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Monday, February 20, 2023

मोबाइल मरम्मत की मशक्कत



मोबाइल का कैमरा खराब हो गया है। मोबाइल बेकार लगने लगा। बातचीत के लिए इस्तेमाल होने वाला उपकरण बातचीत के अलावा होने वालों काम के लिए उपयोग इतना अधिक आने लगा है कि जीवन के तमाम कामकाज इस मोबाइल पर निर्भर हो गए हैं। मोबाइल पर निर्भरता इतनी बढ़ गयी है कि इसके बिना काम चलना मुश्किल लगने लगा है।
सर्विस सेंटर में दिखाया। उन्होंने कहा -'कैमरा अभी है नहीं। दस दिन में आने के चांस हैं। तब तक मोबाइल जमा करना होगा।'
हमने कहा -'दस दिन जमा करने के बजाय आप कैमरे के पैसे जमा कर लो। जब कैमरा आएगा, बदलवा लेंगे।'
वो नहीं माने। बोले-'हमारी कम्पनी की पॉलिसी के हिसाब से मोबाइल जमा करना होगा।'
अब बताओ भला अपने प्यारे मोबाइल को दस दिन के लिए अकेले कैसे छोड़ दें। बिना नेट कनेक्शन के, किसी अंधेरे कोने में पड़े-पड़े मोबाइल बेचारे का तो दम घुट जाएगा। इतना इंतजार तो मोहब्बत के मारे भी आजकल नहीं करते। इंतजार बड़ा बवालिया काम है।
हमने यह भी पूछा कि मोबाइल के पार्ट मंगाने में इतना समय क्यों? आप रखते क्यों नहीं साथ में।
वो बोले-'पुराना हो गया मोबाइल। इसकी रिपेयरिंग के पार्ट मुश्किल से मिलते हैं।'
हमको लगा कि इस मामले में मोबाइल और समाज एक जैसे हो गए। जैसे-जैसे पुराने होते जाते हैं उनकी मरम्मत मुश्किल होती जाती है। मरम्मत के पुर्जे बनने बन्द हो जाते हैं। बिना मरम्मत के टूटे-फूटे ही काम चलता रहता है।
हम मोबाइल लिए-लिए बाहर आ गए। सागर मार्केट बगल में है। सागर मार्केट कानपुर में मोबाइल रिपेयर का महासागर है। सैकड़ों दुकानें हैं मोबाइल रिपेयरिंग की, सामान की, एसेसरीज की। हर दुकान का दावा ऐसा कि बस वही सही दुकान है। कानपुर की सबसे सस्ती होलसेल और रिटेल की इलेक्ट्रॉनिक मार्केट है सागर मार्केट।
रास्ते में जगह-जगह मोबाइल रिपेयरिंग और लैपटॉप रिपेयरिंग सिखाने के इश्तहार वाली दुकानें, गुमटियां भी दिखीं। कुल मिलाकर लगा किसी मोबाइल रिपेयरिंग विश्वविद्यालय में टहल रहे हैं। मन किया कि रिपेयरिंग का काम सीखकर यहीं कहीं गुमटी डाल लें और मोबाइल रिपेयरिंग का काम शुरू कर दें। गुमटी को चर्चा में लाने के लिए ऑफर लगा दें -'मोहब्बत करने वालों के मोबाइल की रिपेयरिंग मुफ्त में।' पता चला दुकान में सारा काम मुफ्त का ही आएगा। हर मोबाइल धारी आएगा कहेगा -'मोहब्बत है लेकिन एकतरफा।' कोई कहेगा -'तुम मोबाइल बनाओ यार, हम रिपेयरिंग तक मोह्हबत करके सबूत दिखाएंगे।'
बहरहाल सागर मार्केट में दिखाया फोन तो एक ने दूसरे के पास, दूसरे ने तीसरे के पास भेजा।इस तरह पांचवे तक पहुंचते हुए ज्यादा समय नहीं लगा। अगले ने बताया कि कैमरा रिपेयर हजार रुपये और बदलने के पंद्रह सौ लगेंगे। हमने कहा -'बदल ही दो।'
उसने मोबाइल को गरम किया। खोला। बताया कि इसकी पट्टी भी खराब हो सकती है। कोशिश करते हैं। ठीक होनी चाहिए। अगर ठीक हुई तो चलेगा नहीं तो नहीं। बता दिया पहले इसलिए कि बाद में आप बहस न करें।
हमें लगा कि क्या हो गया है अपने देश को। हर आदमी बहस से कतराने लगा है। बिना बहस कैसे काम चलेगा।
मजबूरी में हमने बात मान ली उसकी। यह सोचते हुए कि बहस करने का मन बनेगा तो करेंगे ही। कौन एस्टेम्प पेपर पर लिख कर दे रहे हैं कि बहस नहीं करेंगे।
मोबाइल खुलने के बाद पता चला कि घन्टा भर लगेगा। हमने कहा -'कोई बात नहीं हम इंतजार करेंगे।'
इंतजार करने में कौन हमारी जेब से कुछ जाता है। इंतजार हमारे खून में है। बेमियादी इंतजार। भले ही लोहिया जी 60 साल पहले कहें हो कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती। लेकिन दुनिया की तमाम कौमें न जाने कब से इंतजार कर रहीं हैं। इंतजार करते-करते न जाने कितनी पीढियां गुजर गयीं। इंतजार जारी है। हम भी करेंगे। डरते थोड़ी हैं इंतजार करने से।
मोबाइल खुला तो उसके अनगिनत पार्ट इधर-उधर जुड़े दिखे। किसके तार किससे जुड़े हैं और उसका काम क्या है , समझना मुश्किल। हमारे लिए तो नामुमकिन। देखते रहे मोबाइल पर चिमटियां चलते।
रिपेयर करने वाले परवेज सागर मार्केट के पहले गुमटी धारकों में से एक हैं। सोलह-सत्रह साल पहले आये थे यहां। तब कुछेक दुकानें ही थीं। अब सैकड़ों दुकानें हो गयीं। शुरआत में मोबाइल मंहगे होते थे। रिपेयर का काम खूब चलता था। अब मोबाइल सस्ते हो गए। काम कम हो गया।
क्राइस्टचर्च से ग्रेजुएट परवेज मोबाइल संभालते हुए बता रहे थे गुमटी का किराया 22 हजार महीना है। कुल जमा दो आदमियों के बैठने की जगह। हर साल किराया बढ़ जाता है। मुश्किल है लेकिन मजबूरी और ज्यादा है। मजबूरी मुश्किल पर हावी है।
घण्टे भर की मेहनत के बाद परवेज ने बोला -'सॉरी, ठीक नहीं हो पाया। पट्टा खराब है।' पट्टा मतलब मोबाइल के कैमरे को सिग्नल देने वाला पट्टा। मोबाइल बांध के हमको थमा दिया। इतनी देर की मजदूरी की भी बात नहीं की।
हमने कहा -'पट्टा मंगवा लो। लगा दो। ठीक करो।'
परवेज ने बात की। दिल्ली। बोले -'मगंल को आएगा पट्टा।' हमने कहा -'कोई बात नहीं। मंगल को आएंगे।'
परवेज ने कहा -'कुछ पैसे एडवान्स जमा करने होंगे।' हमने कर दिए। परवेज ने हमारा नम्बर लेकर हमको व्हाट्सअप पर मेसेज भेजा। इतने रुपये एडवान्स लिए । विजिटिंग कार्ड पर अलग से लिखकर दिया।
हम लौटते हुए सोच रहे थे कि यार हिंदुस्तान में सैकड़ों दुकानें दिखीं रिपेयर की। अमेरिका में एक्को दुकान न दिखी मोबाइल रिपेयर की। वो लोग सिर्फ नया बेंच पाते हैं। पुराना सुधार नहीं पाते।
सुधारने में मेहनत लगती है। अमेरिका में मेहनत की कीमत ज्यादा है। इसीलिए वो लोग मरम्मत पर ज्यादा भरोसा नहीं करते। खराब हुआ बदल डालो।
बहरहाल, अब मंगलवार का इंतजार है।

