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Saturday, July 13, 2024

शाहजहांपुर बाढ़ की चपेट में


शाहजहांपुर आजकल बाढ़ की चपेट में हैं। शहर गर्रा और खन्नौत नदियों के बीच बसा है। इन नदियों ने अपने आलिंगन में समेट रखा है शहर को। शहर इनसे बाहर निकलने की कोशिश करता है तो नदियां गुस्से से उफनकर दबोच लेती हैं उसको। शहर को अपनी औकात पता चलती है। वह सहम-सिकुड़ जाता है नदियों के आगोश में। नदियां फिर उसको प्यार से समेट लेती हैं।
दो दिन पहले गए थे तो पता चला खन्नौत की तरफ के इलाके पानी में डूबे हैं। लोदीपुर की तरफ का रास्ता बंद है। पानी से भरा है। केरूगंज की तरफ से शहर में घुसे।
जिस जगह हम रहे वहां पानी नहीं भरा था। न बारिश हो रही थी। अंदाज नहीं था कि जिनके घर पानी में डूबे हैं उनके हाल कैसे होंगे।
पता चला और हमने बाद में पुल से देखा भी कि इमारतों में पानी भरा है। घर आधे-आधे डूबे है पानी में।
लोगों ने नदियों के किनारे घर बनाये हैं। कई साल पानी नहीं आता होगा उस इलाके में तो उसको सुरक्षित मानकर वहां घर बना लिए। लेकिन जब दस-बीस साल बाद नदी में पानी बढ़ता है तो उस जमीन पर फिर से कब्जा करता है। डूबो देता है जमीन को।
नदियों किनारे बने नीचे इलाके में बने घर ऐसे होते हैं जैसे किसी ट्रेन की कोई रिजर्व बोगी में अनारक्षित यात्री आकर बैठ जाये और कि पूरी यात्रा आराम कटेगी। लेकिन चार-छह स्टेशन बाद वह यात्री आये जिसके नाम बर्थ रिजर्व है और ट्रेन में आराम से लेटे यात्री को उठाकर कहे -'भाई साहब, यह बर्थ मेरी है। खाली कर दीजिए।' यात्री बेचारा दुखी होकर खुद को और सामान को भी समेट कर सीट छोड़ देता होगा।
नदियां भी इसी तरह अपनी जमीन पर कब्जा कायम करने को वापस लौटती हैं। लोगों को अपनी जमीन पर घर बसाए देखकर भन्ना जाती होंगी। बेदखल कर देती हैं लोगों को।
लेकिन यह पानी यहाँ की बरसात का नहीं है। बांध से छोड़ा पानी है। कहीं और बरसा होगा पानी। बांध में आया होगा। बांध का पेट भरा है। उसने पानी इधर उलट दिया। बरसा कहीं, भरा कहीं कहावत है न :
एक गांव में आग लगी, एक गांव में धुंवा।
एक दिन बाद खन्नौत की तरफ पानी कम हुआ तो गर्रा की तरफ बढ़ गया। नदी किनारे तमाम इलाके पानी में डूब गए। शहर के अस्पताल के सामने घुटनों, कमर तक के पानी में लोग भागते दिखे। जो बीमार हैं उनका क्या हाल होगा।
लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरे इलाके में भाग रहे हैं। सामान निकालना समस्या है। सामान ढोने वाली सवारियों के भाव बढ़े हैं। वो भी निकाल कहाँ पा रही है। लोग अपना सामान घर में ही छोड़ कर सुरक्षित इलाकों में जा रहे हैं।
बाढ़ के पानी ने रास्ते बदल दिए हैं। हमको 30 किलोमीटर दूर एक कार्यक्रम में जाना था। बरेली मोड़ पर पानी भरा होने के चलते दूसरे रास्ते जाना पड़ा। 30 किलोमीटर की दूरी 90 किलोमीटर में बदल गयी। रास्ते में जाम। 90 किलोमीटर की दूरी छह घण्टे में तय कर पाए।
शहर कई तरफ से पानी से घिरा है। जगह-जगह नदियों का पानी ‘जनता-दर्शन’ के लिए मौजूद है। लोग फोटो-वीडियो बनाने में जुटे हुये हैं। अनगिनत फोटो-वीडियो इधर-उधर टहल रहे हैं। लोगों के मोबाइल डिजटल बाढ़ में डूब रहे हैं।
दो दिन शाहजहांपुर रहने के बाद वापस लौट आये कल। खन्नौत की तरफ का पानी कम हो गया था। जाते समय जिधर से रास्ता पानी में डूबा था वह साफ हो गया था। उधर से ही आये।
शाहजहांपुर में तमाम मित्रों से मिलना हुआ। कुछ से नहीं मिल पाए। फिर मिलेंगे।
मित्रों के प्रेम-स्नेह की बारिश और बाढ़ में भीगे-डूबे। यह स्नेह/प्रेम की बारिश और बाढ़ ऐसी है जिसमें हमेशा भीगने और डूबे रहने का मन करता है।

