आजकल मानहानि का दौर चल रहा है। बेइज्जतियों की भगदड़ मची हुई है। जिसे देखो वही लपका जा रहा है अदालत की तरफ़। मानहानि का दावा पेश करने के लिये। अदालतों की भी नाक में दम हुआ पड़ा है। एक से एक चिरकुट लोग अपनी मानहानि का मुकदमा धांसे पड़े हैं अदालतों में। हाल यह कि जो जितना बड़ा चिरकुट उसका उतना ही बड़ा मानहानि का दावा। मतलब मानहानि के दावा दावावीर की चिरकुटई की मात्रा के समानुपाती है।
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Saturday, May 31, 2025
मानहानि
अदालतें हलकान हैं। व्यस्तता के आंसू रो रही हैं। उनका भी मन करता होगा -’कोई अदालत हो जहां वे अपनी इस बेइज्जती के खिलाफ़ दावा कर सकें।’
मानहानि पर कुछ कहने से पहले इसका मतलब तय कर लिया जाये। मानहानि से मोटा मतलब निकलता है कि कोई व्यक्ति जैसा खुद को समझता है , कोई दूसरा व्यक्ति उसको उससे अलग बताये। उदाहरण के लिये कोई अपने को ईमानदार समझता है। समाज में भी अपनी ईमानदारी का भौकाल बनाये हुये है। ऐसे किसी व्यक्ति को कोई सरेआम बेईमान कह दे। लाखों, करोड़ों के घपले का इल्जाम लगा दे। अगला इस इल्जाम को बजाय दिल्लगी के गम्भीरता से ग्रहण कर ले। फ़िर हल्ला मचा दे-’हमारी मानहानि हो गयी।’ अदालत में मानहानि का दावा करने की धमकी दे दे। इसके बाद मानहानि का दावा कर भी दे। बस शुरु हो गया मानहानि का मीटर।
दुनिया में जित्ती भी बड़े काम हुये सबमें मानहानि का योगदान है। सत्यनारायण की कथा में देवता को लगा उसकी मानहानि हुई। देवता रूठ गये। दुखवर्षा कर दी भक्त पर। फ़िर जजमान ने उनको पटाया। मान दिया। मत्ता दिया। प्रसाद चढाया। देवता खुश हो गये। भक्त के अच्छे दिन बहाल कर दिये।
ऋषिगण जहां अपमान महसूस हुआ नहीं कि फ़ौरन कमंडल से पानी छिड़ककर शाप जारी कर देते थे। पुराने-जमाने में राजा-महाराजाओं को जैसे ही कहीं से अपनी मानहानि की भनक मिली, वैसे ही हमले की पिपिहरी बजा देते थे। बदनामी से बरबादी भली। भले ही इतिहास की किताब में भी जगह न मिले लेकिन मानहानि के महल में रहना गवारा नहीं।
मानहानि के इतने प्रकार के होते हैं कि उनकों शब्दों में बयान करना मुश्किल है।’अविगत गति कछु कहत न आवे’ टाइप मामला होता है। गणित में कहा जाये तो मानहानि के प्रकारों की संख्या दुनिया के कुल लफ़ड़ों की संख्या से एक अधिक होती है। कहने का मतलब कि अगर संसार में अगर 100 तरह के लफ़ड़े हैं तो मानहानि के प्रकार 101 होंगे। सूत्र रूप में कहें तो Y=X+1 (यहां X= दुनिया के कुल लफ़ड़े, Y=मानहानि के प्रकार)
बेइज्जती के प्रकारों की गणित के पायजामें में घुसेड़ने के बाद आइये आपको मानहानि के कुछ पहलू दिखाते हैं। समझने में आसानी होगी आपको।
मानहानि जो है न वह लक्ष्मी की तरह चंचला होती है। कब किस रूप में हो जाये पता नहीं चलता। सीधी मानहानि का उदाहरण हमने आपको ऊपर बताया जिसमें किसी ईमानदार को बेईमान बता दिया जाये। उल्टी मानहानि भी होती है। जैसे किसी अरबों के घोटालेबाज को टिकियाचोर बताया जाये। पूरी दुनिया में जिसके हरामीपने का डंका पिटता हो उसको गली मोहल्ले के छिछोरेबाज की तरह बताया जाये। मानवमांस भक्षी ईदी अमीन की तुलना खेल-खेल में एक-दूसरे को नोच लेने वाले बच्चों से की जाये।
साहित्यिक हलके में भी उलटी मानहानि के नमूने मिल सकते हैं। अपने लेखन की खुद ही प्रसंशा करने वाले को कवि भूषण के समान बताया जाये। विसंगति की शिकायत करने पर समझाइश दी जाये -’अरे भाई, भूषण जी तो सिर्फ़ कवि थे। आप तो भूषण और शिवाजी/छत्रसाल के कम्बो पैकेज हो। मतलब वीर भी खुद वीर के चारण भी खुद। ’ अगला इतने पर मान जायेगा। न माने तो उसको उसकी विधा का देवता घोषित करके गेंदे की माला पहना दी जाये। अगला बेचारा ’स्तुति-स्नेह-सरोवर’ में छप्पछैंया करते आशीष देने के अलावा और कुछ कर भी न पायेगा।
