Showing posts with label पुलिया. Show all posts
Showing posts with label पुलिया. Show all posts

Thursday, June 13, 2024

पुलिया पर बतकही



सुबह नीद खुलते ही चाय मंगाई। कड़क चाय। चाय पीकर टहलने निकले। साथी लोग अभी सो रहे थे शायद। कोई बाहर दिखा नहीं। हो सकता है वे भी चाय-वाय पीते हुए या इन्तजार करते हुए जगने की/उठने की कोशिश में लगे हों। जड़त्व का नियम जड़/चेतन सब पर सामान रूप से लागू होता है। जो वस्तु जिस अवस्था में है उसी में बनी रहती है जब तक उस पर बाहरी बल न आरोपित किया जाए।
मेस से बाहर निकलते हुए सड़क पर आते-जाते-टहलते लोग दिखे। कोई तसल्ली से , कोई हडबडी में। दोनों पुलिया आबाद थीं।
सर्वहारा पुलिया पर राजनीति का चैनल चालू थी। स्वत: स्फूर्त। किसी एंकर की जरूरत के बिना ही बहस/ बतकही जारी थी। बतकही काफी देर से चालू थी। हमने जब श्रोता के रूप अपनी मौजूदगी दर्ज की तो सुनाई पड़ा :
-नीतीश कुमार की तो लाटरी लग गयी।
-खुद मुख्यमंत्री ही रहेगा। केंद्र में अपना आदमी बैठायेगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ेगा। यहीं से चलाएगा अपना दांव।
-मोदी का मुंह इत्ता सा रह गया एक ने हथेली को चोंच की शक्ल में दिखाते हुए कहा।
-बहुत अकड़ता था। बहुत बोलता था। दूसरी पार्टी के लोगों को छोड़ दो, अपनी पार्टी तक के लोगों से कायदे से बात नहीं करता था। अब सब नचाएंगे। देखना खेल। मजा आयेगा।
बातचीत करते हुए नेताओं का नाम आत्मीयता से लेते हुए उनके नाम के आगे ‘वा/या’ लगाते हुए राजनीतिक कमेंट्री करते रहे पुलिया पर बैठे लोग।
पुलिया, नुक्कड़, चौराहे ,चौपाल किसी भी समाज के थर्मामीटर , बैरोमीटर होते हैं। समाज का ताप और दाब बताते हैं।
बतियाने वाले वीएफजे, जीआईऍफ़, जीसीऍफ़ और खमरिया से रिटायर्ड लोग थे। कामगार। बातचीत से अंदाज लग रहा था कि बिहार के मूल निवासी हैं। काम-धाम के लिए जबलपुर आये और फिर यहीं बस गए। रोजी-रोजगार के लिए इंसान कहाँ –कहाँ नहीं भटकता है। दुनिया में विस्थापन का सबसे बड़ा कारण नौकरी रहा है। स्थायित्व की तलाश में इंसान स्थाई रूप से भटकता रहता है।
हमने उन लोगों से छट्ठू सिंह और उनके साथियो के बारे में पूछा जो आठ साल पहले यहाँ टहलते हुए मिलते थे। किसी को उनके बारे में पता नहीं था। पुलिया और उसके आसापास के तमाम किरदारों के बारे में सोचते रहे कि शायद कहीं टहलते हुए दिख जाएँ। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। रोहिणी सिंह जो अक्सर यहाँ टहलती दिखती थीं वो भी शायद कहीं और चली गयीं हों। अब तो वो पीएचडी करके डाक्टर हो गयी हैं। मिलती तो चाय पीते, मिठाई खाते ।
सामने सर्वहारा पुलिया पर एक अकेला इंसान बैठा था। कुछ अनमना सा। नाम बताया ओमप्रकाश। वीएफजे रिटायर हुए थे। कुछ देर उनसे बतियाने के बाद आगे बढ़ गए।
टहलते हुए मेन रोड तक चले गए जो बाईं तरफ रांझी , खमरिया चली जाती है। दायीं तरफ जीसीऍफ़ होते हुए रेलवे स्टेशन। यहीं दायीं तरफ पंकज टी स्टाल पर बजाते रेडियो पर गाना सुनते हुए चाय पीते थे। एक के बाद दूसरा गाना सुनते हुए चाय पीते। अक्सर एक चाय खत्म करने के पहले ही दूसरी आर्डर कर देते थे। यहीं कई चरस पीने वाले मिलते थे और चरस वाली बीडी पीते हुए चरस की खासियत बताते थे। एक चरस प्रेमी ने धुँआ उड़ाते हुए बयान जारी किया था –‘चरस दिलखुश नशा है।‘
पंकज की चाय की दूकान बंद थी। बोर्ड भी नदारद। काउंटर पर चाय की केतली की जगह एक आदमी बैठा था। बगल की दूकान वाले ने बताया कि बहुत दिन हुए बंद हो गयी उनकी दूकान। अगल-बगल की दुकाने अलबत्ता आबाद थीं। सामने ही जलेबी छन रहीं थी। बगल में पोहा जलेबी का काउंटर भी खुला था। लेकिन अपन तो चाय पीने आये थे। पंकज टी स्टाल जो कि भूतपूर्व हो चुकी थी उसकी दूकान के बगल वाली दूकान से चाय पी और पलट लिए।
रास्ते में एक दुकान में रुके। सोचा दीपा के लिए चाकलेट ले लें। पहले कभी –कभी ले जाते थे। आठ साल बाद मुलाक़ात के जाते हुए यह बात याद आई। दूकान पर चाकलेट थी नहीं। साँची के पड़े थे , ले लिए और कुछ टाफी। आठ साल का समय बीत गया इस बीच। अब बड़ी हो गयी है लेकिन हमारी याद में वह बच्ची ही थी अभी तक।
शोभापुर क्रासिंग के आगे दायीं तरफ मुड़कर थोड़ी ही दूर पर रहती है दीपा। उसके घर की तरफ जाते हुए एक नल पर कुछ लोग पानी भरते हुए दिखाए दिए। एक महिला अपना प्लास्टिक का डब्बा नल के मुंह से सटाए हुए बैठी थी। पास से देखा तो नल का पानी डब्बे में भरता जा रहा था। हम आगे बढ़ गए। दीपा से मुलाक़ात की उत्सुकता हो रही थी हमको।

https://www.facebook.com/share/p/6Bm3c1NNSjjSf3k4/

Friday, June 07, 2024

एक बार फिर पुलिया पर



एक बार फिर जबलपुर आना हुआ। पूरे आठ साल एक महीना और सात दिन बाद । 30 अप्रैल, 2016 को जबलपुर से कानपुर जाते समय तुरन्त लौटकर आने का प्लान था। प्लान बदलता गया और आठ साल निकल गए। इस बीच कानपुर, शाहजहांपुर होते हुए वापस कानपुर आकर रिटायर भी हो गए।
जबलपुर आने की खबर जानकर दोस्त लोगों ने स्टेशन आने के लिये कहा। गाड़ी सबेरे साढ़े पांच बजे पहुंचती है। हमने सबको मना कर दिया। लेकिन प्रदीप Sagwal Pradeep जबरियन आ गए। स्टेशन से उठाकर मेस तक लाये।
रिटायर इंसान की बात लोग मानते कहाँ हैं।
प्रदीप-आस्था के साथ हम लोग लंबे समय तक मेस में रहे। अपन ने रहने के लिए वही कमरा खुलवाया जिसमें चार साल रहे थे। कमरा नम्बर 14 । बताया गया कमरे का एसी खराब है। हमने कहा कोई बात नहीं। बन जायेगा। रहेंगे इसी कमरे में। चार साल रहे हैं इस कमरे में। इसी में रहेंगे।
कमरा खुल गया। सामान जमा लिया। दरवज्जा खोलकर बैठे हैं। सूरज भाई अपनी किरण-उजाला के कुनबे के साथ हमको देखकर मुस्करा रहे थे।
अजय कुमार राय Ajai Kumar Rai बनारस के लिए निकलने वाले थे। बहुत छुटकी मुलाकात हुई। आठ साल के भूले-बिसरे गीत आठ-दस मिनट में गा लिए गए।
अजय राय और प्रदीप के साथ शुरआती चाय पानी के बाद उनको विदा करके पुलिया की तरफ गए।
पुलिया के पहले एक आदमी अपना स्कूटर खोले स्टार्ट करने में जुटा था। किक पर किक मारे जा रहा था लेकिन स्कूटर स्टार्ट ही नहीं हो रहा था। स्कूटर वाला झुककर उससे विनती सरीखी करता हुआ किक मारे जा रहा था।
पुलिया पर एक आदमी बैठा था। हाथ में पट्टी बंधी हुई थी। यही बातचीत की शुरुआत का बहाना बनी। हमने पूछा -'चोट कैसे लगी?'
कूलर ठीक कर रहे थे। सीट लग गयी।
नाम,काम-धाम पूछने पर पता चला कि वीएफजे से रिटायर हुए हैं 2017 में। नाम इतवारी लाल। इतवार को पैदा होने के कारण नाम पड़ा इतवारी लाल। पिता खरिया में काम करते थे। इतवारी लाल एम पी वी में स्टोर का काम देखते थे। सामान रखने, इशू करने का।
सामने वाली पुलिया पर कोई था नहीं। सुबह लोग बैठते होंगे। कल देखेंगे।
लौटते हुए देखा स्कूटर वाला चला गया था। स्कूटर स्टार्ट हो गया होगा।
अपन भी स्टार्ट हो गये जबलपुर में।

