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Wednesday, August 14, 2024

जनता से कटे हुए शासकों का पतन अवश्यम्भावी होता है



[जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है। फिर कोई डिक्टेटर देश को कुपित आंखों से देखने लगता है। तीसरी दुनिया के किसी भी देश के हालात पर दृष्टिपात कीजिये। डिक्टेटर स्वयं नहीं आता, लाया और बुलाया जाता है और जब आ जाता है तो प्रलय उसके साथ-साथ आती है।- खोया पानी]
पिछले दिनों बांगलादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। आंदोलनकारियों ने हसीना शेख़ की चुनी हुई सरकार को नकारकर उनको देश से भागने के लिए मजबूर कर दिया। देश में अराजकता की स्थिति पैदा हुई। अल्पसंख्यको पर अत्याचार होने लगे। उनके घर, सम्पत्तियों को नुक़सान पहुँचाया गया।
आंदोलनकारी छात्रों ने नोबल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का मुखिया बनाया। 84 वर्षीय मोहम्मद यूनुस ने अल्पसंख्यकों पर हिंसा रोकने की अपील की। यह भी कहा -'अगर अल्पसंख्यकों पर हिंसा न रुकी तो वे देश छोड़ देंगे।' बांगलादेश से आए समाचारों के अनुसार वहाँ हिंसा में कमी आई है। हिंसा रुकी है। बांगलादेश के एक समाचार पत्र के सम्पादक के अनुसार वहाँ के कट्टरपंथी संगठन ने भी हिंसा रोकने और अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों और सम्पत्तियों की रक्षा करना शुरू किया है।
मोहम्मद यूनुस ढाका के प्रसिद्ध मंदिर जाकर स्थितियों को सामान्य करने का प्रयास किया है। आज बीबीसी के एक वीडियो में दिखा कि ढाका शहर में हालात सामान्य हो रहे हैं। छात्र टैफ़िक पुलिस का काम कर रहे हैं। दूर-दराज के इलाक़ों में भी ऐसा ही हो रहा होगा। सम्भव है दूर के हिस्सों में हिंसा का प्रसार ही न हुआ।
बांगलादेश में पिछले पंद्रह वर्षों से शेख़ हसीना का शासन था। उनके कार्यकाल में बांगलादेश ने आर्थिक तरक़्क़ी के नए आयाम छुए थे। भारत-बांगलादेश सम्बन्ध बहुत अच्छे थे। तमाम समस्यायों का निपटारा हुआ था। बांगलादेश में शेख़ हसीना की सरकार का अपदस्थ होना भारत के लिए एक मित्र देश की सरकार का अपदस्थ होना है।
बांगलादेश में सत्ता परिवर्तन के पहले तक वहाँ की कोई नकारात्मक खबर समाचारों में नहीं थी। सत्ता परिवर्तन होने के बाद तमाम पुरानी कहानियाँ सामने आने लगीं। शेख़ हसीना की सत्ता पर पकड़। उनके लोकतंत्र की आड़ में तानाशाह जैसे रवैए की कहानियाँ सामने आयीं। जिसने भी उनका विरोध किया उसको जेल में डाल दिया। नोबल पुरस्कार विजेता मोह्म्मद यूनुस भी जेल जा चुके थे। उनकी विरोधी ख़ालिद जिया कई वर्षों से जेल में थीं।
शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ आंदोलन 2018 से शुरू हुआ था। आरक्षण को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अदालत के फ़ैसले के बाद समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन लोगों के ग़ुस्से के कारण शायद और भी थे। सत्ता की हनक में शेख़ हसीना ने आंदोलनकारियों से बात करना भी गवारा नहीं किया। उनको 'रजाकार' (ग़द्दार) बताया। रजाकार इसलिए कि बांगलादेश के निर्माण के समय उन लोगों ने अवामी लीग का साथ देने के बजाय पाकिस्तान के साथ सहानुभूति प्रकट की थी। उसका साथ दिया था।
आंदोलनकारियों को 'रजाकार' कहने ने पेट्रोल में स्पार्क का काम किया। लोग भड़क गए। लोग सड़क पर उमड़ पड़े। प्रधानमंत्री आवास घेर लिया गया। शेख़ हसीना को बांगलादेश छोड़कर भागना पड़ा।
आंदोलन कारियों को ग़द्दार कहना उसी तरह से है जैसे अपने देश की आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेजो का साथ देने वालों को आज ग़द्दार कहना।
लोगों ने इस सत्ता परिवर्तन की अपने-अपने हिसाब से व्याख्या की। सत्ता परिवर्तन में अमेरिका/चीन /पाकिस्तान का हाथ बताया। हाथ किसी का रहा हो लेकिन यह साफ़ है कि बांगलादेश की जनता का बड़ा हिस्सा उनके ख़िलाफ़ हो गया था। जिस अवामी लीग के वोटों से चुनकर वे प्रधानमंत्री बनी थीं उन लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई कि अपनी प्रधानमंत्री के बचाव में सड़क पर उतरें।
दुखद स्थिति यह है कि अब देश के सभी तरफ़ पड़ोसियों से हमारे देश के सम्बन्ध भरोसेमंद नहीं हैं। सभी पड़ोसी देशों की सरकारें या तो हमारे देश के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं या वे हमारे दुश्मन देशों के प्रभाव में हैं। यह हमारी विदेश नीति की असफलता है। हम या तो पड़ोसी देशों के अच्छे सम्बन्ध बनाने में असफल रहे या उनको दूसरे देशों के प्रभाव में जाने से रोक नहीं पाए।
अपने प्रधानमंत्री जी के भक्त उनके सम्मान में क़सीदे काढ़ने वाले लोग कहते हैं -'वे हैं तो मुमकिन हैं।' यही मुमकिन हुआ कि हमारे सारे पड़ोसी देश हमारे ख़िलाफ़ हो गए। यह बड़ी सफलता है।
बांगलादेश में हालिया सत्ता परिवर्तन के मूल में लोकतंत्र के चुने हुए शासक का अलोकतांत्रिक होते हुए तानाशाह होते चले जाना रहा। शेख़ हसीना ने देश के हर संस्थान पर अपने पिट्ठू बैठाए हुए थे। वे उनके इशारे पर काम करते थे। उनकी मर्ज़ी के बिना उन संस्थानों में पत्ता हिलना तो दूर, शायद हवा भी नहीं चलती थी। न्यायालय, विश्वविद्यालय, पुलिस सब जगह वही होता था जो शेख़ हसीना चाहती थी। यह किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए घातक होता है।
लोकतांत्रिक देशों में लम्बे समय तक शासक रहने वाले को भ्रम हो जाता है कि देश का भला केवल वही कर सकता है। इस मामले में अमेरिकी व्यवस्था सही है कि कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दस साल तक (दो कार्यकाल लिखना था। अमेरिका के संदर्भ में आठ साल ) रह सकता है। हर लोकतांत्रिक देश में यह व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
लोकतंत्र में जिन लोगों को सत्ता मिलती है वे इससे चिपके रहना चाहते हैं। इसका कारण यह है कि आजकल सत्ता से जुड़े रहने पर बेशुमार सम्पत्ति सुनिश्चित होती है। जो लोग किसी सरकार को चुनने के लिए पैसा देते हैं वे चाहते हैं कि सरकार बनी रहे ताकि वे पैसा पीटते रहें। मुनाफ़ा कमाते रहें। सत्ता और पैसेवालों का आपराधिक गठजोड़ दिन पर दिन मज़बूत होता जाता है।
आशा है कि अपने देश के लोग बांगलादेश की समस्या से सबक़ लेंगें। सबसे बड़ा सबक़ यह की उनको जो सत्ता मिली है वो सेवा के लिए मिली है। कमाई या तानाशाही के लिए नहीं। जनता का भला किससे होना यह बात जनता से जुड़ने पर ही पता चलती है। जो लोग जनता से कट जाते हैं उनका पतन देर-सबेर अवश्यम्भावी होता है। बड़े से बड़े नेता को इतिहास समय के कूड़ेदान में फेंक देता है।

