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Sunday, March 02, 2025

तुमको सब इसी तरह के लोग मिलते हैं


कल 'सैंट्रो सुंदरी' से शहर से वापस आते समय पीछे से खड़खड़ाट सुनाई दी। उतरकर देखा तो कार का पिछला पहिये का मुँह अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह फूला हुआ था। कुछ तार भी निकले हुए थे। पहिए के एक हिस्से की ऊपरी परत ने पहिए से समर्थन वापस लेकर अपना दल बना लिया था। यही हिस्सा चलते समय कार के मडगार्ड में लगकर आवाज़ कर रहा था।
पहले सोचा धीरे-धीरे चलते हुए घर तक आ जाएँ। लेकिन फिर आवाज़ ज़्यादा हुई तो ख़राब टायर बदलने का तय किया। कार की डिक्की से पाना निकाला और पहिए के नट खोलने चालू किए। बहुत दिन से न खुले होने के कारण नट कसे थे। खुल नहीं रहे थे।
हम और ज़ोर लगाएँ तब तक उधर से एक आदमी आकर बोला -'हम बदल दें टायर।' हमने कहा -'कित्ते पैसे लोगे?' वो बोला-'जो मन में आए दे देना।' हमने कहा -'खोलो।बदलो'
उसने कोशिश की। ज़ोर लगाते ही वो लुढ़क गया। हमने सोचा पिए होगा। वह लड़खड़ा कर उठा। खोल नहीं पाया नट तो हमने ज़ोर लगाया। नट ढीले हो गए। उसने नट खोले। इसके बाद उसने जैक लगाकर टायर निकालने का उपक्रम किया। वह भी ठीक से नहीं कर पा रहा था। फिर हमने लगाया। टायर निकाला। स्टेपनी वाला लगाया।
उस आदमी के हमारे साथ मेहनत करते हुए आसपास के दो लड़के उसकी पोलपट्टी खोलते हुए कुछ बोलते जा रहे थे। उनकी बातों से लग रहा था कि वह ऐसे ही घूमता रहता है। कुछ करता, जानता नहीं है। वह उन लड़कों को चुप कराने की कोशिश करते हुए जुटा था।
बहरहाल,टायर बदलने के बाद उससे बातचीत हुई। हमने पूछा -'क्या करते हो?'
बोला -'जो मिल जाता है। सब काम कर लेते हैं।'
बाद में बताया -'हम जाति के नाई हैं लेकिन दाढ़ी बनाना नहीं आता।'
नाम बताया श्यामलाल। उसकी खुद की दाढ़ी बेतरतीब थी। आज के समय में यह कोई ख़ास बात नहीं कि ख़ानदानी पेशा अपनाए ही।
उसके अन्दाज़-ए-बयां रोचक लगा तो और बातचीत की। उसने बताया कि उसके पिता एचएएल कैंटीन में वेंडर थे। चाय पिलाते थे लोगों को। उसने कुछ दिन चाय पी, पिलाई।
घर परिवार की बात चलने पर बताया उसने -'दो बीबियाँ हैं। दोनों छोड़ के चली गयीं हैं। एक फ़र्रुख़ाबाद , दूसरी ग़ाज़ियाबाद। दोनों से आठ-आठ बच्चे हैं। कुल मिलाकर सोलह। आठ लड़के, आठ लड़कियाँ।
हमने ताज्जुब किया दो बीबियों वाली बात पर तो बोला -'हमारे बाप के तो चार बीबियाँ थीं। हमारे तो दो ही हैं।
हमने पूछा -'जब तुम्हारे हाल इतने बेहाल हैं तो दूसरी बीबी कैसे कर ली?'
बोला -' दिल आ गया तो कर ली।'
फिर विस्तार से बताया -'दूसरी वाली हमारे पड़ोसी की बीबी थी। मुस्लिम है। उसके मियाँ नहीं रहे तो हमारे घर आ गई। पड़ोस के नाते हमारी बहू लगती थी। हमने मना किया तो बोली हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे। फिर हमने कर ली शादी उससे। '
अपनी बीबियों के बारे में बताते हुए बोला -'बड़ी वाली सीधी है। छोटी वाली लड़ाका है।'
एक आदमी जिसका आमदनी का ठिकाना नहीं, दो बीबियाँ कर ले, एक हिंदू एक मुसलमान। सोलह बच्चे। ताज्जुब की बात लगी मुझे। लोग यहाँ एक नहीं निभा पाते। छोड़ के चल देते हैं।
बच्चों के बारे में बताया -' बड़ा लड़का कहता है शादी कर दो। हम कहते हैं पहले कमाई का हिसाब बनाओ तब शादी करेंगे।'
यह भी बताया -'हम अपनी बेटियों को बेटों से ज़्यादा प्यार करते हैं।'
चलते समय हमने उससे पूछा कित्ते पैसे दें? बोला -'चाय-पानी भर के दे दीजिए।' हमने दिए उसने सलाम मुद्रा में ग्रहण किए। हमने कुछ और दिए।'
बेतरतीब दांत देखकर हमने पूछा -'मसाला खाते हो क्या?'
'नहीं मसाला नहीं खाते। चुनही तम्बाकू खाते हैं। कभी-कभी दारू पी लेते हैं जब मिल जाती है।' - श्यामलाल ने बताया।
चलते समय बोला -' हमको मोदी जी से मिलना है।'
हमको ताज्जुब लगा कि इसको मोदी जी से क्यों मिलना है? यह पूछ पाएँ तब तक वह लड़खड़ाते हुए चलना शुरू करके आगे चला गया। शायद चाय पीने।
बाद में पास में खड़े नारियल बेचते लड़के से कंफ़र्म किया तो उसने बताया यहीं पास में ही रहता है वो। दो बीबियाँ हैं। बच्चे भी उतने ही जितने बताए। ऐसे ही माँगता-घूमता रहता है। कहीं बारात-वारात में काम मिलता है तो कर लेता है।
आगे वह फिर मिला। उसके पास से गुजरते हुए गाड़ी धीमी की तो बोला -'आपकी पुलिस में कोई जान पहचान हो तो एक काम है।'
हमने काम पूछा तो उसने बताया -'हमारे बग़ल में रहने वाली औरत ने पड़ोस का लोहे का गेट चुराकर बेंच लिया है। उसकी शिकायत करनी है। बहुत बदमाश है वह। रोज लड़ती है।'
हमारी कोई जान पहचान नहीं है कहकर चल दिए। क्या पता शायद वह इसीलिए मोदी जी से मिलने की बात कर रहा हो। Dhirendra जी का मानना है कि श्यामलाल सबका साथ सबका विकास का पोस्टर बॉय हो सकता है। शायद इसीलिए उनसे मिलने की बात कर रहा है।
हमने घर में आकर श्यामलाल से मुलाकात का क़िस्सा बताया तो हमको सुनाया गया -'तुमको सब इसी तरह के लोग मिलते हैं।'

हम क्या कहें ? आप ही बताओ।

 

Thursday, February 27, 2025

विजय नगर चौराहा

 


कल विजयनगर चौराहे से गुजरते हुए देखा कि मेट्रो के खम्भे के आसपास लगा टीन-टप्पर खुल गया है। खंभा साफ़ दिखने लगा है।