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Thursday, July 11, 2024

मार्निंग वाकर्स ग्रुप के ठीहे पर

 कल शाहजहांपुर आना हुआ। सुबह टहलने निकले। सड़क पर लोग कम थे। शायद जल्दी हो अभी। साढ़े पांच ही तो बजे थे।

कई परिचित मिले। कुछ फैक्ट्री के , कुछ शहर के। कुछ लोगों ने कहा-'आप अब यहीं आ जाईये फिर से।' उनको पता नहीं था अपन रिटायर हो दो महीने पहले।
लोगों से मिलते ,हाल-चाल पूछते बताते सड़क पर टहलते रहे कुछ देर। सामने से शाहजहाँपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के Inderjeet Sachdev जी आते दिखे। बाद में Dr Anil Trehan त्रेहन जी भी साइकिल पर आते दिखे। ये दोनों बुजुर्ग युवाओ वाले जोश से शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप को लगातार सक्रिय और उत्साह से लबरेज रखते हैं। खुशी और उत्साह के किसी भी मौके को बिना सेलिब्रेट किये जाने नहीं देते। तय हुआ कि उनसे उनके ठीहे पर मुलाकात होगी।
आगे जाकर लौट लिए। एक बेंच पर बैठा एक आदमी आत्मालाप कर रहा था। रुककर सुना तो कह रहा था -'औरत के लिए उसका आदमी बिंदी, लिपिस्टिक, आलता लाता है। उनके टिकुली सिंगार के खर्च उठाता है। खिलाता पिलाता है। इसलिए औरतों को अपने आदमियों को पतिपरमेश्वर मानना चाहिए। '
हमने रुककर उसकी बात सुनी तो हमसे अपनी बात के समर्थन की अपेक्षा की उसने। हमको श्रोता समझकर उसने 'उनकी' ही तरह पूछा भी -"मानना चाहिए कि नहीं ?"
हमें लगा कि अगर हम रुके तो मनवा के ही छोड़ेगा। अपन बिना समर्थन दिए आगे बढ़ गए।
मैदान में पानी और पिछले दिनों हुई प्रदर्शनी का कचरा जमा था। बीच में घास भी दिख रही थी। साफ होगा धीरे-धीरे। कभी हमने यहां पुस्तक मेला लगवाने की सोची थी। लेकिन पहले कोरोना ने समय खा लिया और बाद में दीगर कामों में उलझ गए।
मार्निंग वाकर्स ग्रुप के ठीहे पर पहुंचे तो साथी लोग माला, शाल, पटका ले आये थे। हमको पकड़कर माला पहना दी, पटका पहना दिया और सभी के साथ फोटो भी हो गयी। जो बाद में आया उसने भी पहनी माला के साथ फोटो खिंचाई। अपन गर्दन झुकाए खड़े रहे। माला पहनने में गर्दन झुक ही जाती है।
सामने Saif Aslam Khan की बेंच नम्बर सात पर बैठे दो आदमी एक-दूसरे की तरफ झुके बतियाने में मशगूल थे।
शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के साथी हमेशा सम्मान करने वाले समानों से लैस रहते हैं। कोई भी खुशी का अवसर मिला, सम्बंधित सदस्य को सम्मानित करने का अवसर नहीं चूकते।
फोटोबाजी के बाद वक्तव्य भी हुए एक-एक मिनट के। किसी ने नाम गलत बोल दिया तो रिकार्डिंग दुबारा हुई।
बाढ़ आई हुई है शहर में आजकल। शहर के कई इलाके पानी में डूबे हैं। शारदा डैम का पानी छोड़ा गया है। लोगों के घरों में पानी भरा है। लोग बाढ़ से और चोरों से अपने घर का सामान बचाने की जुगत में लगे हैं। पता चला आज कुछ पानी कम हुआ है।
'जस की तस धर दीन चदरिया' की तर्ज पर सम्मान -सामान वहीं छोड़कर वापस आ गए। चाय पीते हुए पानी बरसने की आवाज सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा तो सड़क भीग रही है। मैदान भीग रहा है। बिल्डिंग भीग रही हैं। जहाँ तक देखो सब भीगता दिखा।
भीगने से याद आया कि पिछले दिनों 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' शीर्षक से बहुत कुछ लिखा गया। फ़ोटो सहित। हम उस बारे में कुछ न लिखेंगे।
फिलहाल हमको तो सामने की भीगती सड़क पर साइकिल पर भीगता जाता इंसान दिख रहा है। भीगने के नाम पर शेर भी याद आ गया। मुलाहिजा फरमाएं :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा। "
आपको भी कोई शेर याद आ रहा तो सुना दीजिए। इरशाद कह रहे हैं।

