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Monday, April 04, 2022

परदेसियों से न अखियां लड़ाना



सूरज भाई भन्नाए हुए हैं। कुछ किरणें अभी तक धरती पर नहीं पहुंचीं हैं। सज-संवर रही हैं। इठलाती हुई एक-दूसरे से 'देख री, कैसी लग रही हूँ' पूछते हुए फिर-फिर तैयार हो रही हैं। दूसरी भी बिना उनकी तरफ देखे -'जम रही है, एकदम बिंदास' कहते हुए तैयार हो रही है।
सूरज भाई किरणों की लेट लतीफी से सुलग रहे हैं। धरती पर गर्मी बढ़ रही है। एक बच्ची किरण फूल तैयार है। मुंह फुलाये हुए कोने में बैठी है। सूरज भाई की लाड़ली है। वह गुस्सा है कि जिस फूल पर बैठने के लिए वह जाने वाली थी आज वह उसको एलॉट नहीं हुआ है। सूरज भाई उसको मना रहे हैं लेकिन वह मान नहीं रही। मनौना ले रही है।
असल में बच्ची किरण का फूल से 'वो' टाइप का हो गया है। कल दिन भर फूल ने हवा के सहारे हिल-हिलकर झूला झुलाया था। किरण का मन गुदगुदा गया। आज फिर वह उसी फूल पर जाना चाहती है। लेकिन सूरज भाई ने जब उसको कोई दूसरी जगह एलॉट की तो वह बमक गयी। मनमाफिक सीट न मिलने पर चुनाव न लड़ने की धमकी देते जनप्रतिनिधियों की तरह हरकतें कर रहीं। अब सूरज भाई कोई हाईकमान तो हैं नहीं जो बच्ची पर अनुशासन की कार्यवाही कर दें। बाप हैं बच्ची के। प्यार करते हैं अपनी लाड़ली को। प्यार मजबूत बनाता है तो मजबूर भी करता है।
सूरज भाई बच्ची किरण को समझाने में जुट गए। बताया ''जिस फूल पर जाने की तू बात कर रही उसको कल बंदरों ने नोच कर फेंक दिया। इसीलिए दूसरी जगह एलॉट की है तुझे।"
बच्ची किरण सूरज भाई की बात मान नहीं रही। उसका दिल 'टूट' टाइप का गया है। वह बिफर गयी-"आप झूठ बोल रहे हैं। वह वहीं होगा। कल विदा किया था उसने मुझे हिल-हिलकर। मुझे जाना है उसके पास। नहीं जाऊंगी तो वह मुझे बेवफा समझेगा। मैंने उससे प्रॉमिस किया था। मैं कोई नेता थोड़ी हूँ जो वादा करके मुकर जाऊं। मुझे जाना है उसके पास। वह मेरा इंतजार कर रहा होगा। "
सूरज भाई मजबूरन बच्ची किरण को साथ लेकर आये। वह जगह दिखाई जहां कल फूल खिला था। आज उसकी जगह एकाध पत्तियां थीं। फूल को बंदरों ने नोच डाला था। किरण दुखी हो गयी। कुछ देर गुमसुम खड़ी रही। फिर पास में खिली कली को गले प्यार करती हुई फूल के साथ बिताए समय को याद करती रही। रेडियो पर गाना बज रहा है -'परदेशियों से न अखियां मिलाना।'
किरण का मन किया रेडियो को उठाकर पटक दे। थूर दे बदमाश को जो ऐसा फालतू गाना बजा रहा है। परदेशी बता रहा है फूल को। बदनाम कर रहा उसको। लेकिन जगह छोड़कर जाने का मन नहीं हुआ उसका। कली को गले लगाए वहीं रही वह।
हमारे साथ चाय पीते किरण को कली के साथ खेलते देख सूरज भाई ने सुकून की सांस ली। सारा किस्सा सुनाया मुझे। हम लोग बातों में मशगूल थे इस बीच एक बंदर आया और चुपके से मेज पर रखा बिस्कुट का पैकेट उठा ले गया। एकदम सर्जिकल टाइप। सिर्फ पैकेट उठाया। चाय का कप हिला तक नहीं। हमने दौड़ाया तो आंखे दिखाने लगा।
एक हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए दूसरे हाथ से वह दूसरे बंदरो को भगाने में लगा था। बाकी के बंदर भी उस पर झपट पड़े। सब एक-दूसरे पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं की तरफ खौखियाने लगे। अंततः बन्दर के हाथ से बिस्कुट का पैकेट छूट गया। उस पर दूसरे मुस्टंडे बन्दर का कब्जा हो गया। वैसे ही जैसे एक पार्टी के एजेंडे को दूसरी शातिर पार्टी अपना बना लेती हैं।
कुछ देर बाद बंदरों के दोनों गुट चले गए। क्या पता दोनों गुट सारी घटना का वीडियो बनाकर अपने-अपने हिसाब से अपने लोगों में दिखाएं। अपने को दूसरे से बेहतर बताएं। उनके यहाँ भी चुनाव होते हों तो क्या पता इसी आधार पर वोट भी मांगे जाए । आखिर हमारे पूर्वज हैं वो। हमारी ही तरह तो हरकतें करेंगे।
बंदरों के ऊधम से कुचली हुई घास अपने जख्म पर सूरज की किरणों का मरहम लगा रही है। रिक्शे में बैठा हुआ रिक्शेवाला अखबार में चुनाव की खबरें पढ़ रहा है। उससे उतरकर बच्ची स्कूल जा रही है। सूरज भाई चाय खत्म करके वापस चमकने लगे।
सुबह हो गयी है।

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Sunday, October 24, 2021

उजाले की सरकार

 कमरे में बैठे हुए सूरज की किरणों को देख रहा हूँ। स्कूल के दिनों से पढ़ते आये हैं कि सूरज की सतह से चलकर पृथ्वी तक पहुंचने में आठ मिनट लगते हैं किरणों को। धरती पर पहुंचने के पहले लाखों किलोमीटर चलना पड़ता है किरणों को। रास्ते में भयंकर वाला अँधेरा पड़ता होगा। कहीं कोई इंतजाम नहीं रौशनी का। पता नहीं किसकी सरकार है सूरज और धरती के बीच जो करोड़ों वर्षों में दो चार ठो बिजली के पोल तक न गड़वा पाई अपने इलाके में।