https://www.facebook.com/share/p/v8kVX77z48TiTCHK/

Monday, January 09, 2017

पुलिया की दुनिया का विमोचन


कल से दिल्ली में विश्वपुस्तक मेला शुरु हो गया। तमाम कवि/लेखक/व्यंग्यकार अपनी नई किताब का विमोचन, नये संस्करण का पु्नर्विमोचन करवाने के लिये दिल्ली पहुंचेंगे प्रगतिमैदान। ख्यातनाम लोग मित्रों की किताबों का विमोचन करेंगे। उन सबको बधाई। शुभकामनायें।
विमोचन के लिहाज से देखा जाये तो मेरी पहली किताब ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन अनूठे ठंग से हुआ था। जिस पुलिया पर बैठने वाले किरदारों के किस्से इस किताब में हैं उसी पर इसका विमोचन हुआ था। मतलब घटनास्थल पर ही।
किताब के विमोचनकर्ता थे ’पुलिया पर दुनिया’ के सबसे प्रमुख किरदार ’रामफ़ल’। जाड़े की एक धूपभरी दोपहरी में पुलिया पर गये अपन किताब लेकर। ’रामफ़ल’ को किताब पकड़ाई। कहा ये देखो किताब बनी ऐसी। फ़िर उनको विमोचन मुद्रा में किताब पकड़ाई। फ़ोटो खींची और बस हो गया विमोचन। थर्मस में चाय ले गये थे। डिस्पोजेबल ग्लास भी। वहीं चाय पी गयी और चले आये।
किताब आम लोगों के बारे में है। इसके परिचय लिखते हुये मैंने लिखा था:
" व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी एक पुलिया पर बैठे लोगों के विवरण हैं इस किताब में। तरह-तरह के लोग दिखे पुलिया पर। हर व्यक्ति अपने में एक अलग किरदार है। पुलिया पर बैठे लोगों से बतियाते हुये एहसास होता है कि आपाधापी भरी जिन्दगी जीते हुये हम अपने आसपास की दुनिया से कितना अपरिचित रह जाते हैं।
“पुलिया पर दुनिया” आम लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी का रोजनामचा है। इसकी खासियत यही है कि कोई खास व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है। सब आम लोगों के किस्से हैं।"
किताब की कोई समीक्षा तो नहीं छपी। लेकिन आनलाइन गाथा पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रियायें हैं। जैसे कि ये:
1. Akanksha Verma
i take this book for my father. after reading this book my father said that this book really touch his past, when he enjoy with friends at tea shop in evening. I am very happy to see my father happy.
2. Sonu Singh
ha ha ha, nice book. what we do today, we didn't meet with our friends and not sharing our feeling. This book realize me what is the importance of people in our life.
किताब आनलाइन उपलब्ध है। ई-बुक और पेपरबैक दोनों फ़ार्मैट में। खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर जाकर आर्डर कर सकते हैं।
इस तरह हमारा भी पुस्तक मेला शुरु हो गया। 
व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी
BOOKSTORE.ONLINEGATHA.COM

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210214407450096

Sunday, July 03, 2016

धनात्मक बातें करनी चाहिए

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10208447205991164

जबलपुर में कलीम से मुलाकात हुई थी। पुलिया पर। 10 मार्च, 16 को। कलीम कब्ज़ा पेटी रिपेयर का काम करते थे। इस असुरक्षित धंधे के बजाय कुछ दूसरा काम करने की सलाह हमने ऐसे ही उछाल दी तो कलीम ने बताया कि वे पोल्ट्री फार्म वगैरह के लिए दाना बनाने का काम करना चाहते हैं। बहुत दिन का सपना है उनका। चार लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

50-60 हजार की रकम चाहिए थी काम शुरू करने के लिए। पहले तो बस राय देने तक ही सीमित रहे हम। लेकिन अपना काम करने का सपना जिस सिद्दत से कलीम देखने लगे उससे हम उनके लिए लोन की कोशिश में भी जुटे। 'मुद्रा लोन' के बारे में पता किया। बैंक अधिकारियों से बात की।

इस बीच कलीम से अक्सर बातचीत और मुलाकात होने लगी। एक दिन वो मेरे कमरे में भी आये। उनके अपना काम करने की ललक देखकर मन किया कि अपने पास से रूपये दे दें निकाल कर लेकिन ऐसा किया नहीं। पर यह जरूर कहा एक बार फिर -'जिस शिद्दत से तुम यह सपना देख रहे हो उसके बाद फिर इसको पूरा होने से कोई रोक नहीँ सकता।'

इस बीच हम कानपुर आ गए। उधर कलीम का लोन का कागज सरकने लगा। हमारे जबलपुर के साथी विनय को इस काम में सहयोग के लिए बैंक गए। वहां अधिकारियों से मिले। वहां कुछ देरी हुई। फिर भी कुछ हुआ। बाद में बैंक वालों ने कोटेशन माँगा कि सामान कहां से खरीदेंगे। एक सप्लायर ने मेरे कहने पर कोटेशन दे दिया।

बैंक वाले सर्वे के लिए आये। लोन पास हो गया है। 40600/- रूपये। पता चला कि लोन का चेक वो उस सप्लायर के नाम ही देंगे जिसने कोटेशन दिया था। वह भी तब जब मशीन बन जायेगी। हमने फिर बात की बैंक वाले साहब से। कुछ गर्मा-गर्मी भी हुई। जबलपुर में होते तो बैंक में ऊपर शिकायत भी करते। मशीन बन जायेगी फिर लोन का क्या आचार डालेगा कोई।

बैंक वाले क्या इसी तरह 'मुद्रा लोन' पास करते हैं ? क्या प्रधानमंत्री जी को पता है कि 'मुद्रा लोन' तब पास करते हैं जबलपुर की 'सटक बैंक' के अधिकारी जब वह काम हो जाये जिसके लिए लोन स्वीकृत हुआ है।

फिर मैंने सप्लायर से अपनी गारन्टी पर सामान देने को कहा। उसके पास जो सामान था उसने दे दिया। बाकी सामान कलीम ने उधारी पर इधर-उधर से लिया। मशीन बनाने में जुट गए।

आज फोन पर बात हुई तो पता चला कि कलीम की मशीन लगभग बन गयी है। बैंक वाले देख भी गए हैं। सोमवार को पैसा देने के लिए बुलाया है। क्या पता सोमवार को लोन का चेक मिल भी जाये। 1200 रूपये महीने की क़िस्त बनी है।

अब जब सब काम लगभग पूरा हो गया है। कलीम की मशीन बन गयी है। उनका अपना काम करने का सपना पूरा हो जायेगा। शायद ईद के पहले ही।

कलीम से जब हमने अपना काम करने की बात कही थी तब मुझे अंदाजा नहीं था कि ऐसा कुछ होगा। लेकिन उन्होंने मेरी बात को गंभीरता से लिया और अपना बहुत दिनों का सपना पूरा करने में जुट भी गए।

इसीलिये कहते हैं धनात्मक बातें करनी चाहिए। क्या पता कौन सी बात कब सच साबित हो जाए।
पहले का किस्सा इस लिंक पर पढ़ें

Sunday, April 10, 2016

पुराने ख्याल के लोग

कल सुबह फैक्ट्री जा रहे थे तो पुलिया के पास एक महिला दिखी। सर पर टोकरी रखे दोनों हाथ हिलाती हई अपनी गगरी, मटकी बेचकर लौट रही थी। उसका फोटो खींचकर फैक्ट्री चले गए।

दोपहर को लंच पर आते समय पुलिया पर मिले इब्राहम। मोटरसाईकल पर प्लास्टिक के ड्रम, टब और बाल्टी तथा आउट तमाम चुटुर-पुटुर सामान लादे फेरी के लिए निकले थे। दोपहर हो गयी तो पुलिया की छाँह में सुस्ताने लगे। सुस्ताते हुए एक छुटकी डायरी में बिक्री का हिसाब करते जा रहे थे।

बात करते हुए पता चला कि फेरी लगाने के पहले इब्राहम पुताई का काम करते थे। मजूरी। शहर की कई बिल्डिंगों के नाम गिनाये इब्राहम ने जिनकी पुताई की है उन्होंने। एक बार पुताई करते हुए झूले से गिर गए। चोट लग गई तो फिर पुताई के काम से राम-राम कर लिया।


पुताई का काम छोड़ने के पीछे गिरने के अलावा शादी होना भी था। तीन साल पहले शादी हुई फिर बच्ची तो पुताई की अनियमित कमाई से गुजारा नहीं होता था तो फेरी लगाने लगे। उसमें कभी मजूरी मिली न मिली। फेरी लगाने में काम भर का कमा ही लेते हैं। अपने काम का यह भी फायदा जब मन किया फेरी लगाई और जब मन किया आराम।

फेरी के काम को व्यापार मानने वाले इब्राहम का कहना है कि व्यापार में यह आसानी रहती कि एक काम में मन न लगे तो दूसरा कर लो।

मोटरसाइकिल पर ड्रम को लदे देख हमने ताज्जुब किया तो बोले इब्राहम की दस ड्रम तक लाद कर फेरी लगा चुके हैं वे। लोगों ने फोटो भी खींचकर अख़बार में छापी हैं।

