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Wednesday, May 01, 2019

खबरों की जुगलबंदी



1.रसोई गैस सिलेंडर के दाम 6 रुपये बढ़े: सूरज भाई का मुफ्तिया ऑफर -खाना धूप में पकाएं।
2. नौबस्ता में ताला बंद मकान में चोरी: नए ताले का खर्च बचा।
3. कलेक्ट्रेट और विकास भवन में पसरा सन्नाटा: कर्मचारी घर से ही कर रहे टाटा।
4. मई में ताजमहल का रात में नहीं होगा दीदार: चांदनी अब दिन में ही दिखेगी यार।
5. चश्मे के गले में घन्टी : बांध दी Arunendra Verma ने ।
6. इंजीनियर कर रहे दिहाड़ी मजदूरी: उनसे भी कमीशन लेते हैं ठेकेदार।
7. फर्जी मतदान पर रिपोर्ट मांगी: मसूद पर बातचीत करने के लिए तैयार हुआ चीन।
8.मार्क जुकरबर्ग ने स्लीप बॉक्स बनाया: सभी फेसबुकियों को करेंगे भेंट।
9. जेट एयरवेज कर्मियों की मेडिक्लेम सुविधा बन्द: अपने भरोसे बीमार पड़े जेट कर्मी।
10. सोना 55 रुपये लुढ़का चांदी 200 रुपये सस्ती: दोनों मिलकर कर रहे सर्राफे में मस्ती।
11. हैलेट में अभी दवाओं की आपूर्ति में लगेंगे दो माह: अच्छी खबरों को सुना मरीजों को ला रहे आई सी यू से बाहर।
खबरें दैनिक हिन्दुतान से।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10216659643376966

Saturday, June 30, 2018

फ़ुटबाल


मानसून आने की खबर हो चुकी है। लेकिन बरस नहीं रहा है। लगता है कहीं रुककर फ़ुटबाल मैच देखने लगा है। पूरी दुनिया में आजकल फ़ुटबाल मचा है न!
बादल-बदलियों के साथ अपनी पसंदीदा टीमों को चीयरअप करने में जुटे होंगे। इसीलिये बरसने में देर कर रहे हैं शायद। जैसे दफ़्तरों में लोग चाय की चुस्कियां लेते हुये क्रिकेट मैच देखते हुये काम-तमाम करते हैं वैसे बादल-बदलियां धूप की चुस्कियां लेते हुये नैन-मटक्का कर रहे होंगे।
हो तो यह भी सकता है कि बादल-बदलियों को कहीं मुफ़्त का नेटवर्क मिल गया हो। अच्छे सिग्नल मिलते ही वे अपने दोस्त-सहेलियों से हाऊ-डू-यू-डुआने लगे हो। हम्म, यप्प, के, लोल मचाने लगे हों।
फ़ुटबाल का हल्ला मचा है। रोमांच के क्षणों में उचकते लोगों को देखकर लगता है कि कम ऊंचाई के बच्चों को बचपन से फ़ुटबाल देखने की आदत डाल दी जाये तो उनके कद निकल आयें। मैच के दौरान दर्शकों की तेज धड़कने देखकर अंदेशा होता है कि हो न हो फ़ुटबाल की शुरुआत किसी दिल के डॉक्टर ने की होगी। खेल के दौरान धकधक के चलते गड़बड़ाते दिल के इलाज के मरीज मिलते होंगे।
श्रीलाल शुक्ल जी ने लिखा है-’ हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो मन आता है लात लगा देता है।’ फ़ुटबाल देखकर मुझे यह अपने देश के विकास योजनाओं सा लगता है। कभी कोई आगे लात मारता है, कभी पीछे। कभी आसमान तक पहुंचती है, कभी लद्द से जमीन पर मुंह के बल गिरती है। गेंद दिन भर में मीलों भटकने के बाद भी रहती मैदान में ही है जैसे गंगा सफ़ाई में अरबों-खरबों खर्चने के बाद भी गंगा वैसे ही बहती हैं।
फ़ुटबाल में क्रिकेट की तरह चीयरबालायें नहीं होती। इसका कारण शायद उनके ठुमकने के लिये मौका तय करने में असफ़लता रही होगी। अगर हर गोल के बाद ठुमकने का नियम बनता तो किसी मैच में कोई गोल न होने पर चीयरबालाओं का ’ठुमका-उपवास’ हो जाता। अगर हर लम्बी किस पर मटकने का नियम होता तो क्या पता चीयरलीडर कमर उनके शरीर से एक ही मैच में समर्थन वापस ले लेती। उनके शरीर की सरकार गिर जाती। उस पर आई.सी.यू. लागू हो जाता। चीयरलीडरानियों की कमी की भरपाई खिलाड़ी लोग नाच-गाकर, एक दूसरे पर कूद कर लेते हैं।
हमारी फ़ुटबाल के बारे में जानकारी उतनी ही अच्छी है जितनी स्नूकर के बारे में हैं। दोनों के बारे में एक-बराबर जानकारी होने के नाते अपन पूरे दावे से कह सकते हैं कि दोनों ही क्रिकेट से अलग हैं। कम खर्चीला और ज्यादा वर्जिश वाला खेल होने के बावजूद अपने देश में क्रिकेट फ़ुटबाल के मुकाबले ज्यादा चलन में है तो उसका कारण सिर्फ़ यही समझ में आता है कि फ़ुटबाल में क्रिकेट जितनी समय की बर्बादी और निठल्लेपन की गुंजाइश नहीं बनती।
गेंद के पीछे भागते खिलाड़ी देखकर विदर्भ और अन्य इलाकों में पानी के टैंकर के पीछे भागती जनता की याद आती है। मैदान में भागते-भागते गिर जाने वाले खिलाड़ी गिरकर नाटक करते हुये तड़फ़ने लगने वाले खिलाड़ी देखकर लगता है कि दुनिया के सारे फ़ुटबालर अपने देश की नाट्य संस्थाओं के टॉपर होते हैं।
फ़ुटबालर फ़्री किक, पेनाल्टी किक हथियाने के लिये विरोधी खेमे में जितनी गिरा-गिरौव्वल करते हैं उसे देखकर कुर्सी हथियाने के लिये पतित होते जनप्रतिनिधियों की याद आती है। दूसरी टीम के खिलाड़ी को धकियाने वाले खिलाड़ी गिरे हुये को ही दोषी साबित करने की कोशिश करते हैं जैसे राजनीति में विरोधी को पीटकर उसी के खिलाफ़ पुलिस रिपोर्ट कराने का चलन है।
फ़ुटबाल में खेल कुल जमा 90 मिनट चलता है। सारी गिरा-गिरौव्वल डेढ घंट ही चलती लेकिन कुर्सी के लिये गिरौनी हरकतें साल-दर-साल जारी रहती हैं। सबसे बड़ी बात फ़ुटबाल के नाटक में भाषण नहीं होते। इसीलिये फ़ुटबाल मैदान के नाटक राजनीति की तरह बेहूदे, फ़ूहड़ और गलीज भरे नहीं लगते।
फ़ुटबाल के बारे में हमारी सिफ़र जैसी जानकारी और उड़ती-उजड़ती जैसी रुचि के बावजूद हमें यह खेल पसंद है तो सिर्फ़ इसलिये कि आजकल फ़ुटबाल मैचों के चलते फ़ूहड़ बयानों के घमासान में मंदी है। दुनिया की औसत खूबसूरत बढ गई लगती है। इसी समय लगता है कि काश दुनिया भर में खेले जाने वाली सारी फ़ुटबाली किकों को एक जगह इकट्ठा किया जा सकता और जहां कोई बेहूदे बयान देता, रिमोट किक अपने आप उसके मुंह में पड़ जाती। लेकिन चाहने मात्र से अगर कुछ होता तो अब तक दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी होती।
फ़िलहाल तो दुनिया कहीं नहीं पहुंची है। अपनी ही धुरी पर कदमताल कर रही है। उसकी ही गोद में फ़ुटबाल के अगले मैच की सीटी बज चुकी है। मैच की बात करते-करते मैच सही में शुरु हो गया। इससे यह लगता है बदलाव की बात करते रहना चाहिये। पता नहीं कब सही में कुछ बदल जाये। है कि नहीं?