विजय नगर चौराहा पहले पहले गंदा नाला चौराहा के नाम से जाना जाता था। आटो वाले एक सवारी गंदा नाला, गंदा नाला कहते सुनाई देते थे। आजकल विजय नगर चौराहा ज़्यादा सुनाई देता। हालाँकि नाला वहीं है, चौराहा भी वही है।
जिस चौराहे पर आज मेट्रो का खंभा दिखा वहाँ पहले वीर रस के कवि भूषण की मूर्ति थी। भूषण जी कानपुर ज़िले की घाटमपुर तहसील के टिकवापुर गाँव में पैदा हुए थे। वे मोरंग, कुमायूँ, श्रीनगर, जयपुर, जोधपुर, रीवाँ, छत्रपती शिवाजी महाराज और छत्रसाल आदि के आश्रय में रहे, परन्तु इनके पसंदीदा नरेश छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराजा छत्रसाल थे। वे कहते हैं :
और राव राजा एक मन में न ल्याऊं अब।
साहू को सराहों कै सराहौं छत्रसाल को॥
(और किसी राजा के बारे में नहीं सोचता। या तो शिवाजी की सराहना करूँ या छत्रसाल की)
भूषण जी यह उक्ति इसी तरह की है जैसे कोई नौकरी पेशा व्यक्ति कहे इतनी जगह नौकरी की लेकिन मज़ा दो जगह आया।
विजयनगर चौराहे पर कवि भूषण जी की मूर्ति की स्थापना में स्व बद्री प्रसाद तिवारी जी का बड़ा योगदान था। उन्होंने शहर में कई जगह शहर से जुड़े महापुरुषों की मूर्तियाँ लगवाईं थी। अब वे नहीं हैं। भूषण जी की मूर्ति अब कहीं लगेगी या नहीं कहना मुश्किल। सम्भव है जब विजयनगर मेट्रो बने तो भूषण जी की प्रतिमा वहाँ लग जाए। कानपुर इतिहास समिति शायद इस बारे में आवाज़ उठाए।
गुमटी में एक दुकान के बाहर एक स्त्री मैनीक्वीन के हिस्से सड़क पर पड़े थे। टाँगे अलग धड़ अलग। सर नदारद। शायद दो मैनीक्वीन के ख़राब टुकड़े बाहर फेंक दिए गए थे। ऐसा जैसे खबरों में लिखा होता है -'महिला के शव के टुकड़े पाए गए। टाँगे और धड़ अलग-अलग शरीर के। सर लापता।' वैसे भी महिलाओं के सर वाले हिस्से से दुनिया असहज रहती है। इसी लिए सर ग़ायब कर दिया।
कहानी लिखने का हुनर और धीरज होता तो इसी पर एक कहानी खैंच देते।
मैनीक्वीन से याद आया कि हमारे कपड़ों की जब कोई तारीफ़ करता है तो हम कहते हैं जो कि सच भी है -"हम तो मैनीक्वीन हैं। जो कपड़े पहना दिए जाते हैं पहन लेते हैं। हमारी अपनी कोई पसंद नहीं।"
लौटते में एक दुकान पर गन्ने का रस पीने के लिए रूके। बीस रुपए का एक ग्लास। रस पीते हुए कुलदीप नैयर जी का लिखा एक क़िस्सा याद आया जिसमें उन्होंने बताया था कि एक बार वो शास्त्री जी के साथ कहीं जा रहे थे। क्रासिंग बंद थी तो शास्त्री जी ने कहा -'जब तक क्रासिंग खुलती है तब तक आइए गन्ने का रस पी लेते हैं।' उन लोगों ने रस लिया और क्रासिंग खुलने पर आगे बढ़े।
गन्ने की दुकान पर बैठी महिला ने बताया कि उसका मायका ग़ाज़ीपुर में है। बचपन से ही पिता यहाँ आ गए तो यहीं पली-बढ़ी यहीं शादी हुई । यहीं रहना हो रहा है।
हमने पूछा कि गर्मी में गन्ने का रस बेचती हो। बाक़ी समय में क्या काम चलता है। उसने बताया -'साल भर यही काम चलता है।'
हमने बर्फ़ डालने से मना किया था तो मेरे रस पीते हुए पूछा -'ज़्यादा ठंडा तो नहीं?'
हमने रस पीकर काग़ज़ का ग्लास डस्ट बिन में डालते हुए देखा कि उसमें कोई और पहले से नहीं पड़ा था तो पूछा -'सबेरे से पहली ग्लास बिका क्या?' इस पर उसने कहा,' नहीं , और बिके हैं।' फिर उसने उचककर डस्टबिन देखी और कोई और ग्लास न पाकर कहा, 'कूड़ा वाला ले गया शायद।'
चलते समय फ़ोटो खींची। उसको दिखाई। फ़ोटो देखकर हंसते हुए सर पल्ला कर लिया। हमने नाम पूछा तो बोली -'अरे, नाम का क्या करना?'
उसकी बात सुनकर बहुत पहले शुक्लागंज की तरफ़ जाते हुए लइया-चने की दुकान पर मिली महिला की बात याद आ गयी। नाम पूछने पर बोली थी -'नाम कुछ नाईं है हमार। नाम हेरा गा है।' (हमारा नाम कुछ नहीं है। नाम खो गया है।)
(पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
दोपहर हो गयी थी। घर से बुलावा आ गया था। घर की बात से अपनी ही कविता की याद आ गयी :
"घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।"
हम घर लौट आए। सोचा आपको भी बता दें।

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Wednesday, January 29, 2025

सड़क पर व्हाटसप भारत यात्रा


 कल बड़े दिन बाद साइकिल चलाई। नहा-धोकर , नाश्ता-पानी करके धूप में नहाने निकले। धूप हमको देखकर खिल सी गयी। दोनों को बहुत दिन बाद किसी आत्मीय से मिलने का सुख जैसा मिला।