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Sunday, February 12, 2023

अमेरिका से वापसी



अमेरिका से वापस आ गए? कब आये? अभी अमेरिका में हो या इंडिया में? कब वापसी होगी ? बाईडन से मिले कि नहीं?
आजकल फोन या मुलाकात होने पर हर तीसरा दोस्त इसी घराने के सवाल पूछता है। तीसरा इसलिए क्योंकि बाकी दो लोग पहले ही यह पूछ चुके होते हैं।
कितने दिन रहे, कहाँ-कहाँ गए बाकी के सवाल होते हैं। अमेरिका के बाद जब पूना की पोस्ट लिखी तो सवाल उठा -'अमेरिका के गोल्डन गेट से सीधा पूना आ गए। आने का किस्सा लिखा ही नहीं।'
फेसबुक पर लिखना इस तरह हो गया हो गया कि हमारी हाजिरी यहीं होने लगी। जिस जगह के बारे में लिखा फेसबुक हमारी उपस्थित वहीं लग जाती है।
पिछले दिनों जो लोग मिले उनमें से कई लोगों ने बताया कि वे नियमित पढ़ते हैं हमारी पोस्ट। हमको ताज्जुब हुआ कि क्या वाकई इतने लोग पढ़ते हैं। लेकिन जब लोगों ने पोस्ट्स का जिक्र करके बताया तो मान गए। मानना पड़ा।
अमेरिका हम गए थे पिछले साल 25 दिसंबर को। लौटे 28 जनवरी को। इस दौरान सैनफ्रांसिस्को और उसके आसपास घूमे। कुछ के बारे में लिखा। कुछ बाकी है। लिखेंगे जल्द ही। कई किस्से बाकी हैं। आहिस्ते-आहिस्ते लिखेंगे।
पिछली बार तीन साल पहले जब गए थे अमेरिका तो उसके संस्मरण छपाने की बात सोची थी। नाम भी तय हो गया था -'कनपुरिया कोलम्बस।' अब इस यात्रा के भी किस्से भी जमा हो गए। देखिए कब तक आती है किताब।
लगता यह भी है कि किताब छपेगी तो क्या लोग खरीदेंगे, पढ़ेंगे! किताब खरीदकर पढ़ने का चलन कम है अपने यहां। है भी तो सेलिब्रिटी लेखकों तक।
अमेरिका से अब अपने देश आ गए। यहाँ के किस्से लिखे जाएंगे अब। अमेरिका में घूमते हुए लगा था कि अपने शहर के हर हिस्से को कायदे से देखा जाए। जाना जाए। हम लोग अक्सर पूरी जिंदगी बिता देने के बाद भी अपने शहर से अपरिचित, अनजान रह जाते हैं।
अब अपना शहर जमकर घूमना है। आप भी अपने शहर का चप्पा-चप्पा छानिये। शहर और आप दोनों खुश होंगे।
इस बीच हमारे छोटे सुपुत्र अनन्य Anany अपनी कंपनी फिरगुन ट्रैवेल्स के पहले विदेशी दौरे पर आजकल थाइलैंड के दस दिन के टूर पर निकले हैं। 22 लोगों के साथ। ट्रिप लीडर के रूप में यह उनका पहला विदेशी टूर है। अभी शुरुआत हुई है। ऐसे अनेक दौरे होंगे अब तो। आप भी निकलिए कहीं घूमने। अच्छा लगेगा।
अपडेट: टिप्पणी बॉक्स में घुमक्कड़ी के लिए उकसाता हुआ अनन्य का लिखा और उनके मित्र अर्जित आनंद का कंपोज़ किया और गाया गीत -निकल बेवजह।
Firguntravels.com में कंपनी के बारे में तथा जिन लोगों यात्रायें की उनके अनुभव पढ़िए।

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Monday, February 06, 2023

गोल्डन गेट पुल के आस-पास

 