मूलत: बरगी बाँध के पास के गाँव के रहने वाले इब्राहिम के पिता जी की जमीन जब डूब क्षेत्र में आई तो उसका मुआवजा भी नहीं लिया उन्होंने। चले आये जबलपुर रोजी कमाने। मुआवजा न लेने का कारण बताते हुए बोले इब्राहिम --'पुराने ख्याल के लोग। जमीन की कीमत का दस फ़ीसदी मुआवजा मिल रहा था। गाँव के किसी को बोल दिया हमाई जमीन भी अपने नाम बताकर ले लेना जो मिले और चले आये शहर।'

नर्मदा नदी पर बने बांध के चलते कई गावों के लोग विस्थापित हुए। पानी, बिजली और सिंचाई की सुविधा के लिए कई गाँव जो डूब क्षेत्र में आये खाली कराये गए। उनमें से एक गाँव हरसूद के डूबने की कहाँनी पत्रकार विजय तिवारी ने बहुत मार्मिकता से बयान की है अपनी किताब 'हरसूद-30 जून' में।उनका एक इंटरव्यू लिया था मैंने विस्तार से। उनका कहना था -' वोट की राजनीति ने बनाये नपुंसक नेता।' इंटरव्यू यहां पढ सकते हैं।
http://www.nirantar.org/0806-samvaad

हम इब्राहिम से बतिया रहे थे तब तक फैक्ट्री से फोन आ गया। वापस किसी काम से फैक्ट्री जाना पड़ा। जब तक लौटे तब तक इब्राहिम कहीं जा चुके थे।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207841467088070

Saturday, March 12, 2016

अपना काम करने का सपना


मोहम्मद कलीम पुलिया पर
’ये है हमारा मशीन का स्केच ! ये मोटर है! ये जाली ! यहां से दाना फ़ाइनली निकलेगे।’ - कलीम एक कागज में स्केच बनाकर हमको समझा रहे थे।

हुआ यह कि दो दिन पहले पुलिया पर सोते हुये कलीम मिले। साइकिल पर बक्सा, पेटी के कुंडी वगैरह रिपेयर करने का सामान लदा था। कुछ साइकिल के हैंडल पर, बाकी कैरियर की पेटी पर। कब्जा, पेटी रिपेयर का ही काम करते हैं कलीम। कभी काम मिलता है, कभी नहीं मिलता। परसों की ही कुल कमाई 100 रुपये हुई थी।
हमने ऐसे ही रायबहादुर की तरह कहा- ’ इस धन्धे में काम रोज नहीं मिलता तो कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते।’

कलीम बोले-’ काम तो करना चाहता हूं। अपना काम। लेकिन पूंजी का जुगाड़ ही नहीं हो पा रहा।’

हमने कहा -’ क्या काम करने की सोच रहे हो? कितना पैसा चाहिये उस काम में?’

उन्होंने बताया-’ हम पोल्ट्री फ़ार्म, सुअर पालने वालों के लिये दाना बनाना का काम करना चाहते हैं। 50-60 हजार लगेंगे इस काम में। काम से और लोगों को भी रोजगार मिलेगा।’

विस्तार से अपनी योजना के बारे में बताते हुये बोले कलीम-’ परियट नदी के पास सैंकडों डेयरी हैं। हजारों जानवर हैं वहां। रोज कोई न कोई मरता है। उसका गोश्त बेकार जाता है। हम उस मरे हुये जानवर के गोश्त से मुर्गियों और सुअरों के लिये दाना (चारा ) बनाने वाली मशीन बनायेंगे। इससे हम चार लोगों को रोजगार भी देंगे। हमारा बहुत दिन से सपना है यह काम करने का लेकिन पैसे के कारण पूरा नहीं हो पा रहा है।’

हमने कहा- ’ तो बैंक से पैसा लोन लेकर सपना पूरा करो न्! शुरु करो काम।’


अपना काम करने का सपना है कलीम का
बैंक में लोन कैसे मिलेगा? कौन देगा ? यह बात कह ही रहे थे कलीम तब तक हमारे एक परिचित हमको खोजते हुये आये। एक किताब कूरियर से आयी थी। किताब आर्डर करते समय मैं अपना मोबाइल नंबर लिखना भूल गया था सो कूरियर वाला मुझे खोज रहा था। उनसे पूछा उसने मेरे बारे में तो मुझे पुलिया पर खड़े देखकर वे कूरियर वाले को मेरे पास ले आये।

मैंने उनसे कहा -’ये जरा इनकी कुछ सहायाता कर सकते हो बैंक से लोन दिलाने में तो करो।’

उन्होंने कहा - ’हां हम पूरी कोशिश करेंगे। इसके बाद साढे तीन बजे अपने सब कागज लेकर बैंक आने की बात तय हुई कलीम और मेरे परिचित की।’

मैं फ़ैक्ट्री पहुंचा तो कुछ देर में फ़ोन आया कलीम का कि वे बैंक में इंतजार कर रहे हैं। हमने अपने परिचित को फ़ोन किया तो वे पहुंचे बैंक। इस बीच मैंने बैंक मैनेजर से लोन के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि ’मुद्रा लोन’ मिलता है 50 हजार से 10 लाख तक। लेकिन इस साल का लक्ष्य पूरा हो गया है। अप्रैल मई में मिल सकता है अगर उनका खाता बैंक में हो।

शाम को पता चला कि लोन मिल जायेगा लेकिन उसके लिये पैन कार्ड होना जरूरी है। आधार कार्ड, वोटर आई डी है कलीम के पास। पैन कार्ड जैसे ही मिलेगा लोन मिल जायेगा। अब मैंने पैन कार्ड की जानकारी नेट से ली। अब कलीम के लिये पैन कार्ड का इंतजाम करना है।

इस बीच मैंने कलीम से पूछा कि तुम्हारा बैंक में खाता है ? बोले - है! जीरो बैलेंस वाला खाता है। हमने पूछा - किस बैंक में है? बोले - ’बैंक का नाम याद नहीं पर किताब घर में धरी है।’ हमने कहा - ’नाम देखकर बताओ।’
कुछ देर में कलीम का फ़ोन आया। बोले- ’ सटक बैंक में खाता है।’ हमने कहा - ’ये सटक बैंक कौन सी नयी खुल गयी। स्पेलिंग पढकर बताओ।’


ये है कलीम की मशीन का स्केच
पता चला कि उनका खाता स्टेट बैंक में है। जिसे वो सटक बैंक कह रहे थे।

इस बीच हमने कहा -’ तुम गोश्त से दाना बनाने की मशीन कैसे बनाओगे?’

कलीम बोले-’ हम खुद बनायेंगे। हम मिस्त्री हैं। पुरानी मोटर उठा लेंगे। सब कर लेंगे। बस पैसे का जुगाड़ हो जाये।’

हमने कहा-’ अच्छा स्केच बनाकर बताना कैसे बनाओगे मशीन।’ कलीम बोले- ’दिखायेगे।’

हमने सोचा स्केच की बात कही है। एकाध दिन बाद कभी आयेंगे। लेकिन कल दोपहर लंच के बाद फ़ैक्ट्री जाते समय देखा कि कलीम भाई स्केच लिये हाजिर थे। हमको एक-एक चीज विस्तार से समझाने लगे।

हमने कहा - ’ स्केच तो मुझे नहीं पता वैसा ही है जैसा तुम मशीन बनाने की सोच रहे हो। लेकिन जितनी शिद्धत से तुम इस काम के बारे में सोच रहे तो इसको पूरा होने से कोई रोक नहीं सकता।’

कलीम बोेले-’ यह मेरा बहुत दिनों का सपना था। आपका सहयोग मिलेगा तो अब लगता है यह पूरा भी हो जायेगा। इससे लोगों को रोजगार भी मिलेगा। लोन भी मैं साल भर में चुका दूंगा।’

हमने कहा - ’तुम्हारा सपना पूरा होगा तो मुझे बहुत खुशी होेगी।’

और विस्तार से बात करने पर बताया कलीम ने कि मशीन तो 20 हजार में बन जायेगी लेकिन बाकी का हिसाब-किताब करने में, दुकान बनाने के लिये 30-40 हजार और चाहिए। दुकान नहीं होगी तो कौन आयेगा मेरे यहां से दाना खरीदने।

कल मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुये सलिल जी ने 'मुद्रा लोन' का जिक्र किया। उनसे और जानकारी लेकर ये लोन कलीम भाई को दिलवाने की कोशिश करेंगे। देखते हैं कितना सफ़ल होते हैं उनका सपना पूरा करने में।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207515572180901

Saturday, February 27, 2016

तम्बाकू नहीं खायेगें अब



मयूर (दांये) सोनू के साथ पुलिया पर
कल दोपहर को लंच के लिये मेस आते हुये पुलिया पर दो लोग बैठे दिखाई दिये। साइकिल उनकी सामने खड़ी थी। दोनों साथ के लिफ़ाफ़े से कुछ निकालकर हथेली से रगड़कर खाते हुये दिखे। हमें लगा कि ये दोनों तम्बाकू खा रहे हैं । ’तम्बाकू विरोधी प्रवचन का मौका मिला सोचकर हम किंचित प्रसन्न भी हुये। उनके पास से गुजरते हुये बतियाने लगे।

जैसे खुद को पक्का ईमानदार मानने वाला इंसान दूसरे की हर हरकत को बेईमानी की दिशा में उठा हुआ कदम समझकर उसकी निन्दा करता है। या फ़िर आजकल अपने को देशभक्त मानने वाले लोग अपने से अलग विचार रखने वाले को देशद्रोही ही मानकर यथासंभव उनका हर संभव संहार करने की चेष्टा करते हैं वैसे ही किसी को तम्बाकू खाते देखकर, बीडी पीते हुये उसको प्रवचनामृत पिलाने की सहज इच्छा घेर लेती है अपन को भी।