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Monday, August 22, 2022

परसाई होते तो बताते कि हम कितने बौड़म हो चुके हैं

 [आज परसाई जी के जन्मदिन के मौके पर नवभारत टाइम्स में दो साल पहले प्रकाशित लेख । लेख जो हमने भेजा था उससे कई गुना बेहतर होकर छपा। सम्पादन के लिए नवभारत टाइम्स के राहुल का आभार। Chandra Bhushan जी का शुक्रिया जिनको लगा कि मैं परसाई जी पर लिख सकता हूँ।]

हरिशंकर परसाई के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निडरता है। अपने समय की विसंगतियों और संकीर्णताओं पर उन्होंने बेपरवाह लिखा और इसकी कीमत भी चुकाई। नौकरी छोड़ने तक में संकोच नहीं किया। उनकी कलम से तिलमिलाकर लोगों ने उन पर हमले किए। आर्थिक अभाव लगातार बना रहा, फिर भी उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अगस्त परसाई जी का महीना है, 22 अगस्त उनकी पैदाइश है तो 10 अगस्त उनकी रवानगी।
कोई पूछ सकता है कि आज परसाई होते, तो क्या लिख रहे होते। अगर वे होते तो आज की विसंगतियों पर जरूर कुछ ऐसी नियमित चोट कर रहे होते, जिससे वे बहुत बड़े वर्ग की ‘हिट लिस्ट’ में होते। पहले की ही तरह उन पर लगातार हमले हो रहे होते, बल्कि शायद पहले से भी तेज। शायद हाल यह होता कि उन पर उनकी पहले की लिखी किसी ‘पंच लाइन’ के आधार पर कोई पंचायत स्वत: संज्ञान लेकर सजा सुना चुकी होती। या फिर देश के अनेक स्वघोषित बुद्धिजीवी उनके इस वाक्य, ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’ के आधार पर उनके खिलाफ मानहनि का मुकदमा दायर कर चुके होते। अंतरात्मा की आवाज पर दल बदलने वाले लोग, ‘अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिए। जरूरत पड़ी तो फैलाकर बैठ गए, नहीं तो मोड़कर कोने से टिका दिया’ जैसी लाइन लिखने के लिए परसाईजी को सबक सिखाने का निर्देश अपने कार्यकर्ताओं को दे चुके होते।
परसाई कहते थे, ‘मैं सुधार के लिए नहीं, बल्कि बदलने के लिए लिखता हूं। वे यह भी मानते थे कि सिर्फ लेखन से क्रांति नहीं होती। हां, उसकी भावभूमि जरूर बन सकती है।’ वे कहते थे कि मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती। नौजवानों को संबोधित करते हुए वे लिखते हैं, ‘मेरे बाद की और उसके भी बाद की ताजा, ओजस्वी, तरुण पीढ़ी से भी मेरे संबंध हैं। मैं जानता हूं, इनमें से कुछ कॉफी हाउस में बैठकर कॉफी के कप में सिगरेट बुझाते हुए कविता की बात करते हैं। मैं इनसे कहता हूं कि अपने बुजुर्गों की तरह अपनी दुनिया छोटी मत करो। मत भूलो कि इन बुजुर्ग साहित्यकारों में से अनेक ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे वर्ष जेल में गुजारे। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी और दर्जनों ऐसे कवि हैं, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़े। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खां, जो फांसी चढ़े, कवि थे। लेखक को कुछ हद तक एक्टिविस्ट होना चाहिए। सुब्रमण्यम भारती कवि और ‘एक्टिविस्ट’ थे। दूसरी बात यह कि कितने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त है यह विशाल देश, और कोई देश अब अकेले अपनी नियति नहीं तय कर सकता। सब कुछ अंतरराष्ट्रीय हो गया है। ऐसे में देश और दुनिया से जुड़े बिना एक कोने में बैठे कविता और कहानी में ही डूबे रहोगे, तो निकम्मे, घोंचू और बौड़म हो जाओगे।’
परसाईजी की तुलना अन्य व्यंग्यकारों से करते हुए कुछ लोग बड़ी मासूमियत से किसी दूसरे व्यंग्य लेखक को किन्हीं मामलों में उनसे बेहतर भी बता देते हैं। ऐसा करने वाले लोग परसाईजी के साथ ही दूसरे लेखकों से भी अन्याय करते हैं। परसाई मात्र व्यंग्यकार नहीं थे। वे लोक शिक्षक थे, समाज-निर्देशक थे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। जबलपुर में भड़के दंगे रुकवाने के लिए गली-गली घूमे। मजदूर आंदोलन से जुड़े। लोक शिक्षण की मंशा से ही वे अखबार में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। उनके स्तंभ का नाम था, ‘पूछिए परसाई से’ पहले हल्के और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे। धीरे-धीरे परसाईजी ने लोगों को गंभीर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। यह सहज जन शिक्षा थी। लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिए अखबार का इंतजार करते थे।
आज के समय में परसाईजी कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं तो यह उनके लेखन की ताकत और उनकी विराट संवेदना है। अपने बारे में वे कहते थे, ‘मैं लेखक छोटा हूं, लेकिन संकट बड़ा हूं।’ तो लेखक तो परसाईजी अपने समय में ही बहुत बड़े हो गए थे। आज वे होते तो मौजूदा संकटों पर उनकी चोट भी बहुत बड़ी होती, शायद सबसे बड़ी होती।

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Friday, June 04, 2021

यह क्या हो रहा है?

 आजकल खबरों में सच और झूठ , अफवाह और वास्तविकता इस कदर घुली मिली है कि असलियत पता नहीं चलती। लुटने वाला चोर साबित हो रहा है, जिसको जुतियाया जाना चाहिए उसकी जय बोली जा रही है। यह सब क्या है -'हमारे एक मित्र भन्नाते हुए बोले।'

यह जादुई यथार्थवाद है। मार्खेज का नाम सुने हो? जादुई यथार्थवाद उसी के नाम पर चला है। हजार साल पहले की बात आज घटती हुई बताता है। आज की बात को हजार साल पहले घटी बताता है। सब गड्ड-मड्ड। मार्खेज तो लिखकर चला गया, हमारा समाज उसको जी रहा है। यह जो हो रहा है न , वह जादुई यथार्थवाद है। हमारा समाज जादुई यथार्थवाद जी रहा है। हमारे दोस्त ने अंगड़ाई लेते हुए बताया।
हम जिस दोस्त को बुड़बक समझते थे वह सुबह-सुबह इतने ज्ञान की बात कह गया। हम समझ नहीं पा रहे कि क्या कहे? मन कह रहा है कि धृतराष्ट्र की तरह आंख मिचमिचा के पूछें - यह क्या हो रहा है?