गोल्डन गेट पुल पर पहुंचकर हम लोग वेलकम सेंटर पहुंचे। वेलकम सेंटर पर गोल्डन गेट से सम्बंधित तमाम सामान बिक रहा था। फोटो एलबम, किताबें, स्मृति चिन्ह आदि। हमने उन सामानों को देखा। ललचाये भी कुछ को देखकर। लेकिन उनकी कीमतों ने हमको खरीद से बचा लिया।
वस्तुओं के दाम भी हमको बचत में सहयोग करते हैं। बचत बढ़ाने के लिए चीजों के दाम अधिक होने चाहिए। जहां भी मंहगाई अधिक है, वहाँ मंहगाई के लिए जिम्मेदार समझे जाने वाले लोग इस तर्क का उपयोग कर सकते हैं।
वेलकम सेंटर से कुछ दूरी पर ही गोल्डन गेट पुल है। हम लोग पुल की तरफ बढ़े। रास्ते में तमाम लोग जगह-जगह पुल को साथ में लेकर फोटो खिंचाने में लगे हुए थे। जबसे पुल बना होगा तब से करोड़ों अरबों लोग पुल को देख चुके होंगे, इसके साथ फोटो खिंचा चुके होंगे। पुल बिना किसी भेदभाव के सबके साथ फोटो खिंचवा चुका होगा।
पिछली बार, तीन साल पहले, जब आये थे पुल देखने तो पुल कुछ शरमाया हुआ सा था। काफी देर तक कोहरे की चादर में मुंह छिपाए रहा। दिखा ही नहीं। जब सूरज भाई को पता चला तो आये और कोहरे की चादर को हटाया। पुल का मुखड़ा दिखा।
इस बार ऐसा कुछ नहीं था। पुल परिचित था। खिली हुई धूप में खुलकर मिला।
पुल पर टहलते हुए लोग फोटोबाजी में व्यस्त थे। पिछली बार छुट्टी का दिन था शायद । सुबह का समय भी। लोग पुल के पास साइकिलिंग और जॉगिंग करते हुए दिखे थे। कुछ लोग किसी दौड़ में भाग भी ले रहे थे। इस बार शाम का समय होने के कारण लोग आराम मुद्रा में टहल रहे थे।
तीन महिलाएं आपस में बतियाती हुई फोटोबाजी कर रहीं थीं। बुजुर्ग थीं लेकिन मस्ती कालेज में पढ़ती सहेलियों वाले अंदाज में कर रहीं थीं। भाषा समझ नहीं आ रही थी लेकिन भाव बिंदास घराने के ही थे।
पुल पर गाड़ियां धड़-धड़ करती हुई निकल रहीं थीं। दुष्यंत कुमार जी का शेर याद आया:
तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
यहां पुल पर रेल नहीं गाड़ियां गुजर रहीं थी। पुल भी थरथरा नहीं रहा था। धड़-धड़ कर रहा था। जिस हिस्से से गाड़ी गुजरती वह हिस्सा धड़ से बोलता और गाड़ी आगे निकल जाती। मानों पुल गाड़ी के निकल जाने की मोहर लगाकर गाड़ियों को आगे धकेल रहा हो।
हवा तेज चल रही थी। धूप बढिया खिली हुई थी। दूर एक तरफ आर्कताज जेल और दूसरी तरफ सैन फ्रांसिस्को की इमारतें दिख रहीं थीं। उनको देखकर लगा कि ये इमारतें भी एक तरह की खुली हुई जेल सरीखी ही हैं जहां लोग अपने को अपनी मर्जी से बन्द करके रहते हैं। काम करते हैं, जीते हैं, खुश रहते हैं, दुखी होते हैं। छटपटाते हैं लेकिन यहां से निकलने की सोचते ही कांप जाते हैं। सुख-सुविधा का जाल ऐसा ही होता है। विनोद श्रीवास्तव जी की कविता सरीखा:
पिंजरे जैसी इस दुनिया में
पंछी जैसा ही रहना है,
भरपेट मिले दाना-पानी
फिर भी मन ही मन दहना है।
इमारतों में सबसे ऊंचा पैंसठ मंजिला सेल्सफोर्स टावर था। उसके आसपास की इमारतें उसके सामने चिल्लर जैसी लग रहीं थीं। सेल्सफोर्स आमतौर पर कर्मचारियों का हित देखने वाली और पारिवारिक माहौल कंपनी मानी जाती थी। यहां इस बार कई हजार लोग निकाले गये। निकले हुए लोगों को कैसा महसूस होता होगा अब इस टावर को देखकर, कहना मुश्किल है।
पुल की रेलिंग ऊंचाई तक जाली से ढंकी थी। लोग पुल से कूदकर आत्महत्या की कोशिश करते हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ही रेलिंग ऊंची और जाली से ढंक दी गयी है।
नीचे पानी में कुछ लोग तैर रहे थे। ऊंचाई के कारण उनको देखकर ऐसा लग रहा था कि पानी में मछलियां तैर रही हैं।
पुल पर टहलते हुए, लोगों और नजारे को देखते हुए हम लोग पुल के बीच तक गए। वहां पुल के बारे में जानकारियां और उदघाटन के विवरण लिखे हुए हैं। उनको देखते हुए हम वापस लौटे।
पुल देखकर लपकते हुये रेस्टरूम गए। रेस्टरूम साफ-सुथरा था। मुफ्तिया सार्वजनिक रेस्टरूम पर ऐसी साफ-सफाई हमारे लिए भले ताज्जुब का कारण हो लेकिन यहां के लिए सामान्य बात है।
इसके बाद एक बार फिर फोटोबाजी का दौर चला। अकेले, साथ में और अलग-अलग पोज में फोटो खींचे गए।
फोटोबाजी के बाद मन किया कुछ खाया-पिया जाए। खाने-पीने की बात चलने के बाद वहां मौजूद एक रेस्तरां की तरफ देखा। रेस्तरां की तरफ बढ़ते हुए जेब में हाथ डाला तो बटुआ , जिसमें फॉरेक्स कार्ड, क्रेडिट कार्ड और नकद रुपये थे, नदारद मिला। पहले तो लगा किसी ने मार दिया। ऐसा तो अपने यहाँ भीड़ में होता है। यहां खुले में हो गया। लेकिन फिर याद आया चलते समय पर्स रखना भूल गए थे। साथ में आये लोगों सारी निगाहें हमको लापरवाह बता रहीं थीं।
हमको याद आया हमारे फोन में गूगल पे एप है। हमने रेस्तरां में जाकर पूछा -'यहां गूगल पे से भुगतान होता है?' उसने माफी मांगते हुए बताया -'गूगल पे यहां नहीं चलता।' हमको लगा क्या अजीब बात है। जहां गूगल का मुख्यालय है वहीं गूगल का एप गूगल पे नहीं चलता है। मायूसी और खुशी के कॉकटेल वाले भाव के साथ वापस आ गए। मायूसी एप के न चलने की थी, खुशी एप के न चलने से पैसे बचने की थी। पैसा बचाया मतलब पैसा कमाया। कितना कमाया यह पता नहीं।
तब तक शाम हो गई थी। सूरज भाई विदा ले रहे थे। विदा होने से पहले वो पानी में नहा रहे थे। हम भी लौटने का मन बना लिए।
लौटने के लिए टैक्सी बुलाई। फौरन आ गयी। इस बार ड्राइवर साहब तुर्की के थे।नाम था हसन। पढ़ाई के साथ काम करनेवाले। एक दिन पहले तुर्की के क्रांतिकारी जनकवि नाजिम हिकमत का जन्मदिन था। हमने बातचीत शुरू करने के लिए लिहाज से नाजिम हिकमत का नाम लिया-' नाजिम हिकमत तुर्की के थे।' ड्राइवर ने थोड़ा चहकते हुए कहा -'ओह नाजिम द ग्रेट , रिवोल्यूशनरी पोयट्। एस्टरडे वाज हिज बर्थडे।' कुछ और भी बातें हुईं क्रांतिकारी कवि के बारे में। उसकी बातों से ऐसा नहीं लगा कि उसको साहित्य में कोई खास रुचि होगी। लेकिन नाजिम हिकमत और उनके जन्मदिन के बारे में पता था उनको।
हमको लगा कि परदेश में रहने वाले अपने देश के किसी आम आदमी को अपने देश के किसी कवि के जन्मदिन के बारे में क्या इतनी सहज जानकारी होगी? शायद नहीं। क्या पता शायद हो भी।
तुर्की के कमाल पाशा के बारे में भी उसने कुछ सम्मानजनक बातें कहीं। कमाल पाशा अपने देश के क्रांतिकारी स्व.रामप्रसाद बिस्मिल से इतना प्रभावित थे कि तुर्की के एक शहर का नाम 'बिस्मिल' रखा। जबकि अपने यहां शाहजहांपुर में जहाँ बिस्मिल/उनका परिवार रहता था वह जगह जस की तस है। खाली उनके घर की तरफ जाने वाली सड़क के द्वार पर उनका नाम लिखा बोर्ड लगा है। शहर में अलबत्ता उनकी मूर्ति जरूर लगी है उनके साथी शहीदों अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के साथ। अपने शहीदों को याद करने का यही तरीका है अपना।
इस बीच ड्राइवर का फोन आया। उसने हमसे पूछकर बात की।
लौटते हुए शाम हो गई थी। सड़क पर ट्राफिक ज्यादा था लेकिन जाम कहीं नहीं। सिर्फ रफ्तार कम हो गयी थी गाड़ियों की। चल वो अपनी लेन में ही रहीं थीं। लोग घरों को लौट रहे थे। महिलाएं और पुरुष दोनों थे लौटने वालों में। हमको वसीम बरेलवी साहब का शेर याद आ रहा था जिसमें उन्होंने घरवालियों को समझाया था:
थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें
सलीकामंद शाखों का लचक जाना जरूरी है।
यहाँ शाखें और परिंदे दोनों घर लौट रहे थे। कौन लचकेगा। शायद वो जो पहले लौटे। तब शायद शेर इस तरह पढा जाए:
थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें,
जो पहले लौट आये, उसका लचक जाना जरूरी है।
बहरहाल हम गाड़ी पर थे। थके नहीं थे। घण्टे भर में करीब घर पहुंच गए। गोल्डन गेट ब्रिज की तीन साल बाद यह हमारी दूसरी यात्रा थी। इस बीच पुल भले ही 3 साल और पुराना हो गया था लेकिन उसकी खूबसूरती और बढ़ गयी थी।