बाहर अशोक का पेड़ नुकीला एकदम भाले की तरह खड़ा है। ऐसे लग रहा है बड़ा होकर आसमान के पेट में छेद करके ही मानेगा पट्ठा।
कुछ देर पहले पूरे लान में जहाँ कोहरे का कब्जा था वहां अब उजाले की सरकार है। मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री, राज्यपाल, सन्तरी,कलट्टर सब पदों पर सूरज के खानदान के लोगों का कब्जा है। किसी के पास कोई डिग्री नहीं है। किसी ने शपथग्रहण में समय बरबाद नहीं किया। किसी ने आने के पहले हल्ला नहीं मचाया कि मित्रों हम आते ही अँधेरे और कोहरे को उखाड़ फेकेंगे। किसी ने विज्ञापन में न समय खराब किया और न पैसे फूंके। बस आये और चुपचाप लग गए काम में। जहां कुछ देर पहले अँधेरा था वहां अब उजियारा है।
कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। सूरज की किरणें दरवज्जे से अंदर कमरे में दाखिल हो गयी हैं। वो एक दायरे में ही रुक गयी हैं। उजाला आगे अंदर घुस आया है और जगह-जगह फैलता जा रहा है। अंदर जहाँ भी अँधेरा था वहां अब प्रकाश दिखने लगा है। लगता है सूरज के निकलते ही अँधेरे ने कुछ देर तो उजियारे से कुश्ती की होगी। फिर अपनी औकात समझकर उजाले के सामने समर्पण कर दिया होगा।
सूरज और धरती आपस में आठ मिनट की दूरी पर हैं। दोनों में आपस में क्या कभी बात होती होगी? अगर हाँ तो कौन कम्पनी का फोन प्रयोग करते होंगे दोनों। हो सकता है कि ये जो किरणें हैं न वही माध्यम हों दोनों के आपस में बतियाने का। ये जो सूरज की किरणें बीच-बीच में मुस्कराती और खिलखिलाती सी दिखती हैं वो शायद दोनों की बातें सुनकर ही ऐसा करती हों।
क्या पता दोनों आपस में बतियाते हुए मजे लेते हों एक दूसरे से। सूरज भाई धरती से कहतें हों कि तुम काहे को चक्कर लगाती रहती हो मेरे। आ जाओ मेरे ही पास। बहुत जगह खाली पड़ी है इधर। रहो आराम से। तुम्हारे लिए रोज-रोज रौशनी भेजने का लफ़ड़ा कम होगा।
धरती शायद कहती हो -अरे रहन दो पास होने की बात। इत्ता तो सुलगते रहते हो। तुमसे तो दूरी ही भली। तुम्हारा तो सबसे कम टेंपरेचर ही 6000 डिग्री है। इत्ते में तो हमारे सबरे बाल-बच्चे, प्राणी, जानवर सुलगकर राख बन जाएंगे। सारी हरियाली जल जायेगी, नदियां गायब हो जाएंगी, समन्दर गोल। हमारा धरतीपन खत्म हो जायेगा। हमें न आना तुम्हारे पास।
धरती को सूरज चक्कर वाली बात लगता है ज्यादा ही लग गयी। इसीलिये वो अलग से बोली--'जहां तक रही चक्कर की बात तो जिस दिन हम चक्कर लगाना छोड़ देंगे तो ये जो तुम्हारा सौरमण्डल का टीम टामड़ा है न यह सब लड़खड़ा जाएगा। क्या पता फिर तुम भी कहीँ लड़खड़ाते हुए किसी दूसरे सौरमण्डल में शरण मांगो जाकर। ये हमारा तुम्हारे चारो तरफ घूमना जितना हमारे लिए जरूरी है उतना ही तुम्हारे लिए भी। सो इसका ज्यादा गुमान न किया करो कि हम तुम्हारे चक्कर लगाते हैं।'
सूरज भाई को लगा कि धरती कुछ ज्यादा ही गरम हो गयी सो मुस्कराते हुये बोले-'अरे मैं तो मजाक कर रहा था। तुम तो बुरा मान गयी। कितना अच्छी लग रही हो तुम स्वीट एन्ड क्यूट गोल-गोल घूमती चक्कर लगाती हुई।'
कोई फेसबुकिया होता तो इतने पर खुश होकर सूरज भाई को थॅंक्यू बोलकर चार ठो इस्माइली अलग से लगाता लेकिन चूंकि धरती का कोई फेसबुक खाता तो है नहीं सो उसने सूरज की 'चक्कर लगाती हुई' वाली बात पकड़ ली और फिर हड़काया-' मैं तो सिर्फ तुम्हारा चक्कर लगाती हूँ वह भी अपने बाल-बच्चों के लिए। रौशनी के लिए। लेकिन तुमको कौन जरुरत है जो तुम आकाश गंगा के चक्कर लगाते रहते हो। तुम्हारे पास तो खुद की रौशनी है। ज्यादा मुंह मती खुलवाओ मेरा अब सुबह-सुबह। हमको अपना काम करने दो।'
सूरज भाई चुपचाप मुस्कराते हुए एक बादल की ओट में चले गए। ऊपर से धरती को अपनी धुरी पर घुमते देखते रहे। दोनों अपने अपने काम में लग गए।
हम भी चलते हैं अपने काम पर। आप भी मस्त रहिये।

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Wednesday, October 06, 2021

जहां जिंदगी को पनपने का मौका नहीं वहीं ब्लैक होल है


सुबह उठे तो पता चला चीनी खत्म थी घर में। ’दउड़ा’ दिए गए लेने के लिए।बाहर निकले तो सूरज भाई पेड़ की आड़ में मुस्करा रहे थे। चमकते चेहरे से लग रहा था कि मजा आ रहा था उनको कि हमको सुबह-सुबह 'बिस्तर बदर ' कर दिया गया।
हमको लगा कि सूरज भाई कामकाजी हैं।फैशन ऊसन न करते होंगे। लेकिन आज देखा तो किरणों का रंग -बिरंगा मुकुट धारण किये हैं माथे पर। पीला और लाल रंग का गोल मुकुट।
इससे लगा कि लोग चाहे जितना सर्वहारा की सेवा करें लेकिन राजाओं की तरह मुकुट धारण करने की इच्छा से मुक्त नहीं हो पाते। लोकतन्त्र में आम जनता की सेवा के लिए दिन रात लगे रहने वाले जननायक भी अपनी बिरादरी के किसी मंच पर हाथ में तलवार लिए सर पर ताज धारण किये बरामद होते हैं।
सूरज भाई से आज ब्लैक होल के बारे में बतियाते रहे। हमने पूछा -"भाईजी ये ब्लैक होल क्या होते हैं आपकी बिरादरी में?
कैसे बनते हैं? तुमसे मुलाक़ात होती है क्या उनकी कभी?"
सूरज भाई मुस्कराये और बोले- "ब्लैक होल हमरी बिरादरी के वे लोग होते हैं जो रौशनी हीन हो जाते हैं। सिर्फ अँधेरा होता है इनके पास।आसपास की जो भी रोशनी दिखती है इनको उसको पिंडारियों की तरह लूट लेते हैं। पूरे के पूरे सूरज तक को लील जाते हैं। डकार तक नहीं लेते। नेता जैसे परियोजनाओं का पैसा हिल्ले लगाते हैं ऐसे ब्लैक होल लोग सूरज पर सूरज निगलते जाते हैं और बेशर्मी से कहते हैं- ये दिल मांगे मोर।"
लेकिन सूरज भाई सिर्फ अँधेरे में कैसा लगता होगा ब्लैक होल को ?
बिना रौशनी के जिंदगी कैसी होती होगी उनके यहाँ? -हमने ऐसे ही पूछ लिया।
सूरज भाई इस पर गंभीर टाइप हो गए और बोले-"इसकी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।हमने कोई ब्लैक होल देखा तो नहीं सिर्फ बुजुर्गों से सुनते आये हैं।लेकिन यह समझ लो कि जब कोई सिर्फ लेना जानता है देना नहीं तो वह ब्लैकहोल हो जाता है।जहां जिंदगी को पनपने का मौका नहीं वहीं ब्लैक होल है।आम सूरज और ब्लैक होल में सिर्फ जिंदगी का फर्क होता है।"
सूरज भाई को सीरियस टाइप देखकर अनगिनत किरणें उनके आसपास इकट्ठा होकर उनको गुदगुदाने लगीं। एक बच्ची किरण ने तो उनको उलाहना सा दिया - "कहाँ सुबह-सुबह आप भी पाखण्डी बाबाओं की तरह प्रवचन करने लगे? मैं इत्ता अच्छा एक सुगन्धित फूल पर बैठी थी।आपको प्रवचन मोड में देखा तो मूड उखड़ गया।आपने मेरा मूड आफ कर दिया दादा। हाउ बैड। चलो अब मुस्कराओ।" यह कहते हुए उसने सूरज भाई के गुदगुदी कर दी। सूरज भाई मुस्कराने लगे। वह किरण भागकर फिर फूल पर पहुंच गयी और उसके ऊपर बैठकर सूरज भाई को हाथ हिलाते हुए अंगूठा दिखाया किया। सूरज भाई ने भी थम्पस अप वाला अंगूठा दिखाया तो उस बच्ची किरण ने सूरज भाई को उड़न पुच्ची भेजी। सूरज भाई शरमाते हुए हमारी तरफ देखने लगे।
सूरज भाई फिर चाय पीते हुए कहने लगे- "तुमने आज ब्लैक होल की बात की वो तो मैंने देखा नहीं। केवल सुना है।लेकिन यह समझ लो कि ब्लैक होल ऐसा ही होगा जैसी वह दुनिया होगी जहां लड़कियां नहीं होंगी।सिर्फ और सिर्फ लड़के होंगे। दुनिया को ब्लैक होल बनने से बचाना है तो लड़कियों को बचाये रखना होगा।"
"सूरज भाई आज तो आप ऐसे बतिया रहे हैं मनो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ कोई भाषण देने जा रहे हैं।" हमारी यह बात सुनकर सूरज भाई मुस्कराये और अपनी गोद में धमाचौकड़ी मचाती किरणों को दुलराने लगे।
सुबह हो गयी।