आजकल पैसे ने मानहानि के पाले में कबड्डी खेलना शुरु कर दिया है। करोड़ों के दावे होते देख बाजार मानहानि के हलके में प्रवेश करने के लिये अंगड़ाई ले रहा है। बड़ी बात नहीं कल को बाजार में मानहानि कराने और उससे निपटने के पैकेज आ जायें। बाजार में बेइज्जती करवाने और उसके बाद मानहानि का दावा पेश करने की इस्कीमें चलने लगें। मेडिको-लीगल केस की तर्ज पर मानहानि-लीगल वकीलों के अलग बस्ते खुल जायें। बाजार की कुछ इस्कीमें इस तरह की हो सकती हैं:
१. घर बैठे बेइज्जती करायें। मानहानि का दावा करें। तुरंत भुगतान पायें।
२. बिना बेइज्जती के मानहानि दावा करें। भुगतान दावा पाने के बाद।
३. मनचाही मानहानि करायें। भुगतान किस्तों में। कैसलेस सुविधा उपलब्ध।
४. बेइज्जती में इज्जत का एहसास। आपके घर के एकदम पास। सुविधायें झकास।
५. बिना पिटे पिटने का एहसास पायें। मानहानि का दावे के लिये प्रमाण पायें।
मानहानि का बाजार चल निकलने के बाद तरह-तरह की मानहानि और उससे निपटने के तरीके बाजार में चल निकलेंगे। तरह-तरह से मानहानि करने के तरीके बताये जायेंगे जिससे आदमी की इज्जत भी उतर जाये और अगला प्रमाणित भी न कर पाये कि उसकी बेइज्जती हुई है। कुछ-कुछ गांधी डिग्री वाली पुलिस की पिटाई की तरह जिसमें पिटने वाला चोट को जिन्दगी भर महसूस भले करे लेकिन साबित नहीं कर सकता कि वह पुलिस-प्रेम का शिकार हुआ है।
आप किसी ख्यातनाम लेखक से कह सकते हैं जित्ता खराब आप लिखते हैं उससे ज्यादा खराब तो मैं अपने बायें हाथ से लिख सकता हूं। लेखक अगर इसको अपनी मानहानि समझता है और अदालत में घसीटने की धमकी देता है तो आप उसको समझा सकते हैं कि -’ आपके समझने में गलती हुई। मैं तो आपके लेखन की तारीफ़ कर रहा था। मैं बायें हाथ से लिखता हूं। मेरे कहने का मतलब यह था कि मैं कितना भी अच्छा लिखूं लूं पर वह आपके लेखन से खराब ही होगा।’
मानहानि महसूस होने पर होती है। मानो तो मानहानि। वर्ना आम बात। वो सेल्स मैन वाला किस्सा आपने सुना होगा। एक सेल्समैन ने कुछ दिन की सेल्समैनी के बाद त्यागपत्र दिया। उससे दुकान मालिक ने नौकरी छोड़ने का कारण पूछा-’ क्या बात है? तन्ख्वाह कम है? कोई शिकायत है?’ नौकरी छोड़ने वाले ने कहा-’कोई शिकायत या पैसे की बात नहीं लेकिन सेल्समैनी में ग्राहक जिस तरह बात करते हैं उससे बेड़ी बेइज्जती महसूस होती है।’ मालिक ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा-’ यार ये तुमने नई बात बताई। हमने भी जिन्दगी भर सेल्समैनी की है। हमको लोगों ने गालियां दी, दफ़ा हो जाने के लिये, पीटने की धमकी दी, कुछ ने अमल भी किया लेकिन हमारी बेइज्जती आज तक नहीं हुई। ’
अपने देश की आम जनता भी इसी दुकान के मालिक की तरह है। तरह-तरह के लोग इसको धोखा देते हैं, सेवा करने के नाम पर ठगते हैं, लूटते हैं , हाल-बेहाल करते हैं लेकिन जनता इसे अपनी मानहानि नहीं मानती। वह सोचती है यह तो आम बात है।
आपको इत्ता पढना पडा बेफ़ालतू में। कहीं आपकी शान में तो कोई गुस्ताखी नहीं हुई। मने पूछ रहे है। हो तो बता दीजियेगा। किसी की मानहानि करने का अपना कोई इरादा नहीं है।
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Thursday, February 24, 2022
कमजोर दिल के घपलेबाज
आजकल बैंकिग घोटालों की बमबम मची है। एक के बाद एक ताबड़तोड़ घपले किलकते हुये पैदा हो रहे हैं। ’मीडिया रैम्प’ पर सुन्दरियों की तरह इठलाते हुये कैटवॉक कर रहे हैं। एक घपले के सौंदर्य को जी भरकर निहार भी नहीं पाते कि भड़भड़ा के सामने आया दूसरा घोटाला अपने हनीट्रैप में फ़ंसा लेता है।
घपले करने वाले ताबड़तोड़ बैटिंग वाले अंदाज में स्कोर टांगते जा रहे हैं। जनता बेचारी न्यूट्रल अम्पायर की तरह चुपचाप किनारे खड़ी घपलचियों के जलवे देख रही है। घपलावीरों की हिट की हुई हर गेंद बाउंड्री के बाहर जा रही है। मीडिया चीयरलीडरानियों की तरह हर घपले पर मटक रहा है। घोटालचियों की अदाओं का सौंदर्य निहारते हुये उनको मधुर अंदाज में धिक्कारता है जैसे वधू पक्ष की महिलायें वरपक्ष के सम्मान में मंगलगालियां देती हैं।
