड़क पर टहलते दिखे। पहली बार ऐसा हुआ कि उनको देखकर , उनसे मिलने के लिए रुके नहीं।
गाड़ी समय पर थी। रास्ता आराम से कटा। साथ लाई किताबों में से एक पढ़ने के लिए खोली। चार पन्ने पढ़े। बंद करके अखबार बांचा। इसके बाद आंख बंद करके सोते हुए यात्रा पूरी कर ली।
दिल्ली में ठहरने की जगह के लिए टैक्सी खोजी। दाम देखे। सोचा उतरकर ओला या उबर से टैक्सी करेंगे। लेकिन ट्रेन से उतरते ही लोकल टैक्सी वाले पीछे लग लिए। हर कदम पर हमको समझाते रहे कि हमारा सामान ज्यादा है। ओला में आएगा नहीं। हम उनकी बात सुनी-अनसुनी करके बाहर आ गए। वे भी साथ लगे रहे।
उबर बुक की तो टैक्सी वाले बोले वो अंदर आएगी नहीं। यहाँ का भी किराया देना होगा उसे। हमने उबर वाले से पूछा तो उसने भी बताया कि अंदर स्टैंड का किराया पड़ता है।
इस बीच एक टैक्सी वाले ने हम लोगों को कंजूस मानते हुए कहा-'दिल्ली आए हो तो पैसा तो खर्च करना होगा।'
उबर वाले ने आने में देरी की। इस बीच मोलभाव भी चलता रहा। आखिर में भावताव के बाद स्टेशन पर मौजूद टैक्सी से चलने की बात तय हो गई। सामान लादकर हम चल दिये।
टैक्सी चलने पर गर्मी लगी। हमने एसी चलाने को कहा। ड्राइवर ने कहा -'200 रुपये एक्स्ट्रा लगेगें।' हमने खिड़कियां खोल लीं। दुनिया का सबसे बड़ा एयरकंडीशनर हमारे लिए खुल गया। मुफ्त में।
ड्राइवर मजेदार अंदाज में अगल-बगल गुजरती गाड़ियों के ड्राइवरों पर कमेंट करता रहा। एक गाड़ी आगे रुकी थी। उसको देखकर बोला -'ये लगता है पूरी दिल्ली का ट्रैफिक निकाल कर ही आगे बढ़ेगा।'
एक ऑटो वाले को मच्छर कहकर मजाक किया। दोनों काफी दूर तक एक-दूसरे का पीछा करते हुए एक-दूसरे से हंसी-मजाक करते रहे। इस दौरान गाड़ी दाएं-बाएं भी घुमाते रहे सड़क पर। एक कार वाले ने टोंका इसके लिए तो बोले-'यहां आगे कोई बढ़ता ही नहीं तो क्या करें।'
एक जगह गाड़ी रोककर कुछ लेने गए। पान-मसाले की पूड़िया लटकी थीं दुकान पर। हमको लगा कि मसाले की पुड़िया लेने गए हैं। लेकिन लौटने पर देखा कि उनके हाथ में एक बिस्कुट का पैकेट था। उसे खाते हुए गाड़ी चलाते हुए वे हमको गेस्ट हाउस विदा करके चले गए।
जाते समय उनको भुगतान करने की बारी आई तो लगा कि जो पैसा वो शुरु में कह रहे थे वही जायज था। उसी हिसाब से भुगतान भी किया तो वे खुश हो गए और शुक्रिया कह कर गए।


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