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Sunday, May 09, 2021

कोरोना से लड़ना सबका फर्ज है

 

"अगर आदमी ध्यान से सोचे तो हर घटना का , चाहे वह कितनी ही अप्रिय क्यों न हो, आशापूर्ण पहलू भी होता है।
यह सुनकर रेम्बर्त ने गुस्ताखी से अपने कन्धे सिकोड़े और बाहर निकल आया।
दोनों शहर के केंद्र में पहुंच गए थे।
"यह निहायत अहमकाना बात है न डॉक्टर! दरअसल मैंने अखबारों के लिए लेख लिखने के लिए दुनिया में जन्म नहीं लिया था। मेरा ख्याल है किसी औरत के साथ जिंदगी बसर करने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ। यह तर्क संगत बात है न ?"
रियो ने सतर्कता से उत्तर दिया कि सम्भव है रेम्बर्त की बात में सच्चाई हो।"
ऊपर उद्धरत बातचीत अल्वेयर कामू के प्रसिद्द उपन्यास प्लेग के दो पात्रों की है।
ओरान शहर में प्लेग फैल जाती है। रेम्बर्त संयोगवश ओरान में आया था। प्लेग महामारी से बचाव के लिए शहर के फाटक बंद कर दिए गए। लोगों का आना-जाना रुक गया।
रेमबर्त शहर से बाहर जाने के लिए छटपटाने लगा। उसकी प्रेमिका उसका इंतजार कर रही थी। लेकिन शहर के फाटक बंद थे। कोई बाहर नहीं जा सकता था।
रेम्बर्त ने हर सम्भव कोशिश की निकलने की। उच्चाधिकारियों से मिला। जोर-जुगाड़ लगाया। डॉ रियो से अनुरोध किया कि उसे प्लेग के कीटाणु न होने का प्रमाणपत्र दे ताकि वह उसे दिखाकर निकल सके। रियो ने मना कर यह कहते हुए:
"मैं तुम्हे सर्टिफिकेट नहीं दे सकता, क्योंकि मुझे यह नहीं मालूम कि तुम्हारे अंदर इस बीमारी के कीटाणु नहीं है। और अगर मुझे मालूम होता तो भी मैं इस बात की गारंटी कैसे दे सकता हूँ कि मेरे यहाँ से निकलकर प्रीफेक्ट के दफ्तर तक पहुँचने के बीच तुम्हें इस बीमारी की छूत नहीं लग जायेगी।"
रेम्बर्त हर तरह से अपने को सही ठहराने की कोशिश करते हुए निकलने की कोशिश करता है। असफल होता है। इस बीच वह डॉक्टर रियो के सम्पर्क में रहते हुए शहर से निकलने की कोशिशें करता रहता है।
डॉक्टर रियो आपदाग्रस्त लोगों के इलाज में लगा रहता है। रेम्बर्त शहर से निकलने की फिराक में। इस सिलसिले में वह गेट पर तैनात लोगों से जोड़-तोड़ कर निकलने की कोशिश में रहता है। उसको अपनी प्रेमिका से मिलने की उतावली है।
रेम्बर्त को पता चलता है कि डॉक्टर रियो की बीबी शहर से करीब 100 मील दूर एक सेनिटोरियम में है।
अगले दिन तड़के ही रेम्बर्त ने डॉक्टर को फोन किया। "जब तक मैं शहर से निकलने का कोई तरीका नहीं निकाल लेता , क्या तब तक तुम मुझे अपने साथ काम करने दोगे?"
कुछ देर की खामोशी के बाद जबाब सुनाई दिया , "जरूर, रेमबर्त! धन्यवाद।"
इसके बाद रेम्बर्त डॉक्टर रियो के साथ काम करने लगा। शहर से निकलने की कोशिश भी जारी रहीं।
एक दिन रेम्बर्त का शहर से बाहर निकलने का जुगाड़ बन गया। उसका शहर से जाना तय हो गया। वह रियो और तारो से विदा लेकर गया। रेम्बर्त की जगह नई टीम बन गई।
जिस रात रेम्बर्त को जाना है उसी शाम वह वापस आकर डॉक्टर रियो से मिलता है। आगे की बात :
"रेम्बर्त बोला , "डॉक्टर , मैं शहर छोड़कर नहीं जा रहा। मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।"
तारो बिना हिले-डुले कार चलाता रहा। लगता था कि रियो अपनी थकान से छुटकारा पाने में असमर्थ था।
"और ----'उसका' क्या होगा?" रियो की आवाज बड़ी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
रेम्बर्त ने जबाब दिया कि उसने सारे मामले पर बड़ी गम्भीरता से सोच-विचार किया है। उसके विचार तो नहीं बदले लेकिन अगर वह चला गया तो उसे अपने पर शरम आएगी, जिसकी वजह से अपनी प्रियतमा के साथ उसका सम्बन्ध और भी पेचीदा हो जायेगा।
इस बार और अधिक उत्साह दिखाते हुए रियो ने कहा कि यह निरी बकबास है। अगर कोई अपने सुख को ज्यादा पसन्द करता है तो इसमें उसे शरम नहीं महसूस करनी चाहिए।
" यह तो सही है," रेम्बर्त ने जबाब दिया, "लेकिन जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शरम महसूस हो सकती है।"
तारो ने, जो अभी तक खामोश रहा था, पीछे मुड़कर देखे बगैर कहा कि अगर रेम्बर्त दूसरे लोगों के दुख में हिस्सा बटाने की इच्छा रखता है तो उसके पास फिर अपने सुख के लिए कोई समय नहीं बचेगा। इसलिए दोनों रास्ते में से उसे एक चुनना ही पड़ेगा।
"बात यह नहीं है," रेम्बर्त ने फिर कहा।" अब तक मैं हमेशा अपने को इस शहर में एक अजनबी- सा महसूस करता था। और मुझे ऐसा लगता था कि आप लोगों से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन अब मैंने अपनी आंखों से जो कुछ देखा है, इसके बाद मैं जान गया हूँ कि मैं चाहूं या न चाहूं मैं यहीं का हूँ। प्लेग से लड़ना सबका फर्ज है।""
इसके बाद रेम्बर्त शहर छोड़कर भागने के प्रयास छोड़ देता है। डॉक्टर रियो की टीम से जुड़कर प्लेग रोगियों की सेवा में जुट जाता है। एक दिन ऐसा भी आता है जब शहर में प्लेग खत्म हो जाती है और सड़कों पर मरते हुए चूहों की जगह बिल्लियां दिखने लगती हैं।
पिछली सदी में हुई प्लेग महामारी पर केंद्रित यह उपन्यास पढ़ते हुए आज कोरोना की विभीषिका के समाचार छाए हुए हैं। तमाम लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। असमय विदा हो रहे हैं।
यह विवरण एक पराये शहर के पत्रकार की एक अजनबी शहर के लोगों की पीड़ा से जुड़कर वहां के लोगो की सेवा करने की भावना का है।
आज जब हमारा समाज इस विभीषिका से जूझ रहा है तब समय यह देखने का भी है कि हम अपने समाज से कितने जुड़े हैं। हमारे अंदर डॉक्टर रियो और पत्रकार रेम्बर्त के कितने अंश बचे हैं।
डॉक्टर रियो और रेम्बर्त प्लेग से लड़े थे। आज कोरोना फैला है। कोरोना से लड़ना हमारा फर्ज है।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222276162866443

Saturday, April 03, 2021

रुप्पू

 आज ज्योति त्रिपाठी रुचि द्वारा लिखा उपन्यास रुप्पू पढा। पेज नम्बर 7 से 160 तक पूरा उपन्यास एक सिटिंग में पढ़ गये। बहुत दिन बाद ऐसा हुआ कि कोई किताब एक दिन में पढ़ ली जाए। वरना पिछले कई महीनों से ऐसा होता आ रहा है कि एक से एक अच्छी मानी जाने वाली किताबें जितनी तेजी से शुरू हुई उतनी ही तेजी से, बिना पूरी पढ़े गए, उनकी जगह दूसरी किताबें आती गयीं।