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Saturday, June 09, 2018

तेल और तेल के दाम


तेल फिर चर्चा में हैं । हमेशा रहता है। तेल के दाम चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ते हैं। चन्द्रमा तो छोटा बड़ा होता है। लेकिन तेल के दाम को छोटा होना पसंद नहीं। कभी मजबूरी में घटना भी पड़ता है तो दोगुना बढ़कर हिसाब बराबर कर लेता है।
तेल का महत्व जगजाहिर है। तेल खुद को जलाकर दूसरों के लिए ऊर्जा पैदा करता है। वोट बैंक की तरह समझिये तेल को। किसी लोकतंत्र में दबे-कुचले , वंचित लोग चुनाव में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैसे ही जमीन में मीलों नीचे दबा- कुचला, काला-कलूटा , बदसूरत तेल जमीन पर आते ही महत्वपूर्ण हो जाता है। लोग इस पर कब्जे के लिए मारपीट करने लगते हैं।
वोट बैंक पर कब्जे के लिए अपने देश में भाषणबाजी, आरोप-प्रत्यारोप या फिर दंगा-फसाद आदि का चलन है। तेल पर कब्जे के लिए शांति का हल्ला मचाना पड़ता है। ताकतंवर , गुंडे टाइप के देश किसी तेल वाले देश में लोकतंत्र को खतरे में बता देते हैं। उस देश में घुसकर उसकी सरकार गिरा देते हैं। शांति की स्थापना के लिए अशांति मचा देते हैं।
तेल ऊर्जा पैदा करने के साथ ही घर्षण कम करता है। घर्षण कम होने से भी ऊर्जा बचती है। जहां तेल लग जाता है वहां घर्षण कम हो जाता है। कम मेहनत में ज्यादा काम हो जाता है। लोग इस वैज्ञानिक सत्य को इतना ज्यादा जानते हैं सारी ऊर्जा तेल लगाने में ही लगा देते हैं। मेहनत करने वाले टापते रह जाते हैं। तेल लगाने वाले बहुत आगे निकल जाते हैं।
हमारे एक मित्र को 'तेल लगाऊ' विधा में महारत हासिल है। वे अपने बॉस की कई दिन मिजाज पुर्सी करते रहे। असर न हुआ। तेल का असर न हुआ। मेहनत लगने लगी। हलकान हो गए। तेल लगाकर काम निकालने वाले का पसीना निकल आया। अंततः सीधे पूछ ही लिया एक दिन बॉस से -'साहब हम इतना तेल लगाते हैं, आप पर कुछ असर नहीं होता। '
पूछने का अंदाज भी तेल लगाऊ ही था। लेकिन बॉस उसमें मिली निरीहता और छद्म आकुलता से पसीज गए। बताया -'आप तेल लगाते कहाँ हैं, आप तो तेल बहाते हैं। बहुत तेल बर्बाद करते हैं। तेल दिन पर दिन मंहगा हो रहा है। आप इतना तेल लाते कहां से हैं। इतनी बर्बादी देखकर मेरा दिल दहल जाता है।'
तेल मध्यवर्गीय समाज की चौपाल है। मंहगाई की नपनी है तेल के दाम। पहले लोग गेंहू , चावल के दाम से मंहगाई नापते थे। आज तेल मंहगाई मीटर हो गया है। कभी तेल के दाम किसी की उम्र से जुड़ जाते हैं , कभी किसी और नाम से। सब नापें फेल हो जाती हैं। तेल के दाम कंचनमृग की तरह इधर-उधर होते रहते हैं।
लोग आज के समय में तेल के बढ़ते दामों से परेशान दिखते हैं। आज जब भी कोई परेशानी दिखती है तो उसे अपने अतीत के आईने में देखने का चलन है। सबको पता है कि रामायण , महाभारत काल में अपना समाज बहुत उन्नत था। इंटरनेट, सर्जरी सब था। फिर भी उस समय लड़ाई घोड़ों, हाथियों से हुई । ऐसा थोड़ी था कि उस उन्नत समाज में टैंक वगैरह न हों। लेकिन उस समय तेल के दाम इतने ज्यादा थे कि लोगों ने घोड़े-हाथियों से लड़ाई लड़ना उचित समझा।
देवता लोग इसीलिये पावरफुल हैं क्योंकि उनके सारे वाहन बिना तेल के चलते हैं। अपने परम भक्त गज को ग्राह से बचाने के लिए भगवान नंगे पांव पैदल भगे चले आये। समझ लीजिए कितना मंहगा रहा होगा उन दिनों।
कवि यहां कहना यह चाहता है कि तेल के अगर दाम बढ़ रहे है तो हमको दुखी नहीं होना चाहिए। हमको यह मनाना चाहिए कि यह और बढ़े। इतना बढ़े कि हमारी पहुंच से बाहर हो जाये। हमारा तेल से तलाक हो जाये। हम बिना तेल के रहना सीख लें। देवता हो जाएं।
लेकिन मनचाहा हमेशा होता कहां हैं। अभी - अभी खबर आई कि तेल के दाम तीस पैसे कम हो गए। हसम्भावित देवत्व से फिर दूर हो गए। मनुष्य योनि में ही रहने को अभिशप्त। तेल के दाम पर स्यापा करने को मजबूर। तेल लगाने , तेल बहाने वाले समाज में सांस लेना ही होगा।
लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि तेल के दाम फिर बढ़ेंगे। हचककर बढ़ेंगे। हम तेल से दूर होते जाएंगे। हम कीड़ो -मकोड़े की जिंदगी जीते हुए भी देवत्व के नजदीक पहुंचेंगे। देखते-देखते उल्लू, गरुड़, घोड़े, गधों पर चलने लगेंगे।
आपको यह बेवकूफी की बात लगती होगी। हमको भी लगती है। लेकिन जहां इतनी बेवकूफाना बातों के साथ जी रहे हैं, वहाँ एक और सही। बेवकूफियों को स्वीकारे बिना जीना असंभव है। तेल के दाम गए , तेल लेने। अभी तो अगली सांस ले ली जाए। इसके बाद जो होगा , देखा जाएगा।

