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Thursday, August 28, 2025

कोलंबो के जुआघर में



 2022 में नेपाल यात्रा के दौरान जिस होटल में हम ठहरे थे वहाँ जुआघर भी था। जुआघर मतलब कैसीनो। कैसीनो का नाम तो बहुत सुना था लेकिन वहाँ जुआ कैसे होता है यह कभी देखा नहीं था। हमने अंदर जाने के बारे में पूछा तो सुरक्षा गार्ड ने कहा -"अपना पासपोर्ट नंबर लिखकर चले जाइए।"

मुझे लगा कहीं बाद में कोई सरकारी दौरे के दौरान जुआघर में दौरे की शिकायत न हो जाये। इसी डर के कारण हम कैसीनो दर्शन की तमन्ना मन में लिए वापस अपने कमरे में चले गए।
कैसीनो देखने की इच्छा तीन साल बाद पूरी हुई श्रीलंका यात्रा के दौरान। सरकारी सेवा से साल भर पहले रिटायर हो चुके थे। रास्ते में एक जगह कैसीनो दिखा तो अनन्य ने कहा -"मैं थोड़ी देर कैसीनो होकर आता हूँ।" हमने कहा हम भी चलेंगे। अनन्य ने कहा -"चलिए।"
पिछली यात्रा के दौरान भी अनन्य कैसीनो आ चुके थे। उसका विवरण वहाँ दर्ज था। नंबर बताने पर वेरिफाई करके हम लोगों को अंदर आने दिया गया।
कैसीनो में तमाम लोग अलग-अलग टेबल में बैठे लोग दाँव लगा रहे थे। खेलने का तरीका यह कि पैसों से टोकन ख़रीदे जाते। अलग-अलग नम्बर पर लोग दांव लगाते। सब लोगों के दाँव लगाने के बाद एक काँच की गोली एक नंबर प्लेट पर घुमाई जाती। गोली जिस नंबर पर रुक जाती उस नम्बर जिन लोगों ने दांव लगाए होते वो लोग जीत जाते। बाकी लोग अपना दाँव हार जाते। मेज पर जितने लोग जीतते वो ख़ुश हो जाते। जीते-हारे दोनों ही लोग नए सिरे से दाँव लगाते।
हम जिस हिस्से में थे उस हिस्से से अलग भी लोग जुआँ खेल रहे थे। पता चला वहाँ और बड़े दांव लगाए जा रहे थे।
कैसीनो में खाने-पीने की मुफ्त व्यवस्था थी। जो मन आए, जितना मन आए खाते जाओ। दाँव लगाते जाओ। तरह-तरह के व्यंजन और पेय। लोग अपनी टेबल पर बैठे, खेलते हुए खाने का आर्डर करते। वेटर सर्व करते जाते। लोग खाते-पीते जाते। खेलते जाते। हारते-जीतते जाते।
हर टेबल पर कुल कितने का खेल हुआ इसका विवरण भी चलता जाता।
जिस टेबल पर हम थे उसी टेबल पर एक और लड़का खेल रहा था। बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह भोपाल से आया है।
भोपाल से आना तो कोई बात नहीं। लेकिन उसने आने के बारे में जो क़िस्सा बताया उससे कैसीनो के जुआ खिलाने के एक और तरीक़े के बारे में पता चला।