किताब एक सिटिंग में पढ़ ली जाए इससे उसकी पठनीयता तो अच्छी कही ही जा सकती है। इस मामले में तो ज्योति को पूरे नम्बर मिलने चाहिए।
ज्योति की कविताएं पिछले कई सालों से पढ़ते आये थे। स्त्री सँघर्ष और घर परिवार में आने वाली चुनौतियों और उनके बारे में पूर्वाग्रहों के बारे में बड़ी बेबाकी से लिखती रही हैं ज्योति। अक्सर उनकी अभिव्यक्ति चकित करती रहती है। समाज में महिलाओं की स्थितियों पर लिखी ज्योति की कुछ कविताएं तो इस विषय पर लिखी सबसे बेहतरीन कविताओं से कमतर नहीं हैं। आने वाले समय में शायद उनकी कविताओं का मूल्यांकन हो सके।
कविताओं से फेसबुक लेखन शुरू करके ज्योति क़िस्त-दर-क़िस्त वाले अंदाज में किस्से लिखने लगीं। लिखने का रोचक अंदाज होने के कारण पाठक उनका इंतजार करने लगे। शुरू में कुछ पोस्ट्स मैने भी पढ़ी। लेकिन फिर एक साथ पढ़ने की सोचकर पढ़ना छूट गया। ज्योति पाठकों की मांग पर लिखती रहीं। इसी तरह करते-करते कई किस्से बन गए उनके। किस्से मतलब उपन्यास।
ऐसे ही एक धारावाहिक किस्से की किस्तों को एक साथ करके जो किस्सा मुकम्मल हुआ वह उपन्यास 'रुप्पू' के रूप में सामने आया। रुप्पू एक बदसूरत लड़की की जिंदगी की चुनौतियों से जूझने की कहानी है।
रुप्पू की जिंदगी में कई 'उतार ही उतार'आये। जिंदगी लगातार कठिन होती रही। जिन पर भरोसा किया उनमें से अधिकतर से धोखे मिले। कई बार टूटी रुप्पू लेकिन हर बार खुद को संभाला। फिर चुनौतियों का सामना किया। कई बार अवसाद में आई रुप्पू। आत्महत्या की कोशिश की। लेकिन फिर जिंदगी की विजय हुई। रुप्पू अपने पैरों पर खड़ी हुई। मजबूत बनी।
रुप्पू के व्यक्तित्व की खासियत में से एक यह भी है कि वे अपने साथ अन्याय करने वाले , धोखा देने वाले के प्रति भी, उसकी परिस्थितियों को ध्यान करते हुए, उसको क्षमा कर देती है। निरन्तर धोखा खाने के बावजूद अपने पति को गलतियों को अनदेखा करते हुए उसकी अच्छाइयां देखकर जुड़े रहने की कोशिश करती है। गलत से गलत व्यक्ति की अच्छाइयों को भी देखने की यह नजर ज्योति के व्यक्तित्व का सहज अंग है।
ज्योति की यह सोच उनकी कविताओं में भी लगातार दिखती है। स्त्री का पक्ष लेते हुए कविताएं लिखने के बावजूद ज्योति की कविताओं में आने वाले पुरुष पात्र अपनी तमाम कमियों के बावजूद 'उतने बुरे नहीं ' होते जितने उनको समझा जाता है। उनमें बहुत कुछ ऐसा होता है जिनके चलते उनके प्रति प्यार उमड़ता है।
बहरहाल बात रुप्पू की। इस उपन्यास की कहानी अपने समाज में एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसको आमतौर पर खूबसूरत नहीं माना जाता। केरल में जो लड़की बिंदास रहती है वह रांची पहुंचकर बेचारी हो जाती है। बाकी किस्से पढ़ने के लिए किताब पढिये।
ज्योति का यह पहला उपन्यास है। जितनी जल्दी यह उपन्यास आया उससे बहुत खुशी हुई। उपन्यास में कई कमियां होंगी। लेकिन वह देखना आलोचकों का काम है। हम तो आनंदित और प्रमुदित हो रहे हैं यह सोचकर कि अभी और कई उपन्यास और कविता संकलन आएंगे ज्योति के।
ज्योति को उसके उपन्यास की
बधाई
।शुभकामनाएं।
किताब खरीदने का लिंक यह रहा


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Thursday, February 18, 2021

इतिहास को तोड़ा नहीं जा सकता केवल समझा जा सकता है

 हंगरी में मैंने योरोपीय ज्ञान, उदारता , दक्षता और प्रोफ़ेशनलिज्म को देखा और जाना जिसकी धाक पूरी दुनिया में जमी हुई है। हंगेरियन हालांकि अपने को पूरा योरोपियन नहीं मानते पर फ़िर भी जर्मनी के बहुत निकट रहने के कारण वे पूरी तरह योरोपियन हो गये है। कुछ रोचक प्रसंग हैं जिनके माध्यम से हंगरी के समाज को थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। सन 1988-89 में जब पूर्वी और केन्द्रीय योरोप रूस के प्रभाव और समाजवादी सत्ता से बाहर निकला तो बहुतेरे देशों के शहरों में जो कम्युनिस्ट समय के नेताओं और विचारकों की मूर्तियां आदि लगी थीं उन्हें तोड़ दिया गया था। लेकिन हंगरी में ऐसा नहीं किया गया। हंगेरियन लोगों ने शहरों के केन्द्रों या अन्य स्थानों पर लगी कम्युनिस्ट युग की मूर्तियों को उखाड़ा और बुदापैश्त के बाहर एक मूर्ति पार्क बनाकर उन सब मूर्तियों को वहां लगा दिया। इसी तरह बुदापैश्त के पुराने के पुराने गिरजाघर की पुताई करने के सिलसिले में जब पिछली पुताई की परतें साफ़ की जा रही थी तो अचानक गिरजाघर के मुख्य भाग की दीवार पर कुरान की आयतें लिखी मिलीं। तुर्की ने हंगरी पर लगभग 200 साल शासन किया था और गिरजाघरों को मस्जिदें बना दिया था। तुर्की का शासन खत्म होने के बाद मस्जिदें पुन: गिरिजाघर बन गई थीं। इस गिरिजाघर में भी कभी मस्जिद थी। इसी कारण कुरान की आयतें लिखीं मिल गईं थी। गिरिजाघर में लिखी, कुरान की आयतों को मिटाया नहीं गया बल्कि वह जगह उसी तरह छोड़ दी गई।

हंगेरियन मानते हैं कि इतिहास को तोड़ा नहीं जा सकता केवल समझा जा सकता है।
असगर वजाहत Asghar Wajahat के लेख शहर फ़िर शहर है’ से

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Friday, December 25, 2020

बिस्मिल की शहादत के बाद उनके परिवार की स्थिति

 बिस्मिल के न रहने के बाद उनकी मां का समय कैसे व्यतीत हुआ हुआ, यह जानने के लिए माँ के साथ गोरखपुर जेल में बिस्मिल से मिलने गए क्रांतिकारी दल के शिव वर्मा की डायरी का एक पृष्ठ पढ़ना पर्याप्त होगा। 23 फरवरी, 1946 को उन्होंने लिखा था -