एक मकान के बाहर एक आदमी पैर में कच्चा प्लास्टर बांधे पैर को धूप के सामने किए खड़ा था।फ़ैक्ट्री में काम करते समय किसी गोले की फ़ोरजिंग उसके पैर पर गिर गयी थी। पंजे में फ़्रैक्चर हो गया। तीन हफ़्ते की छुट्टी।
कैलास नगर की तरफ़ गए। नाले के पार एक इमारत के विधायक द्वारा उद्घाटन का चमकता पत्थर लगा था। इस तरफ़ की तमाम जमीन पर लोगों ने अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है। इमारत जिस जगह पर बनी है पता नहीं वह अवैध क़ब्ज़े वाली है या नहीं लेकिन पूरी दुनिया में अवैध क़ब्जे का यही तरीक़ा चलन में हैं।
अमेरिका में अंग्रेजों ने क़ब्ज़ा किया। स्थानीय लोगों को मारकर, खदेड़कर किनारे कर दिया। अब अवैध लोगों को बाहर कर रहा है। लोगों को बाहर करने के साथ खुद भी बाहर हो जाना चाहिए अगले को। उसका क़ब्ज़ा भी अवैध ही है।
एक बाल काटने की दुकान पर बोर्ड लगा था -गुडलक हेयर ड्रेसर। बाल ठीक कटें न कटें यह आपका भाग्य। हमारे साथ अक्सर ऐसा होता है। पाँच में से तीन बार घर आने पर बताया जाता है-' ठीक नहीं कटाए बाल, सही नहीं लगी डाई।' कभी-कभी तो वापस जाना पड़ता है ठीक कराने।
एक बंगाली डाक्टर का बोर्ड लगा है, 'यहाँ बिना दर्द दांत उखाड़ा जाता है।'
एक चाय की दुकान पर बैठा एक बुजुर्ग चाय का कप चेहरे के पास किए उसकी भाप से अपना चेहरा सेंक रहा था। फेस टी स्टीम बाथ जैसा काम। चाय पीने के पहले चेहरा सेंकना मतलब एक पंथ दो काज।
सड़क पर हर मकान, दुकान के बाहर बैठे लोग धूप सेंक रहे थे।
एक मकान के बाहर एक महिला एक शेर की मूर्ति की पीठ पर हाथ रखे धूप सेंक रही थी। उसको देखकर मुझे सरकारी दफ़्तरों में 'मेकइन इंडिया' के लोगो वाले शेर की याद आई। सरकारी दफ़्तरों में तमाम चूहे जैसे दिल वाले लोगों ने अपने दफ़्तर की मेज़ पर बड़ी शेर की मूर्तियाँ रखी हुईं थीं। यदाकदा वे लोग शेर की पीठ पर हाथ फेरते हुए भी फ़ोटो खिंचाते दिखते थे। उस समय उनके चेहरे पर लोमड़ी जैसी मुस्कान अपने आप चिपक जाती थी। शेर, चूहा, लोमड़ी,इंसान का गठबंधन अद्भुत होता है।
लौटते हुए देखा तो पता चला कि जिसे मैं मकान समझा था वह संतोषी माता का मंदिर था। उसके चबूतरे पर बैठी धूप सेंकती महिलाओं ने बताया कि मंदिर बीस-पचीस साल पहले सबके सहयोग से बना था। ज़मीन किसकी थी यह उनको नहीं पता था। तमाम धार्मिक स्थल ऐसे ही सर्वजन सहयोग से बनते हैं।
सड़क किनारे नालियों से निकला गीला कूड़ा जगह-जगह पड़ा था। ऐसा लगा नाली विरोधी हरकतों के कारण कूड़े को 'नाली बदर' कर दिया गया है।जब तक कूड़ा सूखेगा और लोग इसे उठाने आएँगे तब तक कूड़े का काफ़ी हिस्सा फिर से नाली में शामिल हो चुका होगा जैसे कभी ज़िला बदर किए गए अपराधी समय बीतने पर ज़िले के सम्मानित नागरिक हो जाते हैं, देश द्रोह के आरोपी रहे लोग अखाड़ों के महामंडलेश्वर बन जाते हैं।
रामलला इंटर कालेज के मोड़ पर खड़े आटो वाले सवारियों का इंतज़ार कर रहे थे। धूप सेंकते ड्राइविंग सीट पर बैठे आटो वाले ने बताया- " सवारियों को अब इंतज़ार का सबर नहीं। सवारियों के मुक़ाबले आटो ज़्यादा हो गए हैं। कोई और काम नहीं तो यही कर रहे हैं।"
आगे एक जगह एक वैन खड़ी थी और पास में एक शेड सा लगा था। दोनों पर व्हाटसएप लिखा था। पता चला व्हाटसएप की तरफ़ से लोगों को व्यापार में सहयोग करने की मुहिम के रूप में कैंपेंन चलाया जा रहा था। व्हाटसएप भारत यात्रा के नाम से जानकारी देने की मुहिम चलाई जा रही है। इस बहाने शायद व्हाटसएप अपना कोई सर्वे कर रहा हो, कहना मुश्किल। लेकिन जिसको अपने व्यापार में कोई सहयोग चाहिए तो व्हाटसएप भारत यात्रा ( नम्बर +919160574425) से जुड़कर ले सकता है।
क्या पता कोई राजनीति से जुड़ा नमूना व्हाटसएप भारत यात्रा से चुनाव में झूठ बोलने के तरीक़े जानने की कोशिश करे। तब शायद व्हाटसएप भारत यात्रा एप कहे कि मालिक आपको सिखाने की औक़ात हममें नहीं है। आप स्वयंसिद्ध हैं।
व्हाटसएप भारत यात्रा के वालंटियरों से बात हुयी। हिसाम केरल के त्रिचूर से और मयंक पूर्वी चंपारन से हैं। दोनों इंजीनियर। हिसाम केरल से, मयंक आई.आई.टी. दिल्ली से कम्प्यूटर इंजिनीयरिंग की पढ़ाई किए हैं। हिसाम के पिता सीआरपीएफ में हैं इसीलिए अलग-अलग जगह पोस्टिंग हुई और यही कारण रहा होगा कि वे साफ़ हिंदी समझ-बोल पा रहे थे । मयंक के पिता बिहार में डाक्टर हैं।
शहर के एक बहुत सामान्य इलाक़े में व्हाटसएप की पैठ बनाने की कोशिश से लगा कि तकनीक और जानकारी देने के बहाने बाज़ार हमारे चारों तरफ़ अपनी पैठ बनाता जा रहा है।
रास्ते में तमाम रोचक नामों वाली दुकानें दिखीं। कई जगह लोगों से रास्ता पूछने के बहाने बतियाए। धूप सेंकते लोगों के चेहरों की चमक दिखी। एक जगह दो बुजुर्ग महिलाएँ धूप में बतियाती, गपियाती दिखीं।
काफ़ी दिन बाद साइकिल चलाने के चलते स्पीड थोड़ा कम रही। कई जगह रुके भी। गपियाते, बतियाते, फोनियाते, धूपियाते, मोबाइलियाते, सुस्ताते वापस लौटे। तीन घंटे की साइकिल यात्रा में कुल पंद्रह किलोमीटर यात्रा हुई। स्पीड के हिसाब से देखा जाए तो एक तिहाई रही। एक तिहाई मतलब थर्ड डिवीजन। थर्ड डिवीजन सही लेकिन पास तो हुए ही। ठीक है न?