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Wednesday, May 09, 2018

कास्टिंग काउच


पिछले दिनों कास्टिंग काउच पर बड़ी बयानबाजी हुई। कोई बोला -’यह सिनेमा में होता है।’
अगला बोला-’ कहां नहीं होता।’
हम इंतजार करते रहे कोई बोलेगा -’ कास्टिंग काउच तो महाभारत के समय से हो रहा है।’
अगर यह बयान आता तो पक्का यह भी बोलता-’ महाभारत हुआ ही कास्टिंग काउच के लिये था। हर महाभारत की जड़ में एक कास्टिंग काउच होता है।हर कास्टिंग काउच आगे चलकर महाभारत में बदलता है। ’
हमारे रामायण, महाभारत इस मामले में दादी, नानी की संदूकची टाइप हैं। कुछ भी सामान चाहिए, टटोलकर निकाल देंगी। दुनिया में आज किसी भी नई चीज की मुंहदिखाई हुई नहीं कि अपन रामायण, महाभारत से निकाल कर दिखा देते हैं -'जे तो हमारे पास भौत पहले से है।'
और ये जो इंटरनेट, फिन्टर्नेट, गूगल, फूगल, एटम बम, फेंटम बम , आधुनिकता, फाधुनिकता, विकास, फिकास के चोंचले हैं न वो हम कब के करके छोड़ चुके हमको खुद याद नहीं। आजकल हरामखोरी, बाबागिरी, काहिली, पिछड़ेपन का लुत्फ उठा रहे हैं।इसी में मन रमा हुआ है। मजा आ रहा है। जितना मजा लेते हैं उतना और लेने का मन करता है। ये दिल मांगे मोर टाइप हो रहा है।
बड़ी बात नहीं कि महाभारत में कास्टिंग काउच के बाद खोज पीछे चलते हुये आदम और हौव्वा तक जाती। कोई साबित कर देता कि जिस बगीचे में आदम और हौव्वा ने मिलकर सेब खाया था उसके मालिक ने हौव्वा से पेशकश की होगी-’ हमारे साथ भी सेव खाओ।’ शायद हौव्वा ने मना कर दिया होगा और बगीचे के मालिक ने उसे आदम के साथ निकाल बाहर किया हो।
लेकिन कोई बयान आये नहीं। देश के सारे बयानवीर जिन्ना पर बयान जारी कर रहे थे। जिन्ना पर बयान देते हुए एक तरह से पाकिस्तान को चिढ़ा रहे थे - 'तुम हमारे यहां आतंक वाद मचाओगे, हम तुम्हारे कायदे आजम को चुनाव की ड्यूटी पर लगवाएंगे। दमे के मरीज को चैनल,चैनल दौड़ाएंगे। अखबार, अखबार में छाप कर उसमें समोसा , कचौड़ी खाएंगे। फ्री फंड में कौड़ी का तीन बनाएंगे।
कास्टिंग काउच मतलब शरीर के बदले सुविधा। शरीर सुख देव, सुविधा साधन लेव।
इस लिहाज से देखा जाए तो पूरी दुनिया ही कास्टिंग काउच है। साधन संपन्न, साधन हीन से मजे ले रहा है। बदले में उसको कुछ साधन थमा दे रहा है। अविकसित देश विकसित देशों के बिस्तर सरीखे हैं। वो पिछड़े देशों का बिस्तरों की तरह उपयोग करते हैं, बदले में कुछ ग्रांट, कुछ सुविधा , कुछ कूड़ा तकनीक थमा देते हैं। पिछड़े देश विकसित देशों की तकनीक और बाजार के कूड़े दान हैं।
पूरी दुनिया की राजनीति कास्टिंग काउच ही तो है। जनता को नेता जनसेवक का बाना बनकर पटाता है। सुविधा का लालच देकर बहलाता है, फुसलाता है। वोट का मजा लेकर आगे बढ़ जाता है। अब तो वह इस काम को बेहतर तरीके से अंजाम देने के अपने साथ गुर्गे भी लाता है।
साहित्य और कला के क्षेत्र में भी खूब कास्टिंग काऊच दिखती है। कुछ कुछ सम्मान समारोह तो आपसी सहमति वाले 'कास्टिंग काउच' सरीखे नजर आते हैं। जमे हुए लोग नयों को जमाते हैं। उनसे फायदा लेते हैं, उनको आगे बढाते हैं। दुरुस्त आंखों वाले धृतराष्ट बन जाते हैं। समर्थ, साधन संपन्न चेलों को अपाहिजों की तरह गोद में लेकर ईनाम के मंच पर चढ़ाते हैं। बदले में मंचों की अध्यक्षी, विदेश यात्रा और पथ प्रदर्शक का रुतबा पाते हैं मुक्तिबोध के हिसाब से व्यभिचार का बिस्तर बन जाते हैं।
'उदरम्भरि अनात्म बन गए
भूतों की शादी में कनात से तन गए
किसी व्यभिचार के बन गए बिस्तर।'
मुक्तिबोध की यह कविता बहुत गड़बड़ करती है। हमसे ही सवाल पूछने लगती है:
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया?
हम कविता को क्या जबाब दें समझ नहीं आ रहा। इसलिए फूट लेना सबसे अच्छा। वैसे भी मीडिया मंच से 'कास्टिंग काउच' अब सिमट गया है। जिन्ना के बाद नया तूफान आ रहा है। इसके बाद चुनाव का हल्ला है। सब से बच के रहना है। बचे रहे तो सब होता रहेगा।
सामने से सूरज भाई अपनी किरणों को दुलराते हुए हमसे मजे ले रहे हैं- ' देखो कास्टिंग काउच पर लिख रहा है। जिसके बारे में कुछ पता नहीं उसका विशेषज्ञ बना फिर रहा है।'
हमारे पास सूरज भाई की बात का कोई जबाब नहीं है। हम तो उनको 100 करोड़ के मानहानि का नोटिस भी नहीं दे सकते।
इसलिए मजबूरी में मुस्करा रहे हैं।
लेकिन आप मजे में मुस्कराइए। 'कास्टिंग काउच' के किस्से भूल जाइए। जिंदगी के साथ सुर मिलाकर सुरीली/बेसुरी आवाज में ही सही गुनगुनाइए:
'छोरेंगे दम मगर
तेरा साथ न छोरेंगे।'

Wednesday, April 25, 2018

एटीएम में नकदी


हल्ला मचा हुआ है कि एटीम से पैसा फ़रार है। जैसे ही खबर दिमाग तक पहुंची उसने दिल से पूछा -’बताओ इस खबर को सच मानें कि अफ़वाह? इसे दुख के खाने में धरें कि आनन्द महल में बैठायें?’
आम तौर पर बेवकूफ़ी की बात कहने के लिये बदनाम दिल ने समझाइश दी -’ ’ आज के समय में सच और अफ़वाह में कोई अंतर नहीं रहा । अफ़वाह कब सच में बदल में जाये और सच कब अफ़वाह साबित हो जाये इसे कोई जानता नहीं। इसलिये दोनों ही मानो इसे। जैसा मौका आये वैसा उपयोग करे।’
’सच और अफ़वाह एक कैसे हो सकते हैं भाई !’ - दिमाग ने तार्किक होने की कोशिश करते हुये पूछा।
अरे भाई जब गुंडे-बदमाश- माफ़िया लोग जनता की सेवा कर सकते हैं तो सच और अफ़वाह एक क्यों नहीं हो सकते। सच आखिर क्या है- ’डंके की चोट पर बोला जाने वाला झूठ ही तो। जो झूठ वायरल हो जाता है वही तो सच का बाप कहलाता है।’
हम इस सिरीमान दिल की ऊंची बात छोड़कर एटीएम से बतियाने लगे। उससे पूछा -’ ये नोट आपके पास टिकते क्यों नहीं हैं ? कहां चले जाते हैं?’
’आजकल जिसे देखो उसे बाजार पहुंचने का चस्का लगा है। हर आदमी बाजार पहुंचना चाहता है। बिकता चाहता है। फ़िर बाजार तो नोट का मायका होता है। जहां मौका मिलता है उछलते हुये पहुंच जाता है बाजार।
’पहले और आजकल के नोट के व्यवहार मेंं कोई अंतर आया है क्या?’ - हमने एटीएम से पूछा।
अरे पहले के नोट बड़े संस्कारी टाइप होते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन साथ रहते थे। आजकल के नोटों की तो पूछो ही मती। इनकी हरकतें देखकर लगता है सही में जमाना बड़ा खराब आ गया है। आज के नोट बहुत मनचले टाइप के होते हैं। जहां एटीएम में आये नहीं बाहर भागने के लिये उतावले रहते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है नकदी नकदी न होकर जेल आया कोई वीआईपी हो जिसकी जेल बाद में होती है, बेल पहले होती है। आजकल का पैसा इतना मनचला होता है कि आते भी जाने का जुगाड़ खोजता है।
’लेकिन अगर एटीएम तो हमेशा नकदी निकालने के लिये होते हैं। नोट अगर एटीएम में न रहे तो एटीएम का उपयोग क्या ?’ -हमने एटीएम से पूछा।
आप तो समझदारों की तरह सहज बेवकूफ़ी की बात कर रहे हैं। आज के समय में जिसका जो काम होता है वह करता कहां है? अपना काम करना आजकल के फ़ैशन के खिलाफ़ है। फ़िर एटीएम से आप कैसे आशा करते हैं कि उसमें पैसे रहेंगे?
’अच्छा पैसे जब एटीएम में रहते नहीं तो कैसा लगता है आपको? ’ -हमने एटीएम जी से पूछा।
लगता कैसा है कैसे बतायें? आप ऐसा समझ लो कि अगर बगल के एटीएम में पैसे हुये और अपन खाली हुये तो ऐसा लगता है जैसे किसी किसी विधायक को मंत्री पद मिलने पर उसके साथ के विधायक को लगता होगा। जब बगल वाले में भी पैसे नहीं होते तो ऐसा लगता है जैसे किसी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों को महसूस होता है।
हम एटीएम से बतिया ही रहे थे कि किसी ने अपना कार्ड उसके मुंह में ठूंस दिया। एटीएम का मुंह बंद हो गया। मन किया कि ठहरकर देख लें कि उसका पैसा निकला कि नहीं लेकिन फ़िर देखा नहीं। देखने में सच और अफ़वाह में कोई एक सही साबित हो जाता। हमारे जीने के सहारों में से एक कम हो जाता। हमारी ताकत आधी हो जाती। अभी तो सच भयावह लगता है तो उसको अफ़वाह मान लेते हैं। अफ़वाह मन को सुकून देती है तो उसको सच मानकर खुश हो लेते हैं। दोनों में से कोई एक भी न रहा तो बवाल हो जायेगा। जीना और मुश्किल हो जायेगा। है न !

