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Sunday, March 02, 2025

तुमको सब इसी तरह के लोग मिलते हैं


कल 'सैंट्रो सुंदरी' से शहर से वापस आते समय पीछे से खड़खड़ाट सुनाई दी। उतरकर देखा तो कार का पिछला पहिये का मुँह अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह फूला हुआ था। कुछ तार भी निकले हुए थे। पहिए के एक हिस्से की ऊपरी परत ने पहिए से समर्थन वापस लेकर अपना दल बना लिया था। यही हिस्सा चलते समय कार के मडगार्ड में लगकर आवाज़ कर रहा था।
पहले सोचा धीरे-धीरे चलते हुए घर तक आ जाएँ। लेकिन फिर आवाज़ ज़्यादा हुई तो ख़राब टायर बदलने का तय किया। कार की डिक्की से पाना निकाला और पहिए के नट खोलने चालू किए। बहुत दिन से न खुले होने के कारण नट कसे थे। खुल नहीं रहे थे।
हम और ज़ोर लगाएँ तब तक उधर से एक आदमी आकर बोला -'हम बदल दें टायर।' हमने कहा -'कित्ते पैसे लोगे?' वो बोला-'जो मन में आए दे देना।' हमने कहा -'खोलो।बदलो'
उसने कोशिश की। ज़ोर लगाते ही वो लुढ़क गया। हमने सोचा पिए होगा। वह लड़खड़ा कर उठा। खोल नहीं पाया नट तो हमने ज़ोर लगाया। नट ढीले हो गए। उसने नट खोले। इसके बाद उसने जैक लगाकर टायर निकालने का उपक्रम किया। वह भी ठीक से नहीं कर पा रहा था। फिर हमने लगाया। टायर निकाला। स्टेपनी वाला लगाया।
उस आदमी के हमारे साथ मेहनत करते हुए आसपास के दो लड़के उसकी पोलपट्टी खोलते हुए कुछ बोलते जा रहे थे। उनकी बातों से लग रहा था कि वह ऐसे ही घूमता रहता है। कुछ करता, जानता नहीं है। वह उन लड़कों को चुप कराने की कोशिश करते हुए जुटा था।
बहरहाल,टायर बदलने के बाद उससे बातचीत हुई। हमने पूछा -'क्या करते हो?'
बोला -'जो मिल जाता है। सब काम कर लेते हैं।'
बाद में बताया -'हम जाति के नाई हैं लेकिन दाढ़ी बनाना नहीं आता।'
नाम बताया श्यामलाल। उसकी खुद की दाढ़ी बेतरतीब थी। आज के समय में यह कोई ख़ास बात नहीं कि ख़ानदानी पेशा अपनाए ही।
उसके अन्दाज़-ए-बयां रोचक लगा तो और बातचीत की। उसने बताया कि उसके पिता एचएएल कैंटीन में वेंडर थे। चाय पिलाते थे लोगों को। उसने कुछ दिन चाय पी, पिलाई।
घर परिवार की बात चलने पर बताया उसने -'दो बीबियाँ हैं। दोनों छोड़ के चली गयीं हैं। एक फ़र्रुख़ाबाद , दूसरी ग़ाज़ियाबाद। दोनों से आठ-आठ बच्चे हैं। कुल मिलाकर सोलह। आठ लड़के, आठ लड़कियाँ।
हमने ताज्जुब किया दो बीबियों वाली बात पर तो बोला -'हमारे बाप के तो चार बीबियाँ थीं। हमारे तो दो ही हैं।
हमने पूछा -'जब तुम्हारे हाल इतने बेहाल हैं तो दूसरी बीबी कैसे कर ली?'
बोला -' दिल आ गया तो कर ली।'
फिर विस्तार से बताया -'दूसरी वाली हमारे पड़ोसी की बीबी थी। मुस्लिम है। उसके मियाँ नहीं रहे तो हमारे घर आ गई। पड़ोस के नाते हमारी बहू लगती थी। हमने मना किया तो बोली हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे। फिर हमने कर ली शादी उससे। '
अपनी बीबियों के बारे में बताते हुए बोला -'बड़ी वाली सीधी है। छोटी वाली लड़ाका है।'
एक आदमी जिसका आमदनी का ठिकाना नहीं, दो बीबियाँ कर ले, एक हिंदू एक मुसलमान। सोलह बच्चे। ताज्जुब की बात लगी मुझे। लोग यहाँ एक नहीं निभा पाते। छोड़ के चल देते हैं।
बच्चों के बारे में बताया -' बड़ा लड़का कहता है शादी कर दो। हम कहते हैं पहले कमाई का हिसाब बनाओ तब शादी करेंगे।'
यह भी बताया -'हम अपनी बेटियों को बेटों से ज़्यादा प्यार करते हैं।'
चलते समय हमने उससे पूछा कित्ते पैसे दें? बोला -'चाय-पानी भर के दे दीजिए।' हमने दिए उसने सलाम मुद्रा में ग्रहण किए। हमने कुछ और दिए।'
बेतरतीब दांत देखकर हमने पूछा -'मसाला खाते हो क्या?'
'नहीं मसाला नहीं खाते। चुनही तम्बाकू खाते हैं। कभी-कभी दारू पी लेते हैं जब मिल जाती है।' - श्यामलाल ने बताया।
चलते समय बोला -' हमको मोदी जी से मिलना है।'
हमको ताज्जुब लगा कि इसको मोदी जी से क्यों मिलना है? यह पूछ पाएँ तब तक वह लड़खड़ाते हुए चलना शुरू करके आगे चला गया। शायद चाय पीने।
बाद में पास में खड़े नारियल बेचते लड़के से कंफ़र्म किया तो उसने बताया यहीं पास में ही रहता है वो। दो बीबियाँ हैं। बच्चे भी उतने ही जितने बताए। ऐसे ही माँगता-घूमता रहता है। कहीं बारात-वारात में काम मिलता है तो कर लेता है।
आगे वह फिर मिला। उसके पास से गुजरते हुए गाड़ी धीमी की तो बोला -'आपकी पुलिस में कोई जान पहचान हो तो एक काम है।'
हमने काम पूछा तो उसने बताया -'हमारे बग़ल में रहने वाली औरत ने पड़ोस का लोहे का गेट चुराकर बेंच लिया है। उसकी शिकायत करनी है। बहुत बदमाश है वह। रोज लड़ती है।'
हमारी कोई जान पहचान नहीं है कहकर चल दिए। क्या पता शायद वह इसीलिए मोदी जी से मिलने की बात कर रहा हो। Dhirendra जी का मानना है कि श्यामलाल सबका साथ सबका विकास का पोस्टर बॉय हो सकता है। शायद इसीलिए उनसे मिलने की बात कर रहा है।
हमने घर में आकर श्यामलाल से मुलाकात का क़िस्सा बताया तो हमको सुनाया गया -'तुमको सब इसी तरह के लोग मिलते हैं।'

हम क्या कहें ? आप ही बताओ।

 

Monday, December 09, 2024

 पिछले हफ़्ते फूलबाग की तरफ़ जाना हुआ। दोपहर का समय। जाम जैसा तो नहीं लगा लेकिन चौराह किसी व्यस्त कामकाजी इंसान जैसा लगा। हर चेहरा बिजी बिजी। सड़क पर एक सवारी मूलगंज, एक सवारी मूलगंज की आवाज़ सुनाई दे रही थे। सामने एलआईसी की बड़ी इमारत के बग़ल से आता ट्रैफ़िक। 

चौराहे के पास सड़क के डिवाइडर पर बनी जगह पर बैठे सैकड़ों कबूतर चीयर लीडर्स की तर्ज़ पर हवा में उड़कर , करतब जैसा दिखाते हुए वापस आकार बैठ जाए। सामने दीन दयाल उपाध्याय की प्रतिमा दिखाई दे रही थी। वहीं कहीं कामरेड राम आसरे की प्रतिमा भी लगी थी। लेकिन वह दिख नहीं रही थी। कामरेड अब हर जगह नज़र ओझल हो रहे हैं।

लौटते समय बिरहाना रोड होते हुए आए। सड़क के दोनों ओर ज्वैलर्स ही ज्वैलर्स। अलावा इसके तमाम प्रसिद्द पुरानी दुकाने। दुकानों के सामने दुकानों के साइनबोर्ड के अलावा दुकानों के नाम के बोर्ड एक साइज़ में लटके दिखे। दुकानों की ड्रेस की तरह।