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Tuesday, January 28, 2025

गूगल के मज़े

कल गाड़ी रिपेयर के लिए डालने गए। गाड़ी शेड से निकालते समय स्क्रीन पर कैमरे ने बताया कि निकल जाएगी गाड़ी। निकली तो गाड़ी लेकिन अगले बंपर पर लोहे के खंभे ने मोहब्बत से चूम लिया। जैसे कोई हीरो किसी हीरोईन का तगड़ा चुम्बन लेते हुए उसकी लिपिस्टिक भी चूस लेता होगा वैसे ही बंपर के कोने का पेंट खुरच गया। लोहे के खम्भे ने सफ़ेद बंपर पर काला निशान लगा दिया । चेहरा होता तो कहते नज़र बचाने के लिए है। लेकिन साल भर पहले की गाड़ी पर, जिसका कैसलेस बीमा उपलब्ध है, कोई भी निशान अखरता है।
वरिष्ठ नागरिक की उमर में हासिल चीजों का रखरखाव मुश्किल होता है। उम्रदराज लोगों द्वारा कमउम्र बीबी को सहेजने जैसा हिसाब। शहरों में नई गाड़ी चलाते समय लगता है कि सड़क पर लड़कियों को चलते हुए कैसा लगता होगा। अग़ल-बग़ल, आगे-पीछे चलती, आती-जाती हर गाड़ी देखकर लगता है कि हमारी ही गाड़ी को छेड़ने के लिए चल रही है। धड़ल्ले से बग़ल से गुजरते आटो शोहदों जैसे लगते हैं जिनका जन्म ही मासूम, नयी गाड़ियों को छेड़ने के लिए हुआ है।
बुढ़ापे में नई गाड़ी चलाते हुए सड़क का माहौल बाली की तरह लगता हैं जो चालक की आधी ड्राइविंग स्किल हर लेता है।
इस मामले में हमारी सैंट्रो सुंदरी का साथ हमेशा सुकून देह लगता है। पचीस साल से हमारा साथ दे रही सैंट्रो सुंदरी अब अगले पाँच साल तक और साथ रहेगी। आगे-पीछे, अग़ल-बग़ल, दाएँ-बाएँ तमाम ठोकरों और निशानों के बावजूद सैंट्रो सुंदरी चलने में कभी नख़रा नहीं करती। चाबी आधी घूमते ही कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाती है।
बहरहाल गाड़ी रिपेयर के लिए रिपेयर शाप ले जाने के लिए निकले। पहले भी कई बार जा चुके हैं। रास्ता भी सीधा है। लेकिन फिर गए गूगल शरण में। बताया 39 किलोमीटर दूर। हमें कुछ ज़्यादा लगा लेकिन चल दिए। आधे रास्ते पहुँचे तो लगा कुछ ज़्यादा ही दूर ले जा रहा गूगल बाबा। फ़ोन किया आमिर को जिसने मुझे गाड़ी दिलवाई थी। उसने बताया 16 किमी दूर है आर्मापुर से बाडी रिपेयर शाप। उतना तो हम चल आए थे। हमने फिर सर्च किया, गूगल अभी भी 23 किमी। हमने बाडी शाप फ़ोन करके लोकेशन माँगी। पता चला दूरी अभी भी 24 किमी ही थी।
हमने फिर गाड़ी से उतरकर पूछा किसान नगर कित्ती दूर है। पता चला पीछे छोड़ आए हैं। दो-तीन किलोमीटर। गाड़ी घुमा ली। अब गूगल ने बताया कि चार किमी दूर है बाडी रिपेयर शाप। पहुँचकर जमा की। वहाँ मौजूद भाई जी ने पूछा, अभी कुछ दिन पहले इसी बंपर को बदलवाया था न? पता चला वो दाँया वाला था। इस बार बायाँ ठुका है।रिपेयरिंग में भी संतुलन ज़रूरी है।
बात गूगल की हो रही थी। अभी भी बाडी रिपेयर शाप की दूरी 39 किमी ही बता रहा है। जबकि दूरी 16 किमी है। लगता है गूगल बाबा भी बुजुर्ग हो जाने के चलते चीजें ठीक से नहीं देख पा रहे। यह भी हो सकता है हमसे मज़े ले रहा हो गूगल बच्चा। वो तो कहो हम पूछ लिए कल वरना घंटे भर और सड़क पर टहलते रहते।
यह भी हो सकता है जैसा Dhirendra Srivas जी ने बताया -"गूगल अभी कुंभ में बिजी है इसलिए बाकी लोकेशन पर उत्ता धियान नहीं दे पा रहा है।"
गाड़ी की तरह अपना देश भी लोग ऐसे ही हांके चले जा रहे हैं। अपने-अपने डिज़ाइनर नक़्शे के सहारे। कोई बताता है अगले बीस साल में पहुँच जाएँगे, कोई चिल्लाता है मंज़िल तीस साल दूर है। कोई हल्ला मचाता है अरे ये वाला ड्राइवर देश की गाड़ी पचीस साल पीछे ले जा रहा है। उतारो इसको, हम चलाएँगे गाड़ी। हमको पता है मंज़िल। (इस हल्ले-गुल्ले में देश किधर जा रहा है यह जानने के लिए टिप्पणी में दी गयी पोस्ट देखिए)
लेकिन देश को इस हल्ले-गुल्ले से कोई मतलब नहीं। वह उधर ही चल देता है जिधर लोग उसे हांकते हैं। हज़ारों, लाखों, अरबों, खरबों स्टेयरिंग लगे हैं देश में। हरेक को लगता है कि देश को वही चला रहा है। वही हांक रहा है। देश को भी आगे-पीछे से कोई मतलब नहीं। वह बस चल रहा है, अपने तरह-तरह के ड्राइवरों की बाल सुलभ चिरकूटइयों को वात्सल्य से निहारता हुआ। सदियों से वह इस तरह की लीलाओं को देखता आ रहा है। न जाने कितने गूगल-फूगल, तुर्रम खां टाइप नमूनों को देख चुका है देश। अभी तो देश कुम्भ में डुबकी लगाते लोगों को निहार रहा है। डेढ़ सदी बाद आया है यह मौक़ा। ऐसे न जाने कितने कुम्भ देख चुका है देश। एक बार फिर सही।

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Wednesday, January 22, 2025

व्हाट्सएप स्टार्ट न हुआ




आज सुबह मोबाइल आन करते ही कुछ नोटोफ़िकेशन दिखे । उनमें कुछ व्हॉट्सएप के भी थे। अधिकतर गुडमार्निंग वाले। संदेश देखने के लिए व्हाट्सएप देखने के क्लिक किया तो खुला नहीं। क्लिक करते ही बाहर हो जा रहा था। कई बार कोशिश की लेकिन मेसेज दिखे नहीं।
मोबाइल को रिस्टार्ट करके भी देखा। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। एकाध लोगों से पूछा। किसी ने कहा व्हाट्सएप फिर से इंस्टॉल करो, किसी ने कुछ और सुझाव दिए। मैंने व्हॉट्सप डिलीट किया। फिर से डाउनलोड किया। पहली बार में बिजनेस वाला हुआ। उसने कुछ और विवरण पूछे तो लगा गड़बड़ है। फिर से दूसरा बातचीत वाला डाउनलोड किया।
व्हाट्सएप शुरू करते हुए उसने पूछा चैट और डाटा रिस्टोर करना है ? हमको लगा कि बाद में व्हाट्सएप अलग से भी पूछेगा तब हाँ कहेंगे। बिना डाटा रिस्टोर किए आगे बढ़ गए। व्हाट्सएप फौरन शुरू हो गया।
शुरू तो हो गया लेकिन सारा डाटा ग़ायब हो गया। मोबाइल की पूरी मेमोरी का आधे से अधिक हिस्सा इसी डाटा का था। मेसेज, फ़ोटो, वीडियो सब गायब। व्हाट्सएप एकदम नए पैदा हुए बच्चे सरीखा एकदम साफ़ सुथरा दिख रहा था। ढाई सौ जीबी से ऊपर की मेमोरी पर झाड़ू लग चुका था। पूरा व्हाट्सएप किसी नए चिकने फर्श की तरह चमक रहा था।
महीनों से जमा डाटा, चैट, फ़ोटो, वीडियो ग़ायब हो गए। अपने में अफ़सोस करने लायक बात। लेकिन याद करने पर ऐसा कोई डाटा याद नहीं आया जिसके डिलीट हो जाने का शिद्दत से अफ़सोस हुआ हो। कुछ निमंत्रण पत्र थे उनके से जो याद थे वो दुबारा मंगा लिए कुछ मंगा लेंगे। इसी बहाने तमाम ग्रुप देखे जिनके हम सदस्य थे। महीनों से कोई हलचल नहीं थी उनमें। सबसे बाहर आए। अभी तक बीस-पच्चीस से बाहर आए। आगे और से निकलेंगे।
आज के समय दुनिया में करीब तीन अरब व्हाट्सएप खाते हैं। मतलब दुनिया की आधी-आबादी के बराबर। हमारा खाता खत्म हुआ। पुराने का सारा नाम-ओ-निशान कम से कम हमारे लिए खत्म हो गया। हमारे खाते का पुनर्जन्म हुआ आज। हमारा खाता कह रहा होगा , फिर से इसी नाशुक्रे के नंबर पर आना था। हमको भी पुराने खाते की याद कुछ दिन में बिसरा जाएगी।
दुनिया में इंसान के साथ भी कुछ ऐसा ही होता होगा। दुनिया में कुछ साल , सदी बिताने के बाद अपने-अपने हिसाब से इंसान डिलीट हो जाता होगा। उससे जुड़ी यादें कुछ लोगों को कुछ समय तक कुछ लोगों के ज़ेहन में रहती होंगी। कोई अच्छा कहता होगा, कोई बुरा। कोई बहुत अच्छा, कोई बहुत बुरा। इतना बुरा भी नहीं था, इतना भला भी नहीं था कहते हुए याद रखने वाले लोग भी होंगे। तमाम लोगों की सही तस्वीर लोगों तक पहुँचती भी नहीं होगी और वे लोग दुनिया से विदा हो जाते होंगे। दुनिया के मोबाइल से उनका खाता डिलीट हो जाता होगा। Alok Puranik जी के लेख और इसी नाम से किताब पापा रीस्टार्ट न हुए’ की तरह।
हम सब भी ऐसे ही जी रहे हैं। एक क्लिक में खत्म हो जाने और किसी और रूप में रीइंस्टाल हो जाने वाले। हाहा, हुती जलवे और चुपचाप, निस्पंद जीने वाले सभी के हाल कमोबेश एक जैसे ही होने हैं। कोई गाजे-बाजे के साथ डिलीट होगा , कोई चुपचाप बिना किसी को डिस्टर्ब किए ओ हेनरी की कहानी ‘आख़िरी पत्ती’ के नायक की तरह।
यह लिखते हुए ख्याल आया कि पढ़ने वाले दोस्त यह न समझें कि कहीं तबियत खराबी या अवसाद के चपेटे में तो नहीं आ गए अनूप शुक्ल। तो डिस्क्लेमर यह कि ऐसा कुछ नहीं। अपन मस्त, धूप सेंकते, सूरज भाई के प्रसाद की विटामिन डी पंजीरी फाँकते मजे में हैं। आप भी मजे में रहिए। जो होगा देखा जाएगा। आप भी धूप खा लीजिए फ़ोटो में ।