बात करने पर पता चला कि वे तम्बाकू नहीं खा रहे थे। बल्कि मूंगफ़ली छीलकर खा रहे थे। मूंगफ़ली छीलकर हथेली में रगड़कर दानों का छिलका हटाने को हमने उनका तम्बाकू खाना समझ लिया। कितनी पूर्वाग्रहग्रस्त मानसिकता हो रखी है अपन की भी। आपके साथ भी ऐसा होता है क्या ? :)


उनमें से एक ने बताया कि वे टेंट हाउस में काम करते हैं। वेटर और अन्य सब सर्विस का काम। उसी की मजदूरी लेने जा रहे थे। 375 से 400 रुपये रोज के मिलते हैं। जब टेंट हाउस का काम नहीं मिलता तो बेलदारी का काम करते हैं। उसमें 250 रुपये तक मिलते हैं।

मयूर चौरे नाम था। शक्ल से 20-22 साल के लगने वाले ने अपनी उमर 30 साल बताई। उसके साथ उसका चचेरा भाई सोनू था।

अपना किस्सा बताते हुये मयूर ने बताया कि वह मराठी है। बालाघाट में घर है। लेकिन पिता जबलपुर आ गये। छह बहनों का अकेला भाई है वह। पिता अब हैं नहीं। मां साथ में हैं। शादी हो गयी है। पत्नी छत्तीसगढ की है। मयूर खुद पांचवी पास है। पत्नी आठवीं पास है। दो बच्चे हैं उसके। बच्ची छह साल की और एक बच्चा चार साल का। सब बहनों की शादी हो गयी। दो बहनों की शादी पिता के न रहने पर की।

हमने कहा -’पिता के सात बच्चे हुये। तुम्हारे तीस साल की उमर में दो बच्चे हो चुके। आगे और होंगे!’

’अब नहीं होंगे। हमने वाइफ़ का आपरेशन करवा दिया- छोटा परिवार, सुखी परिवार।’ - मयूर एकदम परिवार नियोजन कार्यक्रम का ब्रांड एम्बेसडर सा हो गया।

हमने कहा -’ बड़े समझदार हो तुम तो यार।’

काम काज के बारे में बात करते हुये बोला- ’ टेंट हाउस के काम में पैसा तो मिलता है लेकिन हमको अच्छा नहीं लगता। लोग गाली-गलौज करते हैं। अबे-तबे करते हैं। शादी-व्याह पार्टी में दारू पीकर बदतमीजी से बात करते हैं। कुछ बोल सकते नहीं। बोलो तो मारपीट तक पर उतारू हो जाते हैं। इसलिये हम कुछ और काम करने की सोच रहे हैं।’

हमने फ़िर कहा -’ तुम तो बड़ी समझदारी की बात करते हो यार। लगते भी नहीं 30 साल के हो।’

इस पर सोनू ने बताया कि कोई भी नहीं कहता इसको कि 30 साल का है यह। सब कम उमर ही समझते हैं इसे।

बात करते हुये अपने मोबाइल में उसने अपने घर वालों के फ़ोटो दिखाये। मोबाइल पुराना था। स्क्रीन शायद ढीला हो गया था। रबड़ बैंड से बांधा गया था। मां, पत्नी, बच्चे सबके फ़ोटो दिखाये । पत्नी का नाम बताया पूनम। धूप में डेढ इंच बाई डेढ इंच के स्क्रीन में फ़ोटो साफ़ नहीं दिख रहे थे लेकिन उसके उत्साह की चमक के चलते हमने सब फ़ोटो देखे और तारीफ़ की।

पत्नी की बात चली तो हमने पूछा- ’ कभी घुमाने / पिक्चर दिखाने ले जाते हो?’

वह बोला- ’ घर में ही टीवी में देखती है। बाहर जाने की फ़ुर्सत ही नहीं मिलती।’

मां का बहुत ख्याल रखता है ऐसा लगा। इतनी तारीफ़ की अपनी मां की उसने कि अगर मुनव्वर राना सुनते तो कुछेक और शानदार शेर निकाल देते।

चलने के पहले हमने उससे कहा -’तुम्हारे दांत से लगता है कि तुम तम्बाकू भी खाते हो! क्यों खराब करते हो अपने दांत? ’

इस पर उसने कहा -’ आपने कह दिया अब आज के बाद से कभी नहीं खायेंगे।’ कहते हुये उसने जेब से तम्बाकू की पुडिया निकालकर वहीं फ़ेंकने का उपक्रम किया।

हमने कहा -’ यहां मत फ़ेंको। अपने साथ ले जाओ। घर में रखना। पत्नी के पास कि अब छोड़ दी। यह आखिरी थी । ’

शाम को फ़ोन पर फ़िर बताया उसने कि तम्बाकू नहीं खायेगा अब ! :)

पता नहीं अपने कहे पर अमल कर पाता है कि नहीं। लेकिन तय किया यही क्या कम ! :)

चलते हुये बोला -’ आप बहुत अच्छे हैं अंकल जी। वर्ना आजकल कौन आम लोगों से इस तरह बात करता है! ’ यह कहते हुये उसने आते-जाते तमाम लोगों की तरफ़ इशारा किया गोया शिकायत दर्ज करा रहा हो कि देखिये इनमें से कोई रुककर हमारा हाल-चाल नहीं पूछ नहीं रहा।  :)

हमने कहा - ’अरे यार,तुम आम नहीं खास हो। इतने समझदार हो। तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगा मुझे।’
वह बोला -’मुझे भी बहुत अच्छा लगा अंकल जी। आपसे बात करते-करते मूंगफ़ली कब खत्म हो गयी पता ही नहीं चला। 30 रुपये थे हमारे पास। 10 रुपये की मूंगफ़ली ली थी। सब खा डाली यहीं बैठकर आपसे बात करते हुये।’ यह कहते हुये उसने पास के बचे हुये 20 रुपये भी दिखाये।

हमने कहा -’ अच्छा हम दे देते हैं 10 रुपये तुमको। फ़िर से खा लेना मूंगफ़ली।’ :)
 
मयूर हंसते हुये अपने साथी सोनू के साथ चला गया। हम भी मेस चले आये।

मयूर (दांये) सोनू के साथ पुलिया पर। मूंगफली का पैकेट दोनों के बीच ।





https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207410956845583

Saturday, February 06, 2016

बीड़ी से बीड़ी जलती है

कल लंच के समय हम फैक्ट्री के सामने की सड़क पर दो साईकिल सवार अगल-बगल खड़े होकर बतियाते दिखे। एक दूसरे की विपरीत दिशा में साइकिलें समानांतर पटरियों पर खड़ी अप-डाउन रेलगाड़ियों सरीखी लग रही थी। साइकिल सवार कुछ देर बात करने के बाद बीड़ी सुलगाते हुए चलने को हुए।

बीड़ी सुलगाकर साथ में पीते हुए साइकिल सवारों को देखकर केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्ति याद आ गई:
"बीड़ी से बीड़ी जलती है।"

हमारे साइकिल के पास पहुंचने तक एक साइकिल सवार जा चूका था। दूसरे भी पैडल मारने की तैयारी में थे कि हम उनके पास पहुंचकर बतियाने लगे।

साइकिल पर पानी के प्लास्टिक के डब्बों में पानी भरकर ले जा रहे थे। यही बातचीत शुरू करने का माध्यम बना। हमने पूछा-'कहाँ से पानी भर के ला रहे?' बोले-'मेस से। कंचनपुर में रहते हैं। वहां पीने का पानी ठीक नहीं आता।'

बात शुरू हुई तो फिर काफी हुई। अपने बारे में बताया साइकिल सवार ने। 2008 में वी ऍफ़ जे से रिटायर हुए। टेलीफोन एक्सचेंज से। छपरा के रहने वाले हैं। अब यहीं बस गए। कंचनपुर में रहते हैं। मकान खरीदा था। फिर बेंचकर नातियों की शादी की। अब किराये के मकान में रहते हैं।

एक लड़का था। 40 साल की उम्र में गुजर गया। मोटर साइकल से जा रहा था। एक सांड ने टक्कर हो गई। खम्भे से टकरा गया सर। नहीं रहा।

हेलमेट नहीं पहने था? पूछने पर बोले-'नहीं। यहाँ कोई हेलमेट नहीं पहनता हैं। देखते हैं कितने लोग जा रहे हैं दुपहिया पर। पहने हैं कोई हेलमेट?'

हमारे देखते-देखते कई मोटरसाईकल/स्कूटर वाले गुजरे वहां से। बहुत कम हेलमेट पहने थे। पेट्रोल पम्प पर बिना हेलमेट पेट्रोल देना मना है। वहां भी लोग एक दूसरे का हेलमेट पहनकर पेट्रोल भराते हैं।

अपने बारे में बताते हुए बोले प्रभु- 'बाईपास कराये थे।' सीना खोल के अपने कृत्तिम दिल (पेसमेकर) दिखाए। बोले- 'ये डाक्टर गड़बड़ लगाया। काम नहीं करता। कन्ज्यूमर फोरम में जायेंगे। पैसा वापस लेंगे। दूसरा ये वाला दिल्ली से लगवाये हैं। अच्छा काम करता है।'

सीजीएचएस की दवाओं के बारे में बताया-'सुबह से दोपहर तक लाइन लगाओ तो झोला भर दवा दे देते हैं। बहुत भीड़ होती है।'

बातों के दौरान पता चला कि उनका नाती भी कुछ दिन पहले नहीं रहा। पेट में दर्द हुआ। नहीं रहा। दुःख पर दुःख। बस हौसला बना है। जब खुद की देखभाल के लिए बच्चे होने चाहिए तब वो बच्चों और उनके बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।

हमारे बारे में पूछा। बोले-'ट्रांसफर करा के जल्दी से कानपुर जाइये। नियम है जब कि पति-पत्नी सरकारी नौकरी में हो तो एक जगह रहना चाहिए तो होगा कैसे नहीं। कराइये ट्रांसफर। जाइए।'

हम बोले-'हाँ लगे हुए हैं कोशिश में।'

एक आदमी जो कि अनजान होता है पांच मिनट पहले उससे दुःख/सुख बतिया लीजिये तो आपका कितना हितचिंतक हो जाता है। है न ?