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Monday, October 02, 2017

बापू


हिन्दुस्तान में ‘बापू’ घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों को कहा जाता है। लेकिन गांधी जी को ’बापू’ की उपाधि आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन की तरह 49 साल की उमर में ही मिल गयी जब उन्होंने चम्पारन सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
किसी को बापू कहने मतलब यही है कि अब उसको चुपचाप सब काम-धाम छोड़ छाड़ देना चाहिये। केवल जो मिले उसी में गुजारा करना चाहिये। इज्जत से रहना सीख लेना चाहिये। बेइज्जती भी होय तो उसको इज्जत समझकर ग्रहण करना चाहिये। भगवत भजन करने लगना चाहिये। लोक में रहते हुये परलोक सुधारने के लिये कोशिश करना चाहिये। मौके-बेमौके आंय-बांय-सांय बकने लगना चाहिये।
लेकिन गांधी जी देश-दुनिया देखे हुये थे। इसलिये वे सिर्फ़ ’बापू’ की उपाधि से संतुष्ट न हुये। कर्म करते रहे और उनके कारण ही उनको महात्मा, संत, राष्ट्रपिता, अधनंगा फ़कीर और न जाने कितनी उपाधियां मिलीं। गांधीजी का केवल ’बापू’ उपाधि के भरोसे न रहना उसी तरह था जिस तरह सफ़ल उद्योगपति एक साथ पचीसों उद्यम लगाते हैं जिससे कि एक डूबे तो दूसरे बचें रहें।
असल में गांधी जी दूरदर्शी थे। जानते थे कि केवल ’बापू’ की उपाधि के भरोसे रहे तो उनको बापू कहने वाले उनके हाल वैसे ही करेंगे जैसे बुढौती में ’रागदरबारी’ उपन्यास में छोटे पहलवान अपने बाप कुसहर प्रसाद के करते हैं।
राग दरबारी के छोटे पहलवान अपने बाप को कुल-परम्परा के हिसाब से आये दिन लठियाते रहते थे। ऐसी ही एक लठियाव के बाद जब कुसहरप्रसाद पंचायत में छोटे पहलवान के खिलाफ़ शिकायत दाखिल करते हैं। पंच लोग कुसहरप्रसाद के चाल-चलन पर टिप्पणी करते हुये उनसे मजे लेते हैं तो छोटे पहलवान अपने खुद के द्वारा लठियाये गये बाप के समर्थन में अदालत से मोर्चा लेते हैं और कहते हैं:
"तुम मुंह लिये बैठे रहो बापू, मैं सब जानता हूं। मैं खुद कल शहर जाऊंगा और इन पर मुकदमा कायम कर दूंगा। इन्होंने तुम्हें भरी सभा में न जाने क्या-क्या कहा है। एक-एक से सवा लाख की कोठी में मूंज न कुटवाऊं तो तो समझ लेना तुम्हारे पेशाब से पैदा नहीं हुआ।"
कुसहर प्रसाद और छोटे पहलवान का किस्सा आधी सदी से ज्यादा पुराना है। जितना पुराना है उतना ही शाश्वत भी। बापूओं की इज्जत और बेइज्जती उनकी सन्तानों की पर मर्जी पर निर्भर करती है। बापुओं की इज्जत (और बेइज्जती की भी) का सर्वाधिकार सन्तानों के हाथ में सुरक्षित रहता है। रागदरबारी में भी शनीचर छोटे पहलवान द्वारा अपने बाप कुसहर प्रसाद की लाठियों द्वारा इज्जत आफ़जाई पर बयान जारी करते हुये हैं:
“इन्हें और कौन मारेगा? ये छोटे पहलवान के बाप हैं। उसे छोड़कर किस साले में दम है कि इनको हाथ लगा दे?”
अपने बापू के बारे में भी यही बात है। बापू जयन्ती के मौके पर जब पूरी दुनिया में गांधी जयन्ती मनाई जा रही है, अहिंसा दिवस मन रहा है तब अपने देश में कुछ लोग अपने बापू के बारें तमाम सुनी-सुनाई बातें बातें उद्घाटित करते हुये अपनी बहादुरी का झण्डा फ़हरा रहे हैं। गांधी जी के विराट व्यक्तित्व में कमी खोजकर उनके चेहरे पर जो खुशी दीखती है उसकी तुलना कूड़े के ढेर में कोई काम का कूड़ा पा जाने वाले के चेहरे खुशी जैसी लगती है।
बापू के बारे में और कुछ जानकारी पाने के लिये गूगलियाया तो आशाराम बापू सबसे पहले हाजिर हो गये। आशाराम बापू की खबरों ने पूरे पेज पर कब्जा किया हुआ है।
आशाराम बापू पर कुछ आगे लिखें तब तक फ़िर रागदरबारी का छोटे पहलवान का अपने बापू पर बयान खुल गया:
“यह बुढ्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं, कहते जीभ गंधाती है।“
किताब पलट कर हम और कुछ सोचें तब तक रेडियो पर भजन बजने लगा:
" वैष्णव जन तो तेने कहिये
जे पीर पराई जाने रे "
भजन सुनते ही हम ’बापू’ (कौन वाले ये मती पूछिये) के प्रति आदर भाव से फ़ुल हो गये।

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Saturday, July 08, 2017

जबाबी तुकबंदियां

1. ज़िक्र है फ़िक्र है हादसा है, इश्क़ इसके सिवा और क्या है।
और क्या चाहिए ज़िंदगी में, ख़्वाब हैं दोस्त हैं फलसफ़ा है।
वो मेरा दोस्त पक्का है ये पक्का हुआ अब,
कि उसकी लिस्ट से नाम अपना सफा है।
पटक के मारा नहीं दोस्त को चौराहे पर मैंने,
इस जरा बात पर मेरा दोस्त मुझसे खफ़ा है !
2. लोग सच का बुरा मानते हैं
झूठ की चारसूं वाहवा है।
Sushil Siddharth
·
सच का भाव फ़िर उचक गया भईया,
झूठ के चेहरा फ़क्क पड़ि गवा है।
3. मैं उसे छोड़ना चाहता हूं
आज वह भी यही चाहता है।
छोड़ने को तो मैं आज क्या अभी छोड़ दूं
लेकिन फ़िर बाद में बहुत जोर से डांटता है।
4. किताब छप गयी और देखो वो भी बन गया लेखक
प्रकाशक से दोस्ती रखने का भी अपना नफ़ा है ।
दाबे बैठा है रॉयल्टी जिसे प्रकाशक बना दिया हमने
मासूमियत से पूछता है, यार मेरा किसी से खफ़ा है?
5. तुम्हारी बातको मानू न मानू तुमसे मतलब
तुम गर खफा हो तो क्या इसमें मुझे नफा है
बहुत देर इधर-उधर की हांकता रहा अगला
हड़काया गया तो सर पर पैर रख हुआ दफ़ा है।
6. यही तो जान है हमारी दोस्ती में
ज़िन्दगी के हर ग़म अपने दफा है
गम आये तो साथ आयीं खूब खुशियां भी,
जिन्दगी का यही तो हसीन १. फ़लसफ़ा है।

Tuesday, June 13, 2017

टॉप किया तो डरना क्या?

लड़के ने अभी परीक्षायें दी हैं। रिजल्ट आने में समय है। लेकिन जिस तरह चुनाव में  हर पार्टी अपने बहुमत के प्रति आश्वस्त रहती है उसी तरह बालक को भी इत्मिनान है कि टॉप उसी को करना है। इसी इत्मिनान के भरोसे होने वाले टॉपर ने एडवांस में प्रेस कान्फ़्रेन्स का इंतजाम कर लिया है। बिना विलम्ब के आइये आपको टॉपर की प्रेस कान्फ़्रेन्स में ले चलते हैं:

सवाल 1: आपको इम्तहान में टॉप करने की प्रेरणा कहां से मिली?

जबाब:  मैं बचपन से ही टॉप करना चाहता था। हमेशा लगता है कि बस टॉप करना है। टॉप करना है। बाद में लोगों से सुना भी कि किसी भी फ़ील्ड में रहो, बस टॉप पर रहो। टॉपर की बरक्कत अच्छी होती है। लोग टॉपर को ही पूछते हैं। देखिये हर फ़ील्ड में यह हो रहा है। इसलिये हम टॉप करना चाहते थे और किये भी। कह के किये कोई चोरी छिपे थोड़ी किये।

सवाल: आपने पहले से अपने टॉप करने की घोषणा कैसे कर दी थी? आपको इतना आत्मविश्वास कैसे है अपने टॉप करने का?

जबाब: अगर आपको फ़िल्मों में जरा सा भी रुचि है तो आप  देखे भले न हों लेकिन  गैंग ऑफ़ वासेपुरपिक्चर का नाम जरूर सुनें होंगे। उसमें हीरो कहता है - कह के लेंगे।लिया भी। तबसे हमने भी सोच लिया था कि जब टॉप करेंगे तब कहकर करेंगे। इसीलिये हमने भी सोच लिया था कि जब करेंगे टॉप तब डंके की चोट पर करेंगे। चोरी छिपे नहीं करेंगे। इसके लिये हमने गाना भी बनाया है- ’टॉप किया तो डरना क्या?’ सुनायेंगे कभी। 


सवाल: टॉप करने के लिये आपने तैयारी कैसे की? कितने घंटे पढते थे आप?