सड़क किनारे एक लाइन में चार-पाँच मक्खन मलाई के ठेले दिखे। कानपुर की मक्खन मलाई प्रसिद्ध है। तमाम लोगों ने इसकी तारीफ़ में लिखा है। लेकिन हमने पहले कभी खायी नहीं थे। सोचा अभी तक नहीं खाए तो अब खा लें। एक ठेले से सौ ग्राम ली। दोने में थमा दी उसने। साथ रुपए की सौ ग्राम। वहीं खड़े-खड़े खाई। 

हर ठेले पर स्व. कल्लू मक्खन वाले की फ़ोटो इश्तहार की तरह लगी थी। 1960 में बेचना शूरू किया होगा कल्लू जी ने। बाद में और लोग लगाने लगे। ऐसा लगा सब उनके ख़ानदानी हैं। लेकिन पूछने पर पता लगा ऐसा है नहीं। सब बस फ़ोटो लगाए हैं उनकी। 

फ़ायदे के लिए प्रसिद्ध हो गए इंसान से ज़बरियन सम्बंध बनाना आम बात है। गांधी से घृणा करने की हद तक नापसंद करने वाले मंच पर गांधी जी की जय बोलते हैं। 

आगे मारवाड़ी लाइब्रेरी दिखी। 1918 में स्थापित लाइब्रेरी का शहर के पुराने लोग गर्व से ज़िक्र करते हैं। पहली  मंज़िल पर स्थित लाइब्रेरी पर चैनल वाला दरवाज़ा लगा है। सरका के अंदर गए तो एक आदमी ने हमको जिस अन्दाज़ में देखा उसका हिंदी अनुवाद करें तो लगे वह पूछ रहा था-' कौन? क्या चहाते हैं?'

हमने बिना पूछे डरते-डरते टाइप बता दिए -'आर्मापुर में रहते हैं। लाइब्रेरी देखनी है।'

उसने अंदर बैठे किसी आदमी से पूछा और कहा -'मेम्बर बनना होगा। तब देख पाएँगे किताबें।'

मेम्बर फ़ीस 300 रुपए प्रति वर्ष। किताबें इशु करानी हो तो आठ सौ रुपए। एक बार में दो किताबें इशु होंगी। पंद्रह दिन के लिए। 

हम वहीं कुर्सी पर बैठकर मेज़ पर रखे अख़बार देखने लगे। कुछ लोग वहाँ बैठे पढ़ रहे थे। नोट्स नुमा कुछ ले रहे थे। बीस-पचीस लोग होंगे। लाइब्रेरी में लगभग 30-35 हज़ार किताबें होंगी। अलमारियों पर उनको देने वाले लोगों के नाम लगे थे। 

अख़बार पलटकर देखने के बाद सबसे पास की अलमारी देखी हमने। चाँद का फाँसी अंक और अन्य दुर्लभ किताबें मौजूद थीं वहाँ। संदर्भ ग्रंथ जो वहीं बैठकर देखे जाते हैं।

आगे और किताबें देखने की कोशिश करने पर लाइब्रेरी के एक कर्मचारी ने धीरे से बताया कि बिना सदस्य बने किताबें देखने की अनुमति नहीं है। थोड़ा चकित हुए हम। लाइब्रेरी कोई गोपनीय जगह है क्या जिसका सदस्य बने बिना किताबें देख तक न सकें। यह पहली बार देखा किसी लाइब्रेरी में। मन किया सदस्य बन जाएँ लेकिन फिर यह सोचकर कि घर से इतनी दूर लाइब्रेरी आना-जाना हो नहीं पाएगा, नहीं बने सदस्य। 

थोड़ी देर और वहाँ रहकर बिना किताबें देखे वापस चले आए। आते समय हमको किताबें देखने से रोकने वाले शख़्स ने रजिस्टर पर नाम पता लिखने को कहा ताकि सनद रहे कि हम वहाँ आए थे। हमने लिख दिया और वापस आ गए। आते समय और अभी भी सोच रहे थे कि इतना लाइब्रेरी में आम इंसान को किताब देखने न देना क्या पठन विरोधी व्यवहार नहीं है? 

सड़क पर फिर चहल-पहल मिली। एक नुक्कड़ पर एक शाकाहारी भोजनालय में कुछ लोग खाना खा रहे थे। दुकान पर बोर्ड लगा था -संगम शाकाहारी भोजनालय, नया गंज चौराहा। मालकिन श्रीमती  मुन्नी देवी शुक्ला। अब मालिकन जैसे शब्द दुकानों में कहाँ चलते हैं। 

सड़क के दोनों तरफ़ दुकानों में पुराने अन्दाज़ में गाव-तकिए लगे दुकानों के कर्मचारी बैठे दिखे। कुर्सी मेज़ और काउंटर वाले समय में कुछ ही जगह गाव तकिए वाली व्यवस्था दिखती है।

आगे तिराहे पर कटे-फटे नोट बदलने वाले बैठे थे। मन किया वो नोट बदल लें जो थोड़ा फटा होने के चलते मक्खन वाले ने लेने से मना कर दिया था। लेकिन फिर नहीं बदला। 

आगे कलट्टरगंज बाज़ार है। छह साल पहले जब बाज़ार आए थे तो यहाँ काम करने वाली मज़दूर परदेशन से मिले थे। उनसे  फ़ोटो उसको देने आए थे। सोचा मिला जाए फिर उनसे। पता किया तो मालूम हुआ परदेशन नहीं रहीं। कब नहीं रहीं पूछने पर लोगों से समय दो तीन महीने से लेकर दो-तीन साल तक बताया। जिस दुकान पर काम करती मिली थी उस दुकान वाले ने  निर्लिप्त भाव से बताया -'बीमार थी। कई जगह काम करती थी। नहीं रही।'

बाज़ार में सन्नाटा था। दुकानें बंद। जगह-जगह लोग ताश खेलते हुए समय काट रहे थे। एक जगह दो कुत्ते एक बोरी को नोचते हुए उस  पर क़ब्ज़े के लिए झगड़ रहे थे। देखकर मुझे राजनीतिक पार्टियों के लोग याद आए जो चुनाव चिन्ह या खुद को असली पार्टी बताते हुए संघर्ष करते हैं। अपने बग़ल में हो रहे कुत्तागीरी से निर्लिप्त ताश खेलते हुए समय बिताने वाले लोग शतरंज के खिलाड़ी वाले नवाबों जैसे लोग लगे जो अपने आसपास से बेपरवाह शतरंज खेलने में डूबे थे।

घंटाघर चौराहे पर आते-जाते लोगों को देखते रहे कुछ देर। लग रहा पूरा शहर ही बेतहाशा भागा चला रह है कहीं। घंटाघर का टावर कानपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के बोर्ड के पीछे सहमा सा खड़ा दिखा। शहर की अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह घंटाघर किसी कमजोर हो चुके बुजुर्ग की तरह अपने आसपास गुजरते जन-प्रवाह को देख रहा था। 

घंटाघर से विजय नगर तक के आटो में बैठे। रास्ते में घंटाघर से चटाई मोहाल, डिप्टी पड़ाव के रास्ते का वीडियो बनाया। विजय नगर से  आर्मापुर गेट तक दूसरे आटो में आए । आर्मापुर गेट पर, एक बच्ची जो शायद स्कूल से घर जा रही थी, ने आटो वाले से गरीब आवाज़ में कहा -'दस रुपए देंगे।' जबाब में आटो वाले ने वात्सल्य, अपनापे और प्यार के मिले-जुले स्निग्ध भाव से बच्ची को देखते हुए कहा -'बिटिया तुम जितना देओगी उतने में ले चलेंगे।' बच्ची चुपचाप आटो में बैठ गयी। आटो चल दिया।  

आर्मापुर गेट से पैदल घर तक आते हुए हमारे ड्राइवर रहे संजय ने हमको पैदल आते देख लिया। हमको ज़बरियन गाड़ी में बैठकर घर छोड़ा। 


Sunday, December 01, 2024

किनारे पे न चलो, किनारा टूट जाएगा


पिछले दिनों कानपुर का 150 साल पुराना गंगापुल टूट गया। इस पुल पर से कई बार गुजरे हैं। अनेक यादें जुड़ी हैं। पुल गिरने की खबर मिलने पर देखने गए पुल। शहर होते हुए घर से दूरी 15 किलोमीटर। गंगाबैराज की तरफ़ से जाते तो दूरी 23 किलोमीटर दिखा रहा था। समय लगभग बराबर। शहर होते हुए गए। जहां से पुल शुरू होता है वहीं पर गाड़ी सड़क किनारे ही खड़ी कर दी। रेती में पुल के नीचे -नीचे चलते हुए उस हिस्से की तरफ़ गए जो हिस्सा टूटा था। 