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Monday, December 09, 2024

 पिछले हफ़्ते फूलबाग की तरफ़ जाना हुआ। दोपहर का समय। जाम जैसा तो नहीं लगा लेकिन चौराह किसी व्यस्त कामकाजी इंसान जैसा लगा। हर चेहरा बिजी बिजी। सड़क पर एक सवारी मूलगंज, एक सवारी मूलगंज की आवाज़ सुनाई दे रही थे। सामने एलआईसी की बड़ी इमारत के बग़ल से आता ट्रैफ़िक। 

चौराहे के पास सड़क के डिवाइडर पर बनी जगह पर बैठे सैकड़ों कबूतर चीयर लीडर्स की तर्ज़ पर हवा में उड़कर , करतब जैसा दिखाते हुए वापस आकार बैठ जाए। सामने दीन दयाल उपाध्याय की प्रतिमा दिखाई दे रही थी। वहीं कहीं कामरेड राम आसरे की प्रतिमा भी लगी थी। लेकिन वह दिख नहीं रही थी। कामरेड अब हर जगह नज़र ओझल हो रहे हैं।

लौटते समय बिरहाना रोड होते हुए आए। सड़क के दोनों ओर ज्वैलर्स ही ज्वैलर्स। अलावा इसके तमाम प्रसिद्द पुरानी दुकाने। दुकानों के सामने दुकानों के साइनबोर्ड के अलावा दुकानों के नाम के बोर्ड एक साइज़ में लटके दिखे। दुकानों की ड्रेस की तरह।

सड़क किनारे एक लाइन में चार-पाँच मक्खन मलाई के ठेले दिखे। कानपुर की मक्खन मलाई प्रसिद्ध है। तमाम लोगों ने इसकी तारीफ़ में लिखा है। लेकिन हमने पहले कभी खायी नहीं थे। सोचा अभी तक नहीं खाए तो अब खा लें। एक ठेले से सौ ग्राम ली। दोने में थमा दी उसने। साथ रुपए की सौ ग्राम। वहीं खड़े-खड़े खाई। 

हर ठेले पर स्व. कल्लू मक्खन वाले की फ़ोटो इश्तहार की तरह लगी थी। 1960 में बेचना शूरू किया होगा कल्लू जी ने। बाद में और लोग लगाने लगे। ऐसा लगा सब उनके ख़ानदानी हैं। लेकिन पूछने पर पता लगा ऐसा है नहीं। सब बस फ़ोटो लगाए हैं उनकी। 

फ़ायदे के लिए प्रसिद्ध हो गए इंसान से ज़बरियन सम्बंध बनाना आम बात है। गांधी से घृणा करने की हद तक नापसंद करने वाले मंच पर गांधी जी की जय बोलते हैं। 

आगे मारवाड़ी लाइब्रेरी दिखी। 1918 में स्थापित लाइब्रेरी का शहर के पुराने लोग गर्व से ज़िक्र करते हैं। पहली  मंज़िल पर स्थित लाइब्रेरी पर चैनल वाला दरवाज़ा लगा है। सरका के अंदर गए तो एक आदमी ने हमको जिस अन्दाज़ में देखा उसका हिंदी अनुवाद करें तो लगे वह पूछ रहा था-' कौन? क्या चहाते हैं?'

हमने बिना पूछे डरते-डरते टाइप बता दिए -'आर्मापुर में रहते हैं। लाइब्रेरी देखनी है।'

उसने अंदर बैठे किसी आदमी से पूछा और कहा -'मेम्बर बनना होगा। तब देख पाएँगे किताबें।'

मेम्बर फ़ीस 300 रुपए प्रति वर्ष। किताबें इशु करानी हो तो आठ सौ रुपए। एक बार में दो किताबें इशु होंगी। पंद्रह दिन के लिए। 

हम वहीं कुर्सी पर बैठकर मेज़ पर रखे अख़बार देखने लगे। कुछ लोग वहाँ बैठे पढ़ रहे थे। नोट्स नुमा कुछ ले रहे थे। बीस-पचीस लोग होंगे। लाइब्रेरी में लगभग 30-35 हज़ार किताबें होंगी। अलमारियों पर उनको देने वाले लोगों के नाम लगे थे। 

अख़बार पलटकर देखने के बाद सबसे पास की अलमारी देखी हमने। चाँद का फाँसी अंक और अन्य दुर्लभ किताबें मौजूद थीं वहाँ। संदर्भ ग्रंथ जो वहीं बैठकर देखे जाते हैं।

आगे और किताबें देखने की कोशिश करने पर लाइब्रेरी के एक कर्मचारी ने धीरे से बताया कि बिना सदस्य बने किताबें देखने की अनुमति नहीं है। थोड़ा चकित हुए हम। लाइब्रेरी कोई गोपनीय जगह है क्या जिसका सदस्य बने बिना किताबें देख तक न सकें। यह पहली बार देखा किसी लाइब्रेरी में। मन किया सदस्य बन जाएँ लेकिन फिर यह सोचकर कि घर से इतनी दूर लाइब्रेरी आना-जाना हो नहीं पाएगा, नहीं बने सदस्य। 

थोड़ी देर और वहाँ रहकर बिना किताबें देखे वापस चले आए। आते समय हमको किताबें देखने से रोकने वाले शख़्स ने रजिस्टर पर नाम पता लिखने को कहा ताकि सनद रहे कि हम वहाँ आए थे। हमने लिख दिया और वापस आ गए। आते समय और अभी भी सोच रहे थे कि इतना लाइब्रेरी में आम इंसान को किताब देखने न देना क्या पठन विरोधी व्यवहार नहीं है? 