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Saturday, July 10, 2021

अंधकार निरोधक अध्यादेश

 

कल सुबह टहलने निकले। बहुत दिनों के बाद। सड़क पर चलता पहला इंसान ऊंघता हुआ दिखा। बेमन से टहलता। चेहरे पर उबासी लादे चलता। फुटपाथ की ठोकर से सहम कर चौकन्ना हो गया। ठोकरें हमको चौकन्ना बनाती हैं, सावधान करती हैं।

दो दरबानों में से एक की ड्यूटी ख़त्म हो गयी थी। वह अपनी वर्दी बदलकर जाने की तैयारी कर चुका था। अपने रिलीवर के इंतजार में था। घर जाने की बेताबी चेहरे पर हावी थी।
एक महिला दूसरे के घर खिले फूल उचककर तोड़ रही थी। जल्दी-जल्दी फूल तोड़कर झोले में डालती जा रही थी। हड़बड़ी में एकाध फूल नीचे गिर गए। चोट लगी होगी नीचे गिरे फूल को। लेकिन उससे बेखबर महिला फूल तोड़ती रही। अपनी पहुंच तक के सारे फूल तोड़कर महिला आगे बढ़ गयी। तेजी से।
उसी जगह एक बच्चा आसपास गिरे आम बीन रहा था। एक पालीथिन में। छोटे-टपके आम। दो-तीन किलो आम होंगे। पालीथिन में इकट्ठा आम नीचे गिरने पर टूट-फूट गए थे। किसी का मुंह घायल, किसी का पेट फटा, किसी की टांग टूटी, सिर्फ गुठली सलामत। सारे आम पालीथिन में किसी शरणार्थी कैम्प में भीड़ की तरह जमा थे।घर से उखड़े-उजड़े के यही हाल होते हैं।
सड़क पर टहलते लोग दिखे। कोई तेजी से, कोई आहिस्ते-आहिस्ते। कोई अकेले, कुछ लोग साथ में। एक बच्ची अपने घरवालों के साथ जाते हुए कोरोना से बचाव के सबक याद कर रही थी। बोली- 'मास्क, दूरी, सफाई-कोरोना से बचाव की पक्की दवाई'। उसके चेहरे पर तेजी से चलने के कारण पसीना सैनिटाइजर की तरह चमक रहा था। हमने उससे पूछा -' लेकिन तुम तो मास्क लगाये नहीं हो।'
'टहलते हुए मास्क लगाना जरूरी नहीं'-कहते हुए बच्ची आगे चली गयी।
मैदान पर तमाम लोग अपने-अपने हिसाब से मशगूल थे। दो बच्चियां बैडमिंटन खेल रहीं थीं। कुछ महिलाएं जमीन पर बैठी अनुलोम-विलोम कर रहीं थीं। कुछ लोग कसरत कर रहे थे। उठक-बैठक करता हुआ आदमी इतनी तेजी से बैठ रहा था मानो जमीन को जबरियन नीचे दबा रहा हो। जमीन दब नहीं रही थी तो गुस्से में और दबा रहा था।
कुछ लोग समूह में योग कर रहे थे। एक आदमी निर्देश दे रहा था, बाकी उसका अनुसरण कर रहे थे। जब हमने देखा तो लोग एक पैर पैर खड़े , दूसरे को ऊपर उठाये तथा हाथ दोनों ओर पंखे की तरह फैलाये हुए थे। एक पैर पर जहाज मुद्रा में खड़े थे लोग। कुछ लोग लड़खड़ाकर दोनों पैरों पर हो गए। फिर एक पैर पर खड़े होकर जहाज बनने की कोशिश करने लगे।
बात यहां कसरत तक ही सीमित थी। सही में जहाज बनते तो तेल के बढ़ते दाम के कारण साइकिल बनने की कोशिश में जुट जाते। जहाज मुद्रा की जगह साइकिल मुद्रा अपनाते।
हम सब इसी तरह जहाज बनते हुये सन्तुलन बनाने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाते रहते हैं। लडखडाते हैं, सम्भलते हैं, स्थिर हो जाते हैं। जरूरत के हिसाब से स्टैंड, आसन बदलते हैं।
एक बच्चा पालीथिन में आटा लिए जगह-जगह डालता जा रहा था। जहाँ छेद दिखा , चीटिंयों का सुराग मिला, वहां आटा डाल दिया। रामनगर से आता है। घर से निकलता है आटा लेकर। जगह-जगह चींटियों के लिए आटा डालता चलता है। चीटियां कभी उसको न धन्यवाद देती हैं, न कोई वोट। उसको संतोष मिलता है, इसलिये वह यह काम करता है। सब कुछ अपनी ही कामना के लिए प्रिय होता है- 'आत्मनस्तु वै कामाय सर्वंम प्रियम भवति।'
आसमान में सूरज भाई अंधकार निरोधक अध्यादेश की तरह चमक रहे थे। कोई भी अंधेरे का टुकड़ा दिखे, फौरन उसका संहार करो। सूरज भाई की शक्ल देखते ही अंधकार अपने कुनबे समेत फूट लेता होगा।
मन किया सूरज भाई से पूछें -'ठीक है भाई आप चमको लेकिन अंधकार ने कौन तुम्हारी भैंस खोली है जो तुम उसको देखते ही कत्ल कर दो। आखिर उसका भी जीने का हक है।'
लेकिन फिर पूछे नहीं। क्या पता सूरज भाई बुरा मान जाएं। हमको अपने दोस्ती के पद से इस्तीफा देने को कहे और नए दोस्त अपने मित्रमंडल में शामिल कर लें। कोई भरोसा नहीं आजकल सूरज भाई का। बड़े बमक रहे हैं आजकल गर्मी में। गुस्से में बमकते साथी को कोई सलाह नहीं देनी चाहिए। वैसे भी सूरज भाई आसमान के राजा हैं। महाभारत में कहा गया है- ' राजाओं को बिना मांगे सलाह नहीं देना चाहिए।'