पुल का टूटा हुआ हिस्सा नदी के पानी में धराशायी सा लेटा  था। क्या पता वह गाना भी गा रहा हो -'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले ये जगह साथियों।' पुल के आसपास पक्षी तेज आवाज़ में चहचहाते हुए शायद पुल के बारे में ही चर्चा कर रहे थे।

एक दूधिया अपने दूध के कनस्तर पानी में धोकर रेती में औंधाए रखकर गंगा स्नान कर रहा था। स्नान करके नदी से निकलते हुए एक बुजुर्ग को नदी किनारे निपटते देखकर भुनभुनाते हुए कहने लगा -' यह भी नही कि गंगाजी से ज़रा दूर होकर निपटें। एकदम किनारे ही गंदगी करने बैठ गए।'

उसके भुनभुनाने के अन्दाज़ से लग रहा था कि उसकी मंशा केवल खुद को और उसके बग़ल से गुजरते हमको सुनाने तक सीमित थी। थोड़ा ज़ोर से बोलता तो आवाज़ उस निपटते बुजुर्ग तक पहुँच जाती। लेकिन उसकी मंशा शायद भुनभनाने तक ही सीमित थी। बुजुर्ग उसकी भुनभुनाहट से निर्लिप्त निपटने में तल्लीन रहा।

बाद में उस बुजुर्ग के पास से गुजरते हुए लगा कि उसको बैठने में कुछ तकलीफ सी थी। बड़ी मुश्किल से  बैठे-बैठे सरकते हुए वह नदी की तरफ़ जाता दिख रहा था। उसकी तकलीफ़ का अन्दाज़ अगर दूध वाले को होता तो शायद वह कम भुनभुनाता। 

वहीं चार छोटे-छोटे बच्चे रेत पर खेल रहे थे। उनमें तीन बच्चे थे , एक बच्ची।  पास जाकर देखा तो वे रेत को नदी के पानी से गीला करके बालू के खिलौने बना रहे थे। 'कौन सा खिलौना बना रहे हो ?'  पूछने पर बच्चों ने बताया -'खाना पकाने के खिलौने बना रहे हैं।' शुरुआत चौके से हुयी। चौका बनाने के बाद उनमें से एक बच्चा थाली या परात जैसा कुछ बना रहा था।

बच्चों ने आपस में एक-दूसरे के बारे में बताया। बच्ची थोड़ा मुखर सी लगी। उसके बारे में एक बच्चे ने बताया -'ये गाली बकती है।' 'क्या गाली बकती है ? ' पूछने पर बच्चे ने बताया कि क्या-क्या गाली बकती है बच्ची। आम जन-जीवन में रोज़मर्रा की गालियाँ बताई बच्चे ने। बच्चों की बातचीत सुन सकते हैं यहाँ वीडियो में। 

बच्चों को खेलता छोड़कर हम आसपास थोड़ा टहले। लोग रेत में अपने-अपने हिसाब से ज़मीन घेरकर गर्मी के फल उगाने की तैयारी कर रहे। गोबर की खाद भी दिखी वहीं। हम एक घेरे में घुस गए यह सोचते हुए कि आगे निकलने का रास्ता होगा। लेकिन जगह इस तरह से घिरी हुई थी कि उसको पार करने का कोई जुगाड़ नहीं था। हमको वापस लौटना पड़ा।

लौटकर देखा तो बच्चे खिलौना बनाने के काम पूरा करके या स्थगित करके नदी में नहा रहे थे। हमारे पास पहुँचने तक वो बाहर निकल आए। हमने उनके फ़ोटो खींचने के लिए पूछा तो सब तैयार हो गए। पोज बनाकर भी खड़े हो गए। एक बच्चे ने उँगली से 'V' का निशान भी बनाया। उसको देखकर बच्ची ने  भी उँगली 'V' वाले अन्दाज़ में फैला ली। बच्ची ने पहले 'V' का निशान ऊपर की तरफ़ करके बनाया। बाद में  दोनों आखों को घेरते हुए 'V' का निशान बना लिया। 

फ़ोटो देखकर बच्चे खुश हो गए। एक ने उत्साहित होकर कहा -'अबे अब हमारे फ़ोटो वायरल हो जाएँगे। इंस्टाग्राम पर लगाएँगे अंकल।' सब बच्चों ने चहकते हुए  फिर से फ़ोटो देखे और दोबारा पोज देकर फ़ोटो खिंचवाए। वे खुश हो गए। मेरे मन हुआ कि काश ये फ़ोटो उन बच्चों को दे पाते। अब सोच रहे हैं कि बनवाएँगे फ़ोटो। कभी शुक्लागंज गए तो लेते जाएँगे। दे देंगे बच्चों को। 

बच्चों ने बताया कि उनमें से तीन बच्चे स्कूल जाते हैं। एक सबसे छोटा बच्चा स्कूल नहीं जाता। उसके बारे में बच्चों ने कहा -'ये स्कूल नहीं जाता , गाली बकता रहता है।' मुझे ताज्जुब हुआ कि पाँच-दस मिनट में ही गाली देने की शिकायत बच्ची से हटकर एक बच्चे की तरफ़ मुड़ गयी। 

बच्चों के नाम पूछे तो पता चला उनके नाम जैन खान, बिलाल खान , शाहबाज़ अली खान और आलिया खान हैं। सब एक ही परिवार के बच्चे हैं। सगे ,चचेरे  भाई-बहन। शाहबाज़ अली खान ने अपना नाम और लम्बा बताया था। लेकिन बाद में अपना नाम शाहबाज़ अली खान तक ही सीमित करने को राज़ी हो गया। बच्चे शुक्लागंज में गोताखोर मोहल्ले में रहते हैं। शायद उनके घर वाले नाव चलाने का काम करते हों। हो सकता है कोई गोताखोर भी हों। 

हमने बच्चों से पूछा -'कोई कविता या कोई शायरी आती है ? आती हो तो सुनाओ।'

बच्चों ने फ़ौरन एक शायरी सुनाई । 

किनारे  पे न चलो, किनारा टूट जाएगा ,

चोट तुम्हारे  लगेगी , दिल हमारा टूट जाएगा।

सबसे पहले शायरी  शाहबाज़ अली खान और आलिया ने सुनाई। फिर सभी ने बारी -बारी यही शायरी दोहराई। हड़बड़ी में शायरी के लफ़्ज़ इधर-उधर होते रहे। बच्चे एक-दूसरे को 'अरे चुप ' कहते हुए अपने अन्दाज़ में शायरी सुनाते रहे। 

बच्चों से हमने कोई और भी कविता या शायरी सुनाने को कहा तो उन्होंने कहा -'हमको यही आती है।' 

बच्चे आपस में खेलने में मशगूल हो गए। हम वापस लौट लिए। 

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Saturday, November 30, 2024

धनिया के पैसे नहीं लेंगे, जाओ मौज करो

 
शाम को सब्ज़ी लेने गए बाज़ार। गुमटी में कुछ काम था तो सोचा सब्ज़ी भी वहीं से ले लेंगे। रास्ते में सोचा सब्ज़ी विजय नगर से ही ले लें, बाक़ी सामान गुमटी से ले लेंगे। लेकिन फिर न्यूटन के जड़त्व के नियम का आदर करते हुए गुमटी की तरफ़ ही बढ़ लिए। 

गुमटी में भीड़ बहुत थी। गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं मिली मेन रोड पर। गली में घुसा दिए गाड़ी। गली में घुसते ही एक दुकान बंद हो रही थी। वहीं कुछ देर इंतज़ार करके,  दुकान का शटर गिरने पर गाड़ी खड़ी कर दी। 

गाड़ी करने के बाद सब्ज़ी वाली की तरफ़ गए। सब्ज़ी वाली गली में फल, अचार और परचून की भी दुकाने भी हैं। सड़क ठेलिया वालों के क़ब्ज़े में सहम-सिकुड़ गयी थी। सड़क से किसी गाड़ी की सहज रूप से गुजरना चुनौती का काम।

एक दुकान से कुछ सब्ज़ी ली। 240 रुपए हुए। आनलाइन भुगतान के लिए स्कैनर माँगा तो सब्ज़ी वाले ने कहा -'हम मोबाइल ही नहीं रखते। स्कैनर भी नहीं।' 

जब तक भुगतान के लिए पैसे निकालें सब्जीवाले ने थोड़ी धनिया थमा दी। हमें लगा -'दस रुपए की धनिया दे रहे हैं ताकि 250 रुपए हो जाएँ और भुगतान आसान हो जाए।'