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207272768270955&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

Friday, February 05, 2016

बच्चों को पालना है चोरी-चमारी से बचाना है, इसलिए दारु नहीं पीते



मुन्ना पुलिया के पास खड़े अपनी झाड़ू ठीक करते हुए
मुन्ना मिले आज सुबह पुलिया पर। सड़क बुहारने वाली झाड़ू की सींके ठीक कर रहे थे। झाड़ू आसमान की तरफ और पीठ सूरज की तरफ किये। और कोई होता तो बुरा मान जाता अपनी अवहेलना से लेकिन सूरज भाई इस सबसे बेखबर शहंशाहों की तरह धूप, उजाला और गर्मी सप्लाई करते रहे।

मुन्ना से उम्र पूछी तो बोले 35 साल। फिर बोले 45 साल। हमने कहा -'हमने पहले कभी तो कभी देखा नहीं तुमको पुलिया पर या आसपास।'

'लेकिन हमतो अक्सर/ रोज देखते रहते हैं आपको।' मुन्ना बोले।

'बाप हमारे मिलिट्री से रिटायर होकर जीसीएफ में भर्ती हुए। फिर वहां से रिटायर होकर कुछ दिन जिए। दारु बहुत पीते थे। तबियत खराब हो गयी। मर गए। माँ भी नहीं रही।'- मुन्ना ने अपने पिता के बारे में बताया।
'तुम नहीं पीते दारु ? -हमने पूछा।'

'कहां से पिएंगे? चार हजार रूपये महीने में ठेकेदार देता है। दो बच्चियां हैं। बीबी है।दारु पिएंगे तो परिवार कहाँ से पालेंगे।' -मुन्ना ने मुझे समझाया।

दो बेटियां हैं मुन्ना की। नाम बताया-निहारिका मलिक और अंशिका मलिक। कक्षा 8 और कक्षा 7 में पढ़ती हैं। हजार रूपये महीने फ़ीस के चले जाते हैं। साल के शुरू में दस/बीस हजार एडमिशन में लग जाते हैं।
सफाई के काम के अलावा सूअर पालने का काम करते हैं मुन्ना। उससे कुछ आमदनी हो जाती है।


हमने कहा जरा इधर मुंह करो तो करके फोटो खिंचा लिए मुन्ना
'बच्चों को पालना है। चोरी-चमारी से बचाना है। इसलिए दारु नहीं पीते।' -मुन्ना ने कहा।

पैसे नहीं हैं इसलिए नहीं पीते। मतलब मन करता है पीने का। -मैंने पूछा।

'अरे मन तो बहुत कुछ करता है। लेकिन मन की करेंगे तो बच्चों की परवरिश कैसे होगी। इसलिए नशा नहीं करते'- मुन्ना ने कहा।

लेकिन दांत से लगता है पान/मसाला तम्बाकू खाते हो। - मैंने कहा।

हम तम्बाकू कभी-कभी खाते रहते हैं। आदत पड़ गयी है। इसके अलावा और कोई नशा नहीं करते। -मुन्ना बोले।

खुद को हरिजन बताया और बोले , कड़वा करतार हमारे कुल देवता हैं।

हमने कड़वा करतार का नाम पहली बार सुना। पता नहीं कि ये देवता 33 कोटि देवताओं में शामिल हैं या वहां से 'बिरादरीबदर' हैं।

फोटो दिखाई तो मुन्ना ने मोबाईल में घुसकर देखी। दिखाकर हम दफ्तर चले आये। मुन्ना सड़क बुहारने लगे होने। हम फ़ाइल निपटाने लगे। अपनी-अपनी रोजी कमाने में जुट गए दोनों लोग।  :)

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207264243137832?pnref=story

Tuesday, February 02, 2016

पुलिया पर कमलेश


कमलेश
आज सुबह पुलिया पर कमलेश मिले। धूप सेंकते हुए पास ही रखी पालीथीन से कुछ-कुछ निकाल-निकालकर खाते जा रहे थे। पास से देखा तो एक पालीथीन में गुड़ और दूसरी में लइया जैसी कुछ थी। गुड़ की भेली के टुकड़े करके मुंह में रखते जा रहे थे। बीच-बीच में लइया भी फांकते जा रहे थे।

पूछने पर बताया कि कांचघर में रहते हैं। सिलबट्टा पर दांत बनाने का काम करते हैं। वीएफजे क्वार्टर की तरफ जा रहे थे। वहां किसी ने बुलाया है अपनी सिल और सिलबट्टे पर दांत बनवाने के लिए।

आजकल रेडीमेड मसाले के जमाने में घरों से ...सिल और सिलबट्टे का चलन बहुत कम हो गया है। इस लिहाज से सिल पर दांत बनवाने का काम भी बहुत कम हो गया है। ऐसे में कमलेश जैसे लोगों की रोजी-रोटी कैसे चलती होगी यह सोचते हुए हमने जब पूछा उनसे तो बोले, कभी मिलता है काम, कभी नहीं मिलता।

विकास और तकनीक के बदलाव के साथ परम्परागत पेशे वाले कई कामों से जुड़े लोगों के काम और रोजी-रोटी के साधन कम होते जाते हैं। हमको पता नहीं चलता लेकिन जो लोग उनसे प्रभावित होते होंगे उनको नए काम में लगने में समय लगता होता। कमलेश को देखकर और पूछने पर भी यही लगा कि वे सिलबट्टे पर दांत बनाने के ही धंधे में लगे हैं।

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले कमलेश के घर में पत्नी और दो बेटे हैं। दोनों बेटे 'इधर-उधर' प्राइवेट काम करते हैं।

कमलेश धीमे-धीमे बोल रहे थे। शायद कुछ तकलीफ रही हो शरीर में या बोलने में। ज्यादा पूछताछ पर चेहरे पर झुंझलाहट सी भी दिखी से। उनके पास दो ठो झोले में कुछ सामान गड्ड-मड्ड था। देखकर लगा शायद मंगलवार को हनुमान जी के मन्दिर में मांग कर आये हों। लेकिन जब पूछा तो बोले,'हम भीख नहीं मांगते।'

इसके बाद हम चलने लगे तो बोले कमलेश,' चाय-वाय कुछ पिला देव।' (मतलब शायद यह कि सुबह-सुबह दिमाग मत खराब करो। चाय के पैसे दे दो और आगे बढ़ो)। हमने पूछा, कित्ते पैसे चाहिए चाय के लिये। कमलेश बोले, 'दस रूपये दे दो।'

पूछने पर बताया कि गुड़ और लइया भी किसी ने दिया है।

हम चाय के पैसे देकर फैक्ट्री की तरफ चल दिए। कमलेश भी पुलिया से उठकर काम के लिए चल दिए।
रास्ते में और बाद में भी मैं सोच रहा था कि जबलपुर स्मार्ट शहर बनने वाला है। जब बन जाएगा जबलपुर स्मार्ट सिटी तब कमलेश जैसे लोग कहां रहेंगे? जबलपुर में या कहीं और। जिन सेवाओं की आवश्यकता स्मार्ट शहरों में नहीं रहेगी उनको प्रदान करके रोजी कमाने वाले लोग स्मार्ट शहर में ही रहेंगे या शहर बदर कर दिए जाएंगे।
 
 

Monday, February 01, 2016

पुलिया पर दुनिया

मैं जब तब अभी तक की अपनी एकमात्र किताब ’पुलिया पर दुनिया’ के बारे में लोगों को बताता रहता हूं। जहां कहीं जाता हूं तो अपनी किताब की प्रति साथ ले जाता हूं। इष्ट-मित्रों को दिखाता और पूछता हूं -"कैसी लगी किताब?"

ज्यादातर लोग प्रोत्साहन के लिहाज से कह देते हैं- बहुत अच्छी है, अभिनव प्रयोग है, ऐसा लेखन कम होता है। आदि-इत्यादि।"

इस तरह की प्रसंशात्मक टिप्पणियों से मन खुश हो जाता है।

आज मेरे एक अभिन्न मित्र से मेरी मुलाकात हुई तो मैंने आदतन अपनी किताब उनको दिखाई और पूछा - "कैसी लगी किताब?"