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Tuesday, March 23, 2021

जो डरता है वही डराता है

 कल बढिया चाय के बाद मूड झक्क होने की बात लिखी। आज सुबह उठकर चाय बनाई। रोज की तरह। फेसबुक पर कल की पोस्ट दिखी। 'लोटपोट' पर उस स्टेटस के बगल में कप धरा। खींच लिया फोटो। जिनके कमेंट और फोटो दिख रहे हैं वे साथी अपने हिस्से की चाय ग्रहण करें। बाकी इंतजार करें। समझते हुए कि आप कतार में हैं।

अंदर बैठकर चाय पी रहे थे। चिड़िया चिंचियाते हुए बताईं कि सूरज भाई आ गये हैं। बाहर बुला रहे हैं। हम आ गए। सूरज भाई ढेर सारी रोशनी, विटामिन डी, चमक, जगमग उजाला हम पर उड़ेल दिए। हम सबको हथियाते हुए बोले-'इसकी क्या जरूरत थी।'
सूरज भाई मुस्कराते हुए बोले -'ऐश कर लो भाई जी कुछ दिन। अभी मुफ्त में मिल रहा है सब। क्या पता कल को सब कुछ बाजार में आ जाये। पाउच में बिकने लगे धूप। बोतल में आने लगे रोशनी। विटामिन डी तो आने ही लगी है गोली में।'
हम बोले-'बता रहे हो कि डरा रहे हो?'
सूरज भाई बोले-'हम काहे को डराएंगे। डराता वही है जो खुद डरता है। डर तो तुम लोग खुद पैदा किये अपने लिए। आपस में डरते-डराते हो। अपनी दुनिया डरावनी बनाते हो।'
सूरज भाई और कुछ कहते कि उनके साथ आई किरण ने उनको टोंक दिया। क्या दादा आप भी सुबह-सुबह शुरू हो गए। चाय खत्म हो गई और आप अभी तक सिप मार रहे हो।
सूरज भाई ने मुस्कराते हुए गियर बदला। बोले-'चाय वाकई बढिया बनाने लगे हो।'
हम बोले-'रेसिपी न पूछोगे?'
वो बोले -'हम काहे को पूंछे। जब पीना होगा चले आएंगे। पियेंगे, चले जायेंगे।'
सूरज भाई कप धरकर निकल लिए। हम भी निकलते। आप भी मजे करो जी। याद करते हुए उमाकान्त मालवीय जी की कविता पंक्तियां:
एक चाय की चुस्की
एक कहकहा
अपना तो कुल
इतना सामान ही रहा।

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Thursday, March 26, 2020

मुसीबत का मुकाबला डटकर करो

 


पार्क में पेड़ की पत्तियों ने सोशल डिसटैनसिंग को मानने से साफ इंकार कर दिया है। वे नए खिले फूलों के साथ सटकर मस्ती में झूम रहीं हैं। झूले अलबत्ता दूरी बनाए हुए हैं। जहां के तहाँ 'थम' गये हैं। उनको डर है कि जरा कहीं नजदीक दिखे तो कोई तुड़ाई कर देगा।

कमरे में खिड़की खोलते ही अनगिनत किरणें बिना मास्क खिलखिलाते हुए बिस्तर, कुर्सी, फर्श पर पसर गयीं। हम उनको दूरी बनाकर रहने को कहते हैं कि भाई दूरी बनाकर रखो। कोरोना से डरो। वे और पास आकर चमकने लगती हैं।
हम सूरज भाई से कहते हैं अरे भाई समझाओ अपनी इन बच्चियों को। कोरोना से बचकर रहना है। दूरी बनाकर रहना है।
सूरज भाई हंसते हुए कहते हैं -'कोरोना इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये जन्मजन्मांतर ऐसे ही खिलखिलाते रहेंगी। कोरोना इनसे बचने के लिए देश-देश मारा-मारा घूम रहा है। इनकी संगत में रहो तुम भी बचे रहोगे।'
हम क्या बोलें सूरज भाई ऊपर आसमान में चमकते हुए ड्यूटी बजा रहे हैं। पूरे आसमान में छाए हुए हैं । उनके यहां न लाकडाउन न वर्क फ्रॉम होम। जलवा है सूरज भाई का। हो भी क्यों न ! लाखों-करोड़ों डिग्री टेम्परेचर रखते हैं सूरज भाई। पूरी धरती उनके सामने ऐसी जैसे स्विमिंग पूल में कोई कम्पट। उनके लिए क्या कोरोना, क्या फोरोना।
हम सूरज भाई के साथ सेल्फी लेने की सोचे कि जलवेदार हस्ती के साथ फोटो खिंचा कर अपलोड कर दें। डरेगा कोरोना। लेकिन सूरज भाई ने टोंक दिया कि ऐसे भूत बनके सेल्फी न लो। जरा नहा-धोकर राजा बाबू बनकर आओ तब फोटो खिंचवाओ। उजड़े-उखड़े मुंह फोटो खिंचायोगे तो लोग समझेंगे कि कोरोना के डर से कवि हो गए हो।
हम बोले ठीक। आते अभी नहाकर। सूरज भाई बोले -'हम भी आते जरा रोशनी, गर्मी और उजाले की सप्लाई देखकर।'
ऊपर उठते हुए सूरज भाई कह रहे थे -'चिंता न करो। मुसीबत का मुकाबला डटकर करो। सफाई से रहो, दूरी बनाओ। मस्त रहो। दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।'

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Friday, February 14, 2020

सूरज भाई का फोन इंगेज्ड

 बिस्तर पर अलसाये से लेटे हुये हैं। खिड़की से देख रहे हैं कि #सूरज भाई अभी तक पधारे नहीं हैं। फ़ोन इंगेज्ड जा रहा है। अब पलट के फोन किया #सूरज भाई ने। बोले जरा आराम से आयेंगे आज। ये किरणें, उजाला, रश्मियां , प्रकाश , रोशनी सब कह रहे हैं -"पापा जरा सबको 'वैलेंटाइन डे ' विश कर दें तब चलें। "