धनिया हमारे गार्डन में लगी है। हमने कहा -'धनिया नहीं चाहिए।'

सब्ज़ी वाले भाई जी ने शाही  अन्दाज़ में कहा -'अरे धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 

हमने बहुत कहा धनिया के पैसे ले लो लेकिन उन्होंने लिए नहीं। 

हमने नाम पूछा तो बताया -'नरेश।'

हमने कहा -'नरेश माने राजा होता है। इसीलिए अन्दाज़ शाही है।'

नरेश बोले -'सब आप लोगों की दुआ है। '

वहीं खड़े एक ग्राहक ने बताया -'नरेश सबसे मस्त सब्ज़ी वाले हैं यहाँ। दरियादिल।सब लोग इसीलिए इनके पास आते हैं सब्ज़ी लेने। '

हमने 500 रुपए का नोट दिया। जब तक वो पीछे की परचून की दुकान से फुटकर कराएँ तब तक हमने सोचा गोभी भी यहीं से ले लेते हैं। गोभी हमें लेनी थी, हमने देख भी ली थी वहाँ लेकिन देखने में थोड़ा बड़ी लगी थीं इसलिए सोचा और दुकाने भी देख लें। लेकिन मुफ़्त की मिली धनिया ने हमें गोभी भी वहीं से लेने के लिए उकसा दिया। पचास रुपए की एक गोभी के हिसाब से दो गोभी ले ली। 

इस बीच एकाध ग्राहक और आए। उनको भी शाही अन्दाज़ में निपटाया सब्ज़ी वाले ने। 

हम और सब्ज़ी लेने के लिए दूसरे ठेलियों की तरफ़ गए। सब सामान ले लिए लेकिन मशरूम नहीं मिला कहीं। हमें याद आया कि नरेश की ठेलिया पर मशरूम थे कुछ। हम वापस गए। देखा केवल दो पैकेट बचे थे मशरूम के। हमने पूछा -'केवल दो ही हैं ?'

'कितने चाहिए ?' -पूछा नरेश ने।

हमने बताया -'पाँच पैकेट चाहिए।'

'दो मिनट रुकिए' कहकर नरेश उस तरफ़ चले गए जिधर और सब्ज़ियों की दुकानें थीं। उन दुकानों पर कहीं दिखा नहीं था मुझे मशरूम। हमें लगा वे  उनमें से ही किसी दुकान पर खोजेंगे और ख़ाली वापस आएँगे। लेकिन कुछ ही देर में नरेश तीन मशरूम के पैकेट लिए आए और हमारे सामने धर दिए। चालीस रुपए के एक पैकेट के हिसाब से दो सौ रुपए भुगतान करके कहा -'तुम्हारा दिया हुआ नोट तुम्हारे पास ही लौट आया।'

इस बीच एक महिला गोभी लेने आई। मोलभाव करने पर नरेश ने कहा -'अभी-अभी भाई साहब को पचास रुपए में दी है। आप पैंतालीस रुपए दे दो।'

लेकिन महिला और कम कराने पर तुली थी।उसने चालीस रुपए में देने को कहा। नरेश  पैंतालीस पर ही अड़े रहे। महिला ने फिर चालीस की ज़िद की। चालीस -पैंतालीस की रस्साकसी देखती हुयी  गोभी ठेलिया पर  शांत भाव से बैठी रही।

महिला ग्राहक और नरेश का मोलभाव देखकर हमको  याद आया कि नरेश ने हमको दस रुपए की धनिया मुफ़्त में दी थी। हमने चलते हुए कहा -'अरे दस रुपए हमसे वापस ले लो। गोभी दे दो ।'

नरेश ने हाथ जोड़ दिए। बोले -'आपकी दुआ बनी रहे। यही बहुत है।' 

हम चल दिए। देख नहीं पाए कि महिला को गोभी कितने में दी आख़िर में। 

अभी घर आकर हमको नरेश का अन्दाज़ याद रहा है -'धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 



Tuesday, November 12, 2024

मोबाइल है या हथगोला

मोबाइल है या हथगोला
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सुबह चाय पी रहे थे। अचानक मोबाइल बजा। वीडियो काल थी। जिस नम्बर से काल आई वह हमारी सम्पर्क लिस्ट में नहीं था। नाम किसी महिला का दिखा रहा था। हम काल उठाने ही वाले थे। तब तक हमको तमाम ' साइबरिया' हिदायतें याद आ गयी। उनमें से एक यह भी थी -' किसी अनजान नम्बर से वीडियो काल नहीं उठानी चाहिए।'
इसके अलावा और भी तमाम लफड़े याद आ गए। हमने फ़ौरन फ़ोन काट दिया। याददाश्त को शुक्रिया किया।
बाद में देखा फ़ोन नम्बर भारत का था। नाम परिचित सा था लेकिन सम्पर्क लिस्ट में नहीं था।
ऐसा आजकल अक्सर होता है। आए दिन अनजान नम्बर से कई काल आते हैं। कभी बैंक के नाम पर, कभी बीमा के नाम पर। कभी क्रेडिट कार्ड के बारे में , कभी लोन के नाम पर।
क्रेडिट कार्ड का अलग मज़ा है। हमने कुछ ख़रीदारी की ताकि क्रेडिट कार्ड का उपयोग चलता रहे। जैसे ही ख़रीद की अगले ने फोनियाना शुरू किया -'आप इसका भुगतान आसान किस्तों में कर सकते हैं। मतलब EMI में।'
हमने हर बार कहा -'भईये, हमारे पास पैसे हैं। हम बिल आते ही भुगतान करेंगे।' लेकिन क्रेडिट कार्ड वाली मैडम हमको बार-बार समझाने पर तुली हैं -'जब एक सुविधा मिल रही है तब उसका उपयोग कर लेना चाहिए आपको।'
हम समझ नहीं पा रहे हैं कि क़र्ज़ में डूबे रहना कहाँ से फ़ायदे मंद है। आम इंसान को लगता है कि क़र्ज़ जितनी जल्दी निपट जाए उतना अच्छा। हम कोई ग़ालिब थोड़ी हैं जो क़र्ज़ की पिएँ और शेर लिखें:
"क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि
हाँ, रंग लाएगी हमारी फाका-मस्ती एक दिन।"
सुना है अमेरिका में लोग सब कुछ ईएमआई पर ख़रीदते हैं। लेकिन हम अभी अमेरिका से 12369 किलोमीटर दूर हैं।
इसी तरह के संदेशे भी आते रहते हैं। कोई किसी बारे में कोई किसी बारे में। रोज तमाम तरह के लोन स्वीकृत होने के संदेश, क्रेडिट कार्ड जारी होने की खबर, कार चालान होने की खबर से लेकर सामानों के विज्ञापन, सूचना और न जाने क्या-क्या खबरें। ईमेल तो पूरी भर गयी ऐसी नोटिफ़िकेशन से। पिछले पाँच सालों में पाँच संदेश भी नहीं आए होंगे जो हमारे काम के हों। सब अगड़म-बग़ड़म संदेश। उस पर तुर्रा मेल से आता रोज का नोटिफ़िकेशन -'आपका फ्री मेल स्पेस ख़त्म हो गया है। मेल जारी रखने के लिए या तो नया स्पेस ख़रीदें या मेल में जगह ख़ाली करें।'
लगता है ये मेल वाले दुनिया भर का कूड़ा-करकट मँगवा के मेल बक्सा भर लेते हैं इसके बाद कहते हैं -'जगह ख़रीदों वरना मेल आने बंद हो जाएँगे।'
अजब दादागिरी है। रोज झाड़ू लिए मेल बक्सा ख़ाली करते रहो ताकि बाज़ार अपना कूड़ा हमारे मेल बक्से में भरता रहे।
आज तो दुनिया भर के नोटिफ़िकेशन मेल, वहात्सएप और दीगर रास्तों से मोबाइल में आता रहता है। दुनिया मुट्ठी में करने के बहाने अपन दुनिया की मुट्ठी में बंद हो गए हैं। हर पल टन्न-टन्न नोटिफ़िकेशन आते रहते हैं। घर वाले भन्न-भन्न भन्नाते रहते हैं। चौबीस घंटे की बेगार में लगा दिया है जैसे मोबाइल ने।
लोग कहते हैं कि सावधान रहो लेकिन कितना सावधान रहें? आजकल सब काम तो मोबाइल के भरोसे हो गए हैं। आप कोई सामना मँगवाओ तो डिलीवरी की सूचना मोबाइल पर आएगी। कुछ भी काम करो तो मोबाइल नम्बर ज़रूरी। लोगों के पास अपना आधार नम्बर भले न हो लेकिन मोबाइल नम्बर ज़रूर होगा। आज के दिन इंसान खाने बिना दिन भर भले रह ले लेकिन मोबाइल और नेटवर्क के बिना उसकी तबियत नासाज़ होने लगती है।
मोबाइल ने हमको जितना सूचना संपन्न बनाया है उतना ही डरपोक भी बनाया है। कहीं किसी प्रियजन का मोबाइल घंटे भर न मिले तो धुकुर-पुकुर , कहीं कोई अनजान नम्बर से काल आया तो संसय , फ़ोन उठाएँ तो डर और न उठाएँ तो चिंता कोई ज़रूरी संदेश ने छूट गया हो।
इन चिताओं से बचाव के कितने भी एसओपी बना लिए जाएँगे लेकिन इंसानी ज़ेहन से उसकी मैपिंग सबके लिए सम्भव नहीं। कहीं न कहीं चूक तो हो ही सकती है। हो ही जाती है।
संदेश नोटिफ़िकेशन वाली बात तो फिर भी बर्दाश्त हो जाती है। लेकिन ये जब से डिजिटल अरेस्ट , वीडियो कालिंग वाली खबरें सुनी हैं तब से लगता है हाथ में मोबाइल नहीं हथगोला लिए चल रहे हैं। हर अनजान काल से लगता है कि इसको उठाते ही हथगोले का पिन निकल जाएगा और हमको काम भर का घायल कर जाएगा।
ये लिखते समय एक अनजान नंबर से कॉल रहा है। समझ नहीं पा रहे कि उठायें कि न उठायें ।