मैं यह बात भूल गया था कि उन मित्र को अपनी किताब के बारे में पहले भी बता चुका था और वे मेरे कई बार ध्यान दिलाये जाने पर आनलाइन संस्करण में 50/- खर्च करके किताब डाउनलोड करके पढ़ भले न चुके हों लेकिन देख चुके थे।

मित्र ने जो प्रतिक्रिया की वह पहले की प्रतिक्रियाओं से एकदम अलग थी। उसने कहा- " यार , तुम्हारी हरकतें तो उस बुजुर्ग महिला सरीखी हैं जो षोडसी कन्या की तरह साज-सिंगार करके हर आने-जाने वालों से पूछती है- बताओ मैं कैसी लग रही हूं। "

हमें झटका लगा। लेकिन बात सच भी थी इस लिये कुछ कह भी नहीं सकते थे इसलिये चुप हो गये। मित्र ने यह सोचकर कि हमें कहीं ज्यादा बुरा न लग जाये समझाते हुये कहा-" तुमने किताब लिख दी। तुम्हारा काम खतम। अब पाठक खुद बतायेगा कैसी है किताब। हर पोस्ट लिखने के बात क्या सबसे पूछते हो -कैसी है पोस्ट! "

इसके बाद और खुश करने के लिये कह भी दिया-" किताब बढिया है। अब अगली भी जल्दी से लिखो।"
हमें समझ नहीं आया कि षोडसी कन्या की तरह लजा जायें या 'साठसी' महिला की तरह कहें - ' चल हट , तेरी मजाक की आदत अभी गयी नहीं।  :)

वैसे ’पुलिया पर दुनिया’ खरीदनी हो तो आनलाइन लिंक यह है। खरीदिये, पढिये और बताइये कैसी लगी किताब ! :)
http://www.bookstore.onlinegatha.com/…/पुलिया-पर-दुनिया-.ht…

Friday, January 15, 2016

धीरेन्द्र से मुलाकात

धीरेन्द्र केसरवानी
कल मेस के बाहर ही मिल गए धीरेन्द्र केसरवानी। देखकर लगा मिनी वाल मार्ट मोपेड पर लादे चले जा रहे हों। गृहस्थी का हर सामान मोपेड पर। मिक्सी, चकला, बेलन, मुगरी, बाल्टी, मग, स्क्रबर और न जाने क्या-क्या सामान लादे बेचते हैं मोपेड पर।

रीवा के रहने वाले धीरेन्द्र 7 साल पहले जबलपुर आये थे। रांझी में रहते हैं। घूम-घूमकर बेंचते है सामान। 200 से 250 रूपये तक रोज कमा लेते हैं। सामान मांग के हिसाब से बेंचते हैं। कई ग्राहक नियमित हैं। कुछ लोग उधार भी लेते हैं। उधारी वसूलना भी एक बवाल है

धीरेन्द्र सामान से लदी मोपेड लुढ़काते हुए चले जा रहे थे। मोपेड का इंजन रिछाई के पास बैठ गया। स्टार्ट नहीं हो रहा। अब आधारताल तक घसीटते हुए ले जाना पड़ेगा।

मोपेड जब जबलपुर आये थे तब खरीदी थी 6000 रूपये में। उस समय तक 6 साल चल चुकी थी। मतलब कुल उम्र 13 साल है मोपेड की। मोपेड के हाल देखकर लगा कि उसको धीरेन्द्र मोपेड की तरह कम दुपहिया ठेलिया की तरह ज्यादा प्रयोग करते हैं।

अंदाज था कि मरम्मत करानी है मोपेड के इंजन की लेकिन समय न मिलने के कारण करा नहीं पाये। हमने कहा कि पास की दुकान में दिखा लो। इस पर बोले धीरेन्द्र- 'अरे ये खराब कर देगा। आधारताल में ठीक कराएंगे। औजार होते तो हम खुद सुधार लेते।'

समय पर ठीक न कराने पर जिस सवारी पर हम चलते हैं तो बिगड़ जाने पर हमको ही उसको घसीटना पड़ता है।

बात करते-करते हम फैक्ट्री के गेट के पास आ गए थे। धीरेन्द्र वहां से करीब 4 किमी दूर आधारताल की तरफ चले गए मोपेड घसीटते हुए। हम गेट के अंदर फैक्ट्री में जमा हो गए।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207129955020713&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

Wednesday, January 13, 2016

फ़ूलचन्द और मोहनकुमार से मुलाकात

फूलचन्द और मोहनकुमार
कल दोपहर दो लोग पुलिया पर बैठे बीड़ी का धुंआ खींच रहे। उनकी साइकिल सामने में खड़ी धूप खैंच रही थी।

जिस तेजी से धुंआ अन्दर-बाहर कर रहे थे फ़ूलचन्द और उनके साथी मोहनकुमार उससे लगा कि शायद वे बीड़ी पीते हुये कपालभाती सिखाने का अभ्यास कर रहे हों।

फ़ूलचन्द की उमर 65 साल। मोहनकुमार करीब 46 साल। बिल्डिंग बनाने का काम करते हैं। फ़ूलचन्द मिस्त्री हैं। मोहनकुमार बेलदार मतलब सहायक।

हमें लगा कि शायद मजूरी करते होंगे और आज मजूरी नहीं मिली तो पुलिया पर सुस्ताने लगे होंगे लेकिन फ़ूलचन्द ने बताया कि वे अब केवल मिस्त्री नहीं रहे। बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार हो गये हैं। 100 लोगों तक लोगों को काम लगाते हैं। सैकड़ों मकान बना चुके हैं। आज भी कहीं काम लगा है। हमसे भी पूछा- ’ बनवाना होय आपको भी तो बताओ।’


साइकिल धूप सेंक रही है
फ़ूलचन्द ने अपने काम की शुरुआत बेलदारी से की। बताया कि वीएफ़जे और जीआईएफ़ जब बनी थी तो हमने बेलदारी की। शुरु में ढाई रुपया रोज और फ़िर चार रुपये रोज मिलते थे (साठ का दशक)। आज न्यूनतम मजदूरी सौ गुनी बढकर 300 पार हो गयी है।

अपने काम करने वालों को कितना पैसा देते हो? पूछने पर फ़ूलचन्द बोले-’200 से 300 तक। जैसा काम आता हो।’

लेकिन न्यूनतम मजदूरी तो 300 रुपया है। कम क्यों देते हो? - मैंने पूछा।

आप लोगों के यहां काम करने वाले ठेकेदार तो 180 - 200 रुपया देते हैं अपने कामगारों को। - फ़ूलचन्द का जबाब प्राइम टाइम के पार्टी प्रवक्ताओं सरीखा था जो अपनी पार्टी के ऊपर लगे किसी आरोप का जबाब दूसरी पार्टी के ऊपर और बड़े आरोप लगाकर देने को सबसे सटीक जबाब मानते हैं।

3 लड़के 2 लड़कियों वाले फ़ूलचन्द के सब बच्चों की शादी हो गयी है। नाती-नातिन हैं। भरा-पूरा परिवार है।
लगते नहीं 65 साल के यह सुनकर और युवा हो गये फ़ूलचन्द।

मोहनकुमार ने बेलदारी का काम दो साल पहले शुरु किया। इसके पहले कुछ करते नहीं थे। 3 बच्चे हैं। तीनों अपना-अपना कुछ-कुछ काम करते हैं।

इसके पहले कुछ क्यों नहीं करते थे ? यह सवाल पूछने पर बताया- घर की देखभाल करते थे। पिताजी जीआईएफ़ में काम करते थे। 1990 में नहीं रहे। माताराम को पेंशन मिलती है।

यह अपने में मजेदार बात सी है न कि 3 बच्चों का पिता 44 साल की उमर तक माताराम की पेंशन के सहारे घर परिवार की जिम्मेदारी निभाता रहे और उसकेबाद फ़िर कामधाम शुरु करे।

बीड़ी पीने के लिये टोंका तो फ़ूलचन्द बोले - ’बस यही एक नशा है। और कोई नशा नहीं करते नहीं। बीड़ी नहीं पियेंगे तो टट्टी नहीं उतरेेगी। बीमार हो जायेंगे। ’

क्या कहते इस बात पर? धूप सेंकते हुये मेस में आ गये।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207118274848716

Monday, January 11, 2016

हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी

दोपहर लंच के बाद हम आफ़िस जा रहे थे। सामने से कुछ महिलायें अपने सर पर लकडियां लिये आती दिखीं। सबके सर पर कटी जंगली लकड़ी का गट्ठर था। लकड़ियां रस्सी से बंधी हुई थीं। वे तेजी से घर की तरफ़ जा रही थीं । हम सोच रहे थे कि उनमें से कोई पुलिया के पास सुस्ताने के लिये रुके तो उनसे बात करते हुये फ़ोटो खींचेगे। लेकिन कोई रुका नहीं। सबको घर लौटने की जल्दी थी शायद।

अचानक एक महिला के सर पर रखे लकड़ी के गट्ठर से कु...छ लकड़ियों के टुकड़े सरककर सड़क पर गिर गये। महिला ठिठककर रुक गयी। सड़क पर पड़ी लकड़ी को देखने लगी। हम बगल से गुजर रहे थे। उसकी लकड़ी सड़क से उठाकर उसके सर पर रखे लकडियों के गट्ठर के ऊपर रख दिया। वह चलने को हुई तो हमने रोककर उनका फ़ोटो लिया। फ़ोटो खींचते हुये हमने पूछा कि कहां से लेकर आ रहीं लकड़ी ? तो उन्होंने बताया कि गेट नंबर 3 के पास लोग जंगल काट रहे हैं वहीं से लेकर आई।

जंगल कटने की बात से याद आया कि फ़ैक्टी के अंदर और बाहर जहां-तहां उगी घास और जंगली झाडियां कटने का ठेका हुआ है। शायद आजकल बाहर कटाई का काम चल रहा है। शनिवार को मेस के आसपास कटिंग का काम हुआ। उस दिन दोपहर को एक महिला मेस के पास लकड़ी के दो गट्ठर इकट्ठा किये उनको घर ले जाने की तैयारी कर रही थी। लकड़ी तो उसने गट्ठर बनाकर और रस्सी से बांधकर सर पर रख ली। इसके बाद एक मोटी झाड़ी , जिसको गट्ठर में बांधना संभव नहीं था, को उठाकर सर पर रखने की कोशिश करती रही। एकाध कोशिश के बाद लकड़ी की झाड़ी तो उसने सर पर रख ली लेकिन झाड़ी के कांटो में उसकी धोती का पल्ला फ़ंस गया। लकड़ी का गट्ठर और झाड़ी को सर पर रखे-रखे धोती के पल्लू को छुड़ाने की कोशिश करते में झाड़ी का कांटा शायद उसकी उंगली में चुभ गया। दर्द से उबरने के लिये उसने उंगली कुछ देर के लिये मुंह में रख ली और घर की तरफ़ चली गयी।

यह सब मैं पुलिया की तरफ़ से मेस की तरफ़ आते हुये देख रहा था। मेस के पास पहुंचने मैं उसके पास पहुंच गया था। बातचीत करने की कोशिश करते हुये पूछा- ’ कहां रहती हो? ये दूसरा वाला गट्ठर नहीं ले जाओगी?