"मां फिर रो पड़ी"
"अशफाक और बिस्मिल का यह शहर कालेज के दिनों में मेरी कल्पना का केंद्र था। फिर क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य बनने के बाद काकोरी मुखबिर की तलाश में काफी दिनों तक इसकी धूल छानता रहा था। अस्तु, यहां जाने पर पहली इच्छा हुई बिस्मिल के मां के पैर छूने की। काफी पूछताछ के बाद पता चला। छोटे से मकान की एक कोठरी में दुनिया की आंखों से अलग वीर प्रसविनी अपने जीवन के अंतिम दिन काट रही है.....
"पास जाकर मैने पैर छुए। आंखों की रोशनी प्रायः समाप्त-सी हो चुकने के कारण पहचाने बिना ही उन्होने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और पूछा, "तुम कौन हो?" क्या उत्तर दूं , कुछ समझ में नहीं आया।
थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर पूछा, "कहां से आये हो बेटा?"
इस बार साहस करके मैने परिचय दिया, गोरखपुर जेल में अपने साथ किसी को ले गईं थीं अपना बेटा बनाकर।" अपनी ओर खींचकर सिर पर हाथ फेरते हुए मां ने पूछा, "तुम वही हो बेटा। कहां थे अब तक। मैं तो तुम्हे बहुत याद करती रही, पर जब तुम्हारा आना एकदम बन्द हो गया तो समझी कि तुम भी कहीं उसी रास्ते पर चले गए।"
मां का दिल भर आया। कितने ही पुराने घावों पर ठेस लगी। अपने अच्छे दिनों की याद, जवान बेटे की जलती हुई चिता की याद और न जाने कितनी यादों से उनके ज्योतिहीन नेत्रों में पानी भर आया। वह रो पड़ीं। बात छेड़ने के लिए मैने पूछा ,"बिस्मिल का छोटा भाई कहां है?"
मुझे क्या पता था कि मेरा प्रश्न उनकी आंखों में बरसात भर लाएगा। वे जोर से रो पड़ीं। बरसो का रुक बांध टूट पड़ा सैलाब बनकर।
कुछ देर बाद अपने को संभालकर उन्होंने कहानी सुनानी शुरू की... आरम्भ में लोगों ने पुलिस के डर से उनके घर आना छोड़ दिया। वृध्द पिता की कोई बंधी आमदनी न थी। कुछ साल वह बेटा बीमार रहा। दवा-इलाज के अभाव में बीमारी जड़ पकड़ती गयी। घर का सब कुछ बिक जाने पर भी इलाज न हो पाया। पथ्य और उपचार के अभाव में तपेदिक का शिकार बनकर एक दिन वह मां को निपूती छोड़कर चला गया।
पिता को कोरी हमदर्दी दिखाने वालों से चिढ़ हो गयी। वे बेहद चिड़चिड़े हो गए। घर का सब कुछ तो बिक ही गया था। अस्तु, फाकों से तंग आकर एक दिन वे भी चले गए, मां को संसार में अनाथ और अकेली छोड़कर। पेट में दो दाना अनाज तो डालना ही था। अस्तु, मकान का एक भाग किराये पर उठाने का निश्चय किया। पुलिस के डर से कोई किरायेदार भी नहीं आया और जब आया तब पुलिस का ही एक आदमी था। लोगों ने बदनाम किया कि मां का सम्पर्क तो पुलिस से हो गया है।
"उनकी दुनिया से बचा हुआ प्रकाश भी चला गया। पुत्र खोया, लाल खोया, अंत में बचा था नाम , सो वह भी चला गया।"
"उनकी आंखों से पानी की धार बहते देखकर मेरे सामने गोरखपुर फांसी की कोठरी घूम गयी। तब मां ने कितनी बहादुरी से बेटे की मृत्यु (फांसी) का सामना किया था। उस दिन समय पर विजय हुई थी मां की और मां पर विजय पाई है समय ने। आघात पर आघात देकर उसने उनके बहादुर हृदय को भी कातर बना दिया है। जिस मां की आंखों के दोनों ही तारे विलीन हो चुके हों उसकी आँखों की ज्योति यदि चली जाए तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। वहां तो रोज ही अंधेरे बादलों से बरसात उमड़ती होगी।
"कैसी है यह दुनिया, मैने सोचा। एक ओर 'बिस्मिल जिंदाबाद' के नारे और चुनाव में वोट लेने के लिए 'बिस्मिल द्वार' का निर्माण और दूसरी ओर उनके घर वालों की परछाई तक से भागना और उनकी निपूती बेवा मां पर बदनामी की मार। एक ओर शहीद परिवार फंड के नाम पर हजारों का चंदा और दूसरी ओर पथ्य और दवा दारू के लिए पैसों के अभाव में बिस्मिल के भाई का टीबी से घुटकर मर जाना। क्या यही है शहीदों का आदर और उनकी पूजा।
फिर आऊंगा मां,कहकर मैं चला गया। , मन पर न जाने कितना बड़ा भार लिए।"
Sudhir Vidyarthi जी की पुस्तक 'मेरे हिस्से का शहर' के
लेख 'एक मां की आंखें' से।

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Wednesday, December 23, 2020

पंडित को फांसी, मुझे सिर्फ सजा

 6 अप्रैल, 1927 को हेमिल्टन फैसला सुनाने वाला था। इसलिए एक दिन पहले 5 अप्रैल को जिला जेल लखनऊ के ग्यारह नम्बर बैरक में रात के भोजनोपरांत क्रांतिकारियों ने एक दिलचस्प बैठक आयोजित की। दृश्य अद्भुत था। मृत्यु सामने फांसी का क्रूर फंदा लिए खड़ी थी लेकिन वे सरफरोश खिलखिलाकर हंस रहे थे, अट्टहास कर रहे थर। आदमी होकर मौत से न डरने वाले इन क्रांतिकारियों की एक झलक उस दिन जिस किसी ने देख पाई, वह धन्य हो गया।

........उन्होंने एक अदालत बनाई और एक जज मुकर्रर किया। उस नकली जज से कहा गया कि वह प्रत्येक क्रांतिकारी का जुर्म देखते हुए अपना फैसला दे। वैज्ञानिक यदि किसी ऐसे यंत्र का आविष्कार कर पाते जिससे अतीत की घटनाओं को देखा जा सकता तो मैं एक बार क्रांतिकारियों की बनाई इस अदालत को जरूर देखना चाहता जिसमें वे मौत को अंगूठा दिखाकर मस्ती से झूमते हुए भारतमाता के रंगमंच पर अपना पार्ट अदा कर रहे थे।
पहला नाम आया पं. रामप्रसाद बिस्मिल का। जज ने जुर्म बताते हुए कहा कि वे भारत देश को दयालु ब्रिटिश साम्राज्य से छीनना चाहते थे, इसलिए उन्हें फांसी की सजा दी जाती है।
दूसरा नाम शचीन्द्रनाथ सान्याल का पुकारा गया। सान्याल जी ने जुर्म कबूल करते हुए जज से प्रार्थना की कि उनके प्रति अदालत नर्म रुख अपनाए क्योंकि उनकी गृहस्थी कच्ची है। उनके इस निवेदन को देखते हुए उन्हें काला पानी की सजा दी गयी।
इसी तरह और दूसरे नाम आये और उन पर लगे अभियोगों के आधार पर उन्हें सजाएं दी गई।
सबसे बाद में पुकारा गया ठाकुर रोशनसिंह को। जज ने कहा कि चूंकि आप बमरोली डकैती में शामिल नहीं थे, लेकिन उस स्थान की जानकारी अपने सबको दी, इस कारण आपको पांच साल की सख्त सजा दी जाती है।
रोशनसिंह चिल्लाए-"ओ जज के बच्चे, फैसला सुनाने की तमीज भी है। मैं तो कोदो बेचकर आया हूँ न, जो मुझे पांच साल की सजा सुना रहा है। पंडित(रामप्रसाद बिस्मिल) को फांसी और मुझे सिर्फ सजा। बेवकूफ।"
सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे।
फिर उनमें से किसी ने रोशनसिंह को थोड़ा और छेड़ने की गरज से पीछे से कहा-"जज साहब से निवेदन है कि अदालत की मानहानि के आरोप में ठाकुर साहब को पन्द्रह दिनों की सजा और दी जाए।"
सब लोग हंस पड़े। रोशनसिंह गुस्से में उठकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए। अदालत भंग हो गई। सभी ने जाकर ठाकुर साहब से माफी मांगी। उम्र में वे सबसे बड़े जो थे। बिस्मिल और दूसरे क्रांतिकारी उनकी बहुत इज्जत करते थे।
'मेरे हिस्से का शहर' -लेखक सुधीर विद्यार्थी से।
क्रांतिकारी ठाकुर रोशनसिंह पर लिखे लेख -जिंदगी जिंदादिली' का अंश।