सूरज भाई बता रहे हैं -- "यहां सब तरफ़ रोशनी के पटाखे छूट रहे हैं। तारे एक दूसरे को मुस्कराते हुये देख रहे हैं। आकाश गंगायें इठला रहीं हैं। एक ब्लैक होल ने ऊर्जा और प्रकाश को धृतराष्ट्र की तरह जकड़ लिया है और फ़ुल बेशर्मी उनको "हैप्पी वेलेंटाइन डे" बोल रहे हैं। ऊर्जा को ब्लैक होल की जकड़ में कसमसाते देख आकाशगंगा ने एक बड़ा तारा फ़ेंककर ब्लैकहोल को मार दिया। उसके कई, अनगिन टुकड़े हो गये। ब्लैक होल का पांखड खंड-खंड हो गया है। अनगिनत रोशनी मुक्त होकर चहकने लगी है। क्या तो सीन है भाई! काश हम तुमको इसका वीडियो दिखा पाते।"
हमें कुछ न देखना सूरज भाई जल्दी आओ। चाय ठंढी हो रही है। देर करोगे तो फ़िर दुबारा बनवानी पड़ेगी। -हमने #सूरज भाई को बुलाकर फ़ोन रख दिया। क्या फ़ायदा पैसा फ़ूंकने से फ़ालतू। आयेंगे तब आराम से बतियायेंगे।

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Saturday, January 11, 2020

धूप की संगत की चाहना

 


सुबह दफ्तर जाते हुए लोगों को सड़क पर आरामफर्मा देखता हूँ तो मन करता है वहीं ठहर जाऊं। घंटा आध घण्टा धूप की संगत में बिताऊं। किलो दो किलो धूप पचा जाऊं।
लेकिन मनचाहा हमेशा हो कहाँ पाता है। सुबह से शाम दिन तमाम हो जाता है। शाम को लगता है कि दिन कल फिर निकलेगा। सूरज फिर निकलेगा। निकलता भी है लेकिन मुलाकात नहीं हो पाती। पहले किसी न किसी बहाने सामने आ जाते थे। मुस्कराते थे। बतियाते थे। चाय-चुस्कियाते थे। टिपियाते हुए तिड़ी-बिड़ी हो जाते थे।
शायद आजकल सूरज भाई को भी व्यस्त होने का शौक चर्राया हो। लेकिन व्यस्त होने का काम तो निठल्लों का है। उनको व्यस्त होने की क्या जरूरत। अनगिनत काम हैं उनके पास। यह भी हो सकता है कि दिल्ली निकल गए हों पुस्तक मेले में किसी विमोचन में। किताब सीने पर सटाकर फोटो खिंचाने का मन किया हो उनका भी।
हो तो यह भी सकता है कि सूरज भाई के मोहल्ले में भी चुनाव का डंका बजा हो और सूरज भाई भी इस बार चुनाव लड़ने का मूड बना रहे हों।
अच्छा मान लीजिये सूरज भाई के मोहल्ले में चुनाव होने को हों और उनको भाषण देना हो किसी चुनाव सभा मे तो क्या बोलेंगे वे? कल्पना कीजिये। क्या वे अपने यहाँ ताजी हीलियम की सप्लाई की बात करेंगे या फिर बहुत उजले जगह में काम भर के अंधेरे की। हो तो यह भी सकता है कि वे अपने यहां भ्रष्टाचार के खात्मे पर बतियाये। कहे हमारे केंद्र पर लाखों डिग्री का तापमान सतह तक पहुंचते हुए कुछ हजार डिग्री ही रह जाता है। यह अंतर कम करके रहेगें हम।
अभी हम सूरज भाई के भाषण का ड्राफ्ट तैयार कर ही रहे थे कि उन्होंने हल्ला मचाकर हमको बाहर बुला लिया।झल्लाते हुए बोले -'तुम लफ्फाजी कर रहे हो बिस्तर पर बैठे हुए, हम यहाँ सुबह से तुम्हारे यहां के कोहरे के झाड़-झंखाड़ उखाड़ रहे हैं।'
हम सूरज भाई की तारीफ करके अंदर आ गए। काम में लगे हुए इंसान को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। क्या पता वह अपना काम निपटाने के पहले डिस्टर्ब करने वाले को ही निपटा दे।
अंदर आने के पहले हमने सूरज भाई की एक फोटो खींच ली थी। तारीफ सुनकर वे झल्लाने की जगह मुस्कराने लगे थे। तारीफ इंसान को मुलायम बना देती है।
है कि नहीं?

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Monday, January 06, 2020

मोरा मन दर्पण कहलाये

 


सबेरे टहलने निकले। सामने ही रामलीला मैदान है। वर्षो से यहां रामलीला होती है। रामलीला के बाद कवि सम्मेलन और मुशायरा। आसपास के कई जिलों के लोग यहां मेला देखने आते हैं। अनगिनत किस्से जुड़े हैं उस मैदान से।

रामलीला मैदान के एक हिस्से में अम्बेडकर पार्क है। पार्क की बाउंड्री कई जगह से हिल गयी है। कहीं किसी ने मांगलिक कार्यक्रम में टेंट बांधा तो हिल गयी, किसी स्मैकिए ने लोहा चुराने की मंशा से धीरे-धीरे हिलाकर कमजोर कर दिया है। एक जगह तो कई मीटर तक दीवार हिल रही है। एक धक्का और , बस गयी दीवार। मरम्मत करानी होगी। नियमित टूटफूट की ज्यादा नियमित मरम्मत होती रहनी चाहिए।
सामने सूरज भाई पूरी शिद्दत से उगे हुए हैं। खूबसूरत लग रहे। चेहरे पर कोहरे और सर्दी को पछाड़ देने का विजय गर्व। मुस्कराते हुए गुडमार्निंग करते हुए बोले -'रोज निकला करो।'
रामलीला मंच पर कुछ बच्चे सिगरेट पी रहे हैं। क्या पता उनमें से कोई उस बिरादरी का हो जो बाउंड्री को हिलाकर तोड़ता हो। सुबह का समय , नागरिक बोध चैतन्य हुआ। छह सात बच्चे थे। हमने उनको टोंका -' यहां सिगरेट क्यों पी रहे?'
एकाध बच्चे तो चुपचाप उठकर चल दिये। एक ने सवाल किया -'यहां न पिएं तो कहां पियें? घर में तो पी नहीं सकते।'
हमने कहा -' तो जरूरी है सिगरेट पीना?'
बच्चा बोला -'तलब लग रही तो क्या करें? 22 साल के हो गए। हमारी मर्जी हम जो पियें। अपना पैसा कोई तुमसे थोड़ी मांग रहे।'
उनके ठोस तर्क से हमने डरते हुये उनसे वहां से चले जाने को कहा। बच्चे चले तो गए लेकिन उनमें से एक ने धमकाते हुए कहा -'देखते हैं अभी तुमको आकर।'