’ यहीं हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी । अभी इसको घर रखकर आते हैं फ़िर उसको भी ले जायेंगे।’ -कहते हुये वह घर चली गयी। बाद में दूसरा गट्ठर भी ले गयी होगी।
 

Sunday, January 10, 2016

पुलिया पर दुनिया एक प्रतिक्रिया



अपनी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ मैंने पहले ई-बुक के रूप में बनाई थी। फ़िर प्रिंट आन डिमान्ड के तरह रंगीन और ’ब्लैक एंड व्हाइट’ पेपर बैक के रूप में भी अपलोड की। ये किताबें आर्डर करने पर प्रिंट करके भेजी जाती हैं।

रंगीन किताब फ़ोटो प्रिंट करने वाले पेपर पर छपने के कारण सबसे मंहगी हैं। अब तक केवल दो बिकी हैं। एक मैंने खरीदी है देखने के लिये कि दिखती है कैसी छपने पर। दूसरी Om Varma जी ने खरीदी अपने पिताजी के लिये। ओम जी के पिताजी 86 वर्ष की उमर के हैं। मप्र के सहायक जिला शाला निरीक्षक के पद से रिटायर हुये हैं। ओम जी के अनुसार उनके पिताजी लैपटाप पर मेरी पोस्टें पढते/देखते रहते हैं। मेरी किताब छपी तो उन्होंने इच्छा जाहिर की कि उनके लिये ’पुलिया पर दुनिया’ की प्रिंटेट प्रति ही खरीद कर मंगाई जाये जिससे वे अपने मन से जब चाहें पढ सकें।

ओम वर्मा जी ने बताया कि उनके पिताजी ने उनसे किताब के बारे में अपनी राय बताई और उसे मुझे लिख भेजा जाये तो ओम जी ने उनसे लिखकर आग्रह किया कि (सुनने की क्षमता बहुत कम है ओम जी के पिताजी जी की) वे अपने हाथ से अपनी प्रतिक्रिया लिखें जिसे वे मुझे भेज देंगे।

आज ओम जी ने अपने पिताजी आदरणीय बाबूलाल भागीरथ वर्मा जी मेरी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ पर प्रतिक्रिया और अपना स्नेह मुझे प्रेषित किया है। प्रतिक्रिया आप फ़ोटो में देख सकते हैं। मैं ओम जी का आभारी हूं जो उनके माध्यम से उनके आदरणीय पिताजी का आशीष मुझ तक पहुंचा। मैंने ओम जी से वायदा किया है कि अपने लेख के प्रिंट आउट उनके पिताजी के पढ़ने के लिये भेजता रहूंगा।

आज कुछ मित्रों ने बताया कि उन्होंने मेरी किताब फ़्लिपकार्ट से खरीदी। उनका आभार। लेकिन साथियों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूं कि किताब अगर आनलाइन.गाथा या फ़िर पोथी.काम से लेंगे तो सस्ती पडेंगी।

किताबों के लिंक एक बार फ़िर से:

1. ई-बुक और ब्लैक एंड व्हाइट पेपर बैक:
http://www.bookstore.onlinegatha.com/author/143/पुलिया-पर-दुनिया-.html

2. रंगीन पेपर बैक:
https://pothi.com/pothi/book/अनूप-शुक्ल-पुलिया-पर-दुनिया-0





https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207101303064432&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

Saturday, January 09, 2016

पुस्तक मेला की शुरुआत


रामफ़ल ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन करते हुये
आज से दिल्ली में विश्वपुस्तक मेला शुरु हो गया। तमाम कवि/लेखक/व्यंग्यकार अपनी नई किताब का विमोचन, नये संस्करण का पु्नर्विमोचन करवाने के लिये दिल्ली पहुंचेंगे प्रगतिमैदान। ख्यातनाम लोग मित्रों की किताबों का विमोचन करेंगे। उन सबको बधाई। शुभकामनायें।

विमोचन के लिहाज से देखा जाये तो मेरी एकमात्र किताब ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन अनूठे ठंग से हुआ था। जिस पुलिया पर बैठने वाले किरदारों के किस्से इस किताब में हैं उसी पर इसका विमोचन हुआ था। मतलब घटनास्थल पर ही।

किताब के विमोचनकर्ता थे ’पुलिया पर दुनिया’ के सबसे प्रमुख किरदार ’रामफ़ल’। जाड़े की एक धूपभरी दोपहरी में पुलिया पर गये अपन किताब लेकर। ’रामफ़ल’ को किताब पकड़ाई। कहा ये देखो किताब बनी ऐसी। फ़िर उनको विमोचन मुद्रा में किताब पकड़ाई। फ़ोटो खींची और बस हो गया विमोचन। थर्मस में चाय ले गये थे। डिस्पोजेबल ग्लास भी। वहीं चाय पी गयी और चले आये।

किताब आम लोगों के बारे में है। इसके परिचय लिखते हुये मैंने लिखा था:

" व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी एक पुलिया पर बैठे लोगों के विवरण हैं इस किताब में। तरह-तरह के लोग दिखे पुलिया पर। हर व्यक्ति अपने में एक अलग किरदार है। पुलिया पर बैठे लोगों से बतियाते हुये एहसास होता है कि आपाधापी भरी जिन्दगी जीते हुये हम अपने आसपास की दुनिया से कितना अपरिचित रह जाते हैं।

“पुलिया पर दुनिया” आम लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी का रोजनामचा है। इसकी खासियत यही है कि कोई खास व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है। सब आम लोगों के किस्से हैं।"

किताब की कोई समीक्षा तो नहीं छपी। लेकिन आनलाइन गाथा पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रियायें हैं। जैसे कि ये:

1. Akanksha Verma

i take this book for my father. after reading this book my father said that this book really touch his past, when he enjoy with friends at tea shop in evening. I am very happy to see my father happy.

2. Sonu Singh

ha ha ha, nice book. what we do today, we didn't meet with our friends and not sharing our feeling. This book realize me what is the importance of people in our life.

किताब आनलाइन उपलब्ध है। ई-बुक और पेपरबैक दोनों फ़ार्मैट में। खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर जाकर आर्डर कर सकते हैं।

http://www.bookstore.onlinegatha.com/author/143/पुलिया-पर-दुनिया-.html

इस तरह हमारा भी पुस्तक मेला शुरु हो गया।






https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207094916024760&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

Thursday, January 07, 2016

नाना के संग हंसती बच्ची

'बाबा हमारे बंगलौर से जबलपुर आये थे। फिर यहीं बस गए। जबलपुर ही हमारा घर हो गया।' --कल दोपहर को पुलिया पर अपनी नातिन गौरी के साथ 'खेलते हुए' 52 साल के कैलाश स्वामी ने बताया।
मूलत: तमिलनाडु के रहने वाले कैलाश स्वामी अब पक्के जबलपुरिया हैं। हिन्दी ही बोल पाते हैं। 'तमिल इल्लै'। मतलब तमिल नहीं जानते।

दो बेटियां हैं। दोनों की शादी हो गयी। दामाद प्राइवेट काम करते हैं। खुद कैलाश स्वामी भी रोजनदारी पर काम करते हैं। आज काम नहीं मिला तो नातिन को लेकर पुलिया पर आ गए।
...
नातिन गौरी का स्कूल का नाम सुरभि पिल्लै है कक्षा एक में पढ़ती है। छोटा अ, बड़ा अ सीख रही है। नाना के साथ खेलते हुए खिलखिला रही है। खिलखिलाते हुए नाना की गोद में भी सिमट सी जाती है। लगता है नाना से बहुत पटती है गौरी की। उसके हाथ में नाखून बढे हुये हैं। उनमें मैल भी जमा है।

बेटियां जब छोटी थीं 4/5 साल की तब ही पत्नी नहीं रहीं। फिर शादी नहीं की। खुद बच्चियों को पाला। आसपास किसी के घर छोड़कर काम पर चले जाते थे। खाना खुद बनाते थे। अब भी खुद बनाते हैं खाना। लड़कियां अपने-अपने घरों में रहती हैं।

पत्नी के न रहने पर दुबारा शादी न करने का कारण बताते हुए कुमार स्वामी ने बताया-"अगर शादी करते तो भगवान की दया से उससे भी बच्चे होते। फिर इन बच्चों के साथ तालमेल गड़बड़ाता। पता नहीं एडजस्ट हो पाते कि नहीं। इसलिए शादी नहीं की।"

लेकिन जब पत्नी नहीं रही तो तुम जवान रहे होंगे। कभी मन करता होगा किसी के साथ रहने का। तब क्या करते थे?