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Tuesday, December 15, 2020

कहीं का सामान कहीं पर डिलीवरी

 दो-तीन दिन पहले हम घर पर थे। लंच पर आए थे। फोन आया -'आपका कोरियर है।'

हमने पूछा -'किधर हो ? कहां से आया है कोरियर?'
'फैक्ट्री गेट पर हूँ। डीटीडीसी से आया है कोरियर'-उधर से बताया गया।
कुछ किताबें मंगाई थीं। हमने सोचा वही होंगी। कह दिया -'फैक्ट्री गेट पर दे दो।'
कोरियर वाले ने दरबान से बात कराई। हमने कहा -'ये कोरियर ले लो। फैक्ट्री आएंगे तो गेट पर ले लेंगे या मेरे आफिस भेज देना।' नाम नहीं पूछा दरबान का। इसलिए कि नाम अक्सर गड्ड-मड्ड हो जाते हैं। दूसरे यह तसल्ली भी रहती है हमेशा कि सामान इधर-उधर नहीं होगा। यह सहज विश्वास बनाये रखने के लिए किसको शुक्रिया अदा करूँ , समझ नहीं आता।
शाम को चलते समय कोरियर की याद आई। पूछा -'कोरियर आया होगा। किधर है?'
'कोरियर तो कोई नहीं आया।' -दफ्तर में बताया गया।
हमने कहा-' गेट पर पता करो। दोपहर को आया था। तीन बजे करीब।'
पता चला गेट पर कोई कोरियर नहीं आया । हमने कहा कोरियर वाले से पूछो किसको दिया।
कोरियर वाले को फोन किया तो उसने कहा -'गेट पर दे आये थे। दरबान को।'
इधर कोरियर वाला कह रहा गेट पर दे आये। गेट पर कह रहे कोई कोरियर नहीं आया। तो गया किधर?
बाद में बात खुली कि सामान जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री में डिलीवर हुआ है। फैक्ट्री जहां हम साढ़े चार साल पहले थे (जनवरी 2012 से अप्रैल 2016 तक)। हमको लगा कि किताब आर्डर करते समय जबलपुर का पता डाल दिये होंगे।
फोन किया जबलपुर। गेट पर जिसकी ड्यूटी थी उसने कहा -'ये गेट नम्बर एक है। आपका सामान गेट नम्बर छह पर आया होगा। अभी वह बन्द है। सुबह पता करके बताएंगे।'
हमने कहा -'ठीक है। पता करके बताना।'
इस बीच उस स्टाफ ने यह भी कहा -'आपकी पोस्ट नियमित पढ़ते रहते हैं।'
हमको सुनकर अच्छा लगा। ऐसा अक्सर हमसे लोग कहते हैं। कुछ लोग तो किसी पोस्ट का जिक्र भी करते हैं। इससे लगता है कि सही में लोग पढ़ते हैं भले ही प्रतिक्रिया न व्यक्त करें। ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं -'आपकी कविताएं आपके ब्लाग पर पढ़ते रहते हैं। बहुत बढ़िया कविताएं लिखते हैं आप।' हम कविता लिखते नहीं फिर भी लोग पढ़ लेते हैं मेरी कविताएं ऐसे पाठक कितने अच्छे होते हैं। 🙂
बहरहाल अगले दिन पता किया तो मालूम हुआ कि पत्र था फैक्ट्री का। उसमें मेरा फोन नम्बर लिखा था क्योंकि मैं पहले था वहां। इसीलिए कोरियर ने मुझे फोन किया। इसके बाद , इसी बहाने जबलपुर में और लोगों से बात हुई। पुरानी यादें ताजा हुईं।
इस सिलसिले को दुबारा सोचा तो लगा कि कोरियर वाले ने मुझे जबलपुर में ही मानकर फोन किया। मैंने उसे शाजहाँपुर में समझा। इसके बाद मुझे यह भी याद नहीं रहा कि जिस किताब की बुकिंग मैंने की थी वह 15 के बाद डिलीवर होनी है। जबलपुर में भी पता आफिसर्स मेस का दिया होता है। फैक्ट्री का नहीं। बिना कुछ कन्फर्म किये इधर-उधर फोनियाते रहे। सहज विश्वास और अतिआत्मविश्वास के सहज साइड इफेक्ट हैं यह।
यह तो हुई कोरियर की बात। कहीं का सामान कहीं डिलीवर हो जाता है।
दुनिया में भी कुछ ऐसा ही घाल मेल चलता होगा। किसी की मेहनत किसी और के खाते में जमा हो जाती होगी। किसी के हिस्से का दुख किसी दूसरे के खाते में चढ़ जाता होगा। किसी के हिस्से की खुशी का कोरियर कोई दूसरा छुड़ा लेता होगा।
कई बार ऐसा भी होता होगा कि कुछ सुख इसलिए डिलीवर नहीं हो पाते होंगे हमको क्योंकि उनपर पता गलत लिखा होगा होता होगा।
दुनिया को दुरुस्त करने के लिए इसका डिलीवरी सिस्टम ठीक करना होगा। इसके लिए हमको खुद को दुरुस्त करना होगा। पते सही लिखने होंगे और याददाश्त दुरुस्त रखनी होगी। 🙂

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Friday, November 27, 2020

मैं मिलूंगा लफ्जों की धूप में

 