जबाब: आप लोग पुराने जमाने के लोगों की तरह टॉप करने को पढाई से जोड़ते हैं। टॉप करने के नये तरीकों के बारे में आप लोगों को जानकारी ही नहीं है। आपको बताते हैं कि टॉप करने के मोटा-मोटी दो तरीके हैं- एक पढकर टॉप करना दूसरा बिना पढे टॉप करना। पढकर  टॉप करने वाले टॉप करने के बाद बस टापते ही रह जाते हैं। ज्यादा आगे नहीं बढ पाते हैं। जबकि बिना पढे टॉप करने वाले बहुत आगे जाते हैं। पढाकू टॉपर केवल किताब, कोचिंग, नोट्स, कुंजी और भगवान की पूजा के भरोसे रहता है। उसका प्रयास एकल प्रयास होता है। इसीलिये  भी उसके टॉप करने की कोई गारन्टी नहीं होती। जबकि बिना पढे टॉप करने वाले लोग सामूहिक प्रयासों से टॉप करते हैं। पेपर आउट करवाने, इम्तहान में नकल करवाना, कापी जांचने में सेटिंग, रिजल्ट बनवाने में जुगाड सब जगह इंतजाम करना होता है।  सामूहिकता का अद्भुत  सौंदर्य होता है बेपढे का टॉप करना। ’सबका साथ, सबका विकासका उदात्त रूप होता है बिना पढे टॉप करना। इस तरीके में सबसे अच्छी बात है कि टॉप करने के लिये पढना जरूरी नहीं होता। बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री बनना  जैसा ही समझिये है-  बिना पढे टॉप करना।

सवाल: फ़िर भी कुछ तो आना चाहिये जिसमें टॉप किया आपने। 

जबाब:  जैसे इलाके के विकास के नाम पर चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि अपने विकास में उलझ जाने के चक्कर में इलाके के विकास पर ध्यान नहीं दे पाते उसी तरह हम भी टॉप करने की योजना पर अमल में ही इतना बुरी तरह अरझे रहे कि कुछ पढाई ही नहीं कर पाये। नेक्स्ट सवाल प्लीज।

सवाल: आपको अपने विषय तो पता होंगे। साइंस में टॉप किये हैं कि आर्ट्स में? कुछ तो बताइये।

जबाब: विषय जानने के लिये आपको हमारी मार्कशीट आने का इंतजार करना होगा। हमको शिक्षा व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। जिन विषयों में वह बतायेगा कि उसमें टॉप किये हैं हम मान लेंगे। उनका बयान हमारा बयान होगा। अगला सवाल।

सवाल: बिना कुछ पढे-लिखे, बिना अपने विषय की जानकारी के टॉप करने का हौसला आपको कैसे आया? आपको डर नहीं लगा कि पोल खुलने पर पकड़े जायेंगे जैसे पुराने टॉपर पकड़े गये हैं?

जबाब: आपने एक पिक्चर देखी होगी- गजनी। उसमें हीरो आमिर खान थोड़ी-थोड़ी देर में पुराना सब कुछ भूल जाता है। गजनी का आमिर खान हमारी प्रेरणा बना। हमारा  ’गजनी अभ्यास’ इतना तगड़ा हो गया है कि अपना नाम तक भूल जाते हैं। जितना बार लोग पूछते हैं, अलग नाम बताते हैं। कहने का मतलब कि हम गजनी घराने के टॉपर हैं। 


सवाल: लेकिन टॉप करने के लिये आपने गजनी माडल का ही चुनाव क्यों किया?
जबाब: वो क्या है न कि  ’गजनी माडल’ सेफ़ है। दुनिया में जित्ते भी धतकर्मी हैं,  सब ”गजनी माडल’ अपनाते  हैं। दंगा करवाकर भूल जाते हैं। घपले करके याद नहीं करते। वादे करके भूल जाते हैं। सपना दिखाकर गोल हो जाते हैं। हम भी उसी गजनी घराने के टॉपर हैं। जो पढे सब भूल गये।  दुबारा याद ही नहीं आया। अब अगर गजनी की तर्ज पर कुछ याद नहीं आ रहा तो इसमें हमारा क्या दोष? हमारी न सही लेकिन एक हिट फ़िल्म की इज्जत तो करो। जो हमको पकड़ने आयेगा उससे कहेंगे - जाओ पहले गजनी पिक्चर देखकर आओ। पैसे न हों तो हमसे ले जाओ। पिक्चर देखने के बाद अपना आइडिया बताओ।’ 

सवाल: फ़िर भी अगर पुलिस आपको पकड़ने पर आमादा ही हो गयी तो क्या करेंगे आप?
जबाब: हम फ़ौरन  एंग्री एंग मैन’  हो जायेंगे। हल्ला मचायेंगे - ’हमको पकड़ने से पहले उस उस मास्टर को पकड़ के लाओ जिसने हमको नकल करवाया। उस स्कूल प्रबंधक को पकड़ के लाओ जिसने हमको टॉप करने के झांसे में फ़ंसाया। उस मंत्री को पकड़ के लाओ जिसने शिक्षा विभाग को गर्त में गिराया। पिछले टॉपर को पकड़कर लाओ। उसको पकड़कर लाओ जिसने हमें सिखाया कि टॉप पर रहे बिना जिन्दगी बेकार है, शिक्षा व्यवस्था को गर्दनियाओ जिसने टॉपर करने को इतना जरूरी बना दिया कि लडका लोग सब भूल जाता है।’............ इसके बाद जो करना होगा पुलिस करेगी। हम अकेले केतना देर चिल्ल्लायेंगे।

सवाल: पकड़े जाने के बाद फ़िर क्या करेंगे?
जबाब: करेंगे क्या? वही करेंगे जो बाकी जेल जाने वाले करते हैं। छूटकर आयेंगे तो सीधे पालिटिक्स में कूद जायेंगे। अपनी गिरफ़्तारी को विरोधियों की साजिश बतायेंगे। न्यायपालिका पर भरोसा जतायेंगे। अगला चुनाव लड़ जायेंगे। जीते तो मंत्री पद हथियायेंगे। टॉप पर जायेंगे। 

सवाल: और अगर हार गये तो?
जबाब: हार गये तो जनता जनार्दन का निर्णय सर माथे पर धरकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिये जुट जायेंगे। स्कूल बनवायेंगे। प्रबंधक बन जायेंगे। जैसे हम टॉप किये वैसे लोगों को टॉप करना सिखायेंगे। गांव-जवार का नाम आगे बढायेंगे।

इंटरव्यू निपटने के बाद जब रिजल्ट आया तो बालक का नाम टॉपर की लिस्ट में नहीं था। पता चला परीक्षा  में धांधली हो गयी। रिजल्ट में पैसा चल गया। एन टाइम पर मेरिट लिस्ट बदल गयी।  जितने पैसे में बालक से सौदा तय हुआ था टॉप कराने का उससे ज्यादा देकर कोई दूसरा टॉप कर गया। बालक का नाम मेरिट लिस्ट में नीचे आ गया है। बालक दुखी है।  शिक्षा व्यवस्था के माफ़ियाओं से भरोसा उठ गया। न्यायपालिका पर भरोसा करने का सपना टूट गया है। 

हम बालक के दुख में दुखी हो गये। एक बार तो मन किया उसको नीरज की कविता सुना दें- ’कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता’। लेकिन फ़िर बालक के चेहरे पर पसरे आक्रोश को देखकर मन मार लिये। 

यही सोचकर रह गये कि  माफ़िया लोग तक अपनी बात से पलट जा रहे हैं। जिसको टॉप कराने की बात तय हुई थी उसको छोड़ किसी दूसरे को टॉप करा रहे हैं।  समाज में मूल्यों का बहुत तेजी से क्षरण हो रहा है। देश बहुत तेजी से रसातल में जा रहा है। 

Monday, June 12, 2017

खेती


खेती दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय है। व्यवसाय बोले तो पेट पालने का तरीका। सबसे ज्यादा लोग खेती करके पेट पालते हैं। गरीब देशों में 75 % तक लोग खेती करते हैं। जितने ज्यादा किसान उतना गरीब देश। भारत एक कृषि प्रधान देश है। मतलब गरीब देश है। गरीबी से छुटकारा पाना है तो किसानी छोड़नी होगी।