उधर कई गुज्जू भाइयों मिलकर हज्जारों करोड़ पार किये। इधर कनपुरिया कोठारी जी ने भी ताव में आकर अकेले ही ’कलट्टरगंज झाड़ दिया।’ मसाला प्रेमी कनपुरिया मुंह के मसाले से सड़क का मुंह रंगते हुये कह रहा है- ’यार इज्जत रख ली अगले ने कानपुर की। अब कोई मना भी करे लेकिन अपन बिटिया की शादी में बरातियों का स्वागत पान पराग से ही करेंगे।’
फ़रवरी में मध्यवर्ग आयकर कटौती के हमलों से हलकान होता है। अपने खर्चे काटता हुआ किसी तरह महीना गुजर जाने का इंतजार करता है। इस समय आयकर की कटौती प्रतिद्वन्दी लेखक को मिले सम्मान सी अखरती है। ऐसे में बैंकिग घोटाले ’बुरा न मानो होली है’ सा कहते हुये हौसला बंधा रहे हैं - ’देख बाबू, देश के हज्जारों करोड़ लुट गये फ़िर भी वह मुस्करा रहा है। तुम अपने चंद रुपयों की कटौती पर बिलख रहे हो।’ बाबू देशभक्ति के नाम पर मुस्कराने की कोशिश करता है तब तक पता चलता है उसके पीएफ़ पर भी कैंची चल गयी। बिना समझाये वह समझ जाता है कि देशभक्त होने के नाते देश का नुकसान उसको ही झेलना पड़ेगा।
घपले पहले भी होते रहे हैं। लेकिन हाल में हुये घपले अलग तरह के हैं। पहले घपलेबाज पकड़े जाने पर शरमाते थे। मुंह छिपाते थे। घपला करने के बाद पछताते थे। अपने बहक जाने की बात बताते थे। कुछ तो मारे शरम के चुल्लू भर पानी में डूब तक जाते थे। इसका कारण उनमें आत्मविश्वास की कमी होती थी। उनको लगता था कि उन्होंने गलत किया है। पकड़े जाते ही वे शर्मिन्दगी वाले मोड़ में चले जाते थे। वे कमजोर मन वाले घपलेबाज होते थे।
लेकिन हाल के घपलेबाजों में अलग तरह का आत्मविश्वास दिखता है। माल्या जी उधर लंदन से हड़काते हुये कहते हैं-’हमको ज्यादा उकसाओगे तो सबकी पोल खोल दूंगा।’ पोल खुलने की घमकी से तो नंगा तक डरता है। इसलिये लोग सहम गये।
घपलेबाज भाई भी ने बैंक और मीडिया को धमकाया है कि उनके खुलासे के चलते उसकी साख में बट्टा लगा। अब कोई पैसा वापस नहीं करेंगे। ’जबरा लूटे, रोवन न देय।’
हमें तो धुकुर-पुकुर मची है कि अगला कहीं देश पर मानहानि का दावा न ठोंक दे। घपले की रकम से दोगुने का हर्जाना न मांगने लगे। खुदा न खास्ता अगर ऐसा हो गया तो अभी तो पीएफ़ कम हुआ है, आगे कहीं तन्ख्वाह भी न दुबली हो जाये।
इस लिहाज से कनपुरिया घपलेबाज संस्कारी डिफ़ाल्टर हैं। घपले का खुलासा होते ही देशभक्त हो गये। पासपोर्ट जब्त हो जाने के चलते सिस्टम में सहज विश्वास पैदा हो गया था। कानून की जकड़ में आया आदमी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करने लगता है। इसी विश्वास के चलते उन्होंने कानपुर छोड़कर न जाने की धमकी दी है। जिस बैंक से लोन लेकर पैसा पीटा, तमाम कनपुरियों को पान मसाले के जरिये कैंसर भेंट किया उनको ही चूना लगाते हुये कनपुरिया जुमले - ’ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’ को अमली जामा पहनाया। कानपुर को ऐसे शहर प्रेमी वीर पर गर्व होना चाहिये।
हर खाया पिया आदमी देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है। महापुरुष बनना चाहता है। पुराने समय में लोग महान बनने के लिये जिन्दगी भर परोपकार करते थे। स्कूल कालेज खुलवाते थे। कुंये-बावड़ी बनवाते थे। देश के लिये जेल जाते थे। जिन्दगी गुजर जाती थी तब कहीं महापुरुषों के खाते में नाम दर्ज हो पाता था। महान बनने के चक्कर आदमी की जिन्दगी परोपकार में ही हलकान हो जाती थी। घपलों-घोटालों ने महानता के नये रास्ते खोले हैं। इस रास्ते पर चलकर आदमी ऐश करते हुये भी इतिहास की किताब में घुस सकता है। आज बच्चा-बच्चा विजय माल्या और नीरव मोदी का नाम जानता है।
हाल में सामने आये घपलों के कारीगर बिना कुछ खर्च किये अहिंसक तरीके से मीडिया में छाये रहे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अगर घपलेबाजों से सीखते तो उनको अपनी सरकार के विज्ञापन करने के लिये आधी रात को अपने सचिव से मारपीट नहीं करनी पड़ती।