हमारे डर का कारण बच्चों की सिगरेट की तलब नहीं थी। हम यह सोचकर डर गए कि कल को इसी तर्ज पर कोई आकर हमको पीट जाएगा। पूछने पर कहेगा -'हमको तलब लगी है पीटने की इसलिए पीट रहे।' ये तलब का मामला बहुत भीषण है।
सामने सूरज भाई मुस्कराते हुए सब देख रहे हैं। देखते तो वो सब रहते हैं । कहीं किसी ने किसी को उड़ा दिया, कहीं किसी ने किसी को बचा लिया। कहीं कोई घुस गया, मारपीट करी और निकल गया। कोई घायल, कोई कराह रहा, कोई बयान दे रहा। सब चुपचाप देखते रहते हैं। लक्खों सालों से। लेकिन कुछ बोलते नहीं। भले आदमी की तरह अपने काम से काम।
सामने की सड़क से लोग फैक्ट्री आ रहे हैं। दूर सड़क पर सूरज की किरणें सड़क पर चमक रही हैं। मानो सड़क कोई शीशा हो जिसमें सूरज की किरणें अपना मुखड़ा देखकर चमकने के लिए निकल रहीं हों। काम पर निकलना है तो जरा बन-ठन कर निकलें। क्या पता गाना भी गाती जा रहीं हों -'मोरा मन दर्पण कहलाये।'
मंदिर के पास पुलिस जीप खड़ी है। कुछ सिपाही भी। दो महिला सिपाही भी हैं। सात बजे से आठ नौ तक रहते हैं यहां ये लोग। हमने रामलीला मंच की तरफ देखने की बात कही तो भाई जी ने कहा -'देख लेंगे जी उधर भी देख लेंगे। सब तरफ देखते हैं हम।' कई जगह के नाम गिना डाले उन्होंने।
पार्क के अलग-अलग कोनो पर अलग-अलग अधिकारियों के नामपट्ट लगे हैं। किसी के नाम कोई पेड़ लगाने का , किसी के नाम पार्क शुरू कराने में, किसी ने द्वार बनवाया। उनमें से कोई अब यहाँ नहीं है। कोई नौकरी से रिटायर हो गया, कोई दुनिया से। लेकिन उनके नाम चल रहे हैं। वह भी तब तक जब तक कोई बोर्ड नहीं बदलता। क्या पता कल को बोर्ड बदलकर बहुत पहले हुये काम का फिर से उदघाटन कर दिया जाए।
सूरज भाई को फिर से नमस्ते किया तो बोले -'जाओ अब काम-धाम करो।' कहते हुए वो और ऊंचे उचककर चमकने लगे।

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Friday, October 18, 2019

सूरज की मिस्ड कॉल पर ब्लॉगर साथी राजीव तनेजा के विचार।

पुराने ब्लॉगर साथी अनूप शुक्ल जी की किताबों को जब अमेज़न पर सर्च किया तो रुझान पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित उनकी किताब "सूरज की मिस्ड कॉल" का नाम कुछ अलग सा,आकर्षक लगा तो सोचा कि सबसे पहले इसी किताब को मंगवाया जाए और पढ़ा जाए।

कमाल का लिखते हैं अनूप शुक्ल जी। छोटी..छोटी, बारीक..बारीक बातों पर भी उनकी पैनी नज़र क्या कमाल दिखाती है, यह इस किताब को पढ़कर पता चलता है। जिन बातों की तरफ कभी हमने ध्यान ही नहीं दिया। ना ही कभी उनके बारे में सोचा कि उन पर भी कभी कुछ लिखा जा सकता है, महीन..महीन बातों पर भी उनकी लेखनी अपना जादू दिखाने से बाज़ नहीं आती।

इस किताब के ज़रिए उन्होंने सूरज ,उसकी किरणों, पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों इत्यादि हर चीज़ को एक तरह से जीवित और हमसे बात करने वाला बना दिया है। पढ़ते वक्त कई बार हैरानी हुई कि वह इस तरह का कैसे सोच लेते हैं तो कई बार बरबस ही चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और कई बार कुछ गहरी बातों को ढंग से समझने के लिए उन्हें फिर से पढ़ना भी पड़ा।

कुल 144 पृष्ठों की इस किताब का मूल्य 150/- रुपए मात्र है जो कि किताब की उम्दा क्वालिटी को देखते हुए बिल्कुल भी ज़्यादा नहीं है। हाँ!..कुछ जगहों पर मात्राओं और नुक्तों की ग़लतियाँ थोड़ा अखरती हैं। एक आध जगह ये भी लगा कि बात को जैसे अधूरा छोड़ दिया गया है। खैर..इन छोटी-छोटी कमियों को आने वाली पुस्तकों और इस पुस्तक के आगामी संस्करण में सुधारा जा सकता है।
नए लेखक अनूप शुक्ल जी से काफी कुछ सीख सकते हैं। उम्दा लेखन के लिए अनूप शुक्ल जी को बहुत बहुत
बधाई
 

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Saturday, September 14, 2019