बालक ने बताया कि वह भोपल से पाँच लाख का जुआँ खेलने आया है। तीन-चार दिन रहना है उसे। उसने पाँच लाख रुपए जुएँ के लिए जमा किए थे भोपाल में। भोपाल से कोलंबो तक का आने-जाने का टिकट, कोलंबो में फाइव स्टार होटल में रहने और गाड़ी का इंतज़ाम कैसीनो वालों ने किया है। उसको सिर्फ़ यहाँ तीन-चार दिन रहने के दौरान पाँच लाख का जुआ खेलना है। हारे या जीते इससे कैसीनो वालों को मतलब नहीं।
बालक ने बताया कि पिछले दो दिनों में वह पाँच लाख से अधिक जीत चुका है। एक दिन और रहकर वह वापस भोपाल चला जाएगा। जितना पैसा खर्च किया उसने उससे अधिक जीतकर और कोलंबो में मुफ्त आने-जाने-रहने-घूमने का आनंद उठाकर वह भोपाल वापस लौट जाएगा।
मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी की जुआघर वाले दूसरे देश से लोगों को जुआ खेलने के लिए बुलायें। रहने-घूमने का बंदोबस्त करें। जीतो या हारो बस उतने पैसे का जुआ खेल लो जितने कैसीनो को दिए हैं। बाकी सारा इंतजाम कैसीनो का।
बालक ने बताया कि वह अक्सर इसी तरह के 'कैसीनो पर्यटन ' के लिए कोलंबो आता है। खेलता है, रहता,घूमता है वापस चला जाता है। कुल मिलाकर कभी घाटे में नहीं रहता।
पैसे का लेनदेन कैसे होता है इसके बारे में जो बताया बालक ने उससे लगा की शायद कुछ हवाला टाइप का हिसाब होगा। पैसे कैसे आए, कहाँ से आए, कहाँ चले गए यह बाद शायद किसी को नहीं पता होगी। पैसा किन-किन गलियों में टहलता रहता है यह पैसे को भी नहीं पता होगा।
करीब दो-तीन घंटे कैसीनो में दांव लगाने के बाद हम लोग वापस लौटे। बेटे ने बताया कि इस बार थोड़ा नुकसान हुआ है। पिछली बार फ़ायदे में रहे थे। इस बात तसल्ली से दाँव नहीं लगाए। अप्रत्यक्ष रूप से शायद वह हमें दोषी ठहरा रहा था कि हमारे कारण उसका ध्यान भंग हुआ।
कैसीनो से होटल जाने के लिए गाड़ी कैसीनो वालों ने उपलब्ध करायी। होटल वापस आकर हम देर तक जुआघरों की व्यवस्था के बारे में सोचते रहे। लेकिन जितना सोचते जाते उतना उलझते जाते।
जिस कैसीनो में हम लोग गए थे (bellagio) उसके दुनिया भर में कई जगह जुआघर हैं। कोलंबो, लास बेगास आदि। इटली में भी bellagio नाम का शहर है। नेट पर bellagio खोजकर इस कैसीनो के बारे में जान सकते हैं। भारत में तो आनलाइन गेमिंग बंद हो गई लेकिन इंटरनेट के ज़रिए इन कैसीनो में आनलाइन दाँव लगाने की भी सुविधा है। दुनिया में न जाने कितने लोग रोज़ दांव लगाते होते होंगे। आबाद -बर्बाद होते होंगे।
अपन के लिए तो एक बार का अनुभव बहुत है।