Saturday, November 09, 2024

नवीन मार्केट की सड़क पर

 नवीन मार्केट की सड़क पर

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अपन जहां खड़े हैं वहां से सामने होटल लैंडमार्क दिख रहा है। होटल का नाम सफेद रंग में है इसलिए कम चमक रहा है। चमकने के लिए नाम या शख़्सियत का रंगीन होना जरूरी होता है। रंगीन चीज या इंसान अलग से चमकता है।
लैंडमार्क होटल शहर का प्रमुख होटल है। आठ-दस मंजिला होगा। दूर से मंजिलें एक के ऊपर एक रखे डब्बों जैसी दिखतीं है। होटल के नीचे कल्याण जी बेकरी की दुकान ,उसके नीचे BG Shop और उसके नीचे टाइटन की दुकान है। यहाँ से केवल TAN दिख रहा है।
ये सारी इमारतें एक के ऊपर एक खड़ी देखकर गाना याद आ रहा है:
'नीचे पान की दुकान, उप्पर गोरी का मकान।'
लैंड मार्क के सामने आल आउट का विज्ञापन दिख रहा है-' डेंगू मलेरिया के साथ चान्स लेंगे या all out? ' मतलब आल आउट भी असर करे यह चान्स की ही बात है। सबेरे अस्पताल में खून की जांच करने वाले स्टाफ ने बताया -'आजकल डेंगू/मलेरिया के मरीज बढ़ गए हैं।'
पता नहीं मरीजों ने किसके साथ चान्स लिया है?
क्या पता होटल में आये यात्री सामने ऑल आउट का विज्ञापन देखकर पूछते होंगे-'आल आउट कमरे के किराए में शामिल है कि अलग से चार्ज हैं उसके?'
गाड़ी किनारे खड़ी करके काफी देर वीडियो देखने के बाद 'चयास' लग आई। गाड़ी से उतरकर आसपास की टोह ली। सामने न्यू केसरवानी डोसा कार्नर वाले की दुकान दिखी। सोचा कि वहाँ चाय भी मिलती होगी। पता किया तो उसने सामने सड़क पार की तरफ इशारा कर दिया।
सड़क पार नुक्कड़ से रफूगरों की दुकाने दिखी। सब रफूगर बलिया वाले। फोटो खींचने के लिए कैमरा सामने किया तो नुक्कड़ पर मोटरसाइकिल पर बैठा ट्रैफिक पुलिस का होमगार्ड तेजी से मोटरसाइकिल से उतरा। हमें लगा कहेगा -'बिना पूछे फोटो कैसे खींच रहे?' यह भी लगा कि शायद हड़ककर मोबाइल अपने कब्जे में ले ले। लेकिन वह मोटरसाइकिल से चुपचाप उतर कर चौराहे का ट्रैफिक कंट्रोल करने लगा। देखकर लगा हमारा डर फ़िज़ूल था। सोचा -'कितना जिम्मेदार है सिपाही।'
रफूगरों की दुकान के आगे मीट की दुकानें हैं। बोटी-बोटी कट रही थी मीट की। बोटी देखकर मुझे समझ नहीं आया कि बोटी बंट रही थी कि कट रही थी।
मीट की दुकान के आगे चाय की दुकान थी। चाय वाला तीन-चार भगौने में चाय रखे एक की चाय दूसरे में, दूसरे की तीसरे में फिर तासरे से पहले में डालता/खौलाता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बुजुर्ग साहित्यकार पुरानी किताबों से इधर-उधर छंटनी करके नई किताबें लाते रहते हैं।
पांच रुपये की चाय हुंडे में लेने पर दस की पढ़ी। पहला घूंट लेते ही कुछ नमकीन स्वाद आया। काफी दिन बाद नमकीन चाय पी। बचपन में अम्मा बनाती थीं। चाय वाले इरफान फुर्ती से सबको चाय पिलाते जा रहे थे।
लौटते हुए रफूगरों से पूछा -'सब लोग बलिया के हैं?'
बोले -'हाँ , बलिया के हैं।'
हमको बलियाटिक नारा याद आया -'बलिया जिला घर बा तो कौन बात का डर बा?'
हमने पूछा -'वहीं के जहां चंद्रशेखर जी थे?'
'अरे नहीं।चंद्रशेखर जी तो खास बलिया के थे। हम लोग सिकंदरपुर के हैं। 35 किमी दूर है बलिया से।' -एक रफ़ूगर ने बताया।
हमने सोचा और बात की जाए लेकिन सड़क किनारे खड़ी गाड़ी की चिंता में सोच को स्थगित कर दिया। गाड़ी के पास आ गए।
सामने भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय चमक रहा है। भारतीय जनता पार्टी मूलतः व्यापारियों की पार्टी मानी जाती थी। नवीन मार्केट शहर का मुख्य व्यापारिक केंद्र है। इलेक्ट्रोरल बांड के पहले के समय में यहां कार्यालय होने से चंदा लेने में सहूलियत होती होगी पार्टी को।इसीलिए कार्यालय बन गया होगा।
सड़क पर ट्राफिक बढ़ गया है। एक महिला ई रिक्शा चलाती जा रही है। पीछे बुजुर्ग सवारी बैठी है। दोनों थके-थके दिख रहे हैं।
लैंडमार्क का निशान बिजली जल जाने से चमकने लगा है। इससे लगता है कोई साधारण दिखने वाली वस्तु या व्यक्ति के चमकने में किसी का सहयोग जरूर होता है।जैसे ट्रम्प जी की चमक के पीछे लोग एलन मस्क जी का सहयोग बता रहे हैं। बाकी के बारे में हम कुछ न कहेंगे। कहने का मतलब भी नहीं। आप खुद समझदार हैं।
वैसे आजकल 'समझदार' होना कोई बहुत 'समझदारी' की बात नहीं है। आजकल समझदार की मरन है। इसलिए आजकल 'समझदारी' इसी में है कि 'समझदारी' से परहेज़ लिया जाए।
शाम हो गयी है। दुकानों के साइन बोर्ड चमकने लगे हैं।दुकानों पर बिजली की झालर जल रही हैं । उनकी दीवाली जारी है। चौराहे पर रेमंड्स और राजकमल की दुकान के साइन बोर्ड लाल रंग में चमक रहे हैं। आम तौर पर लाल रंग खतरे का माना जाता है। लेकिन लाल रंग का एक मतलब इश्क़ का रंग भी होता है। दुकानों की तड़क-भड़क देखकर लगा कि 'ठग्गू के लड्डू' और 'बदनाम कुल्फी' में यहां लिखा होना चाहिए-' ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं' , 'घुसते ही जेब औऱ दिमाग की गर्मी गायब।'
पहली बार यहीं कहीं ठग्गू के लड्डू खाये थे और उनके जुमले सुने थे।
सड़क पार 'तारा सिंह मंघा राम' की दुकान दिख रही है। उसके नीचे कुल्हड़ की वही चाय 12 रुपये में बिक रही है जो इरफान ने हमको 10 रुपये में पिलाई थी अभी थोड़ी देर पहले। मतलब हम अभी थोड़ी देर पहले चाय पीकर दो रुपए बचा चुके हैं।
सामने की इमारत टूटकर नई बन रही है। पहली मंजिल बन गयी है। सरिया दिख रही हैं। सरिया किसी इमारत की हड्डियां होती हैं। हड्डियां ही हड्डियां दिख रहीं हैं इमारत की।
परेड का मैदान पीछे है। यहाँ रावण जला होगा दशहरे में। कागज, कपड़े का जितना जल गया उतना जल गया। बाकी बचा रावण लोग लूट, समेट के ले गए होंगे अपने मन के लाकर में रखने के लिए। अगले साल फिर चाहिए न जलाने के लिए।
सड़क के दोनों ओर गाड़ियों की कतारें जमा हैं। कुल जमा तीन कतारें । अंदर मार्केट में तो पूरा गाड़ियां ही गाड़ियां हैं। हम गाड़ी के दरवाजे से पीठ सटाये गाड़ी की रखवाली कर रहे हैं। ड्राइवर का काम ही यही होता है। मुफ्त के ड्राइवर का तो और भी जरूरी काम।
बगल की इमारत में सूरज भाई ऐसे विराजे हैं जैसे सिंहासन पर बैठे हों। डूबने वाले हैं भाई जी लेकिन किरणें बाअदब,बामुलाहिजा वाले अंदाज में उनके तारीफ में चमक रही हैं। हमको लगा कि सूरज भाई ने भी अपना तारीफ़ी चैनल बना लिया है। शायद उनको भी लगता है कि आज के समय में चमकने के लिए मीडिया जरूरी होता है।
सूरज भाई को देखकर हमको अजय गुप्त जी की कविता पंक्ति याद आई:
सूर्य जब जब थका हारा ताल के तट पर मिला,
सच कहूँ मुझे वो बेटियों के बाप सा लगा।
हमने इसकी तर्ज पर सूरज भाई की शान में तुकबन्दी की:
'सूर्य जब जब थका हारा इमारत की छत पर मिला,
सच कहूँ मुझे वो किसी उखड़ते शहंशाह सा लगा।'
सूरज भाई मेरी तुकबन्दी सुनकर लजा से गए। अपनी लाज को मुस्कराहट में लपेट के वो बिल्डिग के पीछे छिप गये।
असहज बातों के जवाब आजकल इसी तरह दिए जाते हैं।