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शाहजहाँपुर में

 कल शाहजहांपुर आना हुआ। सुबह टहलने निकले। सड़क पर लोग कम थे। शायद जल्दी हो अभी। साढ़े पांच ही तो बजे थे।

कई परिचित मिले। कुछ फैक्ट्री के , कुछ शहर के। कुछ लोगों ने कहा-'आप अब यहीं आ जाईये फिर से।' उनको पता नहीं था अपन रिटायर हो दो महीने पहले।
लोगों से मिलते ,हाल-चाल पूछते बताते सड़क पर टहलते रहे कुछ देर। सामने से शाहजहाँपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के Inderjeet Sachdev जी आते दिखे। बाद में Dr Anil Trehan त्रेहन जी भी साइकिल पर आते दिखे। ये दोनों बुजुर्ग युवाओ वाले जोश से शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप को लगातार सक्रिय और उत्साह से लबरेज रखते हैं। खुशी और उत्साह के किसी भी मौके को बिना सेलिब्रेट किये जाने नहीं देते। तय हुआ कि उनसे उनके ठीहे पर मुलाकात होगी।
आगे जाकर लौट लिए। एक बेंच पर बैठा एक आदमी आत्मालाप कर रहा था। रुककर सुना तो कह रहा था -'औरत के लिए उसका आदमी बिंदी, लिपिस्टिक, आलता लाता है। उनके टिकुली सिंगार के खर्च उठाता है। खिलाता पिलाता है। इसलिए औरतों को अपने आदमियों को पतिपरमेश्वर मानना चाहिए। '
हमने रुककर उसकी बात सुनी तो हमसे अपनी बात के समर्थन की अपेक्षा की उसने। हमको श्रोता समझकर उसने 'उनकी' ही तरह पूछा भी -"मानना चाहिए कि नहीं ?"
हमें लगा कि अगर हम रुके तो मनवा के ही छोड़ेगा। अपन बिना समर्थन दिए आगे बढ़ गए।
मैदान में पानी और पिछले दिनों हुई प्रदर्शनी का कचरा जमा था। बीच में घास भी दिख रही थी। साफ होगा धीरे-धीरे। कभी हमने यहां पुस्तक मेला लगवाने की सोची थी। लेकिन पहले कोरोना ने समय खा लिया और बाद में दीगर कामों में उलझ गए।
मार्निंग वाकर्स ग्रुप के ठीहे पर पहुंचे तो साथी लोग माला, शाल, पटका ले आये थे। हमको पकड़कर माला पहना दी, पटका पहना दिया और सभी के साथ फोटो भी हो गयी। जो बाद में आया उसने भी पहनी माला के साथ फोटो खिंचाई। अपन गर्दन झुकाए खड़े रहे। माला पहनने में गर्दन झुक ही जाती है।
सामने Saif Aslam Khan की बेंच नम्बर सात पर बैठे दो आदमी एक-दूसरे की तरफ झुके बतियाने में मशगूल थे।
शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के साथी हमेशा सम्मान करने वाले समानों से लैस रहते हैं। कोई भी खुशी का अवसर मिला, सम्बंधित सदस्य को सम्मानित करने का अवसर नहीं चूकते।
फोटोबाजी के बाद वक्तव्य भी हुए एक-एक मिनट के। किसी ने नाम गलत बोल दिया तो रिकार्डिंग दुबारा हुई।
बाढ़ आई हुई है शहर में आजकल। शहर के कई इलाके पानी में डूबे हैं। शारदा डैम का पानी छोड़ा गया है। लोगों के घरों में पानी भरा है। लोग बाढ़ से और चोरों से अपने घर का सामान बचाने की जुगत में लगे हैं। पता चला आज कुछ पानी कम हुआ है।
'जस की तस धर दीन चदरिया' की तर्ज पर सम्मान -सामान वहीं छोड़कर वापस आ गए। चाय पीते हुए पानी बरसने की आवाज सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा तो सड़क भीग रही है। मैदान भीग रहा है। बिल्डिंग भीग रही हैं। जहाँ तक देखो सब भीगता दिखा।
भीगने से याद आया कि पिछले दिनों 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' शीर्षक से बहुत कुछ लिखा गया। फ़ोटो सहित। हम उस बारे में कुछ न लिखेंगे।
फिलहाल हमको तो सामने की भीगती सड़क पर साइकिल पर भीगता जाता इंसान दिख रहा है। भीगने के नाम पर शेर भी याद आ गया। मुलाहिजा फरमाएं :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा। "
आपको भी कोई शेर याद आ रहा तो सुना दीजिए। इरशाद कह रहे हैं।