लेकिन इन घपलों से हमको परेशान नहीं होना चाहिये। हमको इनके धवल पक्ष देखने चाहिये। बैंक में हुये घपलों से बैंको की सुरक्षा मजबूत हो होगी। जरूरत मंदों के लोन मुश्किल हो जायेंगे। घोटालेबाजों से लुटने की भड़ास बैंक वाले शिक्षा लोन लेने वालों पर निकालेंगे। इसका फ़ायदा यह होगा कि बच्चे पढने लिये विदेश कम जायेंगे। प्रतिभा पलायन में कमी आयेगी। जो युवा दुनिया की उन्नति में योगदान देते वे देश में ही रहते हुये रोजगार की तलाश में भटकेंगे। राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारों से आसमान गुंजायेंगे। मारकाट करते हुये देश की जनसंख्या कम करने में सहयोग करेंगे। देश आगे बढायेंगे।
हम सदियों से पैसे को हाथ का मैल मानते आये हैं। हमें सोचना चाहिये कि गबन करके विदेश भागे लोग देश की गंदगी लेकर भागे हैं। देश के स्वच्छता अभियान में अप्रतिम योगदान है यह उनका। यह पैसा भी कोई हमेशा के लिये थोड़ी गया है बाहर। जहाज के पंछी की तरह यह फ़िर वापस आयेगा देश में। घपलों के रुपयों का देश से तगड़ा लगाव होता है। जरूरत पड़ते ही वापस आयेगा। देश में चुनाव, दंगे, अराजकता की पुकार पर दौड़ता भागता चला आयेगा। जहां जरूरत होगी, खप जायेगा। देश के घपले का पैसा अंतत: देश में ही खपता है। घपले के पैसे की देशभक्ति में संदेह नहीं करना चाहिये। घपलों में देश की बरक्कत देखना चाहिये।
घपलों का सामना हमको उदारता से करना चाहिये। ’वसुधैव कुटम्बकम’ के हिसाब से घोटाले करने वालों को अपना भाई-बहन मानना चाहिये। जिन घपलों से भाई-बहनों का भला होता हो उनका बुरा नहीं मानना चाहिये। घपलेबाजों की इज्जत करनी चाहिये। ’बुरा न मानो होली है’ कहते उनको गले लगाना चाहिये।
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Sunday, February 13, 2022
चाय के साथ चुम्बन दिवस
सुबह-सुबह मोबाइल आन किया तो पता चला कि आज ’चुम्बन दिवस’ है। क्यों मनाया जाता है चुम्बन दिवस यह जानने के लिये गूगल की शरण गये तो खूब सारी फ़ोटो चुम्बनरत फ़ोटो दिखीं। अधिकतर में युवा लोग खड़े होकर या बैठे हुये चुम्बन करते दिखे । सब नवीन वस्त्र धारण किये। इससे लगा कि जो भी हो यह त्योहार सुबह-सुबह नहीं मनाया जाता। आराम से नहा धोकर ’सेलिब्रेट’ किया जाता है। बिना नहाये-धोये मनाया जाता होता तो फ़ोटो में लोग बिस्तर में बैठे, मंजन करते, चाय पीते दीखते। फ़ोटो में लोग नदी के किनारे दिखे, पहाड़ पर दिखे, एफ़िल टावर के पास दिखे।
कोई व्यक्ति किसी झुग्गी-झोपड़ी के पास किसी को चूमते नहीं दिखा। कोई फ़टेहाल व्यक्ति किसी दूसरे बदहाल को चूमते नहीं दिखा। कोई हड्डी-पसली का एक्सरे टाइप आदमी किसी चुसे हुये चेहरे वाले इंसान को चूमते नहीं दिखा। जो भी दिखा किसी को चूमते हुये वह झकाझक कपड़े में चकाचक चेहरे वाला ही दिखा। बढिया शैम्पू किये बाल, डिजाइनर कपड़े पहने लोग ही चुम्बनरत दिखे। इससे यही अंदाज लगा कि ’चुम्बन दिवस’ गरीब लोगों के लिये नहीं है। मीडिया इसको जितना धड़ल्ले से इसे दिखा रहा है उससे भी सिद्ध होता है कि इस त्योहार का गरीब लोगों से कोई संबंध नहीं है।
पुराने समय की पिक्चर में हीरो-हीरोइन लोग आपस में एक दूसरे को सीधे-सीधे चूमने में परहेज करते थे। सब काम इशारे से होता था। फ़ूल को भौंरा चूम लेता था लोग समझ जाते थे कि चुम्मा हो गया। कुछ इसी तरह से जैसे पहले जनसेवक , आजकल की तरह, गुंडागर्दी खुद नहीं करते थे। इस काम के लिये अलग से गुंडों का इंतजाम करते थे।
धीरे-धीरे थोड़ा खुलापन बढा और हीरो लोग हल्ला मचाने लगेे -’दे दे चुम्मा दे दे’ कहने लगे। जितने जोर से हीरो चुम्मा मांगता है उतनी जोर से अगर गरीब लोग अपने लिये रोटी मांगते तो शायद अब तक भुखमरी खत्म हो गयी होती देश से।
पहले सिनेमा में चुम्बन ऐसे हो थे मानो नायक स्पर्श रेखा खींच रहा हो नायिका के अधर या गाल पर। आजकल की पिक्चरों में तो ऐसे चूमते दिखाते हैं मानों कम गूदे वाला आम चूस रहे हैं। इतनी मेहनत करते हैं लोग पिक्चरों में चूमने में कि देखकर लगता है कि अगले के होंठ न हुये कोई सार्वजनिक सम्पत्ति हो जिसे नोचकर लोग अपने घर ले जाना चाहते हों।
प्रगाड़ चुम्बन में जुटे होंठ बिजली के पिन और साकेट सरीखे लगते हैं। जहां कनेक्शन हुआ नहीं कि मोहब्बत की बिजली दौड़ने लगती है।जरा देर तक बही करेंट तो बहुत देर तक झटका मारती रहती है। सांस उखड़ने लगती है। बेदम हो जाते हैं लोग। बाद में ताजादम भी।