Wednesday, August 27, 2025

कोलंबो का डच हॉस्पिटल




 कहीं घूमने निकलते हैं तो लगता है जहाँ गए हैं वहाँ के सारे प्रसिद्ध स्थल देख लें। इसी मासूम भावना के वशीभूत होकर कोलंबो के पेट्टा बाजार (लिंक टिप्पणी में) घूमने के बाद पास ही स्थित डच अस्पताल देखने गए।

श्रीलंका पर पुर्तगालियों, डच और अंग्रेजों का अधिकार रहा। ये यूरोपियन लोग लगता है जहाँ मन आता चले जाते और जिस देश में मन आता अपना झंडा गाड़ देते। शुरुआत उन देशों के व्यापारी करते थे। कब्जा के बाद अपने अधिकार में आए देश को नजराने के रूप में अपने देश की सरकार को सौंप देते थे।
डच ईस्ट इंडिया अपने अफसरों और की देखभाल के लिए यह अस्पताल बनवाया। अस्पताल कब बना यह पता नहीं लेकिन एक अनुमान के अनुसार अस्पताल 1681 में मौजूद था। मतलब क़रीब साढ़े तीन सौ साल पुराना है यह अस्पताल।
कोलंबो क़िले के पास स्थित यह अस्पताल बंदरगाह के पास होने के कारण डच नाविकों की देखभाल के लिए भी इस्तेमाल होता था।
अस्पताल में आए मरीजों को चटाई और बीमारों के लिए गद्दे का इंतजाम था। चटाई और गद्दे इंडोनेशिया से आते थे। चटाई और गद्दे उस समय नहीं बनते होने सीलोन में। यहाँ काम करने वाले डाक्टर हरमन (Dr Paul Hermann) को श्रीलंका में बाटनी का पितामह कहा जाता है।
पुरानी फोटुओं से पता चलता है कि पहले यहाँ एक नहर भी थी। बाद में जब अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आया सीलोन तो उन्होंने नहर पटवा दी। नहर नहीं रही लेकिन जहाँ नहर थी उस सड़क को नहर रो लेन कहते हैं।
अंग्रेजों द्वारा कोलंबो पर कब्जे के बाद नहर को बंद करा देना शासन का शाश्वत सूत्र रहा है। हर नया शासक आने पर पुराने शासन के तमाम रीति-रिवाज बदलता है। कई मामलों में यह सुधार के लिहाज से होता है, कई बार बिना किसी मतलब के। सुनते हैं जाट लोगों ने आगरे पर कब्जा किया तो उन्होंने ताजमहल का उपयोग अपने घोड़ों के लिए भूसा रखने के काम में किया।
बदलाव का रिवाज सरकारों में भी जारी रहता है। नई सरकारें पुरानी सरकारों के तमाम चलन बदल देती हैं। कुछ नहीं हुआ तो योजनाओं शहरों के नाम ही बदल देती हैं। इस बदलाव को ही अपनी उपलब्धि के रूप में बताने में करोड़ों रुपए फूँक देती हैं।
बदलाव का चलन हाकिमों-हुक्कामों में भी जारी रहता है। नया हाकिम आते ही सबसे पहले दफ़्तर के पर्दे, फर्नीचर बदलवाता है। कुछ नहीं तो बैठने वाली मेज़-कुर्सी का सेटअप बदलता है। महीने भर पहले पुते घर को फिर से पुतवाता है। पुराने हाकिम द्वारा बनवाये किचन, ड्राइंगरूम को 'ऑल्टर' करवाता है। जनता के पैसे का अहमक इस्तेमाल का नायाब नमूना होते हैं हाकिमों के बदलने पर उनके दफ्तरों-घरों में हुए मरम्मत के काम।
डच और अंग्रेजों के बाद इस अस्पताल बिल्डिंग के उपयोग बदलते गए। 1980 से 1990 तक यहाँ पुलिस स्टेशन था। इसके पहले मेडिकल सेवाओं से संबंधित काम होते थे। 1996 में लिट्टे के भीषण हमले में इस इमारत को काफ़ी नुक़सान हुआ।
2011 में इस इमारत को शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और खान-पान परिसर में बदल दिया गया। हर ऐतिहासिक इमारत के साथ ऐसा ही होता है। एक दिन वह किसी न किसी रूप में बाजार में तब्दील हो जाती है। उसका अस्तित्व बने रहने के लिए जरूरी होता है शायद। बाजार की शरण में आने पर ऐतिहासिक इमारतों के स्वरूप भले बदल जायें लेकिन उनकी साँसे चलती रहती हैं।
डच अस्पताल को दूर से और फिर पास से देखा। बाहर से एक बड़ी इमारत, बड़ा अहाता। उसके परिसर में अंदर तमाम दुकानें थीं। ज्यादातर खाने-पीने की। अंदर की तरफ़ जाने पर देखा तो इमारत के खुले आँगन जैसी जगह में तमाम बेंच पड़ी थीं। तमाम लोग उन पर बैठे हुए धूप सेंकते हुए खाने-पीने में जुटे हुए थे। पास के बरामदे में खाना सर्व करने वाले काउंटर थे।
इन लोगों में अधिकतर विदेशी थे। शायद यूरोप से आए यायावर। क्या पता उनमें से कुछ डच लोग हों जो देखने आए हों कि श्रीलंका रहते हुए उनके पूर्वज कहाँ इलाज करवाते थे। वहाँ खाने-पीने की दुकानों का स्तर देखकर लगा कि यहाँ खाना-पीना मंहगा ही होगा। ज्यादातर लोग अपनी ग्लासों में दारु लिए परिसर का आनंद उठा रहे थे। इनमें महिलाएँ भी थीं। स्थानीय लोग कम ही दिखे।
पहले तो मन किया कि हम भी वहाँ बैठकर चाय-कॉफ़ी कुछ पियें। लेकिन जहाँ बैठने का मन किया वहाँ चाय-कॉफ़ी के लिए दुकान वाले ने सॉरी बोल दिया। अंदर बैठने का मन नहीं था। लिहाजा कुछ देर वहाँ इधर-उधर टहलने के बाद चले आये।
आगे के मोर्चे हमको आवाज़ दे रहे थे।