“जब कोई काम करना हो तो समझो कि मृत्यु तुम्हारे केश पकड़कर अपनी दिशा में घसीटती ले आ रही है, इसलिये उस कार्य को करने में विलंब मत करो; किन्तु जब कोई विद्या सीखनी हो कि तुम अजर और अमर हो. कोई देर नहीं हुई है, अभी भी सीखी जा सकती है।“
इंडिया टुडे के दिसंबर अंक ('व्यंग्य विशेषांक') में श्रीलाल शुक्ल जी के बारे में लिखे संस्मरण में कहानीकार संपादक अखिलेश ने श्रीलाल जी द्वारा सुनाये इस श्लोक का जिक्र किया। इस आत्मीय संस्मरण के अलावा और भी बेहतरीन संस्मरण और व्यंग्य सामग्री है इस अंक में।
काम करने में विलंब न करने की बात से अनगिनत काम आकर खड़े हो गये सामने। हमको करो, पहले हमको करो। कुछ काम तो धमकी भी देने लगे –’हमको नहीं करोगे पहले तो तुम्हारे खिलाफ़ प्रदर्शन करेंगे।’
जब एक साथ कई काम हल्ला मचाते हैं तो कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब का यह शेर बहुत सुकून देता है:
मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।
मतलब आराम से किये जायेंगे काम। अभी करना है, आराम से करना है और कभी नहीं करना है इन खानों में बंटे हुये हैं काम। अक्सर इसमें गड्ड-मड्ड हो जाती है। अभी किये जाने वाले काम कभी नहीं किये जाने वाले खाने में पहुंच जाते हैं। कभी न किये जाने वाले काम फ़ौरन किये जाने वाले काम की दराज में जमा हो जाते हैं। बड़ी आफ़त है, बवाल है।
लिखने-पढने के कामों में एक सबसे जरूरी काम अटका हुआ है अमेरिका यात्रा के किस्से लिखने का। साल भर पहले जब वापस आये थे तो तय किया था कि फ़ौरन किताब निकाल देंगे। नाम भी तय हो गया- ’कनपुरिया कोलम्बस।’ कवर पेज भी बन गया। किताब मुकम्मल होने में बस तीन लेख और लिखने थे। इसके बाद छापाखाने जाने थी किताब। लेकिन मामला एक बार टला तो टल ही गया।
इसके अलावा व्यंग्य की जुगलबंदी पर कम से कम एक किताब बनानी है। दो साल ’व्यंग्य की जुगलबंदी’ के बहाने जो लेख लिखे गये उनमें कुछ लेख चुनकर किताब बनाने का विचार है। देखिये कब होता है। करीब महीने भर का काम है।
“काम तो जब होंगे तब होंगे। अभी तो सबसे जरूरी काम दफ़्तर के लिये निकलने का है- निकलो फ़टाक से”- कहते हुये सूरज भाई सामने से झऊवा भर रोशनी हमारे मुंह पर मारते हुये बोले। गुलाल की तरह सामने से फ़ेंकपर मारी हुई धूप किरन-किरन बिखर गयी। घर पूरा जगमगा गया। किरन-किरन से नंदन जी की गजल याद आ गयी:
मुझे स्याहियों में न पाओगे मैं मिलूँगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू मैं किरन-किरन में बिखर गया।
किरन-किरन में बिखर गये इंसान के हाथ में सबके लिये रोशनी की दुआ करने के सिवाय क्या होता है। वही कर रहे हैं।
मेरी पसंद
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तेरी याद का ले के आसरा, मैं कहाँ-कहाँ से गुज़र गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ, वो तो आईना देख के डर गया।
मेरे जेहन में कोई ख़्वाब था ,उसे देखना भी गुनाह था
वो बिखर गया मेरे सामने सारा गुनाह मेरे सर गया।
मेरे ग़म का दरिया अथाह है , फ़क़त हौसले से निबाह है
जो चला था साथ निबाहने वो तो रास्ते में उतर गया।
मुझे स्याहियों में न पाओगे ,मैं मिलूँगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू मैं किरन-किरन में बिखर गया।
-कन्हैयालाल नन्दन

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Sunday, November 01, 2020

सुरेन्द्र मोहन शर्मा

 Surendra Mohan Sharma जी से मेरा परिचय 6-7 पुराना था। जबलपुर के दिनों की मेरी फेसबुक की पोस्ट्स से मेरे लेख पढ़ने का सिलसिला शुरू किया था उन्होंने। उन दिनों वे बिस्तर पर थे। बीमारी के दौरान मेरी पोस्ट्स पढ़कर उनको सुकून मिलता था ऐसा उन्होंने मुझे बताया। कहते तो वे यह भी थे कि उनको पढ़कर उनका हौसला बनता था और उसी के चलते वे ठीक भी हुये। दोस्तों की तारीफ करने का उनका यही अंदाज था। अगले को उसकी विशिष्टता का एहसास कराते रहते थे।