Friday, November 08, 2024

स्टेशन निकल आया

 शहर में बहुत भीड़ है। सड़कें  गाड़ियों के नीचे दबी हैं। फुटपाथ पर या तो दुकानदारों का क़ब्ज़ा है या बेघरबार लोग अपना अस्थाई ठिकाना बनाए हुए हैं। 

जहां-जहां मेट्रो बन रही है वहाँ सड़क तीन भागों में बंट गयी है। बीच का भाग मेट्रो बनाने के लिए घेरा गया है। बाक़ी सड़क आने-जाने के लिए छोड़ दी गयी है। चलो रेंगते हुए, बचते-बचाते। 

कल सीटीआई चौराहे से विजय नगर की तरफ़ आते हुए देखा बड़ा गड्ढा ख़ुदा हुआ है। विजय नगर के नाले (गंदा नाला)  समानांतर दस मीटर लम्बा गड्ढा। एक बच्ची वहाँ कुर्सी पर बैठी उबासी लेती सड़क से लोगों, वाहनों को गुजरते देख रही थी। बग़ल में कई झोपड़ियाँ बनी हैं। एकदम नाले के ऊपर। वर्षों से ये झोपड़ियाँ ऐसे ही ही बनी हुई हैं। किसी भी तरह के परिवर्तन, विकास-विकास की औक़ात नहीं क़ि इनका बाल-बाँका कर सके। 

बच्ची से झोपड़ी के बग़ल में खुदे गड्डे के बारे में पूछा तो उसने बताया -'यहाँ स्टेशन निकल आया है। वही बनेगा।'

स्टेशन निकल आया मतलब मेट्रो स्टेशन। शायद विजय नगर मेट्रो स्टेशन। स्टेशन बनेगा तो झोपड़ियाँ हटेंगी। कुछ नया बनने के लिए पुराना हटेगा ही। हटाने से याद आया कि इस बीच विजय नगर चौराहे पर लगी महाकवि  भूषण की मूर्ति भी हट चुकी है। 

बच्ची से पूछा कि फिर तुम कहाँ जाओगी? उसने कुछ जवाब नहीं दिया। सोच रही होगी शायद -'इस बेवक़ूफ़ी भरी बात का क्या जवाब दिया जाए?'

वहीं पास खटिया पर लेते एक आदमी से बात की। पता चला पास बैठी बच्ची और बग़ल में खेलते बच्चे का पिता है वह। खटिया और उसपर के बिस्तर वर्षों से ऐसे ही पड़े लग रहे थे।

पता चला वो  42 साल से यहीं रह रहा है । बस्ती घर है लेकिन रहता यहीं है। पत्नी बस्ती में है। बच्चे इसके साथ। होटल में खाना बनाने का काम करता है। बच्चों के लिए भी वही बनाता है। बच्चे पढ़े नहीं। स्कूल गए होंगे लेकिन स्कूल और बच्चे एक-दूसरे को रास नहीं आए होंगे। 

स्टेशन बनाने के लिए झोपड़ी हटेगी तो कहाँ जाओगे पूछने पर बताया -'देखेंगे कहीं जुगाड़। अभी तो हफ़्ते भर की मोहलत मिली है।

हफ़्ते भर बाद जिसका ठीहा उजड़ने वाला है वो आराम से खटिया पर लेता हुआ है। पता चला -' कंधे पर चोट लग गयी । इसलिए काम पर भी नहीं जा पाया।'

आदमी से पूछने पर पता चल कि उसका न आधार कार्ड है , न राशन कार्ड , न वोटर कार्ड। अलबत्ता मोबाइल है पास में। बिना किसी पहचान के ज़िंदगी जी रहा है बंदा। 

आधार कार्ड न बनवाने के पीछे कारण बताया -'काम में लगे रहे। बनवा ही नहीं पाए।अब बताते हैं लोग कि  दो हज़ार रुपए लगेंगे बनवाने के।'

आगे एक झोपड़ी के बाहर तीन महिलाएँ-बच्चियाँ एक के पीछे एक बैठी-खड़ी बाल काढ़ रहीं थीं, जुएँ बिन रहीं थीं। सबसे आगे वाली महिला ज़मीन पर बैठी थी, उसके पीछे बच्ची खटिया पर बैठी उसके बाल संवार रही थी, उसके पीछे खड़ी बालिका उसके जुएँ बिन रही थी। सब मिलकर अपने समय का दिन दहाड़े क़त्ल कर रहीं थीं। 

समय काटने के समाज के हर वर्ग के अपने-अपने उपाय होते हैं। कोई जुएँ बीनते हुए बाल बनाते हुए , कोई लड़ते-झगड़ते, कोई बुराई-भलाई करते, कोई हऊजी-पपलू खेलते पार्टी करते , कोई रोते-झींकते, कोई दुनिया को बरबाद करते और कोई दुनिया की चिंता करते हुए समय बिताता है। हरेक के अपने जायज़ बहाने होते हैं समय बिताने के। 

आगे सिग्नल लाल था। एक बच्ची लपक-लपक कर गाड़ियों की खिड़कियाँ खटखटा कर माँग रही थी। हमारी दायीं तरफ़ की खिड़की खुली थी वह उससे सटकर कुछ माँगने लगी। 

बच्ची ने बताया-' सुबह से कुछ खाया नहीं। भूख लगी तो माँगने आ गए।'

'सुबह की बजाय दोपहर में क्यों आई माँगने?' -हमने ऐसे पूछा गोया हम उसकी अटेंडेंस लगा रहा हों।

'हमने सोचा घर में होगा कुछ खाने को। इसलिए सुबह नहीं आए। अभी मम्मी से से पूछा तो उसने बताया कुछ है नहीं तो आ गए माँगने।'- बच्ची ने बताया।

मम्मी किधर हैं?   मेरे पूछने पर बच्ची बच्ची ने बताया -' बहन को नहला रही हैं हैण्डपम्प पर।'

पास में हैण्डपम्प पर एक महिला बच्ची के सर पर पानी डालकर नहलाती दिखी। 

बच्ची मेरी खिड़की से सटी खड़ी थी। उसके माँगने की बात मेरे ज़ेहन में थी लेकिन देने की इच्छा कमजोर सी क्योंकि पर्स पीछे था। बग़ल में रखे होते पैसे तो शायद फ़ौरन दे भी देते। दिमाग़ ने हाथ को आदेश  दिया पर्स निकालने के लिए लेकिन हाथ ने आदेश के पालन में लालफ़ीताशाही का मुजाहरा किया। टाल गया दिमाग़ का आदेश। दिमाग़ को लगा उसने आदेश कर दिया अब उसकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई। दुनिया में   परोपकार के तमाम काम इसी तरह टलते रहते हैं। 

इस बीच दिमाग़ में  फिर कुलबुलाहट हुई और बच्ची से पूछा -' स्टेशन बनने पर झोपड़ी हटेंगी तो कहाँ जाओगी तुम लोग?'