Friday, August 08, 2025

कोलंबो का पेट्टा बाजार


 कोलंबो के मॉल से लौटकर हम लोगों ने होटल में खाना खाया। सुबह उठकर पास ही स्थित माउंट लाविनिया बीच देखने गए। श्रीलंका के गवर्नर रहे मेटलैंड के साथ श्रीलंका की लाविनिया की प्रेमकहानी के कारण इस बीच का नाम लाविनिया बीच पड़ा।

माउंट लाविनिया बीच घूमते समय याद आया कि तीन साल पहले वहाँ की अराजक स्थिति के बारे में सोचते हुए लगा कि क्या हाल रहे होंगे उस समय। माउंट लाविनिया बीच पर ही स्थित एक पूर्व मंत्री का घर जला दिया गया था। उस समय के समाचारों के विवरण बताती एक पोस्ट से वहाँ के हाल का अंदाजा लगाया जा सकता है :
"श्रीलंका (Sri Lanka) में अब सेना भी स्थिति नहीं सम्भाल पा रही। कोई प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहता। आर्थिक संकट, बेतहाशा महंगाई, लोगों का जीवन नारकीय बना रही थी।"
लोकतंत्र में जब जनता शासक के ख़िलाफ़ होती है तो ऐसे ही हाल होते हैं।
बहरहाल, माउंट लाविनिया बीच से लौटकर होटल में नाश्ता करने के बाद हम स्थानीय पेट्टा (Pettah) बाजार घूमने गए। बाजार ले जाते समय ऑटो गुहान ने चालक ने अपने जीवन के रोचक किस्से सुनाये। (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
गुहान को विदा करने के बाद हम लोग पेट्टा मार्केट घूमें। पेट्टा कोलंबो का प्रसिद्ध बाज़ार है। तमिल में पेट्टा क़िले के आसपास बने/बसे बाजार कहते हैं। कोलंबो क़िले के पीछे बसा है। शहर के कई प्रसिद्ध प्रतिष्ठान यहाँ मौजूद हैं।
पेट्टा बाजार को एक विशाल क्रॉसवर्ड पहेली की तरह डिजाइन किया गया है, जहां कोई व्यक्ति सुबह से शाम तक पूरे बाजार में घूम सकता है, लेकिन इसके हर हिस्से को पूरी तरह से कवर नहीं कर सकता है।
बाजार में टहलते हुए हमने तरह-तरह की दुकानें देखीं। परचून के सामान से लेकर इलेक्ट्रानिक का बाज़ार। चश्मे की दुकान के डॉक्टर की दुकान। किसी आम भारतीय बाजार जैसा ही भीड़-भाड़, चहल-पहल भरा बाजार।
एक चीज ने हम लोगों को आकर्षित किया वह यह कि ठेले पर फल बेचने वाले सामानों के आगे उसके दाम लगाए हुए थे। फ़रवरी के महीने में टमाटर 150 रुपये किलो थे तो मुसम्मी 200 रुपए किलो। भारत के हिसाब से लगभग 50/66 रुपए किलो। नारंगी जैसा और एक फल 300 रुपए किलो बिकता दिखा।
एक जौहरी और घड़ी के डीलर की दुकान का स्थापना वर्ष 1902 लिखा दिखा। सड़क के दूसरी तरफ़ स्थित उस बुजुर्ग दुकान को हमने दूर से प्रणाम निवेदित किया। दुकान के संचालकों की कम से कम पाँच पीढ़ियाँ यहाँ बैठकर चली गयीं होंगी।