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Wednesday, October 11, 2023

मेरा दिल ये पुकारे आ जा



शाहजहांपुर से वापस लौटने के पहले पंकज से मिलने गए। एक दिन पहले बातचीत के दौरान रागिनी Ragini ने बताया कि पंकज हमको याद करता है। उसी समय सोचा था कि जाने से पहले मिलेंगे पंकज से।
पंकज से मुलाकात कोरोना काल के दौरान हुई थी। गाने के शौकीन पंकज का अपना बैंड था -'शंकर बैंड।' उधार लेकर बैंड बनाया था। कोरोना काल में शादी-ब्याह में बैंड-बाजे बजे नहीं। काम बंद हो गया। कर्जा चुकाने के लिए बैंड के सब आइटम बेचने पड़े। रोजी-रोटी के लिए चाय की दुकान पर आ गए। गाने का शौक बरकरार रहा। जब भी जाते थे चाय पीने, पंकज का गाना जरूर सुनते थे।
कोरोना काल में तमाम लोगों के रोजगार तबाह हुए। होटल वाले, टूरिस्ट, ट्रांसपोर्ट और तमाम काम ठप्प हो गए। लोगों को लोन की किस्तें चुकाने के लिए गाड़ियां बेंचनी पड़ी। तमाम लोगों को लिए कोरोना एक भयावह याद की तरह है। लोग अभी भी उसके सदमे से उबर नहीं पाए हैं।
पंकज से सुबह मिलने के लिए गए। शाहिद रजा Shahid Raza जी को भी साथ ले लिया कहते हुए चलो बाहर चाय पीते हैं। गए जब तो पंकज का चाय का ठेला कहीं दिखा नहीं। हमे लगा शायद उसकी दुकान बंद हो गयी। लौट आये बिना चाय लिए।
शाहजहांपुर से चलते हुए हालांकि देर हो गयी थी लेकिन सोचा कि एक बार देखते हुए जाएं शायद पंकज की दुकान खुल गयी हो।
गए तो देखा दुकान खुली थी। पंकज के पापा थे दुकान पर। अब दुकान ठेले पर नहीं पक्की जगह थी। यह दुकान पहले किराए पर दी थी। किरायेदार का उधार था। वह चुकाकर उससे दुकान खाली करवाई और दुकान शुरू की। दुकान में बैठने की जगह भी थी। कुछ लोग अंदर बैठे चाय पी रहे थे। पीछे दुकान का नाम भी लिखा था -Yes tea.