हिन्दी दिवस के कुछ अनुभवों से


१. सितम्बर का महीना देश में हिन्दी का महीना होता है। हिन्दी नहीं, राजभाषा का। देश भर में राजभाषा माह, पखवाड़ा, सप्ताह, दिवस मनाया जाता है। श्रद्धा और औकात के हिसाब से। क्या पता कल को राजभाषा घंटा, मिनट या फ़िर सेकेंड भी मनाया जाने लगे।
२. एक दक्षिण भारतीय ने बताया कि -पहले उनको लगता था हिन्दी कविता में हर पांचवी लाइन के बाद वाह-वाह बोला जाता है।
३. एक कवि ने अपनी किसी कविता में ’कड़ी’ शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने उसको ’कढ़ी’ समझकर ग्रहण किया और कल्पना करते रहे कि क्या स्वादिष्ट कल्पना है।
४.आज अगर नेता, पुलिस पर कविता लिखना बैंन हो जाये तो आधे हास्य कवि या तो बेरोजगार हो जायें।
५.आपातकाल में तमाम लोगों ने इस तरह की कवितायें लिखीं जिनके व्यापारियों के खातों की तरह दो मतलब होते थे। एक जो सारी जनता समझती थी दूसरा वह जिसे सिर्फ़ वे समझते थे। अपना मतलब उन्होंने दुनिया भर को आपातकाल के बाद बताया और अपने लिये क्रांतिकारी कवि का तमगा गढ़कर खुदै ग्रहण कल्लिया।
६. एक कवि सम्मेलन में वीर रस के कुछ कवियों ने पाकिस्तान कोी गरियाया। पाकिस्तान को गरियाते हुये एक ने तो इत्ती जोर से कविता पढ़ी कि मुझे लगा कि अगर पाकिस्तान कहीं उसको सुन लेता तो एकाध फ़ुट अफ़गानिस्तान की तरफ़ सरक जाता।
७. पाकिस्तान में भी हिन्दुस्तान के विरोध में वीर रस की कवितायें लिखीं और चिल्लाई जाती होंगी। सोचता हूं कि क्या ही अच्छा हो कि दोनों देश की वीर रस की कविताओं की ऊर्जा को मिलाकर अगर कोई टरबाइन चल सकता तो इत्ती बिजली बनती कि अमेरिका चौंधिया जाता। ऐसा हो सकता है। दोनों देशों के वीर रस के कवि जिस माइक से कविता पाठ करें उसके आवाज बक्से के आगे टरबाइन फ़िट कर दी जाये। इधर कविता शुरू हो उधर टरबाइन के ब्लेड घर्र-घर्र करके चलने लगें और दनादन बिजली उत्पादन होने लगे। बिजली के तारों पर सूखते कपड़े जलकर खाक हो जायें। हर तरफ़ रोशनी से लोगों की आंखें चमक जायें।
८.हिन्दी लिख-पढ़ लेने वाले लोग हिन्दी दिवस के मौके पर पंडितजी टाइप हो जाते हैं। उनके हिन्दी मंत्र पढ़े बिना किसी कोई फ़ाइल स्वाहा नहीं होती। काम ठहर जाता है। हिन्दी का जुलूस निकल जाने का इंतजार करती हैं फ़ाइलें। हिन्दी सप्ताह बीते तब वे आगे बढ़ें।
९. हिन्दी दिवस के दिन साहब लोग हिन्दी का ककहरा जानने वालों को बुलाकर पूछते हैं- पांडे जी अप्रूव्ड को हिन्दी में क्या लिखते हैं? स्वीकृत या अनुमोदित? ’स’ कौन सा ’पूरा या आधा’ , ’पेट कटा वाला’ या सरौता वाला?
१०. काव्य प्रतियोगिताओं में लोग हिन्दी का गुणगान करने लगते हैं। छाती भी पीटते हैं। हिन्दी को माता बताते हैं। एक प्रतियोगिता में दस में से आठ कवियों ने हिन्दी को मां बताया। हमें लगा कि इत्ते बच्चे पैदा किये इसी लिये तो नही दुर्दशा है हिन्दी की?
११. कवि आमतौर पर विचारधारा से मुक्ति पाकर ही मंच तक पहुंचता है। किसी विचारधारा से बंधकर रहने से गति कम हो जाती है। मंच पर पहुंचा कवि हर तरह की विचारधारा जेब में रखता है। जैसा श्रोता और इनाम बांटने वाला होता है वैसी विचारधारा पेश कर देता है।
१२. कोई-कोई कवि जब देखता है कि श्रोताओं का मन उससे उचट गया तो वो चुटकुले सुनाने लगता है। वैसे आजकल के ज्यादातर कवि अधिकतर तो चुटकुले ही सुनाते हैं। बीच-बीच में कविता ठेल देते हैं। श्रोता चुटकुला समझकर ताली बजा देते हैं तो अगला समझता है- कविता जम गयी।
१३. विदेश घूमकर आये कवि का कवितापाठ थोड़ा लम्बा हो जाता है। वो कविता के पहले, बीच में, किनारे, दायें, बायें अपने विदेश में कविता पाठ के किस्से सुनाना नहीं भूलता। सौ लोगों के खचाखच भरे हाल में काव्यपाठ के संस्मरण सालों सुनाता है। फ़िर मुंह बाये , जम्हुआये श्रोताओं की गफ़लत का फ़ायदा उठाकर अपनी सालों पुरानी कविता को -अभी ताजी, खास इस मौके पर लिखी कविता बताकर झिला देता है।
१४. कोई-कोई कवि किसी बड़े कवि के नाम का रुतबा दिखाता है। दद्दा ने कहा था- कि बेटा तुम और कुछ भी न लिखो तब भी तुम्हारा नाम अमर कवियों में लिखा जायेगा। कुछ कवि अपने दद्दाओं की बात इत्ती सच्ची मानते हैं कि उसके बाद कविता लिखना बंद कर देते हैं। जैसे आखिरी प्रमोशन पाते ही अफ़सर अपनी कलम तोड़ देते हैं।
१५. बिहार से रीसेंटली अभी एक मेरे फ्रेंड के फादर-इन-ला आये हुए थे, बताने लगे - 'एजुकेसन का कंडीसन भर्स से एकदम भर्स्ट हो गया है. पटना इनुभस्टी में सेसनै बिहाइंड चल रहा है टू टू थ्री ईयर्स. कम्प्लीट सिस्टमे आउट-आफ-आर्डर है. मिनिस्टर लोग का फेमिली तो आउट-आफ-स्टेटे स्टडी करता है. लेकिन पब्लिक रन कर रहा है इंगलिश स्कूल के पीछे. रूरल एरिया में भी ट्रैभेल कीजिये, देखियेगा इंगलिस स्कूल का इनाउगुरेसन कोई पोलिटिकल लीडर कर रहा है सीजर से रिबन कट करके.किसी को स्टेट का इंफ्रास्ट्रक्चरवा का भरी नहीं, आलमोस्ट निल 🙂 ( १५ नम्बर रिटेन by Indra Awasthi)

Thursday, April 04, 2019

परदेसियों से न अखियां लड़ाना

 