सूरज भाई भी लगता है ’चुम्बन दिवस’ पूरे उल्लास से मना रहे हैं। हर कली को, फ़ूल को, पत्ती को, घास को, मिट्टी को, सड़क को, कगूरे को एक समान प्रेम से चूम रहे हैं। हमको देखा तो हमारे गाल पर भी धर सी एक ठो पुच्ची।
फ़िलहाल आप मजे से जैसा मन करे वैसे मनाइये ’चुम्बन दिवस’। हम तो चाय के कप को चूमते हुये चाय की चु्स्की के साथ मना रहे हैं ’चुम्बन दिवस।
'चाय' के साथ 'चुम्बन' जोड़ने से अनुप्रास अलंकार भी हो गया। और कुछ हो न हो लेख के अंत की छटा दर्शनीय हो गयी।
https://www.facebook.com/share/p/arp2KmZtmz4kGAyc/
Friday, September 24, 2021
झूठ बोलने का मन
आज थोड़ा झूठ लिखने का मन हुआ। एक से बढ़कर एक झूठ हल्ला मचाने लगे- 'हम पर लिखो, हम पर कहो।'
हमने सब झूठ को हड़काते हुए कहा -'अनुशासन में रहो। लाइन लगाकर आओ। सबका नम्बर आएगा। हल्ला मत मचाओ।'
एक झूठ हल्ला मचाते हुए बोला-'हम लाइन लगाकर आएंगे तो हमारा तो वजूद ही निपट जाएगा। हम तो एक के ऊपर एक लदफद कर आते हैं। इसीलिए जब तक पहचाने जाते हैं, तब तक अपना काम करके निकल जाते हैं।'
हम जब तक उसकों कुछ कहें तब तक वह पलटकर फूट लिया। भागते हुए दिखा उसकी शर्ट पर 'सत्यमेव जयते लिखा' था।
हमको झूठ की कमीज पर लिखे लिखे 'सत्यमेव जयते' से आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि आजकल झूठ बोलने का यही फैशन चलन में है। बड़े झूठ सच के लिबास में ही बोले जाते हैं। देश सेवा के नाम पर स्वयंसेवा का चलन है। हमको अचरज उसकी स्पीड पर था। जितनी तेज वह भागा उतनी तेज ओलंपिक में भागता तो गोल्ड मेडल मिल जाता ।
हमने उसकी स्पीड पर ताज्जुब किया तो उसकी जगह ले चुके झूठ ने बताया -'उसकी 'सत्यमेव जयते' वाली ड्रेस किराए की है। घण्टे भर के लिए लाया था। देर करता तो अगले घण्टे का किराया भी ठुक जाता। बहुत मंहगा होता जा रहा है झूठ बोलना भी आजकल। आप समझते हो सिर्फ पेट्रोल ही ऊपर जा रहा है।'
हम कुछ और कहें तब कुछ और झूठ हल्ला मचाने लगे। हल्ला मचाने वाले 'मूक विरोध' की कमीज पहने थे। हमें लगा कि कुछ देर और ठहरे यहां तो सब मिलकर हमको पीट देंगे। हमारे शक की वजह उनकी कमीजों पर लिखा नारा था। सबकी छाती पर लिखा था -'अहिंसा परमों धर्म:। '
हम फूट लिए कहकर कि अभी आते हैं। सारे झूठ हमारी बात सुनकर खुश हो गए। वे आपस में धौल धप्पा करते हुए बोले -'ये तो अपना ही आदमी निकला। हमारी ही तरह झूठ बोलता है। इसको अब लौटकर आना नहीं। चलो फालतू टाइम क्या खोटी करना।'
हमको लगा कि समय सही में कीमती है। झूठ बोलने वाले तक इसको बर्बाद नहीं करते। बिना समय बर्बाद किये झूठ बोलते रहते हैं।
https://www.facebook.com/share/p/HEfeS8untXtr7QtQ/
Sunday, June 13, 2021
Monday, April 26, 2021
सच और हसीन झूठ
झूठ की भीड़ में एक अकेला सच खड़ा था।
सच अकेला था लेकिन निडर था।
झूठ की भीड़ अकेले सच से डरी खड़ी थी। पता नहीं किस झूठ की पोल खोल दे।
एक अकेला सच अनेकों झूठ पर भारी था।
झूठ की भीड़ में खुसफुसाहट डर बढ़ रहा था। लोग फुसफुसाते हुए आपस में कह रहे थे -'यार इस सच के बच्चे ने जीना मुहाल कर रखा है। यह तो बहुत बड़ी समस्या है हमारे लिए। कब तक इसके डर के साये में जिएंगे हम। इसका कोई इलाज नहीं क्या?'
दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका कोई इलाज न हो। एक शातिर झूठ ने कहा। निकलेगा इसका भी इलाज निकलेगा। चिंता न करो। देखते रहो। थोड़ा इंतजार करो।
झुट्ठों की भीड़ इंतजार करने लगी।
कुछ देर बाद एक हसीन झूठ इठलाता हुआ सच की तरफ बढ़ा। सच जब तक कुछ समझ पाए तब तक झूठ ने उसको चूम लिया और गले लगकर कहा -' सच में तुम कितने बहादुर हो सच। मैं तुम्हारी बहादुरी पर फिदा हूँ। आई लव यू।'
सच कुछ देर को हक्का-बक्का रह गया। जब उसको समझ आया कि उसको चूमने वाला 'झूठ' है तब उसने उसको झिड़ककर दूर किया। हसीन झूठ मुस्कराते हुए झूठ की भीड़ में वापस लौट आया।