पंकज ने बताया कि उनकी दुकान अब अच्छी चल रही है। बड़े भगौने में रखे दूध की तरफ इशारा करते हुए बताया -'सब दूध खत्म हो जाता है। शाम को फिर आता है। देर रात , ग्यारह-बारह बजे तक चलती है दुकान।
देर रात दुकान चलने के कारण ही सुबह देर से खुलती है दुकान।
पंकज ने बताया कि अब मम्मी की तबियत ठीक रहती है। बैंड वाले दोस्त जिससे थोड़ा मन-मुटाव था उससे भी फिर से दोस्ती हो गयी है। शादी के लिए मम्मी लड़की देख रही हैं। लड़की कैसी चाहिए पूछनी पर बताया -'जो घर में सबके साथ एडजस्ट करके चल सके।'
दांत कुछ साफ दिखे बालक के। पूछने पर बताया -'अब मसाला खाना बंद कर दिया। ' मुंह खोलकर दिखाया भी। मुंह में अधचुसा कम्पट जीभ की पिच पर पड़ा दिख रहा था।
मसाला खाना बंद कैसे किया ?पूछने पर बताया -'लगता था कि खराब आदत है। आप भी समझाते थे। फिर एक दिन सोचा नहीं खाना है। छोड़ दिया। अब तो महीनों हो गए खाये हुए।'
चलने के पहले गाना सुनाने को कहा। पंकज ने एक क्षण ठहरकर गाना सुनाया -'मेरा दिल ये पुकारे आ जा।' गाना सुनकर लगा कि गाना -गुनगुनाना कम हो गया है पंकज का। रोजी-रोटी की जंग में इंसान अपनी सबसे मनचाही आदत भी भुला देता है। हमने कहा -'गाते रहा करो।'
चलते समय सामने कहीं से आवाज आती सुनाई दी। लगा कोई बुला रहा है। इधर-उधर कोई दिखा नहीं। फिर देखा सड़क पार अपने घर के टेरेस से शुक्ला जी आवाज देकर इशारे कर रहे थे। बुला रहे थे।
शुक्ला जी फैक्ट्री से रिटायर हैं। बोलने-सुनने के मामले में दिव्यांग। लोग बताते हैं कि शाही तबियत के शुक्ला जी खुद सिगरेट नहीं पीते थे लेकिन दोस्तों को बुलाकर सिगरेट पिलाते थे। अनोखी आदत। पंकज की दुकान पर ही उनसे मुलाकात हुई थी। फिर अकसर होती रही। हमको देखकर सलाम किया। हमने भी नमस्कार किया। थोड़ी देर इशारे-इशारे में बात हुई। सब ठीक-ठाक का आदान-प्रदान हुआ और हम चल दिये कानपुर की तरफ।