किसानों की संख्या कम करने के लिये तेजी से काम हो रहा है। किसानों की संख्या कम करने के उपाय किये जा रहे हैं। उन पर गोली चलवाई जा रही है। किसान भी आत्महत्या करते हुये इसमें सहयोग कर रहे हैं। लेकिन स्पीड कम है इस उपाय में। वैसे भी हाय-हत्या से कोई मामला हल नहीं होता इसलिये दीगर उपाय भी सोचे जा रहे हैं। ऐसे उपाय जिससे खेती दिन पर दिन मुश्किल होती जाये। किसान झल्लाकर खेती छोड़कर दूसरा व्यवसाय थाम ले। शहर में मजदूरी करने लगे। कारखानों में सस्ते में खटने लगे। बाजार को सस्ते मजदूर मिलेंगे। किसान अपनी ही जमीन पर बने कारखानों में दिहाड़ी पर काम करेंगे। मालिक नौकर हो जायेगा। देश खुशहाल हो जायेगा।


खेती के लिये बीज न मिलना, सिचाई के लिये पानी न मिलना, फ़सल पैदा होने के बाद उसका दाम न मिलना, इसके बाद जिन्दा रहने के लिये अन्नदाता को अन्न न मिलना जैसे उपाय अमल में लाये जा रहे हैं। गांव के लोगों को गंवार कहते हुये खेती छोड़ने के लिये उत्साहित किया जाता है। यह उपाय इतना कारगर है गांव से आकर शहर में बसा बेटा शहर में अपने बाप को पहचानने से मना कर देता है।


खेती सबसे पुराना व्यवसाय है। धंधों में सबसे बुजुर्ग। नये धंधों के सामने इस बुजुर्ग धंधे की कोई इज्जत नहीं है। मार्गदर्शक धंधा हो गया है खेती। खेती से जुड़े लोग मौका मिलते ही इसको नमस्ते करते जा रहे हैं। 

  
खेती के हाल अब बेहाल हैं। गांवों पर पिक्चरें नहीं बनती। हीरोइनें अब खेतों में काम नहीं करती। हीरो लोग खेत में गाना नहीं गाते। गांवों में प्रेम करना मुश्किल काम हो गया। सारी प्रेम-मोहब्बत शहरों में शिफ़्ट हो गयी है। इसलिये भी खेती में लोगों की रुचि कम हो गयी है।

जमीन पर होने वाली खेती से ध्यान हटाने के लिये दुनिया भर में तमाम दूसरी  तरह की खेतियों का चलन भी शुरु किया गया है। आश्वासनों की खेती करने वाले लोग सरकारें बना रहे हैं। पैसे की खेती कर रहे हैं। सपनों की खेती करने वाले फ़र्जी क्रांति करते हुये मालामाल हो रहे हैं। नकल की खेती वाले जाहिल शिक्षा व्यवसाय पर कब्जा किये हैं।  लहसुन, प्याज तक से परहेज करने वाले मीट की खेती में छाये हुये हैं। इनामों की खेती वाले साहित्यिक हलकों के लंबरदार हैं। हथियारों की खेती वाले लोग विश्व में शान्ति व्यवस्था का ठेका हथियाये हुये हैं। दुनिया भर में कत्लेआम मचाते हुये शांति बहाली में जुटे हुये हैं।

कहने का मतलब कि दुनिया में असली खेती भाव गिर रहे हैं। दूसरी  वर्जुअल खेतियां लहलहा रही है। छ्द्म का जमाना है। इसी से कमाना है। आप तो खुद सब समझते हैं। समझदार हैं। समझदार को कुछ क्या बताना ?






  






Wednesday, May 31, 2017

मानहानि

आजकल मानहानि का दौर चल रहा है। बेइज्जतियों की मारकाट मची हुई है। जिसे देखो वही लपका जा रहा है अदालत की तरफ़। मानहानि का दावा पेश करने के लिये। अदालतों की भी नाक में दम हुआ पड़ा है। एक से एक चिरकुट लोग अपनी मानहानि का मुकदमा धांसे पड़े हैं अदालतों में। हाल यह कि जो जितना बड़ा चिरकुट उसका उतना ही बड़ा मानहानि का दावा। मतलब मानहानि के दावा चिरकुटई की के समानुपाती है।


अदालतें हलकान हैं। व्यस्तता के आंसू रो रही हैं। उनका भी मन करता होगा -’कोई अदालत हो जहां वे अपनी इस बेइज्जती के खिलाफ़ दावा कर सकें।’


मानहानि पर कुछ कहने से पहले इसका मतलब तय कर लिया जाये। मानहानि से मोटा मतलब निकलता है कि कोई व्यक्ति जैसा खुद को समझता है , कोई दूसरा व्यक्ति उसको उससे अलग बताये। उदाहरण के लिये कोई अपने को ईमानदार समझता है। समाज में भी अपनी ईमानदारी का भौकाल बनाये हुये है।  ऐसे किसी व्यक्ति को कोई सरेआम बेईमान कह दे।  लाखों, करोड़ों के घपले का इल्जाम लगा दे। अगला इस इल्जाम को बजाय दिल्लगी के गम्भीरता से ग्रहण कर ले। फ़िर हल्ला मचा दे-’हमारी मानहानि हो गयी।’ अदालत में मानहानि का दावा करने की धमकी दे दे। इसके बाद मानहानि का दावा कर भी दे। बस शुरु हो गया मानहानि का मीटर। 

दुनिया में जित्ती भी बड़े काम हुये सबमें मानहानि का योगदान है। सत्यनारायण की कथा में देवता को लगा उसकी मानहानि हुई। देवता  रूठ  गये। दुखवर्षा कर दी भक्त पर। जजमान ने उनको पटाया। मान दिया। देवता खुश। ऋषिगण जहां अपमान महसूस हुआ नहीं कि  फ़ौरन कमंडल से पानी छिड़ककर शाप जारी कर देते थे। पुराने-जमाने में राजा-महाराजाओं को जैसे ही मानहानि की भनक मिली, वैसे ही हमले का पिपिहरी  बजा देते थे। बदनामी से बरबादी भली। भले ही इतिहास की किताब में भी जगह न मिले लेकिन मानहानि के महल में रहना गवारा नहीं।


मानहानि के इतने प्रकार के होते हैं कि उनकों शब्दों में बयान करना मुश्किल है।’अविगत गति कछु कहत न आवे’ टाइप मामला होता है। गणित में कहा जाये तो मानहानि के प्रकारों की संख्या दुनिया के कुल लफ़ड़ों की संख्या से एक अधिक होती है। कहने का मतलब कि अगर संसार में अगर 100 तरह के लफ़ड़े हैं तो मानहानि के प्रकार 101 होंगे। सूत्र रूप में कहें तो Y=X+1 (यहां X= दुनिया के कुल लफ़ड़े, Y=मानहानि के प्रकार)


बेइज्जती के प्रकारों की गणित के पायजामें में घुसेड़ने के बाद आइये आपको मानहानि के कुछ पहलू दिखाते हैं। समझने में आसानी होगी आपको।


मानहानि जो है न वह लक्ष्मी की तरह चंचला होती है। कब किस रूप में हो जाये पता नहीं चलता। सीधी मानहानि का उदाहरण हमने आपको ऊपर बताया जिसमें किसी ईमानदार को बेईमान बता दिया जाये। उल्टी मानहानि भी होती है। जैसे किसी अरबों के घोटालेबाज को टिकियाचोर बताया जाये। पूरी दुनिया में जिसके हरामीपने का डंका पिटता हो उसको गली मोहल्ले के छिछोरेबाज की तरह बताया जाये।  मानवमांस भक्षी ईदी अमीन की तुलना खेल-खेल में एक-दूसरे को नोच लेने वाले बच्चों से की जाये।


साहित्यिक हलके में भी उलटी मानहानि के नमूने मिल सकते हैं। अपने लेखन की खुद ही प्रसंशा करने वाले को कवि भूषण के समान बताया जाये। विसंगति की शिकायत करने पर समझाइश दी जाये -’अरे भाई, भूषण जी तो सिर्फ़ कवि थे। आप तो भूषण और शिवाजी/छत्रसाल के कम्बो पैकेज हो।’ अगला इतने पर मान जायेगा। न माने तो उसको उसकी विधा का देवता घोषित करके गेंदे की माला पहना दी जाये। अगला बेचारा ’स्तुति-स्नेह-सरोवर’ में छप्पछैंया करते आशीष देने के अलावा और कुछ कर भी न पायेगा।


आजकल पैसे ने मानहानि के पाले में कबड्डी खेलना शुरु कर दिया है। करोड़ों के दावे होते देख बाजार मानहानि के हलके में प्रवेश करने के लिये  अंगड़ाई ले रहा है। बड़ी बात नहीं कल को बाजार में मानहानि कराने और उससे निपटने के पैकेज आ जायें। बाजार में बेइज्जती करवाने और उसके बाद मानहानि का दावा पेश करने की इस्कीमें चलने लगें। मेडिको-लीगल केस की तर्ज पर मानहानि-लीगल वकीलों के अलग बस्ते खुल जायें। बाजार की कुछ इस्कीमें इस तरह की हो सकती हैं:

१.       घर बैठे बेइज्जती करायें। मानहानि का दावा करें। तुरंत भुगतान पायें।
२.       बिना बेइज्जती के मानहानि दावा करें। भुगतान दावा पाने के बाद।
३.       मनचाही मानहानि करायें। भुगतान किस्तों में। कैसलेस सुविधा उपलब्ध।
४.       बेइज्जती में इज्जत का एहसास। आपके घर के एकदम पास। सुविधायें झकास।
५.       बिना पिटे पिटने का एहसास पायें। मानहानि का दावे के लिये प्रमाण पायें।

मानहानि का बाजार चल निकलने के बाद तरह-तरह की मानहानि और उससे निपटने के तरीके बाजार में चल निकलेंगे। तरह-तरह  से मानहानि करने के तरीके बताये जायेंगे जिससे आदमी की इज्जत भी उतर जाये और अगला प्रमाणित भी न कर पाये कि उसकी बेइज्जती हुई है।  कुछ-कुछ गांधी डिग्री वाली पुलिस की पिटाई की तरह जिसमें पिटने वाला चोट को जिन्दगी भर महसूस भले करे लेकिन साबित नहीं कर सकता कि वह पुलिस-प्रेम का शिकार हुआ है।


आप किसी ख्यातनाम लेखक से कह सकते हैं जित्ता खराब आप लिखते हैं उससे ज्यादा खराब तो मैं अपने बायें हाथ से लिख सकता हूं। लेखक अगर इसको अपनी मानहानि समझता है और अदालत में घसीटने की धमकी देता है तो आप उसको समझा सकते हैं कि -’ आपके समझने में गलती हुई। मैं तो आपके लेखन की तारीफ़ कर रहा था। मैं बायें हाथ से लिखता हूं। मेरे कहने का मतलब यह था कि मैं कितना भी अच्छा लिखूं लूं पर वह आपके लेखन से खराब ही होगा।’  
मानहानि महसूस होने पर होती है। मानो तो मानहानि। वर्ना आम बात। वो सेल्स मैन वाला किस्सा आपने सुना होगा। एक सेल्समैन ने कुछ दिन की सेल्समैनी के बाद त्यागपत्र दिया। उससे दुकान मालिक ने नौकरी छोड़ने का कारण पूछा-’ क्या बात है? तन्ख्वाह कम है? कोई शिकायत है?’ नौकरी छोड़ने वाले ने कहा-’कोई शिकायत या पैसे की बात नहीं लेकिन सेल्समैनी में ग्राहक जिस तरह बात करते हैं उससे बेड़ी बेइज्जती महसूस होती है।’ मालिक ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा-’ यार ये तुमने नई बात बताई। हमने भी जिन्दगी भर सेल्समैनी की है। हमको लोगों ने गालियां दी, दफ़ा हो जाने के लिये, पीटने की धमकी दी, कुछ ने अमल भी किया लेकिन हमारी बेइज्जती आज तक नहीं हुई। ’


अपने देश की आम जनता भी इसी दुकान के मालिक की तरह है। तरह-तरह के लोग इसको धोखा देते हैं, सेवा करने के नाम पर ठगते हैं, लूटते हैं , हाल-बेहाल करते हैं लेकिन जनता इसे अपनी मानहानि नहीं मानती। वह सोचती है यह तो आम बात है।


आपको इत्ता पढना पडा बेफ़ालतू में। कहीं आपकी शान में तो कोई गुस्ताखी नहीं हुई। मने पूछ रहे है। हो तो बता दीजियेगा। किसी की मानहानि करने का अपना कोई इरादा नहीं है।

















Monday, May 15, 2017

टेलीफ़ोन

टेलीफ़ोन से पहली मुलाकात अपन की किताबों में ही हुई। सामान्य ज्ञान के तहत पता चला कि ग्राहम बेल ने खोज की इसकी। प्रयोग के पहले सिनेमा में देखते रहे, कहानी में पढते रहे, गाने में सुनते रहे :
मेरे पिया गये रंगून
किया है वहां से टेलीफ़ून
तुम्हारी याद सताती है !
याद सताती है यह बताने के लिये पिया रंगून निकल लिया। बगल के कमरे में जाकर चिल्लाकर भी कह सकता था। लेकिन नहीं रंगून ही जायेंगे। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि पहले के लोग याद के नाम पर कित्ती फ़िजूलखर्ची करते थे।
बचपन में जहां रहते थे वहां दूर-दूर तक कोई फ़ोन रहा हो याद नहीं आता। बड़े होने तक किसी को फ़ोन करने की याद तक नहीं है। बाद में जब नौकरी में आये तो फ़ोन के दर्शन हुये। प्रयोग करने पर पता चला कि फ़ोन भी दो तरह के होते हैं। एक जिसमें लोकल बात होती है, दूसरे जिसमें विदेश बात हो सकती है मने एस.डी.टी.। पहली बार जब विदेश बात किये तो बहुत देर तक सोचते रहे कि बात क्या करेंगे? जब मिला तो भूल गये कि सोचा क्या था बात करने। बाद में ध्यान ही नहीं रहा कि बतियाये क्या?
बहुत दिन तक फ़ोन विलासिता टाइप बने रहे। एस.टी.डी. फ़ोन धारी अफ़सर विधायकों में मंत्रीजी टाइप लगते। लोग फ़ोन पर ताला लगाकर रखते। डायल करने के लिये छेद में बेडियों की तरह ताला लगाकर जाते।
लेकिन जहां चाह वहां राह। ताला लगे फ़ोन में डायल घुमाने की जगह हम लोग खटखटाकर फ़ोन मिलाने की कोशिश करते। 234 मिलाना हो तो पहले 2 बार खटखटकरते, जरा सा रुककर 3 बार खटखटाते फ़िर रुककर चार बार खटखटाते। 10 में 2 बार फ़ोन न मिलने पर वर्जित फ़ल चखने का रोमांच हासिल होता।
बाद के दिनों में पीसीओ का चलन बढा। घंटो इंतजार करके बातें करते। अब वह भी गये जमाने के किस्से हुये।
शुरुआती दिनों में टेलीफ़ोन के बतियाने के काम आया था। बाद के दिनों में तो टेप , भण्डाफ़ोड़ और सरकार गिराने, बनाने में काम आने लगा।
हॉट लाइन नाम सुनते तो लगता कि फ़ोन से कान जल जाते होंगे इसीलिये लोग हॉटलाइन पर कभी-कभी ही बात करते हैं।
मोबाइल में फ़ोन होता है लेकिन टेलीफ़ोन का मजा ही कुछ और है। मोबाइल में आवाज आते-आते चली जाती है। सेंन्सेक्स की तरह उछलती-कूदती रहती है आवाज। लेकिन टेलीफ़ोन में बातचीत स्थिर रहती है। जो मचा टेलीफ़ोन से बतियाने में है वह मोबाइल में कहां। घंटो बतियाने पर भी बैटरी की कोई चिन्ता नहीं।
टेलीफ़ोन में विविधता के दर्शन होते हैं। तरह-तरह के आकार के टेलीफ़ोन दिखते हैं। मोबाइल ने विविधता खत्म कर दी। साइज में भले छोटे-बड़े दिखें लेकिन आकार वही चौकोर। एकरस टाइप की मामला।
टेलीफ़ोन में गुस्से की इजहार करते हुये लोग रिसीवर को पटक देते। रिसीवर भी पुराने जमाने के जीवन साथी की तरह इसका बुरा नहीं मानता। आज मोबाइल कोई पटककर कोई गुस्से का इजहार नहीं करता। एक बार पटका मतलब गया मोबाइल।
टेलीफ़ोन का सबसे मजेदार बात क्रास कनेक्सन मिल जाना हुआ। घर में फ़ोन मिलाना और पता चला बात किसी सहेलियों की सुनाई पड़ने लगी। बैंक फ़ोन लगाओ तो रिसीवर उठे रेलवे इन्क्वायरी में। यह सब तो ठीक। लफ़ड़ा तो तब जब किसी अजीज मठाधीश को फ़ोन मिलाओ और मिलते ही जब आप उसके गुणगान शुरु करो तो वह खुश न होकर उस बातचीत के बारे में सवाल पूछने लगे जो आपने उसको फ़ोन मिलाने के पहले अपने अजीज से उसकी लानत-मनालत करने के पहले की है और जो उसने गलती से क्रास कनेक्शन होने के चलते की है। ऐसा होता तो बहुत कम है लेकिन होता तो है ही। ऐसा एक सच्चा किस्सा सुनाने का मन है लेकिन वह फ़िर कभी।
फ़िलहाल तो आप अपना फ़ोन उठाइये और अपने किसी अजीज से बतियाइये। अच्छा लगेगा।