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Wednesday, February 01, 2023

गोल्डन गेट पुल की ओर



फॉस्टर सिटी में कई दिनों के बदली वाले मौसम के बाद धूप वाला दिन खिला। ऐसे ऑसम मौसम में घूमने के लिये हम लोग गोल्डन ब्रिज देखने गए। सैनफ्रांसिस्को और मैरीन काउंटी को जोड़ने वाला यह गोल्डन ब्रिज अपने तरह का अनूठा पुल है। तेज समुद्री लहरों और बहुत तेज हवाओं के कारण यह पुल बनना बहुत मुश्किल माना जाता था। लेकिन बना।
पुल का नाम गोल्डन गेट नाम पड़ने के पीछे किस्सा यह कि सैनफ्रांसिस्को प्रायद्वीप और मैरीन काउंटी प्रायद्वीप को जोड़ने वाला पानी का हिस्सा गोल्डन गेट जलडमरूमध्य (गोल्डन गेट स्ट्रेट) कहलाता है। इसी गोल्डन गेट जलडमरूमध्य के ऊपर बने होने के कारण यह पुल गोल्डन गेट ब्रिज कहलाता है।
फॉस्टर सिटी से गोल्डन गेट पुल 28.6 मील (लगभग 46 किलोमीटर) दूर है। नक़्शे के हिसाब से 55 मिनट का रास्ता। कोई हड़बड़ी थी नहीं। समय इफरात में था। इंतजार करने वाली टैक्सी की। बुकिंग के 10 मिनट के अंदर आने का बताया एप ने। बुक कर दी। लेकिन गाड़ी बुकिंग करते आने की सूचना मिली और आ भी गयी। हम चल दिये।
ड्राइवर का नाम इस्लाम था। कुरगिस्तान के मूल निवासी। कुरगिस्तान पहले सोवियत संघ का हिस्सा था। सोवियत संघ के विघटन के बाद अलगाव हुआ। पहले केंद्रीय सोवियत सत्ता होने के कारण व्यवस्था थी। आजादी के बाद तमाम बदलाव हुआ।
इस्लाम ने बताया कि कुरगिस्तान के सोवियत संघ से अलग होने के बाद वहां सत्ता परिवर्तन के लिये तीन क्रांतियां हो चुकी हैं। हर क्रांति के बाद सत्ता अराजक लोगों के हाथों जाती रही। हर बदलाव के बाद कुरगिस्तान के हालात बदतर होते गए।
इस्लाम ने बताया कि कहने को देश आजाद है लेकिन उस पर रूस का प्रभाव है। कारण यह कि तमाम चीजों के लिए देश रूस पर निर्भर है।
इस्लाम खुद विदेश नीति की पढ़ाई करके अमेरिका में आये हैं। 2015 में पहली बार आये थे। फिर आते-जाते रहे। पत्नी भी अमेरिका में ही हैं। एक बच्चा है। देश से लगाव के चलते बच्चे की पैदाइश के समय कुरगिस्तान चले गए थे। पत्नी किसी कम्प्यूटर कम्पनी में काम करती हैं। इस्लाम काम की तलाश में हैं। फिलहाल खर्च चलाने के लिए टैक्सी चलाते हैं। सुबह तीन-चार घण्टे चलाते हैं। फिर शाम को तीन-चार घण्टे। बाकी समय पढ़ाई करते हैं। बच्चे की देखभाल करते हैं।
विदेश नीति की पढ़ाई करके टैक्सी चलाने का काम करते जहीन शख्सियत के मालिक इस्लाम के साथ बात करते हुए अनायास मुहावरा याद आया -'पढ़ें फारसी बेंचे तेल' याद आया। सच पूछा जाए तो आज के समय यह बात तमाम जीनियस लोगों पर लागू होती है।
जहीन लोगों के इस हाल को बयान करते हुए परसाई जी कहते थे -'वे शेर हैं लेकिन सियारों की शादी में बैंड बजाते हैं।'
घर-परिवार और देश दुनिया के बारे में बात करते हुए इस्लाम ने बताया कि उनके घर वालों को हिंदी फिल्में बहुत पसंद हैं। ऋतिक रोशन, सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान उनके पसंदीदा एक्टर हैं। लेकिन उनके दादा जी की पसंदीदा पिक्चर अमिताभ बच्चन की बागबां है। पिक्चर को देखकर बार-बार कहते हैं बच्चों से कि हमारा कायदे से ख्याल रखना, अभिताभ बच्चन के बेटों की तरह हमारा बुढापा मत खराब करना।
गोल्डन गेट पुल पहुँचने पर टैक्सी का जीपीएस बहक गया। बार-बार इधर-उधर टहलते रहे। पुल के पास से गुजरते रहे लेकिन पुल नहीं आया। दूर से दिखता रहा पुल लेकिन हर मोड़ पर सड़क गाड़ी को पुल से दूर ही करती रही। इस चक्कर में गाड़ी 4 मील ज्यादा चल ली। आखिर में इस्लाम ने पुल के पास छोड़ दिया हमको और चले गए। हम लोग पैदल चलते हुए पुल पर पहुंचे।
48 किलोमीटर की यात्रा एक घण्टे में हुए और किराया ख़र्च हुआ 43 डॉलर मतलब 3500 रुपये लगभग।

