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Wednesday, August 14, 2024
जनता से कटे हुए शासकों का पतन अवश्यम्भावी होता है
Monday, August 22, 2022
परसाई होते तो बताते कि हम कितने बौड़म हो चुके हैं
[आज परसाई जी के जन्मदिन के मौके पर नवभारत टाइम्स में दो साल पहले प्रकाशित लेख । लेख जो हमने भेजा था उससे कई गुना बेहतर होकर छपा। सम्पादन के लिए नवभारत टाइम्स के राहुल का आभार। Chandra Bhushan जी का शुक्रिया जिनको लगा कि मैं परसाई जी पर लिख सकता हूँ।]
Friday, June 04, 2021
यह क्या हो रहा है?
आजकल खबरों में सच और झूठ , अफवाह और वास्तविकता इस कदर घुली मिली है कि असलियत पता नहीं चलती। लुटने वाला चोर साबित हो रहा है, जिसको जुतियाया जाना चाहिए उसकी जय बोली जा रही है। यह सब क्या है -'हमारे एक मित्र भन्नाते हुए बोले।'
Sunday, May 09, 2021
कोरोना से लड़ना सबका फर्ज है
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Saturday, April 03, 2021
रुप्पू
आज ज्योति त्रिपाठी रुचि द्वारा लिखा उपन्यास रुप्पू पढा। पेज नम्बर 7 से 160 तक पूरा उपन्यास एक सिटिंग में पढ़ गये। बहुत दिन बाद ऐसा हुआ कि कोई किताब एक दिन में पढ़ ली जाए। वरना पिछले कई महीनों से ऐसा होता आ रहा है कि एक से एक अच्छी मानी जाने वाली किताबें जितनी तेजी से शुरू हुई उतनी ही तेजी से, बिना पूरी पढ़े गए, उनकी जगह दूसरी किताबें आती गयीं।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222053962151564
Thursday, February 18, 2021
इतिहास को तोड़ा नहीं जा सकता केवल समझा जा सकता है
हंगरी में मैंने योरोपीय ज्ञान, उदारता , दक्षता और प्रोफ़ेशनलिज्म को देखा और जाना जिसकी धाक पूरी दुनिया में जमी हुई है। हंगेरियन हालांकि अपने को पूरा योरोपियन नहीं मानते पर फ़िर भी जर्मनी के बहुत निकट रहने के कारण वे पूरी तरह योरोपियन हो गये है। कुछ रोचक प्रसंग हैं जिनके माध्यम से हंगरी के समाज को थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। सन 1988-89 में जब पूर्वी और केन्द्रीय योरोप रूस के प्रभाव और समाजवादी सत्ता से बाहर निकला तो बहुतेरे देशों के शहरों में जो कम्युनिस्ट समय के नेताओं और विचारकों की मूर्तियां आदि लगी थीं उन्हें तोड़ दिया गया था। लेकिन हंगरी में ऐसा नहीं किया गया। हंगेरियन लोगों ने शहरों के केन्द्रों या अन्य स्थानों पर लगी कम्युनिस्ट युग की मूर्तियों को उखाड़ा और बुदापैश्त के बाहर एक मूर्ति पार्क बनाकर उन सब मूर्तियों को वहां लगा दिया। इसी तरह बुदापैश्त के पुराने के पुराने गिरजाघर की पुताई करने के सिलसिले में जब पिछली पुताई की परतें साफ़ की जा रही थी तो अचानक गिरजाघर के मुख्य भाग की दीवार पर कुरान की आयतें लिखी मिलीं। तुर्की ने हंगरी पर लगभग 200 साल शासन किया था और गिरजाघरों को मस्जिदें बना दिया था। तुर्की का शासन खत्म होने के बाद मस्जिदें पुन: गिरिजाघर बन गई थीं। इस गिरिजाघर में भी कभी मस्जिद थी। इसी कारण कुरान की आयतें लिखीं मिल गईं थी। गिरिजाघर में लिखी, कुरान की आयतों को मिटाया नहीं गया बल्कि वह जगह उसी तरह छोड़ दी गई।
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Friday, December 25, 2020
बिस्मिल की शहादत के बाद उनके परिवार की स्थिति
बिस्मिल के न रहने के बाद उनकी मां का समय कैसे व्यतीत हुआ हुआ, यह जानने के लिए माँ के साथ गोरखपुर जेल में बिस्मिल से मिलने गए क्रांतिकारी दल के शिव वर्मा की डायरी का एक पृष्ठ पढ़ना पर्याप्त होगा। 23 फरवरी, 1946 को उन्होंने लिखा था -
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Wednesday, December 23, 2020
पंडित को फांसी, मुझे सिर्फ सजा
6 अप्रैल, 1927 को हेमिल्टन फैसला सुनाने वाला था। इसलिए एक दिन पहले 5 अप्रैल को जिला जेल लखनऊ के ग्यारह नम्बर बैरक में रात के भोजनोपरांत क्रांतिकारियों ने एक दिलचस्प बैठक आयोजित की। दृश्य अद्भुत था। मृत्यु सामने फांसी का क्रूर फंदा लिए खड़ी थी लेकिन वे सरफरोश खिलखिलाकर हंस रहे थे, अट्टहास कर रहे थर। आदमी होकर मौत से न डरने वाले इन क्रांतिकारियों की एक झलक उस दिन जिस किसी ने देख पाई, वह धन्य हो गया।
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Tuesday, December 15, 2020
कहीं का सामान कहीं पर डिलीवरी
दो-तीन दिन पहले हम घर पर थे। लंच पर आए थे। फोन आया -'आपका कोरियर है।'
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Friday, November 27, 2020
मैं मिलूंगा लफ्जों की धूप में
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Sunday, November 01, 2020
सुरेन्द्र मोहन शर्मा
Surendra Mohan Sharma जी से मेरा परिचय 6-7 पुराना था। जबलपुर के दिनों की मेरी फेसबुक की पोस्ट्स से मेरे लेख पढ़ने का सिलसिला शुरू किया था उन्होंने। उन दिनों वे बिस्तर पर थे। बीमारी के दौरान मेरी पोस्ट्स पढ़कर उनको सुकून मिलता था ऐसा उन्होंने मुझे बताया। कहते तो वे यह भी थे कि उनको पढ़कर उनका हौसला बनता था और उसी के चलते वे ठीक भी हुये। दोस्तों की तारीफ करने का उनका यही अंदाज था। अगले को उसकी विशिष्टता का एहसास कराते रहते थे।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10221034328661364