सड़क किनारे तख्त में रखे सामान,जूते-चप्पल आदि, उसी तरह बिक रहे थे जैसे कानपुर के मेस्टन रोड या पी रोड में बिकते हैं।
एक बड़े शेड के नीचे कई तरह की दुकानें लगीं थीं। छोटे-छोटे रोज़मर्रा के काम आने वाले सामान बिकते दिखे वाहन।
AYSHA मोबाइल ग्लोबल देखकर कानपुर की मोबाइल दुकानें याद आ गयीं। एक दुकान पर बांबे स्वीट्स लिखा देखकर हमें याद आया कि अब तो बांबे का मुंबई हो गया है। भाषा और शहर के नाम पर हल्ला मचाने वाले मराठी वीर अब तक ख़ामोश क्यों हैं? अभी तक श्रीलंका की दुकान का नाम बदलवाने के लिए कोई हल्ला-गुल्ला नहीं किया। ऐसे कैसे चलेगा भाई?
एक ऑटो पर लिखा दिखा -Proud to be a Srilankan. अच्छा लगा देखकर। लेकिन ड्राइवर नदारद था ऑटो से। शायद श्रीलंका पर ख़ुद गर्व करने के बाद दूसरे लोगों को गर्व कराने गया हो।
लंदन शूटिंग की दुकान भी दिखी वहाँ। ऊपर DFCC बैंक के विज्ञापन स्थानीय भाषा में लिखे थे। पढ़ नहीं पाये।
पेट्टा बाजार घूमते हुए एक शानदार, चमकती हुई मस्जिद भी दिखी। जमीउल अल्फ़र ( Jami Ul-Alfar) मस्जिद थी वह। 1908 में बनी। यह कोलंबो की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है । मस्जिद के बारे में विवरण पढ़ते हुए पता चला कि मस्जिद के डिजाइनर और निर्माता हबीबू लेब्बे साइबू लेब्बे (एक अनपढ़ वास्तुकार) थे। उनको दक्षिण भारतीय व्यापारियों ने कहीं देखी गई मस्जिद के हिसाब से नक्शा दिया कि ऐसे बनाओ मस्जिद। हबीबू लेब्बे साइबू लेब्बे ने बना दी। मस्जिद में क़रीब 1500 लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं।
पेट्टा बाजार में घूमते हुए हमने और भी कई इमारतें और दुकानें देखीं। जितना देख पाये उतना देखने के बाद बाजार के बारे में मशहूर बात (जहां कोई व्यक्ति सुबह से शाम तक पूरे बाजार में घूम सकता है, लेकिन इसके हर हिस्से को पूरी तरह से कवर नहीं कर सकता है) की इज्जत रखने के लिहाज से बाक़ी बचा हुआ बाज़ार दूसरों के देखने के लिए छोड़कर पास ही स्थित डच हास्पिटल देखने चल दिए।
करीब दो घंटे घंटे बाज़ार में घूमने टहलने के बावजूद हमने वहाँ से कोई ख़रीदारी नहीं की। बाजार से गुजरने और कुछ न ख़रीदने के अपराध बोध से बचने के लिए हमारे पास महान बहाना पहले से ही मौजूद था -"बाजार से गुजरा हूँ, ख़रीदार नहीं हूँ।"
नोट : माउंट लाविनिया बीच और ऑटो ड्राईवर गुहान से जुड़ी पोस्ट के लिंक टिप्पणी में।
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Tuesday, August 05, 2025