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Monday, January 30, 2023

किताबों के बीच कुछ घंटे



 
नई जगह से सनीवेल पब्लिक लाइब्रेरी पास ही थी। करीब दस मिनट की दूरी। रास्ता सीधा। नाश्ता करके निकल लिए लाइब्रेरी।
रास्ते मे घर, मकान , सड़क के अलावा स्कूल भी मिले। एक स्कूल पब्लिक स्कूल था। चौराहे के एक कोने पर।
सुरक्षा के लिहाज से स्कूल लोहे की सरियों से ढंका था। बच्चे मैदान मे खेल रहे थे। उनकी देखभाल के लिए स्कूल की टीचर आसपास घूम रहीं थीं।
आगे एक और स्कूल दिखा। छोटे से मकान में। सजा हुआ था स्कूल। बाहर ही बच्चों के लिए काम के रजिस्टर भी रखे थे। हमने स्कूल देखने के लिए आफिस मे बात की। उन लोगों ने कहा –‘स्कूल देखने के लिए पहले से अनुमति लेनी होती है। आपने कोई अनुमति नहीं ली है इसलिए आपको हम स्कूल दिखा नहीं सकते।‘
हम आगे बढ़ गए। एक छुटके से घर मे इतने प्यारे अंदाज से वेलकम लिखा था। मन किया चले ही जाएँ घंटी बजाकर। स्वागत के लिए प्रस्तुत होकर करें- ‘बढ़िया चाय पिलाओ।‘ लेकिन पता था यह वेलकम लिखने के लिए है, अमल के लिए नहीं।
लाइब्रेरी के पास पहुंचकर खोजने के बहाने इधर-उधर टहलते रहे। कई लोगों से रास्ता पूछा। कई लोगों से बतियाए। एक घर के बाहर लाइब्रेरी से संबंधित कोई सूचना का कागज चिपका था। हमको लगा यही लाइब्रेरी है। खड़े हो गए वहीं। तब तक कोई अंदर से निकला। पूछा तो उसने बताया –‘लाइब्रेरी बगल मे है।‘
बगल मे पहुंचे तो बड़े से अहाते के बाहर तमाम लोग धूप मे पढ़ी कुर्सियों पर बैठे किताबें पढ़ रहे थे। एक महिला अपनी छोटी बच्ची को किताब के चित्र दिखाती हुई पढ़ा रही थी। कुछ लोग खाते-पीते हुए किताबों मे रमे हुए थे। लाइब्रेरी के बाहर ही एक किताब पढ़ते हुए आदमी की मूर्ति लगी हुई थी। मूर्ति मे आदमी बैठा हुआ हाथ मे बड़ा पाव टाइप का सैंडविच हाथ में लिए किताब पढ़ने मे मशगूल था। मूर्ति का आदमी मजदूर लग रहा था जो अपने काम के दौरान खाते हुए पढ़ाई कर रहा था। बहुत आकर्षक मूर्ति।
लाइब्रेरी के अंदर घुसते ही एक रैक पर कबाड़ के बने हुए कुछ सामान लगे हुए थे। वहाँ दिए विवरण के अनुसार मशहूर इंजीनियर सिड सिडेंसटीन (Sid Seidenstein) अपने रिटायरमेंट के बाद कबाड़ से कलाकृतियाँ बनाने का काम किया। अंग्रेजी में इसके लिए शब्द है –Bricolage जिसका मतलब है उपलब्ध सामग्री से निर्माण।
सिड करीब नब्बे साल की उम्र तक काम करते रहे (24 सितंबर, 1932 से -20 जुलाई 2022)। इन कलाकृतियों को बनाने की शुरुआत की कहानी बताते हुए सिड की पत्नी का ने बताया :
“एक दिन हम लोगों ने मार्डन आर्ट की शुरुआत का विज्ञापन देखा। विज्ञापन देखकर उन्होंने कहा:” ज्यादातर मार्डन आर्ट देखकर ऐसा लगता है जैसे कबाड़ को एक जगह रख दिया गया हो। मुझे लगता है कि मैं आम तौर पर फेंक दी जाने वाली सामान्य चीजों से बढ़िया कलाकृतियाँ बना सकता हूँ।“
इसके बाद सिड ने अपने गैराज में पुरानी चीजें इकट्ठा करके उनसे कलाकृतियाँ बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे यह काम बढ़ता गया। दोस्तों ने अपने पास की तमाम प्रयोग की हुई चीजें सिड को देनी शुरू कीं और सिड ने तमाम कलाकृतियाँ बनाई।
वहाँ लगे नोटिस के अनुसार अगर किसी को कोई कलाकृति पसंद आती है तो वो उसे अपने साथ ले जा सकता था- मुफ़्त में। यह भी लिखा था कि अगर कोई कलाकृति टूट जाती है तो उसे गोंद से जोड़ ले। उन कलाकृतियों में कुछ पुरानी फ़्लापी से बनाई गई थीं, कुछ पुराने तारों से और तरह-तरह के कबाड़ से। हमने कोई कलाकृति वहाँ से ली नहीं। सोचा यह यहीं अच्छी हैं। हम ले जाएंगे तो अच्छी-खासी कलाकृति को कबाड़ मे ही बदल देंगे।
सिड की कलाकृतियाँ देखकर मुझे चंडीगढ़ में बना राक गार्डन याद आया। स्व. नेकचन्द जैन जी ने अपने वर्षों की अथक मेहनत से तमाम कबाड़ से इस उद्यान को खूबसूरत बनाया था।
सिड की कलाकृतियाँ देखने के बाद हमने लाइब्रेरी देखी। बहुत बड़ी है लाइब्रेरी। तमाम भाषाओं की किताबें वहाँ मौजूद थीं। जगह –जगह लोगों के पढ़ने के इंतजाम के लिए कुर्सियाँ, कंप्यूटर और अन्य सुविधाएं मौजूद थीं। रिसर्च वाले सेक्शन में फोटोकापी की सुविधा भी मौजद थी।
जगह-जगह किताबों से संबंधित उद्धरण भी लगे हुए थे। एक जगह लिखा था –‘There is no such word as a dirty word. Nor is there a word so powerful, that it’s going to send the listener to the lake of fire upon hearing it’ –Frank Zappa ( गंदा शब्द जैसी कोई चीज नहीं होती। न ही कोई शब्द इतना शक्तिशाली होता है कि सुनने वाले को आग की झील में फेंक दे –फ्रेंक जप्पा )।
किताबों पर प्रतिबंध से संबंधित एक उद्धरण इस तरह था- ‘Banning books give us silence when we need speech. It closes our ears when we need to listen. It makes us blind when we need sight- Stephen Chossky (किताबों पर प्रतिबंध लगाने हमको आवाज की आवश्यकता के समय मौन मिलता है। जब हमको सुनने की जरूरत होती है तब हमारे कान बंद हो जाते हैं। दृष्टि की आवश्यकता के समय दृष्टिहीन हो जाते हैं- स्टीफेन चास्की)
तमाम तरह की किताबें देखते हुए उनको उलट-पलट कर देखा। कोई अंश देखकर लगा इसे पढ़ना चाहिए। उसी समय ऋतिक रोशन की पिक्चर ध्यान आई जिसमें वह किताब को हाथ में लेते ही पूरी पढ़ लेता है। लगा काश ऐसी शक्ति होती। लेकिन फिर लगा कि ऐसी शक्ति होने से किताब को मजे लेकर पढ़ने का सुख नहीं मिलता। हर चीज के दूसरे पहलू भी होते हैं।
आर्टिस्ट कैसे बने (Be the Artist) में समय प्रबंधन की महत्ता बताते हुए लिखा था –‘अपने समय की हिफाजत इस तरह करो जैसे अपने बटुए की करते हो।‘ हमको लगा कि यह बात तो सही है लेकिन बटुआ और समय की हिफाजत करना अभी तक सीख कहाँ पाए।
लाइब्रेरी में जगह-जगह लोग पढ़ते हुए दिखे। पूरी लाइब्रेरी घूमने पर हिन्दी की कोई किताब नहीं दिखी। हमने काउंटर पर मौजूद लाइब्रेरियन से पूछा तो वह खुद चलकर उस हिस्से मे ले गई जहां रैक में हिन्दी की किताबें लगी हुईं थीं। हिन्दी व्यंग्य की किताबें खोजीं तो केवल आलोक पुराणिक Alok Puranik जी की दो किताबें – ‘नेता बनाम आलू’ और ‘लव पर डिकाउंट’ दिखीं। इसके अलावा लतीफ़ घोंघी की किताब- ‘मेरे मौत के बाद’ , नीरज व्यास की –‘नेता चिड़िया घर में’, कैलाश चंद्र की –‘नंगों का लज्जा प्रस्ताव’ एक हास्य व्यंग्य का गुलदस्ता मौजूद था। इन किताबों के साथ कुछ और प्रमुख किताबों के अलावा व्रत कथाओं और पूजा-पाठ से संबंधित किताबें काफी दिखीं।
हिंदी व्यंग्य के खलीफा लोग शायद इस बात को नोट करें और अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए कमर कसें।
लाइब्रेरियन से बातचीत के बाद जानकारी मिली कि इस लाइब्रेरी को देखभाल के लिए पंद्रह लाइब्रेरियन मौजूद रहते हैं।
लौटते समय सस्ते में बिकने वाली किताबें भी देखीं। तरह-तरह की किताबें देखकर मन ललचाया कि ले लें। लेकिन फिर ली नहीं। एक किताब का शीर्षक था –Encyclopedia of Horrifica’ पलटते हुए देखा इसमें तमाम डरावने किस्सों के बारे में जानकारी दी गई थी।
लाइब्रेरी के एक हिस्से में लाइब्रेरियन को कम्यूटर ट्रेनिंग की व्यवस्था दिखी। क्लास चालू थी। सीखने वालों में फास्टर सिटी लाइब्रेरी की जेमा भी दिखी।
लाइब्रेरी में कुछ घंटे बिताकर लौटते हुए लगा कि काश ऐसी व्यवस्थित लाइब्रेरी अपने यहाँ भी होतीं। लेकिन लगने और सोचने से कुछ होता होता तो बात ही क्या थी! सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होता। करने से होता है। अपने यहाँ मौजूद लाइब्रेरी चलती रहें, बंद न हों यही बहुत है।