कुछ ही देर में सच को हसीन झूठ द्वारा चूमे जाने का वीडियो वायरल हो गया। उसमें से सच द्वारा झूठ को झिड़ककर दूर करने का सीन गायब था।
सच बेचारा डाक्टर्ड और वायरल वीडियो के अधूरे होने की बात कहते हुए अपनी सफाई पेश कर रहा था। लेकिन झूठ की भीड़ में कोई उसकी सुनने को तैयार नहीं था।
सच अभी भी अकेला खड़ा था। सामने झूठ की भीड़ थी। लेकिन अब झूठ की भीड़ से सच का डर खत्म हो गया था। सच के हसीन झूठ के साथ के वायरल वीडियो ने सच को झूठ का 'आदमी' साबित कर दिया था।
सच 'सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं' का स्टेटस लगाए अकेला परेशान खड़ा था।
हसीन झूठ और शातिर झूठ साथ मिलकर अठखेलियां मना रहे थे। हसीन झूठ को झूठ समाज के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था।
पूरा झूठ समाज उल्लास मनाते हुए भी डरा हुआ था कि अबकी बार फिर सच सामने आया तो उसका मुकाबला कैसे करेंगे।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222196332870743
Tuesday, March 30, 2021
होली के टाइटल बमार्फत अरविंद तिवारी जी
Arvind Tiwari जी वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं। बावजूद वरिष्ठता के उनकी सबसे अच्छी खूबी यह भी है कि वे अपनी वरिष्ठता सर पर लादकर नहीं रखते। उनका खिलंदड़ापन भी बरकरार है। हंसी-मजाक से परहेज नहीं। खिलकर लिखना, खुलकर हंसना। लिखाई में एक बैठक में एक लेख निकाल देते हैं। लेखन में निरन्तर सक्रिय हैं। क्रिकेट की भाषा में कहें तो विकेट के चारो तरफ शॉट लगाते हैं। खूब लिखा है। खूब छपे हैं। अभी भी लिख रहे हैं। छप रहे हैं। नए से नए विषय पर लिखना जारी है। नए से नए लेखक की किताब पढ़कर उस पर , बिना चेला बनाने के लालच के, लिखना अरविंद जी के व्यक्तित्व की खूबसूरती है।
इनाम भी खूब पाए हैं। आगे भी मिलेंगे इंशाअल्लाह। फिलहाल थोड़ा ब्रेक टाइप लगा है शायद। असल में इनामिया कमेटी में शामिल लोग शायद इनके साथ के ही हैं जो इनको नम्बर तो अच्छे देते होंगे लेकिन इतने अच्छे नहीं कि इनामों के मामले में उनके बराबर आ सकें। बिना गुट, मठ, चेलेबाजी के लेखन के ये सहज साइड इफ़ेक्ट होते होंगे।
बहरहाल यह सब तो भूमिका है अरविंद जी द्वारा दिये होली के टाइटल साझा करने की।
दरअसल अरविंद तिवारी जी ने मुझको होली के टाइटल देने का जिम्मा सौंपा। लेकिन हम अलसिया गए। फिर जब मन किया लिखने का तो कुछ सूझा नहीं , सिवाय दो-चार के। फेसबुक वॉल पर 'टायटल चन्दा' की अपील लगाई तो अरविंद जी ने हमारे आलस्य पर लानत टाइप भेजते हुए सूचना दी कि उन्होंने टाइटल दे दिए हैं। एक से एक शानदार टाइटल। यह घण्टों की मेहनत का काम है। इससे पता चलता है कि अरविंद जी ने काम भले हमें सौंप दिया होगा लेकिन उनको हमारी नाकाबिलियत और आलस्य पर पूरा भरोसा होगा कि -'इनसे हो नहीं पायेगा।'
हमको अरविंद जी द्वारा सौंपे काम को न कर पाने का जितना अफ़सोस है उससे ज्यादा खुशी इस बात की है कि हमने उनके विश्वास की रक्षा की (इनसे न हो पायेगा)। जितने लोगों को टाइटल दिए अरविंद जी ने उनको अपन ठीक से जानते भी नहीं।
कुछ टाइटल सौरभ जैन ने भी दिए हैं और कुछ अर्चना चतुर्वेदी ने भी। बेहतरीन होने के बावजूद वे 'कुछ ही' हुए। अरविंद जी के टाइटल में साझा करने का विकल्प नहीं है इसलिये कॉपी करके यहां पेस्ट कर रहे हैं।
अरविंद जी ने अपने लिए टाइटल दिया था - 'मुझे नहीं मिलेंगें अब सम्मान'। प्रभाशंकर उपाध्याय जी की आपत्ति पर बदलकर किया -'आज का ज्ञान समाप्त हुआ।' हमको सूझा था -'डोनाल्ड ट्रम्प की नाक काटने वाला अकेला व्यंग्यकार'।
गोपाल चतुर्वेदी जी वरिष्ठतम व्यंग्यकार हैं। विपुल लेखन है उनका। अभी भी नियमित लिखते हैं सोमवार के दैनिक हिंदुस्तान में। लगभग सब इनाम मिल चुके। वे कंट्रोलर आफ फाइनेंस रहे हैं। कोई भी खर्च बिना उनकी सहमति के होता नहीं है। अभी भी बड़े इनाम उनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति से ही मिलते हैं। उनके लिए सोचा था -'कमेटी कोई हो इनाम के लिए हमारी वित्तीय समहति जरूरी है -हमको हलके में न ले कोई।'