उसने कहा -' कहीं डाल लेंगे पन्नी।' 

इस बीच सिग्नल हरा हो गया। हम गाड़ी हांक कर आगे बढ़ गए। बच्ची दूसरे लोगों के आगे-पीछे घूमते हुए माँगने लगी। 


Thursday, November 07, 2024

किताबें छपवाने का प्लान

अभी तक अपन की सात किताबें आ चुकी हैं:

1. पुलिया पर दुनिया 

2. बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य 

3.  सूरज की मिस्ड काल 

4. झाड़े रहो कलट्टरगंज 

5. घुमक्कड़ी की दिहाड़ी 

6. आलोक पुराणिक -व्यंग्य  का एटीएम 

7. अनूप शुक्ल -चयनित व्यंग्य  


पिछले कई दिनों से अपने लेखन की  छँटाई  करके किताबें तैयार करने का मन  बना रहा। टलता रहा। अमेरिकी यात्रा संस्करण की किताब 'कनपुरिया कोलंबस' तो तैयार भी कर ली थी । एक  प्रकाशक को भेज भी दी थी। लेकिन लगता है किताब ग़ायब हो गयी वहाँ से।  इस बीच जीमेल की सफ़ाई करते उसकी पांडुलिपि भी उड़ गयी। फिर तैयार करेंगे किताब। 

इसके अलावा अपने लिखाई जमा करके कुछ और किताबें तय की हैं प्रकाशित करने को। अभी तक कुल जमा ये किताबें सोची हैं :

1.   कनपुरिया कोलंबस -अमेरिका यात्रा पर संस्मरण 

2.  ट्रेन और हवाई यात्राओं के संस्मरण 

3.  'पुलिया पर दुनिया' के आगे के किस्से 

4. जबलपुर  , कानपुर ,  शाहजहाँपुर , कोलकता के संस्मरण  (चार किताबें)

5.  कश्मीर यात्रा के संस्मरण 

6. लेह - लद्दाख, गोवा, नेपाल यात्राओं के संस्मरण 

7.  वयंग्य की जुगलबंदी के लेखों का संकलन 

8. कट्टा कानपुरी के शेर संकलन 

इन बारह किताबों का मसौदा तैयार है। बस छाँटना बीनना है। ये किताबें छपाने के बाद किताबों की संख्या दो अंको के पार हो जाएगी। ये तो अभी तक लिखे से बनने वाली किताबें हैं। आगे जो लिखेंगे उनसे और किताबें बनेंगी। 

किताबों के ईबुक संस्करण बनाएँगे। किंडल भी। प्रिंट आन डिमांड  सुविधा के तहत आर्डर करने पर किताब छपेगी। 

आपको इस खबर से घबराने की ज़रूरत नहीं है। ये मैंने अपने लिए प्लान तैयार किया है। कोई ज़रूरी थोड़ी कि अमल में लाएँ।

आप बताओ आप मेरी कोई  किताब पढ़ना पसंद करेंगे? 


अमेरिका चुनाव वायदे

कल अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए। डोनाल्ड ट्रम्प को अमेरिकी लोगों में दुबारा अपना मुखिया चुना। कमला हैरिश हार गयीं। शायद अमेरिका अभी महिला राष्ट्रपति चुनने के लिए  तैयार नहीं है। महिलाओं वोटिंग का अधिकार भी देर से मिला था अमेरिका में। मुखिया भी चुनी जाएँगी कभी भविष्य में। 

ट्रम्प जी के जीतने की आहट से क्रिप्टोकैरेंसी उछलने गयी। क्रिप्टोकैरेंसी मुझे 'करप्शन कैरेंसी' लगती है। पता नहीं सच क्या है?

अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव पर जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की टिप्पणियाँ  उल्लेखनीय है:

1. ईसाई फंडामेंटलिज्म और शस्त्र उद्योग ने अमेरिका में जनता के विवेक का मुंडन किया।

2. ट्रंप की नहीं यह नस्लवाद औरशस्त्र उद्योग की जीत है ।

3. हथियार निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उम्मीदवार ट्रंप का संघी खुलकर समर्थन कर रहे हैं।यह है संघ का असली चेहरा।

डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनाव प्रचार में कहा था कि वे इज़राइल-फ़िलिस्तीन की लड़ाई एक दिन में ख़त्म कर देंगे। रूस यूक्रेन युद्द भी रोक देंगे। आने वाला समय बताएगा कि उनका बयान जुमला था या हक़ीक़त। 

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Thursday, October 03, 2024

लखनऊ पुस्तक मेले में 'साँपों की सभा'