सड़क पर फिर चहल-पहल मिली। एक नुक्कड़ पर एक शाकाहारी भोजनालय में कुछ लोग खाना खा रहे थे। दुकान पर बोर्ड लगा था -संगम शाकाहारी भोजनालय, नया गंज चौराहा। मालकिन श्रीमती  मुन्नी देवी शुक्ला। अब मालिकन जैसे शब्द दुकानों में कहाँ चलते हैं। 

सड़क के दोनों तरफ़ दुकानों में पुराने अन्दाज़ में गाव-तकिए लगे दुकानों के कर्मचारी बैठे दिखे। कुर्सी मेज़ और काउंटर वाले समय में कुछ ही जगह गाव तकिए वाली व्यवस्था दिखती है।

आगे तिराहे पर कटे-फटे नोट बदलने वाले बैठे थे। मन किया वो नोट बदल लें जो थोड़ा फटा होने के चलते मक्खन वाले ने लेने से मना कर दिया था। लेकिन फिर नहीं बदला। 

आगे कलट्टरगंज बाज़ार है। छह साल पहले जब बाज़ार आए थे तो यहाँ काम करने वाली मज़दूर परदेशन से मिले थे। उनसे  फ़ोटो उसको देने आए थे। सोचा मिला जाए फिर उनसे। पता किया तो मालूम हुआ परदेशन नहीं रहीं। कब नहीं रहीं पूछने पर लोगों से समय दो तीन महीने से लेकर दो-तीन साल तक बताया। जिस दुकान पर काम करती मिली थी उस दुकान वाले ने  निर्लिप्त भाव से बताया -'बीमार थी। कई जगह काम करती थी। नहीं रही।'

बाज़ार में सन्नाटा था। दुकानें बंद। जगह-जगह लोग ताश खेलते हुए समय काट रहे थे। एक जगह दो कुत्ते एक बोरी को नोचते हुए उस  पर क़ब्ज़े के लिए झगड़ रहे थे। देखकर मुझे राजनीतिक पार्टियों के लोग याद आए जो चुनाव चिन्ह या खुद को असली पार्टी बताते हुए संघर्ष करते हैं। अपने बग़ल में हो रहे कुत्तागीरी से निर्लिप्त ताश खेलते हुए समय बिताने वाले लोग शतरंज के खिलाड़ी वाले नवाबों जैसे लोग लगे जो अपने आसपास से बेपरवाह शतरंज खेलने में डूबे थे।

घंटाघर चौराहे पर आते-जाते लोगों को देखते रहे कुछ देर। लग रहा पूरा शहर ही बेतहाशा भागा चला रह है कहीं। घंटाघर का टावर कानपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के बोर्ड के पीछे सहमा सा खड़ा दिखा। शहर की अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह घंटाघर किसी कमजोर हो चुके बुजुर्ग की तरह अपने आसपास गुजरते जन-प्रवाह को देख रहा था। 

घंटाघर से विजय नगर तक के आटो में बैठे। रास्ते में घंटाघर से चटाई मोहाल, डिप्टी पड़ाव के रास्ते का वीडियो बनाया। विजय नगर से  आर्मापुर गेट तक दूसरे आटो में आए । आर्मापुर गेट पर, एक बच्ची जो शायद स्कूल से घर जा रही थी, ने आटो वाले से गरीब आवाज़ में कहा -'दस रुपए देंगे।' जबाब में आटो वाले ने वात्सल्य, अपनापे और प्यार के मिले-जुले स्निग्ध भाव से बच्ची को देखते हुए कहा -'बिटिया तुम जितना देओगी उतने में ले चलेंगे।' बच्ची चुपचाप आटो में बैठ गयी। आटो चल दिया।  

आर्मापुर गेट से पैदल घर तक आते हुए हमारे ड्राइवर रहे संजय ने हमको पैदल आते देख लिया। हमको ज़बरियन गाड़ी में बैठकर घर छोड़ा। 


Sunday, December 01, 2024

किनारे पे न चलो, किनारा टूट जाएगा


पिछले दिनों कानपुर का 150 साल पुराना गंगापुल टूट गया। इस पुल पर से कई बार गुजरे हैं। अनेक यादें जुड़ी हैं। पुल गिरने की खबर मिलने पर देखने गए पुल। शहर होते हुए घर से दूरी 15 किलोमीटर। गंगाबैराज की तरफ़ से जाते तो दूरी 23 किलोमीटर दिखा रहा था। समय लगभग बराबर। शहर होते हुए गए। जहां से पुल शुरू होता है वहीं पर गाड़ी सड़क किनारे ही खड़ी कर दी। रेती में पुल के नीचे -नीचे चलते हुए उस हिस्से की तरफ़ गए जो हिस्सा टूटा था। 

पुल का टूटा हुआ हिस्सा नदी के पानी में धराशायी सा लेटा  था। क्या पता वह गाना भी गा रहा हो -'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले ये जगह साथियों।' पुल के आसपास पक्षी तेज आवाज़ में चहचहाते हुए शायद पुल के बारे में ही चर्चा कर रहे थे।

एक दूधिया अपने दूध के कनस्तर पानी में धोकर रेती में औंधाए रखकर गंगा स्नान कर रहा था। स्नान करके नदी से निकलते हुए एक बुजुर्ग को नदी किनारे निपटते देखकर भुनभुनाते हुए कहने लगा -' यह भी नही कि गंगाजी से ज़रा दूर होकर निपटें। एकदम किनारे ही गंदगी करने बैठ गए।'

उसके भुनभुनाने के अन्दाज़ से लग रहा था कि उसकी मंशा केवल खुद को और उसके बग़ल से गुजरते हमको सुनाने तक सीमित थी। थोड़ा ज़ोर से बोलता तो आवाज़ उस निपटते बुजुर्ग तक पहुँच जाती। लेकिन उसकी मंशा शायद भुनभनाने तक ही सीमित थी। बुजुर्ग उसकी भुनभुनाहट से निर्लिप्त निपटने में तल्लीन रहा।

बाद में उस बुजुर्ग के पास से गुजरते हुए लगा कि उसको बैठने में कुछ तकलीफ सी थी। बड़ी मुश्किल से  बैठे-बैठे सरकते हुए वह नदी की तरफ़ जाता दिख रहा था। उसकी तकलीफ़ का अन्दाज़ अगर दूध वाले को होता तो शायद वह कम भुनभुनाता। 

वहीं चार छोटे-छोटे बच्चे रेत पर खेल रहे थे। उनमें तीन बच्चे थे , एक बच्ची।  पास जाकर देखा तो वे रेत को नदी के पानी से गीला करके बालू के खिलौने बना रहे थे। 'कौन सा खिलौना बना रहे हो ?'  पूछने पर बच्चों ने बताया -'खाना पकाने के खिलौने बना रहे हैं।' शुरुआत चौके से हुयी। चौका बनाने के बाद उनमें से एक बच्चा थाली या परात जैसा कुछ बना रहा था।

बच्चों ने आपस में एक-दूसरे के बारे में बताया। बच्ची थोड़ा मुखर सी लगी। उसके बारे में एक बच्चे ने बताया -'ये गाली बकती है।' 'क्या गाली बकती है ? ' पूछने पर बच्चे ने बताया कि क्या-क्या गाली बकती है बच्ची। आम जन-जीवन में रोज़मर्रा की गालियाँ बताई बच्चे ने। बच्चों की बातचीत सुन सकते हैं यहाँ वीडियो में। 

बच्चों को खेलता छोड़कर हम आसपास थोड़ा टहले। लोग रेत में अपने-अपने हिसाब से ज़मीन घेरकर गर्मी के फल उगाने की तैयारी कर रहे। गोबर की खाद भी दिखी वहीं। हम एक घेरे में घुस गए यह सोचते हुए कि आगे निकलने का रास्ता होगा। लेकिन जगह इस तरह से घिरी हुई थी कि उसको पार करने का कोई जुगाड़ नहीं था। हमको वापस लौटना पड़ा।

लौटकर देखा तो बच्चे खिलौना बनाने के काम पूरा करके या स्थगित करके नदी में नहा रहे थे। हमारे पास पहुँचने तक वो बाहर निकल आए। हमने उनके फ़ोटो खींचने के लिए पूछा तो सब तैयार हो गए। पोज बनाकर भी खड़े हो गए। एक बच्चे ने उँगली से 'V' का निशान भी बनाया। उसको देखकर बच्ची ने  भी उँगली 'V' वाले अन्दाज़ में फैला ली। बच्ची ने पहले 'V' का निशान ऊपर की तरफ़ करके बनाया। बाद में  दोनों आखों को घेरते हुए 'V' का निशान बना लिया। 