Hari Joshi जी के लिए अरविंद जी ने लिखा -'व्यंग्य के त्रिदेव उपन्यास नहीं, संस्मरण है।' हरि जोशी जी ने लिखा भी -आप इसे कविता भी मान सकते हैं।
हमको उनके लिए सूझा था -'व्यंग्य के त्रिदेव का मारा, एक शरीफ व्यंग्यकार बेचारा।'
Harish Naval जी की किताब अमेरिकन प्याले में हिंदुस्तानी चाय पर लिखा। विपुल लेखन के बावजूद हरीश जी का लेखन 'बागपत के खरबूजे' की खुशबू से ही जाना जाता है। इस खुशबू के आगे कोई खुशबू जम नहीं पा रही। उनके लिये लिखना था मुझे -'बागपत के खरबूजे अभी तक महक रहे हैं।'
हरीश नवल जी की 'अमेरिकन प्याले में भारतीय चाय' में लगभग आधे लेख उनके मित्रों द्वारा उनकी तारीफ में लिखे लेख हैं। इस पर इनाम भी मिला। यह व्यंग्य के नए अंदाज हैं। इस किताब के छपने, बिकने के पहले ही इसका अनुवाद आया और इनाम भी (समग्र व्यक्तित्व के संलग्नक के रूप में)। सब कुछ इतनी फुर्ती से कि बरबस राम जी द्वारा धनुष भंग वाली चौपाई याद आई -'लेत, चढ़ावत, खैंचत गाढ़े। काहू न लखा देख सब ठाढ़े।' टाइटल भी बना हरीश जी के लिये:
-अपने तआरुफ़ के लिए बस इतना काफी है हरीश, किताब छपते ही अनुवाद/इनाम आ जाता है।' 
ज्ञान जी के लिए कई टाइटल सूझे थे। ज्ञान जी वलेस में जब भी कोई संदेश डालते हैं तो उसकी शुरुआत करते हुए अपने लेखन की जानकारी देते हैं -'मित्रों, नए उपन्यास के एक लाख शब्द लिख चुका हूँ/सातवां ड्राफ्ट हो चुका है।' लगता है ज्ञान जी को भरोसा नहीं है कि यह नहीं बताएंगे तो लोग उनको हल्के में लेंगे। अब तो इसका इतना अभ्यास हो गया है कि इसके बिना कुछ शुरुआत करेंगे तो पूछेंगे -'ज्ञान जी का खाता हैक हो गया है क्या?' कुछ टाइटल यह भी हो सकते थे उनके लिए:
-पागलखाना के बाद नया स्वांग
- हर उपन्यास की शुरुआत पांचवे ड्राफ्ट से
-इंटरव्यू कोई ले लेकिन बोलना केवल अपन को ही है
प्रेम जनमेजय जी की चर्चा बिना इनाम के हो यह सम्भव नहीं।नेटवर्किंग के उस्ताद जिसको चाहे इनाम दिलवा दें, जिसको चाहे कबीर बना दें। भले ही कबीर उनको बाद में लुकठिया दें। व्यंग्य यात्रा के द्वारा अपने अद्भुत काम से व्यंग्य के लिये लगातार समर्पित प्रेम जी के लिए यह भी सोचा था
- 'व्यंग्य यात्रा का समर्पित कंडक्टर , यात्रियों को इनाम की गारंटी।'
- 'सभी व्यंग्य यात्रियों से निवेदन है कि वे अपने व्यंग्य सामान से हास्य को यात्रा के पहले निकाल दें। किसी व्यंग्य यात्री के पास हास्य पाया गया तो रास्ते में उतार दिया जाएगा।'
-'राजधानी में गंवार, पहले लेखक फिर संपादक ' 
Alok Puranik व्हाट्सप के पढ़े लिखे क्या हो गए अपनी सहेलियों सनी लियोनी और राखी सावंत को भूल गए।
बातें बहुत सारी हैं लेकिन फिर कभी। फिलहाल आप मजे लीजिये अरविंद तिवारी जी द्वारा दिये टाइटल की।
(बुरा न मानो होली है।सम्मानों की रिस्क पर लिखा है।याददाश्त पर आधारित है और आत्मीय लोगों पर लिखा है।जोड़ने का आग्रह न करें।शेष अगली होली में)
नरेंद्र कोहली___व्यंग्य के रवि शास्त्री
गोपाल चतुर्वेदी___आप भी सम्मानित होंगे और.. आप भी!
सूर्यबाला____कहानी,व्यंग्य के साथ घर भी संभाला
विष्णु नागर______"शब्द सम्मान" सेलिब्रेट कर रहा हूं
ज्ञान चतुर्वेदी___स्वांग लिखता हूं,करता नहीं
प्रेम जनमेजय_____सम्मान दिलाना हो, तो नियम बदलवा देता हूं
हरीश नवल_____चाय मत देखो, अमेरिकन प्याला देखो
यशवंत व्यास______व्यंग्यकारों की मनोहर कहानियां
लिख रहा हूं
सुभाष चंदर_______ससुराल में होली, सिर्फ़ मैंने खेली
गिरीश पंकज__रचनावली के लिए तीन ट्रक बुक किए हैं
आलोक पुराणिक______व्यंग्यश्री का खुमार बाकी है
गिरिराज शरण अग्रवाल__कब तक प्रतीक्षा करें सम्मान की
श्रीकांत चौधरी___व्यंग्य का सब कुछ गलत हाथों में है
अभी भी
मूलचंद गौतम_____व्यंग्य का प्रगतिशील दर्पण
हरि जोशी________त्रिदेव उपन्यास नहीं,संस्मरण है
अनूप श्रीवास्तव____मेरे लिए सभी अतिथि संपादक हैं
पिलकेंद्र अरोड़ा______टेपा सम्मेलन का पुराना "टपोरी"
कैलाश मंडलेकर__ज्ञान जी ने मेरा नाम लिया..शुक्रिया शुक्रिया
शांतिलाल जैन__ज्ञान जी ने मेरा भी नाम लिया है,समझे!