इस सवाल का जबाब पहले शरमाते हुए और फिर बहादुरी वाले मर्दाने अंदाज में देते हुए जो बताया स्वामी जी ने उसका लब्बो-लुआब जो निकल सकता है वह निकालने के लिए आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाइए।
पर लौटते समय मैं यह सोच रहा था कि दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, समय के हिसाब से समाज संचालन की कितनी भी चुस्त तरकीबें बना लें। रिश्ते, नाते, नियम, क़ानून बना लें लेकिन व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं। बाकी सारे रिश्ते कृत्तिम होते हैं और वे हर समाज के लोगों के मन में साफ्टवेयर की तरह अलग से भरे जाते हैं।लेकिन प्राकृतिक आवश्यकताएं हमेशा सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने का प्रयास करती हैं। अब यह अलग बात है कि पुरुष द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन करना उसकी मर्दानगी मानी जाती है। स्त्री के मामले में इसे चरित्रहीनता कहते हैं।

व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं

'बाबा हमारे बंगलौर से जबलपुर आये थे। फिर यहीं बस गए। जबलपुर ही हमारा घर हो गया।' --कल दोपहर को पुलिया पर अपनी नातिन गौरी के साथ 'खेलते हुए' 52 साल के कैलाश स्वामी ने बताया।
मूलत: तमिलनाडु के रहने वाले कैलाश स्वामी अब पक्के जबलपुरिया हैं। हिन्दी ही बोल पाते हैं। 'तमिल इल्लै'। मतलब तमिल नहीं जानते।
दो बेटियां हैं। दोनों की शादी हो गयी। दामाद प्राइवेट काम करते हैं। खुद कैलाश स्वामी भी रोजनदारी पर काम करते हैं। आज काम नहीं मिला तो नातिन को लेकर पुलिया पर आ गए।
नातिन गौरी का स्कूल का नाम सुरभि पिल्लै है कक्षा एक में पढ़ती है। छोटा अ, बड़ा अ सीख रही है। नाना के साथ खेलते हुए खिलखिला रही है। खिलखिलाते हुए नाना की गोद में भी सिमट सी जाती है। लगता है नाना से बहुत पटती है गौरी की। उसके हाथ में नाखून बढे हुये हैं। उनमें मैल भी जमा है।
बेटियां जब छोटी थीं 4/5 साल की तब ही पत्नी नहीं रहीं। फिर शादी नहीं की। खुद बच्चियों को पाला। आसपास किसी के घर छोड़कर काम पर चले जाते थे। खाना खुद बनाते थे। अब भी खुद बनाते हैं खाना। लड़कियां अपने-अपने घरों में रहती हैं।
पत्नी के न रहने पर दुबारा शादी न करने का कारण बताते हुए कुमार स्वामी ने बताया-"अगर शादी करते तो भगवान की दया से उससे भी बच्चे होते। फिर इन बच्चों के साथ तालमेल गड़बड़ाता। पता नहीं एडजस्ट हो पाते कि नहीं। इसलिए शादी नहीं की।"
लेकिन जब पत्नी नहीं रही तो तुम जवान रहे होंगे। कभी मन करता होगा किसी के साथ रहने का। तब क्या करते थे?
इस सवाल का जबाब पहले शरमाते हुए और फिर बहादुरी वाले मर्दाने अंदाज में देते हुए जो बताया स्वामी जी ने उसका लब्बो-लुआब जो निकल सकता है वह निकालने के लिए आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाइए।
पर लौटते समय मैं यह सोच रहा था कि दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, समय के हिसाब से समाज संचालन की कितनी भी चुस्त तरकीबें बना लें। रिश्ते, नाते, नियम, क़ानून बना लें लेकिन व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं। बाकी सारे रिश्ते कृत्तिम होते हैं और वे हर समाज के लोगों के मन में साफ्टवेयर की तरह अलग से भरे जाते हैं।लेकिन प्राकृतिक आवश्यकताएं हमेशा सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने का प्रयास करती हैं। अब यह अलग बात है कि पुरुष द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन करना उसकी मर्दानगी मानी जाती है। स्त्री के मामले में इसे चरित्रहीनता कहते हैं।

Wednesday, January 06, 2016

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती

 
कल दोपहर लंच के बाद पुलिया पर हरिप्रसाद विश्वकर्मा से मुलाक़ात हुई।

भेलुपुरा में रहते हैं हरिप्रसाद। टेलर का काम करते थे। तीन साल पहले काम छोड़ दिया। कारण सुगर की समस्या है। बहुत थकान होती है। काम करते नहीं बनता। पहले सब कपड़े बनाते थे। कोट, सूट भी। अब कुछ नहीं होता। मशीनें बेंच दीं। एक सिलाई मशीन बची है। कोई ग्राहक मिल गया तो वह भी बेंच देंगे।

सुगर लेवल कित्ता है पूछने पर बताया 320 है। 120 नार्मल होता है यह भी कहा। इलाज फिलाज से कोई फायदा नहीं होता। बोले- 'साली सुगर होती है तो आँख, किडनी, लिवर, बीपी सब गड़बड़ा जाता है।'

सुगर, कैंसर, ब्लडप्रेसर और एकाध बीमारियों को बहन की गाली देते हुए बोले-- 'जिसको देखो यही सब घेरे रहती हैं। ये हुई तो आदमी किसी काम का नहीं रहता।'

हमने परहेज और खानपान ठीक रखकर सुगर कण्ट्रोल करने का सुझाव दिया तो बोले-'अरे क्या परहेज करें। कुछ नहीं ठीक होता। दवाएं सब महंगी हैं। कोई सुधार नहीं होता।'

जब काम नही करते तो घर का खर्च कैसे चलता है? पूछने पर बताया कि पत्नी 'दत्ता कम्पनी' में काम करती है। लड़का भी वहीं काम करता है। उससे खर्च चलता है। दूसरा बेटा 'बुढ़िया के बाल' बेंचता है ।

हरिप्रसाद खाली कमीज पहने बैठे थे। नीचे बनियाइन भी नहीं थी। कमीज की बटन के बीच से पेट दिख रहा था। हम उनके सामने कोट के नीचे स्वेटर मिलाकर चार परत के कपड़े पहने उनसे बतिया रहे थे।

पत्नी कमाती है तो ख्याल रखती होगी न ! अच्छा है।यह कहने पर हरिप्रसाद बोले:
सुर, नर, मुनि सब की यह रीती
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।


बोले--'बीमारी जब दो, चार,दस दिन में ठीक हो जाती है तो सब ख्याल करते हैं। अच्छा लगता है। लेकिन लम्बी खींचती है तो कोई ख्याल नहीं रखता। सब अपने में मस्त हो जाते हैं। खुद झेलना पड़ता है।'

50 के करीब के हरिप्रसाद के सामने के दांत टूटे हुए, आँखे अंदर और शरीर पस्त टाइप दिखा। बोले -'कोई बैठे का काम मिल जाए तो दरबान टाइप का तो अच्छा रहेगा। और मेहनत का कोई काम हो नहीं पाता।'

हमने पूछा कहीं कोशिश की ? किसी के पास गए काम मांगने तो बोले --'हमने किसी से कहा नहीं अब तक।'
हमने सहज सलाह दे दी-' कोशिश करो मिलेगा काम।'

बात करते हुए अपनी पांच पीढ़ियों के किस्से सुना दिए हरिप्रसाद ने। बोले पांच पीढ़ी पहले रहेली , गढ़ाकोटा के पास से उनके पूर्वज लालजी सिंह आये थे जबलपुर। मिस्त्री का काम करते थे। व्हीकल फैक्ट्री भी उनके पूर्वजों ने बनाई। पांच पीढ़ियों के नाम भी गिना दिए। लालजी सिंह (परबाबा)-जोराबल सिंह(बाबा)-दीनदयाल(पिता)-हरिप्रसाद( स्वयं)-दीपक (बेटा)।

पिक्चर कभी देखते हैं क्या ? पूछने पर बोले-' बहुत देखते थे पहले। ऐसा कोई टाकीज नहीं जबलपुर का जहां पिक्चर न देखी हो। देवानंद की पिक्चर आई थी --जानी मेरा नाम। वह कई बार देखी। अब तो सालों हुए कोई पिक्चर देखे।

और कोई शौक है? क्या करने का मन करता है ? यह पूछने पर बोले-'क्या शौक? यही कभी-कभी नमकीन खाने का मन करता है। कभी कुछ मीठा।'

चलने-फिरने में थकान होती है तो घर से 2 किलोमीटर दूर टहलते हुए कैसे आ गए यहां? -हमने पूछा।
बस ऐसे ही चले आये। क्या करते घर में पड़े-पड़े। ऐसे ही चले जाएंगे अभी।

हमने फोटो खींचने के लिए पूछा तो बोले खींच लो। फिर अपना अंगौछा अलग रखा। कमीज के बटन ठीक किये। फोटो खिंचाया। मैंने उनको फोटो दिखाया तो बोले--'वाह ये तो बहुत बढ़िया फोटो आया।'
आप भी देखिये। बताइये कैसा है फोटो?

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207072741070400?pnref=story