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Sunday, January 29, 2023

अमेरिका में घर बदलाई

 


पिछले दिनों बेटे ने घर बदला। अपने साथी के साथ दो साल फॉस्टर सिटी में रहने के बाद नया घर सनीवेल में लिया। नया घर दोनों के ऑफिस से पास पड़ता है। अगल-बगल मार्केट है। यह मुख्य कारण रहा नए घर में आने का।
शिफ्टिंग के लिए सुबह-सुबह दो लोग आये। ट्रक और शिफ्टिंग के लिए ट्राली साथ में। आते ही जुट गए। किचन का सामान, कपड़े और बाकी घरेलू सामान हम लोग पहले ही डब्बों में रख चुके थे। सिर्फ बड़ा सामान जैसे बेड, टीवी, सोफा आदि खोलना और पैक करना और लादना बाकी रह गया था।
शिफ्टिंग करने वाले लोगों ने पैक किया हुआ सारा सामान हाथ ट्राली में लादकर लिफ्ट से नीचे उतारा। ट्रक में चढ़ाया। ट्रक का डाला हाइड्रॉलिकली ऑपरेटेड था। सड़क के बराबर रखा डाला बटन दबाते ही ऊपर उठकर ट्रक के बराबर आ जाता। वो लोग ट्राली में सामान लिए-लिए डाले पर खड़े होते। बटन दबाते ही डाला ऊपर उठता। वो ट्राली का सामान ट्रक में सरका कर अगला सामान लादने चल देते।
दोनों शिफ्टिंग वाले चीनी थे। न उनको अंग्रेजी समझ में आती न हम चीनी बूझते। लेकिन काम दोनों को पता था। चालू था।
टीवी खोलने से पहले शिफ्ट करने वाले ने कुछ कहा। चीनी में। हमको समझ नहीं आया। कुछ देर अंग्रेजी और चीनी में कुश्ती होने के बाद भी बात पल्ले नहीं पड़ी। अचानक उनमें से एक ने झटके से जेब में हाथ डाला। मोबाइल निकाला। उसमें कुछ टाइप किया। टाइप किया हुआ मसौदा चीनी में था। समझ नहीं आया। उसने गूगल ट्रांसलिट्रेशन पर टाइप किया हुआ मसौदा चिपकाया और ट्रांसलेट का बटन दबाया। अंग्रेजी में लिखा हुआ आया -'टीवी आन करके चेक करवा लो।' वह टीवी पैक करने के पहले देखना चाहता था कि टीवी ठीक है कि नहीं। कहीं ऐसा न हो, कंडम टीवी ले जा रहे हों और वहां जाकर कहें -'शिफ्टिंग में टीवी खराब हो गया।'
बेड जो कि बड़ा लगता था , नट बोल्ट पर लगा था। पांच मिनट में खुल गया। घर का सारा सामान ढाई - तीन घण्टे में पैक होकर लद गया। वो लोग नई जगह का पता लेकर चल दिये। आधे घण्टे में 38 किलोमीटर दूर घर नई जगह पर पहुंच गए।
पहुंचते ही सारा सामान उतार कर सोफ़ा, बेड, टीवी लगाकर उन लोगों काम निपटा दिया। सारा काम शुरू से लेकर खत्म होने तक साढ़े पांच घण्टे में निपट गया। इन साढ़े पांच घण्टे में उन लोगों ने न कुछ खाया न पिया। पानी तक नहीं पिया। बस काम में लगे रहे। यह इस तरह का पहला अनुभव था हमारा।
शिफ्टिंग का भुगतान घण्टे की दर से हुआ। शिफ्टिंग चार्जेज 100 डॉलर प्रति घण्टे था। उसके ऊपर 10 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति घण्टा टिप के। साढ़े पांच घण्टे की दो लोगों की टिप हुई 110 डॉलर। इस तरह लेबर चार्ज हुआ 660 डॉलर। 45 डॉलर ट्रक का किराया। 20 डॉलर की और टिप कुल मिलाकर साढ़े पांच घण्टे के 725 डॉलर लगे (59100 रुपये)।
सवाल यह कि घर बदलने में जब इतना पैसा लगता है तो घर का किराया कितना होता होगा। अमेरिका (कैलीफोर्निया) में घर बहुत मंहगे हैं। दो कमरे , किचन, ड्राइंग रूम वाले घर के किराए 3 से 4 लाख रुपये महीने हैं। इस इलाके में ज़्यादतर नौकरी करने वाले लोग रहते हैं। सबसे ज्यादा ख़र्च घर के किराए पर लगता है। घर खरीदने की बात सोचना तो लोगों के लिए बहुत दिनों तक सपना ही रहता है।
सामान उतारने के बाद दोनों लोग चले गए। हम लोगों ने जुटकर रात तक सब सामान जमा लिया। एक दिन में घर बदलने और लगाने का यह नया और अनूठा अनुभव था।
नये घर के सामने ही बहुत बड़ा रिहायशी कॉम्प्लेक्स बन रहा था। मज़दूर लोग हेलमेट लगाये काम कर रहे थे। शाम के पाँच बजते ही काम बंद हो गया। ऊँची क्रेन पर अमेरिका का झंडा पहरा रहा था। हमको अपना राष्ट्र ध्वज याद आ रहा था। याद आ रहा था श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’ जी का झंडा गीत-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