विजी श्रीवास्तव______समीक्षा करूंगा तो धो दूंगा
संतोष त्रिवेदी_____व्यंग्य का खुरपेच
पूरन सरमा_______पुराने व्यंग्यों का नया प्रयोग
यशवंत कोठारी______इस उम्र में काहे की यारी
मनोज लिमये___कभी दिखे कभी खोए
अजय अनुरागी_____जवाहर सर्कल पर सिनेमा के टिकट ब्लेक में बेचता था
अनुराग बाजपेई_______यू ट्यूब का वीडियो
फारूख अफ़रीदी____बिना लिखे ही मीरी
अतुल चतुर्वेदी_____ सम्मानअभी म्यान में है
अतुल कनक______हर घटना की मिल जाती है भनक
बुलाकी शर्मा____साहित्य अकादमी राजस्थानी में और चर्चा व्यंग्य में
जवाहर चौधरी___अगले शरद जोशी सम्मान पर नज़र
शरद उपाध्याय_____प्रेमी प्रेमिका व्यंग्य स्पेशिलिस्ट
स्नेहलता पाठक______खुद की पुस्तकें, खुद ही पाठक
अनीता यादव____व्यंग्य की नई रेसिपी है मेरे पास
शशि पांडेय___ऑल टाइम लाइव रहती हूं
अर्चना चतुर्वेदी_____खबरदार!ब्रज भाषा में मीठी गालियां भी हैं
समीक्षा तेलंग_____मैं भी व्यंग्य की जंग में हूं
पल्लवी त्रिवेदी____व्यंग्य की खाकी वर्दी
वीना सिंह___व्यंग्य भी लिखती हूं,किचन रेसिपी भी
इंद्रजीत कौर____अभी किचन में व्यस्त हूं
मीना सदाना अरोड़ा_____ व्यंग्य लघुकथा दोनों को निपटाया
मलय जैन______व्यंग्य का पुलिसिया सर्च ऑपरेशन
हरीश कुमार सिंह____महाकालेश्वर से ललितेश्वर तक
निर्मल गुप्त____व्यंग्य की ऊन का उलझा गुल्ला
कुमार विनोद_____शायरी का पानी व्यंग्य के तालाब में
अनूप शुक्ल____पुलिया के ए टी एम में अभी बैलेंस है
शशांक दुबे_____व्यंग्य भी और फ़िल्म भी
श्रवण कुमार उर्मिलिया____व्यंग्य में "ख़ोंगा पानी"
रमेश तिवारी____व्यंग्य की धारा मोड़ दूंगा
एम.एम. चंद्रा____रचनाएं आमंत्रित हैं,शर्तें लागू
रामविलास जांगिड़_____सपाटबयानी का कट्टर दुश्मन
रामस्वरूप दीक्षित____चंदेल राजाओं के समय का व्यंग्यकार
ब्रजेश कानूनगो____व्यंग्य का सीनियर गिरदावर
ईश्वर शर्मा___न वाद न विवाद सिर्फ़ अनहद नाद
अश्वनी कुमार दुबे____सम्मान के लिए कितनी किताबें चाहिए
सुनीता शानू____अब मैं एडमिन भी हूं
प्रभाशंकर उपाध्याय_____कतरनों का संग्रहालय
अनुज खरे____व्यंग्य में कौन उठाए और कौन धरे
सौरभ जैन____अभिषेक अवस्थी का छीना चैन
अमित शर्मा_______व्यंग्य लेखन में पठार भी आते हैं
अनुज त्यागी____व्यंग्य स्तम्भ का नया वैरागी
अनूप मणि त्रिपाठी__गुरू ने अंगूठा मांगा नहीं,दिखाया
पंकज प्रसून___व्यंग्य पर नहीं,इतिहास पर नज़र है
रामकिशोर उपाध्याय__अट्टहास में पूर्णकालिक हूं
ललित लालित्य___अब मैं गब्बर हूं,वह सांभा
रणविजय राव___नए ग्रुप के सूत्रधार
विनोद कुमार विक्की___अतिथि संपादक बनने का रेकॉर्ड बनाया है
डॉ संजीव कुमार___उनसे तो इकरारनामा था,रजिस्ट्री हमसे करानी पड़ेगी
प्रभात गोस्वामी___दिल्ली में विमोचन हो गया,अब जयपुर बेमानी
मृदुल कश्यप__व्यंग्य के खरगोशों को हराने वाला कच्छप
ललित शौर्य__ मंत्रियों से मिल रहा हूं,व्यंग्य बाद में
मोहन मौर्य____व्यंग्य का मेवाती चेहरा
राजेश कुमार____व्यंग्य, मानक शब्दों में टाइप करें
गोविन्द शर्मा____बाल साहित्यकार, पर व्यंग्य में ओवरटाइम
सुनील जैन राही____रेगिस्तानी खेत का मचान
कृष्ण कुमार आशु_____प्रेम के मार्ग का राही
दीपक गिरकर__समीक्षाएं व्यंग्य लिखने ही नहीं देती
राजेश सैन____अब एक छोटा सा अंतराल
अलंकार रस्तोगी_व्यंग्य का "रनर"भी चालीस हजार का
नीरज दईया____खानदानी व्यंग्यकार सिर्फ़ मैं हूं
संजीव निगम___अपनी ढपली अपना राग
प्रमोद तांबट______अभी चुका नहीं हूं
तीरथ सिंह खरबंदा___व्यंग्य के चक्कर में चौपट है धंधा
सिंघई सुभाष जैन____ये मुकेश राठौर है बड़ा बेचैन
मुकेश जोशी___मैं निर्दोषी व्यंग्यकार हूं
मुकेश राठौर______अमर उजाला से निराश हूं
जयप्रकाश पांडेय____व्यंग्य जैसा भी है, परोस देता हूं
रमेश सैनी____व्यंग्य का पुराना चावल
विवेक रंजन श्रीवास्तव__व्यंग्य का बाबू नहीं, अभियंता हूं
प्रदीप उपाध्याय___जहां जो छपे,वही लिखता हूं
सुधीर कुमार चौधरी____व्यंग्य का चौधरी कब बनूंगा
कमलेश पांडेय____आलोक पुराणिक,अनूप शुक्ल और मैं,व्यंग्य की नई त्रयी है परसाई,जोशी और त्यागी की तरह
आशीष दशोत्तर___रतलामी सेव की तासीर
संजय जोशी____दुखी हैं पड़ोसी
अभिषेक अवस्थी____सौरभ जैन के साथ फुल मस्ती
सूर्य कुमार पांडेय___गद्य पद्य दोनों से व्यंग्य दोहन जारी
बी एल अाच्छा____सम्मान से सुखी,व्यंग्य से दुखी
सुरेश सौरभ____लघुकथा से व्यंग्य उपजा देता हूं
अरविंद तिवारी____आज का ज्ञान समाप्त हुआ
आसिम अनमोल___पुरानी कतरनों का भी है मोल
अरुण अर्णव खरे____पुरस्कार से पुरस्कार खींचे जाते हैं
सुधीर ओखदे_____व्यंग्यकार के ठीक ठाक चौखटे
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