शुरू में उनकी टिप्पणियां मेरी खिंचाई के अंदाज में लगीं। मजे लेने, चुहल करने वाली यह टिप्पणियां बाद में उनके व्यवहार के चलते आत्मीय लगने लगीं। फोन पर बात होने लगी। अपने किस्से सुनाए उन्होंने। शुरू में उनकी फेसबुक प्रोफाइल मुकेश कुमार शर्मा के नाम से थी। गायक मुकेश के मुरीद होने से जुड़े किस्से के चलते उनका घरेलू नाम मुकेश पड़ा। बाद में उन्होंने अपनी फेसबुक प्रोफाइल में नाम सुरेंद्र मोहन शर्मा कर लिया। लेकिन मेरे फोन में उनका नाम मुकेश कुमार शर्मा, मथुरा के नाम से ही सेव रहा। आज भी । कभी तो मैं उनको फोन करने के लिए सुरेंद्र मोहन शर्मा का नाम खोजता मोबाइल में। नहीं मिलने पर ध्यान आता कि अरे उनका नाम तो मुकेश शर्मा के नाम से सुरक्षित है।
मेरे 'वृत्तांत लेखन' को वो बहुत पसंद करते थे। अतिशयोक्ति वाले अंदाज में । इसमें भी वो लेखन जो लोगों से मिलने-जुलने वाले थे। मेरे सारे चरित्रों से वे वाकिफ थे। रामफल, दीपा, पंकज बाजपेयी और तमाम दीगर नाम। उनसे जुड़ी हर बात उनको याद रहती थी। एक बातचीत में दीपा का जिक्र छूट गया तो बोले -'दीपा का नाम कैसे भूल गए आप?'
पंकज बाजपेयी जी से मिलने जाने के लिए उकसाते रहते। कई बार उनसे बात भी करवाई। सुबह आराम से उठने वाले शर्मा जी को सुबह पंकज बाजपेयी जी से बात करवाने के लिए लगा फोन नहीं उठा तो बाद में अफसोस करते। फिर दुबारा बात करवाने पर खुश होते।
खुद शर्मा जी ने तो नहीं बताया लेकिन उनसे जुड़े लोगों ने बताया कि ,वे वकील होने के बावजूद, लोगों के आपसी झगड़े अदालत के बाहर निपटवाने के हामी थे। इसके लिए प्रयास भी करते थे और सफल भी होते थे।
मेरे लेखन में लोगों से मिलने जुलने वाले लेखन को ही वे असली लेखन मानते थे। तमाम बड़े व्यंग्य लेखकों को खारिज करते हुए कहते -'अरे छोड़िए उनको, हमे तो आपका यह लेखन पसन्द है। इसके सामने वो बेकार। इसी बहाने हमारा व्यंग्य लेखन भी खारिज कर देते।'
हमारी लगभग हर पोस्ट वे पढ़ते। हमारे बेटे के कवितापाठ की खूब तारीफ करते। उसको हमसे बेहतर बताते हुए आशीर्वाद देते। हमारे पोस्ट्स के जरिये वे हमारे घर के हर सदस्य से परिचित थे। अक्सर कोई बात निकाल कर टिप्पणी भी करते।
फोन पर अक्सर बात होती। कभी छोटी, कभी बहुत लंबी। बातचीत के दायरे में साझे दोस्त, उनके अपने दोस्त, मेरी पोस्ट्स और तमाम किस्से रहते। कभी कोई बात पूछने के लिए बस एक मिनट के फोन भी आये। ये एक मिनट के फोन किसी बात की पुष्टि के लिए होते। उस पोस्ट्स में ये लिखा था , यह वही हैं न, इनकी बात का यही मतलब था आदि-इत्यादि। अदालती मसले की जानकारी भी देते रहते कभी-कभी।
लेखकों में पुराने लेखकों के मुरीद थे। उर्दू के लेखकों की हास्य लेखन में तारीफ करते। 'पतरस के मजनून' उनकी पसंदीदा रचना थी।
फेसबुक के दोस्तों के किस्से मजे लेकर साझा करते। शंभूनाथ शुक्ला जी, संतोष त्रिवेदी और अन्य तमाम लोगों की फेसबुक पोस्ट के मजे लेते हुए टिप्पणी करते। शम्भूनाथ शुक्ला जी जिस तरह लिखते हैं, अपने पाठक दोस्तों को झिड़क भी देते हैं उसके किस्से भी सुनाते। कहते -'शुक्ला जी कहते हैं अरे सब मजे के लिए लिखता हूँ शर्मा जी।' सारे किस्से सुनाने के बाद समेटते हुए कहते -'बहुत भले आदमी हैं शुक्ला जी, सज्जन पुरुष।' संतोष त्रिवेदी की टिप्पणियों पर मजे लेते -'आज फिर भन्नाए हुए हैं मास्टरजी।' Alok Puranik आलोक पुराणिक जी के लेखन पर भी राय देते रहते। हिंदी व्यंग्य से जुड़े लोगों पर मजेदार टिप्पणी करते। सभी के बारे में जानकारी थी उनको। अर्चना चतुर्वेदी, यामिनी और मथुरा से जुड़े अन्य लेखकों के बारे में विस्तार से बतियाते हुये आत्मीय टिप्पणी से बात खत्म करते -'भली लड़की है, हुशियार है, अच्छा लिखती है।'
अपने से जुड़े किसी भी व्यक्ति के लिए उनके मन में हमेशा आत्मीय भाव ही पाया मैंने।
मेरे से जुड़ी हर उपलब्धि को अपना मानकर वे प्रसन्न होते थे। खुलकर तारीफ करते थे। चाहे वो लेखन में कोई इनाम मिलना रहा हो या शाहजहांपुर में महाप्रबन्धक बनना। हर अवसर पर आत्मीय, शुभकामना पूर्ण पोस्ट्स लिखी। ऐसा वे अपने से जुड़े हर व्यक्ति से करते थे। उनके उदार, आत्मीय व्यक्तित्व का सहज रूप था यह। उनसे जुड़े लोगों को लगता कि यह खास उसके लिए है , लेकिन शायद ऐसे भाव अपने से जुड़े हर व्यक्ति के लिए थे।
कानपुर में ससुराल होने के किस्से बताते हुए भी मजे लेते। पुराने न जाने कितने किस्से साझा किए उन्होंने। वकालत के किस्से, समाज के किस्से और भी हर तरह की बातें।
ऐसे बतरसिया शर्मा जी अपने कष्ट बताने के मामले में बहुत कंजूस थे। माखनचोर के मुरीद शर्मा जी अपने मामले में 'कष्ट चोर' थे। कैंसर की बात पता चलने पर फोन किया मैंने तो कहने लगे -'अरे कुछ नहीं। बस जरा चेकअप के लिए आये हैं। ठीक हो जाएंगे। कुछ दिन की बात।' आखिरी समय तक द्वारिकाधीश की फोटो भेजते थे। अपने कष्ट छिपाते रहे। बाद के दिनों में फोन अक्सर बन्द रहना शुरू हो गया। बिगड़ती तबियत के हाल पता चलते रहे। लेकिन यह भी लगता रहा कि -' कष्ट में हैं , लेकिन ठीक हो जाएंगे।' यह भरम था, छलावा था। लेकिन जब कुछ कर सकने के हाल में न हों तो यही छलावा उचित लगता है। कल वह भरम भी टूट गया।
शर्मा जी के न रहने पर उनके बारे में लोगों ने जो लिखा उससे उनके व्यक्तित्व के अनेक और उजले पहलू पता चले। बेहद लोकप्रिय , आत्मीय , मिलनसार और उदार व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। उनका जाना मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है। इसके पहले ब्लॉग जीवन से जुड़े डॉ अमर कुमार थे जो मेरे लेखन की तारीफ करते हुए कहते थे -'मैं तुम्हारे हाथों को छूना चाहता हूँ जिससे तुम ऐसी बातें लिखते हो।' डॉ अमर कुमार अन्य लोगों की भी ऐसे ही हौसला अफजाई करते थे। तमाम लोगों के बेहद अपने थे। वे कैंसर से गए। अब शर्मा जी।
शर्मा जी के मन में मेरे लिए अथाह प्रेम था। यह एहसास मेरे अकेले का एहसास नहीं है। उनसे जुड़े हर शख्स को ऐसा लगता रहा होगा हमेशा कि शर्मा जी उनको बहुत मानते हैं, बहुत लगाव है उनसे, बहुत प्यार करते हैं उनको। जैसे सूरज की रोशनी सबके लिए एक जैसी होती है लेकिन धूप सेंकते हर इंसान को कभी-कभी लगता है कि यह धूप सूरज खास उसके लिए भेज रहा। शर्मा जी का व्यक्तित्व ऐसा ही था जिसमें सबके लिए प्यार था, लगाव था, शुभकामनाएं थीं, आशीर्वाद था।
शर्मा जी के न रहने पर जो अभाव है उसकी पूर्ति न हो सकेगी। भले ही कुछ दिन बाद हम यह कम याद करें लेकिन आज यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा कि अब वे हमारे बीच नहीं हैं। नंदन जी की एक कविता है जिसका भाव है कि मरने वाले के साथ हमारा कुछ हिस्सा भी हमसे विदा लेता है। थोड़ा हम भी मर जाते हैं। शर्मा जी से जुड़ी तमाम यादें मुझको उमड़-उमड़ कर याद दिला रही हैं कि कहां-कहां हम नहीं रहे। दीपा की याद दिलाने वाले, पंकज बाजपेयी से मिलने जाने के लिए कहने वाले शर्मा जी हमारे बीच नहीं रहे। कभी भी बात करने के लिए खुला फोन हमेशा के लिए शांत हो गया।
शर्मा जी के न रहने पर उनके परिवार के दुख की कल्पना करना भी मुश्किल है।उनकी पत्नी और बेटी कैसे इस अपूरणीय दुख से पार पा सकेंगी यह कल्पना भी नही कर पा रहा मैं।
छह-सात साल के सम्पर्क में ही हमारे अभिन्न हो गए थे शर्मा जी। उनसे जुड़ी बातें दोहराते हुए कई बार आंसू आये। आंखे भर आईं। रमानाथ जी बात ही याद आती है :
आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहां होंगे कह नहीं सकते
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
शर्मा जी मैं कभी मिला नहीं , उनको पूरे से जाना नहीं। स्वार्थी होते हैं हम लोग। जानने की कोशिश भी कहां करते हैं। लेकिन उनके साथ से ऐसा लगता था कि एक ऐसा इंसान है हमारे लिए जो हमेशा हमारे लिए शुभ सोचता है, सुंदर सोचता है। हमेशा हौसला आफजाई करता है। हमारे व्यक्तित्व के उजले पहलूओं पर रोशनी डालकर हमको खास समझने का एहसास दिलाता है। सच तो यह है कि खास हम नहीं होते बल्कि वह होता है जो हमारे बारे में ऐसा सोचता है।
शर्मा बेहद खास, प्यारे बेहतरीन इंसान थे। उनकी यादें हमारा सहारा रहेंगी। हौसला बढ़ाएंगी। हमारे बीच से कभी जुदा नहीं होंगे वे।

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