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Tuesday, January 24, 2023

लाइब्रेरी में थ्री डी प्रिंटिंग



एक दिन घर के पास घूमते हुए एक लाइब्रेरी दिखी। शहर की पब्लिक लाइब्रेरी फ़ास्टर सिटी पब्लिक लाइब्रेरी। घर से 1.1 मील (1.77 किलोमीटर) दूर। नक़्शे के हिसाब से 22 मिनट की दूरी। कल देखने गए लाइब्रेरी।
दोपहर के बाद गए थे लाइब्रेरी। टहलते-टहले चार बजे क़रीब पहुँचे। रास्ते में कोई आता-जाता मिला नहीं। जो मिले भी वे सब अपने में मशगूल।
लाइब्रेरी के अहाते के ज़मीन के पत्थरों में कई प्रसिद्ध लेखकों के नाम खड़े थे। लाइब्रेरी के दरवाज़े के सामने पत्थर पर अंग्रेज़ी में लिखा था:
“Books are keys to wisdom's treasure;
Books are gates to lands of pleasure;
Books are paths that upward lead;
Books are friends. Come, let us read.”
― *Emilie Poulsson
(पुस्तकें ज्ञान के खजाने की कुंजी हैं; पुस्तकें सुख की भूमि का द्वार हैं; किताबें वो रास्ते हैं जो ऊपर की ओर ले जाती हैं; किताबें दोस्त हैं, आइए, पढ़ते हैं।)
किताबों की बारे में एमली पालसन की यह कविता पढ़ने के पहले ही अपन की किताबों से दोस्ती हैं और मानते हैं कि किताबें तमाम अलाय-बलाय से बचाती हैं।
जिस पत्थर पर यह कविता लिखी थी उसका फ़ोटो लेते समय पैर का जूता फ़ोटो में आ रहा था। हमने जीभ दाँतो के नीचे दबाकर पैर पीछे किया और फ़ोटो खींचा। फ़ोटो खींचने के बाद आगे बढ़े।
लाइब्रेरी का दरवाज़ा स्वचालित है। पास पहुँचते ही खुल गया। घुसते ही गेट की बायीं तरफ़ लाइब्रेरी से सम्बंधित तमाम नोटिस लगी थी। एक नोटिस में आत्मकथा लिखना सिखाने की सूचना थी। आभासी माध्यम से। कोई अनुभव नहीं। ग्रुप से जुड़ो। लिखना सीखो। नोटिस पुरानी थी लेकिन लिखना सिखाने के लिए लाइब्रेरी प्रयास करती हैं यह पता चला।
लाइब्रेरी में घुसते ही सैनिटाइज़र और मास्क रखे थे। कोरोना से बचाव के उपाय। ज़्यादातर लोग हाथ साफ़ करके ही लाइब्रेरी में घुस रहे थे।
लाइब्रेरी में घुसते ही एक कमरे में डिसकाउंट पर मिलने वाली किताबें रखीं थी। कई रैक्स में पूरी कमरा भर किताबें। किताबें पलट-पलट कर देखते रहे कुछ देर। एक किताब The Orphan Collector पलटते हुए एक पन्ने पर लिखा दिखा :
This is America, they need to learn our language or go back wherever they came from.
(यह अमेरिका है । उनको हमारी भाषा सीखनी पड़ेगी नहीं तो जहां से आए हैं वहाँ लौट जाएँ)
अमेरिका के बारे में लिखा यह वाक्य किसी भी जगह के बारे में सही है। जहां रहें उसके तौर-तरीक़े सीखना ज़रूरी है।
तमाम किताबें पलटते हुए बिल गेट्स की लिखी एक किताब -The speed of thought भी दिखी। 16.96 डालर की मूल दाम की किताब 2 डालर की मिल रही थी। किताब के पन्ने पलटते हुए उसे लेने का मन किया। हमने काउंटर पर भुगतान का करने के बारे में पूछा। पता चला -‘वहीं क्यू आर कोड से मोबाइल एप से आनलाइन भुगतान कर दीजिए।’ हमारे पास अमेरिका में मोबाइल एप से भुगतान करने की सुविधा नहीं थे। हमने पूछा -‘गूगल पे से हो जाएगा यहाँ भुगतान?’
बताया गया-‘नहीं। गूगल पे यहाँ नहीं चलता। नक़द भुगतान कर सकते हैं।’
नक़द भुगतान में मेरे पास एक डालर का नोट और खूब सारी रेज़गारी थी। मुझे पता नहीं था कि सारी रेज़गारी मिलकार एक डालर से कम से थी या ज़्यादा। हमने अपनी समस्या बताई। काउंटर पर मौजूद लाइब्रेरियन ने मुस्कराते हुए कहा -‘आप किताब ले जाइए। कल भुगतान कर दीजिएगा। खुद न आ पाएँ तो किसी से भेज दीजिएगा।’
पैसे भुगतान की समस्या पर कुछ और सवाल-जबाब हुए तो लाइब्रेरियन ने कहा -‘आप किताब ले जाइए। पैसे के बारे में चिंता न करें।’
लेकिन हमको मुफ़्त में किताब ले जाना जमा नहीं। हमने मेहनत करके सारी रेज़गारी जमा की। कुल मिलाकर दो डालर से अधिक ही होंगे। काउंटर पर दिए। उसने लिए नहीं। बोली -‘वहीं बक्से में डाल दीजिए। किताब ले लीजिए।’
हमने पैसे डाल दिए। लाइब्रेरियन ने न किताब देखी। न पैसे गिने। किताब पाकर हमारी ख़ुशी से से खुश हो गयी।