सूरज भाई भन्नाए हुए हैं। कुछ किरणें अभी तक धरती पर नहीं पहुंचीं हैं। सज-संवर रही हैं। इठलाती हुई एक-दूसरे से 'देख री, कैसी लग रही हूँ' पूछते हुए फिर-फिर तैयार हो रही हैं। दूसरी भी बिना उनकी तरफ देखे -'जम रही है, एकदम बिंदास' कहते हुए तैयार हो रही है।
सूरज भाई किरणों की लेट लतीफी से सुलग रहे हैं। धरती पर गर्मी बढ़ रही है। एक बच्ची किरण फूल तैयार है। मुंह फुलाये हुए कोने में बैठी है। सूरज भाई की लाड़ली है। वह गुस्सा है कि जिस फूल पर बैठने के लिए वह जाने वाली थी आज वह उसको एलॉट नहीं हुआ है। सूरज भाई उसको मना रहे हैं लेकिन वह मान नहीं रही। मनौना ले रही है।
असल में बच्ची किरण का फूल से 'वो' टाइप का हो गया है। कल दिन भर फूल ने हवा के सहारे हिल-हिलकर झूला झुलाया था। किरण का मन गुदगुदा गया। आज फिर वह उसी फूल पर जाना चाहती है। लेकिन सूरज भाई ने जब उसको कोई दूसरी जगह एलॉट की तो वह बमक गयी। मनमाफिक सीट न मिलने पर चुनाव न लड़ने की धमकी देते जनप्रतिनिधियों की तरह हरकतें कर रहीं। अब सूरज भाई कोई हाईकमान तो हैं नहीं जो बच्ची पर अनुशासन की कार्यवाही कर दें। बाप हैं बच्ची के। प्यार करते हैं अपनी लाड़ली को। प्यार मजबूत बनाता है तो मजबूर भी करता है।
सूरज भाई बच्ची किरण को समझाने में जुट गए। बताया ''जिस फूल पर जाने की तू बात कर रही उसको कल बंदरों ने नोच कर फेंक दिया। इसीलिए दूसरी जगह एलॉट की है तुझे।"
बच्ची किरण सूरज भाई की बात मान नहीं रही। उसका दिल 'टूट' टाइप का गया है। वह बिफर गयी-"आप झूठ बोल रहे हैं। वह वहीं होगा। कल विदा किया था उसने मुझे हिल-हिलकर। मुझे जाना है उसके पास। नहीं जाऊंगी तो वह मुझे बेवफा समझेगा। मैंने उससे प्रॉमिस किया था। मैं कोई नेता थोड़ी हूँ जो वादा करके मुकर जाऊं। मुझे जाना है उसके पास। वह मेरा इंतजार कर रहा होगा। "
सूरज भाई मजबूरन बच्ची किरण को साथ लेकर आये। वह जगह दिखाई जहां कल फूल खिला था। आज उसकी जगह एकाध पत्तियां थीं। फूल को बंदरों ने नोच डाला था। किरण दुखी हो गयी। कुछ देर गुमसुम खड़ी रही। फिर पास में खिली कली को गले प्यार करती हुई फूल के साथ बिताए समय को याद करती रही। रेडियो पर गाना बज रहा है -'परदेशियों से न अखियां मिलाना।'
किरण का मन किया रेडियो को उठाकर पटक दे। थूर दे बदमाश को जो ऐसा फालतू गाना बजा रहा है। परदेशी बता रहा है फूल को। बदनाम कर रहा उसको। लेकिन जगह छोड़कर जाने का मन नहीं हुआ उसका। कली को गले लगाए वहीं रही वह।
हमारे साथ चाय पीते किरण को कली के साथ खेलते देख सूरज भाई ने सुकून की सांस ली। सारा किस्सा सुनाया मुझे। हम लोग बातों में मशगूल थे इस बीच एक बंदर आया और चुपके से मेज पर रखा बिस्कुट का पैकेट उठा ले गया। एकदम सर्जिकल टाइप। सिर्फ पैकेट उठाया। चाय का कप हिला तक नहीं। हमने दौड़ाया तो आंखे दिखाने लगा।
एक हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए दूसरे हाथ से वह दूसरे बंदरो को भगाने में लगा था। बाकी के बंदर भी उस पर झपट पड़े। सब एक-दूसरे पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं की तरफ खौखियाने लगे। अंततः बन्दर के हाथ से बिस्कुट का पैकेट छूट गया। उस पर दूसरे मुस्टंडे बन्दर का कब्जा हो गया। वैसे ही जैसे एक पार्टी के एजेंडे को दूसरी शातिर पार्टी अपना बना लेती हैं।
कुछ देर बाद बंदरों के दोनों गुट चले गए। क्या पता दोनों गुट सारी घटना का वीडियो बनाकर अपने-अपने हिसाब से अपने लोगों में दिखाएं। अपने को दूसरे से बेहतर बताएं। उनके यहाँ भी चुनाव होते हों तो क्या पता इसी आधार पर वोट भी मांगे जाए । आखिर हमारे पूर्वज हैं वो। हमारी ही तरह तो हरकतें करेंगे।
बंदरों के ऊधम से कुचली हुई घास अपने जख्म पर सूरज की किरणों का मरहम लगा रही है। रिक्शे में बैठा हुआ रिक्शेवाला अखबार में चुनाव की खबरें पढ़ रहा है। उससे उतरकर बच्ची स्कूल जा रही है। सूरज भाई चाय खत्म करके वापस चमकने लगे।
सुबह हो गयी है।


Thursday, March 14, 2019

डोन्ट बि परेशान। लव यू मम्मा

 

साढे सात बज गये। फ़ैक्ट्री का हूटर बज रहा है। सारे शहर को बताता कि ड्यूटी का समय हो गया।
सूरज की किरणें अपनी ड्यूटी पर आ गयी हैं। सूरज भाई अभी मिलेंगे तो पूछूंगा कि क्या उनके यहां भी हूटर बजता है? हूटर बजते ही अलसाई किरणें आंख मलते उठने की सोचती होंगी। कुछ की मम्मी किरणें बच्ची किरणों को डांटती होंगे- "जल्दी उठ वर्ना सुबह की बस छूट जायेगी। जाना है न तेरे को धरती पर चमकने के लिये। कल जिस खूबसूरत कली पर रही दिन भर वह अब खिलने वाली होगी। "
किरण अलसाई सी बस मम्मी एक मिनट और एक मिनट और करती लेटी रहती होगी। डांट खाती होगी। रोज की तरह जैसे ही दूर चौराहे पर सूरज बस का हार्न सुनती होगी तो फ़टाक से बिस्तर से भागकर हाथ-मुंह धोकर फ़्राक पहनकर मम्मी किरण को टाटा, बाय बाय करती हुयी सूरज बस में बैठकर धरती की ओर चल देती होगी। बस में अपनी सीट पर ऊंघते बैठे मम्मी की बात याद आती होगी- अरे नाश्ता तो कर ले। रोज भूखे चली जाती है।
वह किरण अब धरती पर पहुंच गयी है। कल जिस कली पर दिन गुजारा उसने अब वह फ़ूल बन गया है। किरण को आते देखते ही और खिल गया। किरण उसकी पंखुडियों पर पसर कर धीरे से उसे हाय कहते हुये मुस्कराती है। अगली बात करने से पहले अपनी मम्मी को एस.एम.एस. करती है- "मैं यहां पहुंच गयी। आराम से हूं। नाश्ता कर लिया है। तुम भी कर लो। डोन्ड बि परेशान। लव यू मम्मा। "
मम्मी किरण, बच्ची किरण का मैसेज पाकर चैन से आ जाती होंगी। पलट के -"लव यू बेटा। टेक केयर " लिखकर सोचती होगी -कल से इसको टिफ़िन में नाश्ता दे दिया करूगी।
बरामदे में रोशनी का टुकड़ा पसरा हुआ। इसका शान्त स्वभाव देखकर लग रहा है इसई के घराने वालों के लिये पंत जी लिखे होंगे:
शान्त स्निग्ध ज्योत्सना उज्ज्वल।
स्निग्ध ज्योत्सना से याद आया कि किरणें इतनी चमकती कैसे रहती हैं? क्या इनके भी कोई ब्यूटी सैलून होते हैं? क्या ये भी फ़ेशियल, ब्लीचिंग कराती हैं? क्या पता इनके यहां भी गोरेपन की क्रीम का जलवा हो। आज सूरज भाई से पूछेंगे।
#सूरज भाई अब आ गये हैं। साथ चाय पीते हुये हम बतिया रहे हैं। चाय पीते हुये उन्होंने पूछा कि इसमें कौन चाय की पत्ती डाली है? हमने कहा -पता नही। लेकिन पत्ती के बारे में क्यों पूछ रहे? वे बोले कुछ नहीं बस ऐसे ही। सोच रहा था चुनाव के समय ’बाघ-बकरी ’ चाय चलनी चाहिये। इस समय बकरी जैसे जनता को यह लगने लगता है कि उसकी बाघ से दोस्ती है और बाघ चुनाव जीतते ही उसकी सब परेशानियां खतम हो जायेंगे।
हमने कहा- सूरज भाई आप तो राजनैतिक हो लिये आज।
#सूरज भाई मुस्कराते हुये चाय पीते रहे।उनकी मुस्कराहट से किरणें और चमकने लगीं। सबेरा हो गया है।