फ़ोटो देखकर बच्चे खुश हो गए। एक ने उत्साहित होकर कहा -'अबे अब हमारे फ़ोटो वायरल हो जाएँगे। इंस्टाग्राम पर लगाएँगे अंकल।' सब बच्चों ने चहकते हुए  फिर से फ़ोटो देखे और दोबारा पोज देकर फ़ोटो खिंचवाए। वे खुश हो गए। मेरे मन हुआ कि काश ये फ़ोटो उन बच्चों को दे पाते। अब सोच रहे हैं कि बनवाएँगे फ़ोटो। कभी शुक्लागंज गए तो लेते जाएँगे। दे देंगे बच्चों को। 

बच्चों ने बताया कि उनमें से तीन बच्चे स्कूल जाते हैं। एक सबसे छोटा बच्चा स्कूल नहीं जाता। उसके बारे में बच्चों ने कहा -'ये स्कूल नहीं जाता , गाली बकता रहता है।' मुझे ताज्जुब हुआ कि पाँच-दस मिनट में ही गाली देने की शिकायत बच्ची से हटकर एक बच्चे की तरफ़ मुड़ गयी। 

बच्चों के नाम पूछे तो पता चला उनके नाम जैन खान, बिलाल खान , शाहबाज़ अली खान और आलिया खान हैं। सब एक ही परिवार के बच्चे हैं। सगे ,चचेरे  भाई-बहन। शाहबाज़ अली खान ने अपना नाम और लम्बा बताया था। लेकिन बाद में अपना नाम शाहबाज़ अली खान तक ही सीमित करने को राज़ी हो गया। बच्चे शुक्लागंज में गोताखोर मोहल्ले में रहते हैं। शायद उनके घर वाले नाव चलाने का काम करते हों। हो सकता है कोई गोताखोर भी हों। 

हमने बच्चों से पूछा -'कोई कविता या कोई शायरी आती है ? आती हो तो सुनाओ।'

बच्चों ने फ़ौरन एक शायरी सुनाई । 

किनारे  पे न चलो, किनारा टूट जाएगा ,

चोट तुम्हारे  लगेगी , दिल हमारा टूट जाएगा।

सबसे पहले शायरी  शाहबाज़ अली खान और आलिया ने सुनाई। फिर सभी ने बारी -बारी यही शायरी दोहराई। हड़बड़ी में शायरी के लफ़्ज़ इधर-उधर होते रहे। बच्चे एक-दूसरे को 'अरे चुप ' कहते हुए अपने अन्दाज़ में शायरी सुनाते रहे। 

बच्चों से हमने कोई और भी कविता या शायरी सुनाने को कहा तो उन्होंने कहा -'हमको यही आती है।' 

बच्चे आपस में खेलने में मशगूल हो गए। हम वापस लौट लिए। 

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Saturday, November 30, 2024

धनिया के पैसे नहीं लेंगे, जाओ मौज करो

 
शाम को सब्ज़ी लेने गए बाज़ार। गुमटी में कुछ काम था तो सोचा सब्ज़ी भी वहीं से ले लेंगे। रास्ते में सोचा सब्ज़ी विजय नगर से ही ले लें, बाक़ी सामान गुमटी से ले लेंगे। लेकिन फिर न्यूटन के जड़त्व के नियम का आदर करते हुए गुमटी की तरफ़ ही बढ़ लिए। 

गुमटी में भीड़ बहुत थी। गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं मिली मेन रोड पर। गली में घुसा दिए गाड़ी। गली में घुसते ही एक दुकान बंद हो रही थी। वहीं कुछ देर इंतज़ार करके,  दुकान का शटर गिरने पर गाड़ी खड़ी कर दी। 

गाड़ी करने के बाद सब्ज़ी वाली की तरफ़ गए। सब्ज़ी वाली गली में फल, अचार और परचून की भी दुकाने भी हैं। सड़क ठेलिया वालों के क़ब्ज़े में सहम-सिकुड़ गयी थी। सड़क से किसी गाड़ी की सहज रूप से गुजरना चुनौती का काम।

एक दुकान से कुछ सब्ज़ी ली। 240 रुपए हुए। आनलाइन भुगतान के लिए स्कैनर माँगा तो सब्ज़ी वाले ने कहा -'हम मोबाइल ही नहीं रखते। स्कैनर भी नहीं।' 

जब तक भुगतान के लिए पैसे निकालें सब्जीवाले ने थोड़ी धनिया थमा दी। हमें लगा -'दस रुपए की धनिया दे रहे हैं ताकि 250 रुपए हो जाएँ और भुगतान आसान हो जाए।'

धनिया हमारे गार्डन में लगी है। हमने कहा -'धनिया नहीं चाहिए।'

सब्ज़ी वाले भाई जी ने शाही  अन्दाज़ में कहा -'अरे धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 

हमने बहुत कहा धनिया के पैसे ले लो लेकिन उन्होंने लिए नहीं। 

हमने नाम पूछा तो बताया -'नरेश।'

हमने कहा -'नरेश माने राजा होता है। इसीलिए अन्दाज़ शाही है।'

नरेश बोले -'सब आप लोगों की दुआ है। '

वहीं खड़े एक ग्राहक ने बताया -'नरेश सबसे मस्त सब्ज़ी वाले हैं यहाँ। दरियादिल।सब लोग इसीलिए इनके पास आते हैं सब्ज़ी लेने। '

हमने 500 रुपए का नोट दिया। जब तक वो पीछे की परचून की दुकान से फुटकर कराएँ तब तक हमने सोचा गोभी भी यहीं से ले लेते हैं। गोभी हमें लेनी थी, हमने देख भी ली थी वहाँ लेकिन देखने में थोड़ा बड़ी लगी थीं इसलिए सोचा और दुकाने भी देख लें। लेकिन मुफ़्त की मिली धनिया ने हमें गोभी भी वहीं से लेने के लिए उकसा दिया। पचास रुपए की एक गोभी के हिसाब से दो गोभी ले ली। 

इस बीच एकाध ग्राहक और आए। उनको भी शाही अन्दाज़ में निपटाया सब्ज़ी वाले ने। 

हम और सब्ज़ी लेने के लिए दूसरे ठेलियों की तरफ़ गए। सब सामान ले लिए लेकिन मशरूम नहीं मिला कहीं। हमें याद आया कि नरेश की ठेलिया पर मशरूम थे कुछ। हम वापस गए। देखा केवल दो पैकेट बचे थे मशरूम के। हमने पूछा -'केवल दो ही हैं ?'