बाद में पता चला कि डिस्काउंट में मिलने वाली किताबें वो किताबें हैं जिनको लोग लाइब्रेरी को दान दे देते हैं। लाइब्रेरी वाले उनको बेंचकर लाइब्रेरी के लिए नई किताबें ख़रीदते हैं।
किताब लेकर हमने पूरी लाइब्रेरी घुमी। तमाम लोग पढ़ रहे थे। बच्चों के सेक्सन में किताबों के साथ, डीवीडी और कम्प्यूटर वग़ैरह भी थे। कुर्सियों के साथ सोफ़े भी लगे थे। बच्चे अपने अभिभावकों के साथ पढ़ रहे थे। कुछ बच्चे फ़र्श पर बैठे कलरिंग कर रहे थे।
दूसरी तरफ़ बड़े लोगों की किताबें थीं। हज़ारों की संख्या में होंगी किताबें। जगह-जगह कम्प्यूटर भी लगे थे। लोग उन पर लाग इन किए हुए पढ़ रहे थे।
लौटकर फिर काउंटर पर आए। लाइब्रेरियन से हमने पूछा -‘यहाँ का फ़ोटो ले सकते हैं?’
उसने कहा -‘यह पब्लिक प्लेस है। आप फ़ोटो ले सकते हैं। लेकिन किसी को एतराज हो तो उसका फ़ोटो न लें।’
हमने लाइब्रेरी के फ़ोटो लिए। लाइब्रेरियन का भी। फ़ोटो लेने से पहले पूछने पर मुस्कराते हुए लाइब्रेरियन ने कहा -‘आप ले सकते हैं। वैसे मुझे पोज देना पसंद नहीं।’
बातचीत का सिलसिला शूरु हुआ तो पता चला कि लाइब्रेरियन जेना मूलतः सिंगापुर की है। 2008 से लाइब्रेरी में काम कर रही हैं। कई जगह तबादले होते हुए यहाँ आईं। लाइब्रेरी का काम पसंद है इसीलिए यहाँ पढ़ाई की और नौकरी भी। जेना (Jenna) नाम है। जेना के सर के कुछ बाल हरे थे। शायद रंगाए होंगे। हर रंग पसंद होगा। साथ खड़ी महिला से दोस्ताना अन्दाज़ में बतियाते हुए जेना किताबें इशू करती रही। हमसे भी बात करती रहती। बाद में पता चला साथ वाली महिला लाइब्रेरी इंस्पेक्शन के लिए आई है। मूलतः सिंगापुर की रहने वाली है। उसके बैज पर नाम लिखा था -नूरी।
लाइब्रेरी के काउंटर के पास ही छुटकी सी थ्री डी प्रिंटिंग मशीन रखी थी। थ्री डी प्रिंटिंग जटिलतम पार्ट्स के उत्पादन की आधुनिक तकनीक है। इसकी सहायता से किसी भी आकार का पार्ट बनाया जा सकता है। इस तकनीक की जानकारी देने के विचार से यह छोटी मशीन वहाँ रखी थी। कई तरह के आकृतियाँ बनाकर लोग समझ सकते हैं कि थ्री डी प्रिंटिंग कैसे होती है। लोग अलग-अलग तरह की आकृतियाँ बना रहे थे। सब कुछ मुफ़्त था।
हमने भी एक थ्री डी आकृति बनाई। अपने नाम के पहले अक्षर A को प्रिंट किया। प्रिंटिंग विकल्प चुनते ही मशीन काम पर लग गयी। प्लेटफ़ार्म ऊपर उठा। सेवईं की तरह का प्लास्टिक का धागा मशीन से निकला और प्रिंटिंग होनी लगी। दस मिनट क़रीब मशीन का हेडर इधर-उधर हिलता-डुलता रहा और आकृति बनती रही। आख़िर में A बन गया। हमने वहीं मौजूद चाकू की सहायता से उसको निकाला। जेना को दिखाया। वो मुस्कराते हुए बोली -‘अच्छा बना है। इट्स गुड।’
हमने पूछा -‘इसे मैं ले जा सकता हूँ?’
जेना बोली -‘हाँ। ये आपका है। आप ले जा सकते हैं।’
इस बीच लाइब्रेरी का समय समाप्त हो रहा था। बीस मिनट पहले उन्होंने माइक पर लोगों को बताया कि लाइब्रेरी बंद होने में बीस मिनट बचे हैं। दस मिनट पहले भी घोषणा की। पाँच बजे लाइब्रेरी बंद होने लगी। और लोगों के साथ हम भी बाहर निकल आए।
लाइब्रेरी में एक घंटा गुज़ारकर महसूस हुआ कि यहाँ बच्चों को पढ़ने के लिए उत्साहित करने का अच्छा माहौल है। लोग लाइब्रेरी आते हैं। बैठकर पढ़ते हैं। रखरखाव बहुत अच्छा है।
लाइब्रेरी की संख्या खोजते हुए नेट पर देखा तो पता चला अमेरिका में कुल 117,341 लाइब्रेरी हैं। इसके मुक़ाबले भारत में 54,856 पब्लिक लाइब्रेरी हैं। दुनिया भर में कुल 2600000 (26 लाख) लाइब्रेरी हैं।
संख्या की बात से ज़्यादा ज़रूरी बात लाइब्रेरी का रखरखाव है। अपने यहाँ लाइब्रेरियों के रखरखाव और सुविधाओं पर बहुत कुछ किये जाने की गुंजाइश है।
लौटते हुए शाम को गयी थी। सूरज भाई भी अपनी लाइब्रेरी बंद करके जाने वाले थे। जाते हुए मुस्कराते हुए बोले -‘कुछ पढ़ाई-वढ़ाई भी किया करो। ख़ाली लाइब्रेरी घूमने से कुछ नहीं होता।’
सूरज भाई मज़े लेने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते।
हम सूरज भाई को बाय बोलकर घर आ गए।

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