Sunday, May 07, 2017

कड़ी निंदा

’कड़ी निंदा’ टाइप करते ही परसाई जी का ’निंदा रस’ याद आ गया। ’निंदा रस’ को जमाकर कड़ा कर दिया जाये तो ’कड़ी निंदा’ हो जायेगा। लेकिन ’निंदा रस’ से ’कड़ी निंदा’ तक की यात्रा में लिंग परिवर्तन टाइप हो गया। अब इसे उपलब्धि कहें या बवाल। यह अलग से एक सवाल।
कोई पूछे कि ’निंदा’ और 'कड़ी निंदा' में क्या फ़र्क होता है तो हम तो न बता पायेंगे। ज्यादा हुआ तो गूगल करके खोजेंगे लेकिन हमको अगर नेट कनेक्शन न मिला तो गूगल भी क्या घुंइया बतायेगा ? इसलिये खुद से सोचना चाहिये। हर बात के लिये गूगल पर भरोसा करना ठीक नहीं। कोई हमको घर में घुस के पीटने लगे तो क्या हम गूगल करके पता करेंगे कि पिटते रहें या अपन भी लगायें दो-चार हाथ?
'निंदा' के साथ लफ़ड़ा यह है कि यह दिखती नहीं है। अमूर्त टाइप होती है। दिखती तो छूकर/दबाकर पता कर लेते कि मुलायम है कि कड़ी। कम कड़ी होती तो थोड़ा कड़ापन और बढा देते। भट्टी में पकाकर जैसे लोहे की हार्डनेस बढाई जाती है वैसे ही निंदा की भी बढा लेते।
हमारी समझ में 'निंदा' और 'कड़ी निंदा' में अंतर कड़ेपन का ही होता होगा। पानी और बर्फ़ के अंतर की तरह। किसी ग्लास में रखा हुआ पानी चार हाथ दूर तक फ़ेंककर मारा जा सकता है लेकिन उसी की जमी हुई बर्फ़ फ़ेंककर चालीस हाथ दूर तक चोट पहुंचा सकती है। इससे लगता है कि जो 'निंदा' दूर तक मार करती है वह ’कड़ी निंदा’ होती है।
वैसे भी 'निंदा' और 'कड़ापन' महसूस करने वाले पर है। सूरज जो इत्ता डम्प्लाट है कि उसमें साठ हजार धरती समा जायें और जो दुनिया भर को सुलगाने में लग रहते हैं उसको हनुमान जी ने मधुर फ़ल जानकर लील लिया था। हम अपने पडोसी दुश्मन की हरकतों की ’कड़ी निंदा’ करते रहते हैं लेकिन वह हमारे लिये और ’कड़ी निंदा’ करने का इंतजाम करता रहता है। क्या फ़ायदा ऐसी ’कड़ी निंदा’ का।
लेकिन अपन की भी मजबूरी है कि जो स्टॉक में होगा वही तो सप्लाई किया जायेगा। अब हम कहां से लायें अमेरिका वाली धमकी मिली 'कड़ी निंदा' कि कह सकें कि - ’जो हमारे साथ नहीं है वह दुश्मन के साथ है।’ बल्कि यह कहने में एक डर यह भी है कि जहां हम कहें - ’जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे दुश्मन के साथ है’ तो दुनिया के तमाम मुल्क भाभी जी की तरह कहने लगें - ’सही पकड़े हैं।’
सरल शब्दों में कहा जाये तो लाउडस्पीकर पर की गयी 'निंदा' , 'कड़ी निंदा' कहलाती है। कोई हमको मारकर भाग गया तो उसको कहां तक दौड़ाया-पकड़ा जाये। लगाकर माइक कर दी 'कड़ी निंदा'। सस्ते में काम बन गया। मारपीट में कहीं अगला फ़िर मारने-पीटने लगा तो चोट-चपेट का डर अलग से। इसलिये 'कड़ी निंदा' दुश्मन को निपटाने का सस्ता और सुलभ उपाय है।
’निंदा’ और ’कड़ी निंदा’ हिंसा के अहिंसात्मक विकल्प हैं। ’कड़ी निंदा’ से लड़ाई बचती है। लड़ाई में एक दिन में हजारों करोड़ रुपये रोज फ़ुंक जायेंगे। ’कड़ी निंदा’ में माइक के खर्चे में काम बन जायेगा। चाय-पानी का खर्चा निकाल कर हजार रुपये में मामला निपट जायेगा। बचे हुये पैसों से देश का विकास होगा। भाई-भतीजों के खाने-पीने के काम आयेंगे। सबका साथ होगा। सबका विकास ’एट्टोमेटिकली’ होगा।
इसके बाद भी अगर कहीं गरीबी, भुखमरी या पिछड़ापन दिख गया तो ऐसी ’कड़ी निंदा’ करेंगे उसकी कि सर पर पांव रखकर भागेंगे सब कड़बड़-कड़बड़। हम उसको देखकर कहेंगे देखो कैसे डरकर भाग रहीं हैं गरीबी और भुखमरी। जो डर गया सो मर गया। हमने ’कड़ी निंदा’ से गरीबी, भुखमरी और पिछड़ेपन का खात्मा कर दिया।
जो लोग कड़ी निंदा की ताकत को कम करके आंकते हैं उनको वीर रस के कवियों को सुनना चाहिये। जिस तरह से वीर रस के कवि माइक पर पाकिस्तान को हड़काते हैं उससे लगता है कि अगर माइक लगाकर सीमा रेखा पर रस का कवि सम्मेलन करवा दिया जाये तो पाकिस्तान अपने फ़ौज-फ़ाटे समेत रोज सौ मीटर पीछे खिसकता चला जाये।
यह व्यवस्था हो जाने पर मीडिया की खबरों की शीर्षक बनेंगे-’ पाकिस्तान ने सीमा रेखा पर फ़ायरिंग की। उसको सबक सिखाने के लिये वीर रस के कवियों का दल सीमा रेखा की तरफ़ रवाना। पाकिस्तान में दहशत। पाक सेना सरेंडर की तैयारी में जुटी।
हमको कड़ी निंदा का सार्थक उपयोग करने के लिये उसमें थोड़ा वीर रस भी मिलाना चाहिये। किसी वीर रस के कवि को अपना प्रवक्ता बना देना चाहिये। तोप का एक पिद्दी सा गोला बनाने तक में महीना खिंच जाता है लेकिन ’कड़ी निंदा’ का ’आशु बम’ कवि के मुंह खोलते ही निकल पड़ेगा। प्रवक्ता माइक संभालते ही पूछेगा - ’पाकिस्तान को निपटाऊं कि निपटाऊं चीन के लाल को।’
लेकिन ऊपर वाले उपाय में लफ़ड़ा यही है कि माइक को संभालने के दौरान ही उसको कहीं माइक पर ही ’मेड इन चाइना’ दिख गया तो वह दहल जायेगा। चीन से तो निपटने के उपाय हो सकते हैं लेकिन चीनी माल को कैसे निपटाया जा सकता है। उसके लिये सारे देश को एक साथ मिलकर मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन अपने देश के लोग तो अभी मंदिर-मस्जिद, रोमियो ब्रिगेड, गो रक्षा आदि जरूरी मुद्दों से निपटने में लगे हैं इसलिये उधर ध्यान ही नहीं दे पाते।
’कड़ी निंदा’ अभी शुरुआती दौर में है। एक बार चलन में आ जाने पर देश में सब समस्याओं के हल कड़ी निंदा में खोजे जायेंगे। भ्रष्टाचारी अपने बचे हुये समय में भ्रष्टाचार की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, दंगाई लोग दंगा-फ़साद करने के बाद सांप्रदायिकता की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, बलात्कारी लोग मां-बहनों की इज्जत न करने वालों की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, दिन रात गुटबाजी करने वाले कवि-लेखक गुटबाजी की कड़ी निंदा करेंगे। मतलब जो जिस काम में लगा है वह उसकी ’कड़ी निंदा’ करने लगेगा। कालिदास बनने की ललक में जो जिस डाल पर बैठा है वह उसको ही काटने की कोशिश करेगा। अब यह बात अलग है कि उसके हाथ में कुल्हाड़ी की जगह फ़ूल झाडू सरीखी कोई चीज होगी जिससे डाल को कोई खतरा नहीं है।
भविष्य में लागू होने वाले चलन की तर्ज पर मैं अपने लिखे इस लेख ’कड़ी निंदा’ करता हूं।