कोलम्बो के शॉपिंग मॉल में




 सबेरे टूर के कुछ साथियों को भारत के लिए विदा किया। कोलंबो एक दिन और घूमने की सोचकर हम सात लोग रुक गए। शुरुआत से ही वापसी का टिकट इसी लिहाज से कराया था। हम लोग जिस होटल में रुके थे उसे छोड़कर दूसरे होटल में आ गए। यह दूसरा होटल श्रीलंका के समुद्र तट से एकदम नजदीक था। होटल से निकलकर 100 कदम चलते ही सड़क किनारे समुद्र का किनारा । समुद्र की लहरें सड़क के ट्रैफिक के साथ-साथ चलती दिखती। ऐसे जैसे कानपुर में रेलवे लाइन जीटी रोड के साथ-साथ बतियाती जैसी चलती रहती है।

होटल में कुछ देर इंतजार करना पड़ा। कमरे खाली नहीं हुए थे। चेक-इन दोपहर के बाद का था। होटल की लॉबी में बैठकर, इधर-उधर टहलते हुए इंतज़ार किया। कमरे खाली होने पर चेक-इन हुआ । सुबह का नाश्ता क़ायदे से किया था, होटल के लंच के दाम काफ़ी थे और पास में खाने-पीने का ठिकाने लगाने के लिए पर्याप्त सामान बचा था। इन कारणों ने मिलकर तय किया कि होटल में लंच न करके पास में जो सामान बचा है उससे ही काम चलाया जाये।
पेट पूजा के बाद थोड़ी देर आराम करने के बाद शाम को घूमने निकले। टुकटुक करके हम लोग पास के शॉपिंग मॉल वन गाले फ़ेस (One Galle Face) देखने गए। बाजार संस्कृति के हल्ले में शहरों के शापिंग मॉल दर्शनीय स्थलों में तब्दील हो गए हैं। कानपुर में रेव-3 से शुरुआत करके अब जेड स्क्वायर मॉल देखे बिना कानपुर का भ्रमण अधूरा समझा जाता है। लखनऊ में लूलू मॉल देखने लोग आसपास के शहरों से आते हैं। बड़े मॉल भी धर्मस्थलों की तरह दर्शनीय हो गए हैं।
Galle का मतलब खोजने पर पता लगा कि सिंहली में गाले का मतलब ऐसी जगह होता है जहाँ जानवरों के रुकने का ठिकाना होता है। पुर्तगाली लिहाज से गाले का मतलब सौभाग्य, विश्वास और न्याय का प्रतीक होता है। शॉपिंग मॉल के हिसाब से देखा जाये तो दोनों ही मतलब फिट होते हैं। यहाँ मनुष्य (सामाजिक जानवर) आते-(थोड़ी देर) ठहरते और वापस जाते रहते हैं। इसके अलावा मॉल के मालिकों के लिए ये सौभाग्य, (मुनाफे के) विश्वास और न्याय के प्रतीक होते हैं।
One Galle Face एक मामले में अनूठा है कि यहाँ शॉपिंग कांप्लेक्स, होटल, रिहायशी इलाका और आफिस सभी एक जगह हैं। चीनी मल्टीनेशल कंपनी Shangri-La ने इसे 2019 में कोलंबो में शुरू किया था। चीन के सक्रिय सहयोग के चलते पिछले वर्षों हुई आर्थिक तबाही के झटकों से श्रीलंका को अभी तक उबारना बाकी है। आम धारणा हैं कि जिस देश को आर्थिक रूप से तबाह होना है उसे चीन से आर्थिक सहयोग ले लेना चाहिए। भारत में यही बात सत्ताधारी पार्टी से सहयोग के बारे में कही जाती है।