'कितने चाहिए ?' -पूछा नरेश ने।

हमने बताया -'पाँच पैकेट चाहिए।'

'दो मिनट रुकिए' कहकर नरेश उस तरफ़ चले गए जिधर और सब्ज़ियों की दुकानें थीं। उन दुकानों पर कहीं दिखा नहीं था मुझे मशरूम। हमें लगा वे  उनमें से ही किसी दुकान पर खोजेंगे और ख़ाली वापस आएँगे। लेकिन कुछ ही देर में नरेश तीन मशरूम के पैकेट लिए आए और हमारे सामने धर दिए। चालीस रुपए के एक पैकेट के हिसाब से दो सौ रुपए भुगतान करके कहा -'तुम्हारा दिया हुआ नोट तुम्हारे पास ही लौट आया।'

इस बीच एक महिला गोभी लेने आई। मोलभाव करने पर नरेश ने कहा -'अभी-अभी भाई साहब को पचास रुपए में दी है। आप पैंतालीस रुपए दे दो।'

लेकिन महिला और कम कराने पर तुली थी।उसने चालीस रुपए में देने को कहा। नरेश  पैंतालीस पर ही अड़े रहे। महिला ने फिर चालीस की ज़िद की। चालीस -पैंतालीस की रस्साकसी देखती हुयी  गोभी ठेलिया पर  शांत भाव से बैठी रही।

महिला ग्राहक और नरेश का मोलभाव देखकर हमको  याद आया कि नरेश ने हमको दस रुपए की धनिया मुफ़्त में दी थी। हमने चलते हुए कहा -'अरे दस रुपए हमसे वापस ले लो। गोभी दे दो ।'

नरेश ने हाथ जोड़ दिए। बोले -'आपकी दुआ बनी रहे। यही बहुत है।' 

हम चल दिए। देख नहीं पाए कि महिला को गोभी कितने में दी आख़िर में। 

अभी घर आकर हमको नरेश का अन्दाज़ याद रहा है -'धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 



Friday, November 29, 2024

नीचे बहती गंगा मैया , ऊपर चले रेल का पहिया

कानपुर कनकैया , जंह पर बना घाट सरसैया
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पिछले दिनों कानपुर को शुक्लागंज से जोड़ने वाला गंगापुल का एक हिस्सा टूट गया। इस पुल से शहर की तमाम अनगिनत ऐतिहासिक यादें जुड़ी थीं।
लगभग एक सौ पचास साल पुराना यह पुल कानपुर से शुक्लागंज को जोड़ता था। पुल दो खंडों में बना था। नीचे लकड़ी का पुल था, जिससे हल्के वाहन और पैदल यात्री गुजरते थे और ऊपर सड़क पर कारें और दूसरे वाहन चलते थे। ऊपर वाले हिस्से पर पहले नैरो गैज का रेलवे ट्रैक था। 14 जुलाई 1875 को पहले नीचे वाला पैदल पुल खुला और दूसरे दिन रेल पुल से ट्रेनों का आवागमन शुरू हुआ।
पुल बनने में तब 17.60 लाख रुपए खर्च हुए थे।
इस पुल की लंबाई करीब 800 मीटर है।लगभग 50 साल तक इस पुल के ऊपरी हिस्से से ट्रेनें और नीचे से अन्य वाहन गुजरते रहे। कानपुर पर गंगा किनारे सरसैया घाट है। कानपुर , सरसैया घाट और गंगापुल को जोड़ते हुए लोगों ने गीत गढ़ा :
कानपुर कनकैया ,
जंह पर बना घाट सरसैया,
नीचे बहती गंगा मैया ,
ऊपर चले रेल का पहिया,
चना ज़ोर गरम .... ।
चना बेचने वालों ने इस अपने-अपने हिसाब से गढ़े लोकगीत के माध्यम से कानपुर और शुक्लागंज को जोड़ने वाले इस गंगापुल को अनगिनत पीढ़ियों और लोगों के ज़ेहन में इसे प्रसिद्ध कर दिया। अपने-अपने हिसाब इसकी यादें लोगों के दिमाग़ में बसी हुई हैं। चना बेचने वाले रामकथा से जोड़कर आगे कहते थे :
चने को खाते लछमण वीर
चलाते गढ लंका में तीर
फूट गयी रावण की तकदीर
चना जोर गरम......।
इस लोकगीत में समय-समय पर समसामयिक किस्से अपने-आप जुड़ते रहे और पुल पर से पीढ़ियाँ गुजरती रहीं। लगभग आधा शुक्लागंज रोज़ी-रोटी के सिलसिले में रोज इस पुल से कानपुर आता-जाता रहा।
बाद में जब उन्नाव और कानपुर के बीच सड़क और ट्रेन यातायात बढ़ा तो ट्रेनों के लिए अलग से पुल बनवाया गया और पुराने पुल के दोनों हिस्सों पर सड़क यातायात की व्यवस्था कर दी गई।
कानपुर से शुक्लागंज को जोडऩे के लिए अंग्रेजों ने पुल का निर्माण शुरू किया था । अवध एंड रुहेलखंड कंपनी लिमिटेड को इस पुल के निर्माण का ठेका दिया गया। पुल की डिजाइन जेएम हेपोल ने बनाई थी। निर्माण कराने वाले रेजीडेंट इंजीनियर एसबी न्यूटन ने असिस्टेंट इंजीनियर ई वेडगार्ड के साथ मिलकर इसे तैयार किया था। तब चीफ इंजीनियर टी लोवेल थे।
गंगा के एक ओर शुक्लागंज में कानपुर पुल बायां किनारा या गंगाघाट रेलवे स्टेशन था तो इस पार भी एक रेलवे स्टेशन बना था। ऐसा माना जा रहा है कि गंगाघाट की तरह इस पार भी ट्रेनें रुकती थीं। केंद्रीय विद्यालय व ओईएफ स्टेडियम के सामने आज भी ईंटों का बना एक लंबे चबूतरे का ढांचा देखा जा सकता है। बुजुर्ग बताते हैं कि यहां कभी स्टेशन था और ट्रेनें रुकने पर इस चबूतरे का प्रयोग प्लेटफार्म के रूप में किया जाता था। पैदल पुल मार्ग से प्लेटफार्म पर चढऩे के लिए सीढिय़ां भी थीं, जो अब मिट्टी में दब चुकी हैं।
पुल की हालत देखते हुए इस पर क़रीब चार साल पहले आवागमन बंद कर दिया था। इस पुल से हम भी कई बार आए-गए। नीचे पैदल यात्रियों ने लिए बने पुल पर लोग गर्मी के दिनों में आराम करते दिखते थे। पुल की बनावट के चलते धूप-छाँह का खूबसूरत गठबंधन दिखता था।
कल टूटे पुल को देखने गए। पुल कानपुर की तरफ़ से क़रीब 300 मीटर की दूरी पर टूटा है। लोगों ने बताया कि रात को टूटा पुल। कोई आवागमन होता नही था इसलिए जानमाल का कोई नुक़सान नहीं हुआ।
शुक्लागंज को कानपुर से जोड़ने वाले तीन पुलों में यह पुल सबसे पुराना था। सबसे पुराना पुल क़रीब 1875 में चालू हुआ था। इस पुल पर लगभग पचास साल तक चलती रहीं। दूसरा ट्रेनों के आवागमन के लिए पुल 1990 में चालू हुआ। ट्रेन का आवागमन अभी भी इसी पुल से होता है। तीसरा नया पुल पैदल, गाड़ियों के आवागमन के लिए बनाया गया।
पुल हालाँकि जर्जर हो जाने के कारण आवागमन के लिए बंद कर दिया गया था। फिर भी इसकी मरम्मत की बातें चलती रहती थीं। इसको एक पिकनिक स्पाट के रूप में विकसित करने की योजनाएँ भी चल रहीं थीं। पुल के टूट जाने से इन योजनाओं के क्या रूप बदलेंगे यह आने वाला समय बताएगा।
एक पुल नदी के दो किनारों को जोड़ता है। लेकिन साथ ही यह लोगों को अनगिनत स्मृतियों से भी जोड़ता है। अनगिनत लोग जो इससे गुजरे रहे हैं उनकी न जाने कितनी यादें इस पुल से जुड़ी होंगी। पुल भले टूट गया लेकिन अनगिनत लोगों की यादों में पुल हमेशा बना रहेगा। कानपुर के इतिहास में यह लोकगीत दर्ज रहेगा :
कानपुर कनकैया ,
जंह पर बना घाट सरसैया,
नीचे बहती गंगा मैया ,
ऊपर चले रेल का पहिया,
चना ज़ोर गरम .... ।
पुल के बारे में अख़बार में छपी खबरें कानपुर के इतिहासकार Anoop Shukla की फ़ेसबुक वाल से। पूरा गीत इस लिंक में सुनिए।