कल लखनऊ जाना हुआ। पुस्तक मेले में। Anoop Mani Tripathi की किताब का विमोचन था। किताब राजकमल प्रकाशन से आयी है। 'साँपों की सभा' नाम है किताब का। चौथी किताब है उनकी। इसके पहले की तीन किताबें हैं:
1. शो रूम में जननायक
2. अस मानुष की जात
3. नया राजा नए किस्से
अनूप मणि की पहली किताब 'शो रूम में जननायक' वीनस केशरी ने अपने 'अंजुमन प्रकाशन' से छापी थी -अंजुमन नवलेखन पुरस्कार -2016 से पुरस्कृत कृति के रूप में। तबसे अनूप मणि की किताब पर कुछ लिखने का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ। अब तो अनूप मणि ने तक़ादा भी बंद कर दिया है यह कहते -'हमें मालूम है आप लिखेंगे नही।'
बहरहाल इस चौथी किताब के विमोचन का समय पाँच बजे था। हम पाँच बजने में पाँच मिनट पहले पहुँच गए। तब तक लेखक महोदय का कोई अता-पता नही था। अलबत्ता लेखक मंच पर कोई दूसरा कार्यक्रम चल रहा था। वहाँ भी बिजली चली जाने के कारण कुछ देर को कार्यक्रम 'थम' गया। लाइट आने पर फिर चालू हुआ।
फ़ोन करने पर पता चला कि लेखक महोदय जाम में फँसे हुए थे। थोड़ी देर में पधारे पुस्तक मेले में।
तय समय पर लेखक मंच पर पहुँचने पर पता चला कि उसी समय कोई और कार्यक्रम है वहाँ। थोड़ी देर मामला उसी एक ही बर्थ पर दो यात्रियों के दावे की तरह चलता रहा। लेकिन अंतत: लेखक मंच दूसरे कार्यक्रम के लिए तय हुआ। 'साँपों की सभा' पर बात घंटे भर के लिए मुल्तवी हो गयी।
इस बचे हुए समय का उपयोग वहाँ किताबों की दुकाने देखने में किया गया। पहले ही तमाम अनपढ़ी किताबों की याद करते हुए शुरुआत कोई नयी किताब न ख़रीदने के इरादे से हयी लेकिन राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर याद आया कि दिल्ली पुस्तक मेले में Vineet Kumar की मीडिया का लोकतंत्र नही मिली थी। उसको ख़रीदने का विचार किया। मिल गयी तो याद आया ज्ञान चतुर्वेदी जी का नया उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' भी ख़रीदना बाक़ी है। पिछले दिनों इस किताब की Yashwant Kothari जी की लिखी समीक्षा पढ़कर इसे फ़ौरन मंगाने की बात सोची थी। इसी तरह एक-एक कर किताबें जुड़तीं गयीं। लौटते समय ये किताबें साथ में थीं:
1. सांपों की सभा -अनूप मणि त्रिपाठी
2. मीडिया का लोकतंत्र- विनीत कुमार
3. विमर्श और व्यक्तित्व- Virendra Yadav
4. बोलना ही है -Ravish Kumar
5. धारा के विपरीत- गोविंद मिश्र
6. एक यहूदी लड़की की तलाश- पैट्रिक मोदियानो
7. सलवटें- प्रियंवद
8. छूटी सिगरेट भी कमबख़्त
इनमें वीरेंद्र जी की किताब का विमोचन कुछ दिन पहले ही हुआ था। उनकी वहाँ उपस्थिति का फ़ायदा उठाकर उनके आटोग्राफ भी ले लिए किताब में। प्रियंवद जी की किताब सलवटें उनके कथेतर गद्य का संकलन है। इसका आर्डर आनलाइन दिया थे लेकिन आर्डर कैंसल हो गया था। शायद किताब रही न हो उनके पास। रवीश कुमार की किताब कई बार ख़रीदते-ख़रीदते रह गयी। कल ले ही ली।
अनूप मणि ने ख़ाली समय का उपयोग अपनी किताबों पर आटोग्राफ देते हुआ किया। किताब की दुकान पर थोड़ा टेंढे खड़े होकर दस्तख़त किए किताबों पर। अन्दाज़ से लग रहा था कि अभ्यास किया है आटोग्राफ का। शायद मेले में आने में देरी का वजह भी यही रही हो। मेरी किताब पर दस्तख़त करते हुए लिखा :
"अनूप शुक्ल जी को जो एक दिलचस्प इंसान हैं। सादर -अनूप मणि त्रिपाठी।'
यहाँ 'दिलचस्प' शब्द का मतलब बहुअर्थी है। अपने हिसाब से तय किया जा सकता है।
किताबों पर आटोग्राफ का सिलसिला भी मज़ेदार है। लेखक पाठक की ख़रीदी किताब पर ' शुभकामनाओं सहित' , 'सादर' 'स्नेह/प्यार सहित' लिखकर दस्तख़त करता है उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि लेखक अपनी तरफ़ से किताब भेंट कर रहा है। जबकि वह किताब पाठक ने ख़रीदी होती है। लेकिन जो हो इससे किताब अनूठी तो हो ही जाती है।
प्रसिद्ध व्यंग्यकार,कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर जी को समर्पित किताब 'साँपों की सभा ' में छोटे-बड़े कुल 42 लेख हैं। अनूप मणि की पहली किताब, 'शो रूम में जननायक ' , का कवर पेज राजेंद्र धोड़पकर जी ने बनाया था। 'सांपो की सभा' किताब का ब्लर्ब प्रख्यात कथाकार शिवमूर्ति जी ने लिखा है। लोकभारती पेपरबैक से प्रकाशित इस किताब का दाम 250 रुपए है। पुस्तक मेले में 20% छूट के साथ मिल रही है किताब।
पुस्तक मेले में अनूप मणि त्रिपाठी के कुछ बचपन के दोस्त भी थे। सब अनूप की बचपन की 'हरकतों' की याद करते हुए ताज्जुब टाइप कर रहे थे कि यह लेखक कैसे बन गया। उनको हम कैसे बताते कि यह ताज्जुब हर लेखक दूसरे लेखक के बारे में करता है। कई मर्तबा लेखक खुद अपने बारे में ऐसा सोचता है। इस सहज अचरज के लिए बचपन की दोस्ती की लंबी जान-पहचान की ज़रूरत नही होती।
समय का उपयोग करते हुए शिवमूर्ति जी से कुछ देर बातचीत की। आजकल उनका उपन्यास 'अगम बहै दरियाव' पढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह उपन्यास उन्होंने कोरोना काल में मिले अकेलेपन में लिखा। तीन-चार साल लगे लिखने में। आजकल वे यात्रा संस्मरण लिख रहे हैं।
इसी बीच वहाँ बग़ल में ही स्टाल पर चाय भी पी गयी। दस रुपए की चाय पचीस रुपए में मिली। डेढ़ सौ गुनी महँगी। बाक़ी किसी और चीज़ के पूछे ही नहीं। वहीं एक दुकान पर हर किताब 99 रुपए की मिल रही थी। किताबें न हुई बाटा के जूते हो गए।
पहले चल रहे कार्यक्रम के ख़त्म होने के बाद 'सांपों की सभा' का विमोचन हुआ। विमोचनकर्ताओं ने किताब रखकर फ़ोटो खिंचाए। हमने माँग की कि विमोचन में अनूप मणि त्रिपाठी की जीवन संगिनी को भी शामिल किया जाए। पहले इस माँग को ख़ारिज करने का प्रयास किया गया लेकिन फिर उनको श्रोताओं के बीच से बुलाकर विमोचन में शामिल किया गया। विमोचन सम्पन्न हुआ।
विमोचन के बाद अनूप मणि ने अपनी तीन रचनाओं का पाठ किया। (रचना पाठ पोस्ट में संलग्न है)
इसके बाद वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव जी और वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति जी ने अपनी बात कही। कथाकर-सम्पादक अखिलेश जी को भी आना था वक्ता के रूप में लेकिन स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण आ नही पाए।
वीरेंद्र यादव जी ने कहा : 'आज के बदले हुए समय में अनूप मणि त्रिपाठी जिस तरह व्यंग्य के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं उसके लिए में उनको बधाई देता हूँ।'
वीरेंद्र जी ने आज के समय की जटिलताओं और कुटिलताओं की चर्चा करते हुए अनूप मणि त्रिपाठी के व्यंग्य लेख के सूत्र वाक्य -'हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से समाप्त करना है' पर विस्तार से चर्चा की और बताया :' आज के समय यही हो रहा है। आज सारी संस्थाएँ भी हैं, संविधान भी है, संसद भी है, न्यायपालिका भी है, मीडिया भी है, लेकिन संसद का भी स्वरूप बदला हुआ है, न्याय पालिका का स्वरूप भी बदला हुआ है और मीडिया तो बिलकुल बेपहचाना हो गया है। ऐसे बदले समय में एक व्यंग्यकार का दायित्व बड़ा होता है।
वीरेंद्र यादव जी ने अनूप मणि त्रिपाठी के व्यंग्य लेखों के शीर्षकों पर चर्चा करते हुए उनके लेखन पर अपनी राय रखी। उनकी बारीक नज़र, बेबाक़ी, प्रतिबद्धता की तारीख करते हुए उनको शुभकामनाएँ दीं। (वीरेंद्र जी का पूरा वक्तव्य पोस्ट में सुन सकते है)
शिवमूर्ति जी ने अपने सम्बोधन में अनूप मणि त्रिपाठी को बहुत बहुत बधाई देते हुए कहा -'सारी विधाओं में व्यंग्य लिखना सबसे जटिल है। आज के समय में व्यंग्य लिखना बड़ा हिम्मत का काम है। बिना 'जो भी होगा देखा जाएगा' के भाव के बिना ऐसा लेखन सम्भव नही है। ऐसे लेखन में लेखक के 'वन मैन आर्मी 'में बदल जाने का ख़तरा हमेशा रहता है। हम कामना करते हैं कि ऐसा अनूप मणि त्रिपाठी के साथ न हो। वे निरंतर लिखते रहें और लोग उनके साथ बने रहें। ( शिवमूर्ति जी का पूरा वक्तव्य पोस्ट में सुन सकते है)
इस तरह विमोचन संपन्न हुआ। लगभग आधे घंटे में। जब यह विमोचन चल रहा था तब मंच पर लोग अगले कार्यक्रम का बैनर लगा रहे थे। विमोचन के बाद वक्ता, लेखक मंच से नीचे उतर आए और फोटो सत्र शुरू हुआ। अपने-अपने हिसाब से फ़ोटो लेते हुए लोग यादें सहेजने लगे।
कार्यक्रम की समाप्ति पर Balendu Dwivedi से मुलाक़ात हुई। फ़ैज़ाबाद से अपने दफ़्तर से लौटते हुए पुस्तक मेले के कार्यक्रम में आए थे बालेंदु जी। अपने दो उपन्यास 'मदारीपुर-जंक्शन' और 'वाया फुसतगंज' के बाद आजकल एक नए उपन्यास पर काम चल रहा है उनका- आहिस्ते-आहिस्ते।
सबसे कई बार विदा लेकर कानपुर वापस चलने के लिए हमने उसी गाड़ी वाले को फ़ोन किया जो सबेरे हमको लेकर आया था। वह बीस मिनट की दूरी पर था। बीस मिनट हमने फिर किताबें देखीं। ड्राइवर के आने के बाद कानपुर के लिए चल दिए।

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