बहुमंजिले One Galle Face के शॉपिंग माल वाले हिस्से में घूमते हुए हमको सामानों से पटी हुई जगर-मगर करती दुकानें दिखीं। लेकिन दुकानों में घुसकर खरीदारी करते लोग बहुत कम दिखे। दुकानों के काउंटर पर लोग अकेले बैठे, ऊबते, ऊँघते जैसे दिखे। खाने वाली दुकानों में भी कम लोग दिखे। यहाँ तक कि जेड स्क्वायर में जिस तरह लोग आते-जाते फ़ोटो खींचते-खिंचाते दिखते हैं वैसी भीड़ भी वहाँ नहीं दिखी।
शापिंग माल में ही होटल Shingri-La होटल दिखा। अब चूँकि हम पहले से ही एक होटल में ठहरे थे इसलिए अंदर नहीं गए। मॉल में ही टहलते रहे।
कपड़ों की दुकानों में तरह-तरह के कपड़े पहने मैनिक्विन खड़ी थीं। अपनी सूनी आँखों से ग्राहकों का इंतजार करती हुई उनकी आँखों में 'अँखड़ियाँ झाईं पड़ी पंथ निहारि-निहारि' वाला भाव झरता दिख रहा था। हमने उनके फ़ोटो लिए और इधर-उधर टहलते रहे। उन मैनिक्विन ने भी इस बात का बुरा नहीं माना। मानती और कुछ कहतीं तो हम कह देते -"बाजार से गुजरे हैं, ख़रीदार थोड़ी हैं।"
शॉपिंग माल घूमते वहाँ एक टुकटुक (ऑटो) के आकार की दुकान लगाए चाय वाला दिखा। दुकान के ऊपर लिखा था -चायवाला कोलंबो (CHAIWALA KOLAMBO) मतलब कोलंबो चाय वाला। पूरे मॉल में हमको वही ऐसी जगह दिखी जहाँ हम बेहिचक खरीदारी कर सकते थे। हमने वहाँ चाय पी। शायद सौ श्रीलंकाई रुपए की एक चाय थी। मतलब भारत के लगभग तीस रुपए के बराबर। भारत के शॉपिंग माल के मुकाबले यह काफ़ी सस्ती थी। पिछले दिनों हमने नोयडा के सिनेमा हाल में 270 रुपए की एक चाय के हिसाब से चाय पी। क्या पता कुछ दिनों में ब्लिंकिट का दायरा और स्पीड इतनी बढ़ जाये कि हम नोयडा के किसी पीवीआर में पिक्चर देखते हुए श्रीलंका के One Galle Face के चायवाला कोलंबो को आर्डर करके चाय मंगा सकें। लेकिन यहाँ सिनेमा हाल में जब घर का पानी तक नहीं ले जाने देते तो श्रीलंका से चाय आने देंगें भला। बहुत बदमाश हैं ये बाजार वाले। हम बेकार ही ट्रंप को गरियाते हैं। वो तो बेचारा बाजार की नौकरी बजा रहा है। जो बाजार कहता है वह कर रहा है।
चाय पीकर हम लोग One Galle Face बाहर आ गए। बाहर आकर टुकटुक ख़रीदे और होटल की तरफ़ चल दिए। सड़क की दायीं तरफ़ समुद्र की लहरें मचलती हुई आतीं और किनारे से टकराते हुए वापस लौट जातीं। चमकदार इमारतों और रोशन सड़कों को देखते हुए हम होटल वापस लौट आए। होटल में खाना खाकर सो गए। अगले दिन हमको बचा हुआ कोलंबो देखना था।

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