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Tuesday, October 10, 2023

कचरा आर्ट से बनी कलाकॄति



सबेरे मार्निंग वाकर समूह के साथियों के साथ चाय पीने के बाद सैफ Saif Aslam Khan में साथ उनकी बनाई कलाकृति देखने गए। उनकी मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर।
शाहजहाँपुर आफिसर्स कालोनी की के तिराहे पर बने छुटके पार्क में गांधी जयंती के मौके पर सैफ की डिजाइन की हुई कलाकृति का लोकार्पण हुआ। स्वच्छता ही सेवा अभियान के अंतर्गत छावनी परिषद शाहजहांपुर द्वारा प्लास्टिक की प्रयोग की गई बोतलों को ग्लोब के आकार में जोड़कर इस कलाकॄति का निर्माण किया गया। पुरानी बोतलों से बनाई इस कलाकॄति को 'कचरा आर्ट' नाम दिया गया। प्रयोग की हुई वस्तुओं से बनी कृति को 'कचरा आर्ट' नाम दिया गया। इससे यह भी लगता है कि यह बेकार का काम है। कुछ और बेहतर नाम रखा जा सकता था।
प्लाष्टिक ग्लोब में बोतलें एक गोलाकार जाली से के ऊपर तारों से बंधी थीं। कुल 1032 बोतलों से बना था प्लास्टिक ग्लोब। ग्रीन फ्यूचर कलेक्टिव संस्था और आर्टिस्ट सैफ ने मिलकर इस ग्लोब को बनाया था। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री जी ने इसका लोकार्पण किया था। सैफ के नाम से सैफ गायब था। बोर्ड में उनका नाम असलम खान लिखा था। साथ न होते और बताते नहीं तो हम समझ ही न पाते कि इसके बनाने में सैफ की भी कोई भूमिका है। जल्दबाजी में ऐसे नाम गायब होते हैं।
बाद में छावनी बोर्ड के अधिकारियों से बातचीत करने पर पता चला कि प्लास्टिक ग्लोब की कुल लागत तकरीबन 70-75 हजार रुपये आई।
चंडीगढ़ के राकगार्डन की तर्ज पर बनाये इस प्लास्टिक ग्लोब जैसी अनेक योजनाएं हैं सैफ के पास। एक पत्रिका निकलना भी उनकी योजना में शामिल है। उत्साह भी है। लोग सराहना भी करते हैं। लेकिन योजनाओं में अमल के लिए पैसे की दरकार होती है। उसका इंतजाम शाहजहांपुर में रहते मुश्किल है। लेकिन उम्मीद तो है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी सैफ शाहजहांपुर आने के पहले दिल्ली में काम करते थे। वहां काम मिल जाता था। आमदनी भी होती थी। शाहजहांपुर में दोनों की किल्लत है। गए साल पिताजी के न रहने से घर संभालने की जिम्मेदारी भी आ गयी है। बहुत कठिनाइयां हैं कला की दुनिया की।
सैफ को अपनी भतीजी को स्कूल छोड़ने के लिए निकलना था। जाने के पहले कुछ फोटो और सेल्फी ली हमने। बाद में स्कूल जाते एक बच्चे को पकड़कर उससे भी फोटो खिंचवाई। इस आस में कि क्या पता कोई फोटो अच्छा आ जाये। बच्चा सेंट पॉल में पढ़ता है। ग्यारह में। चलते-चलते उसने हमारी फोटो खींचकर मोबाइल वापस कर दिया। सैफ अपनी भतीजी की छोड़ने चले गए। अपन पैदल वापस चल दिये।
पैदल वापस आते हुए स्कूल से लाउडस्पीकर पर गाया जाता राष्ट्रगान सुनाई दिया। सुनते ही हम फुटपाथ पर खड़े हो गए। राष्ट्रगान खत्म होने पर आगे बढ़े। आगे बीच सड़क पर दो घोड़े शांत , सावधान मुद्रा में खड़े दिखे। ऐसे जैसे वे भी राष्ट्रगान सुनकर ही सावधान हो गए हों। लेकिन वे बाद में बहुत देर तक उसी मुद्रा में खड़े रहे तो लगा कि वे ऐसे ही निठल्ले खड़े हैं। पोज देने वाली स्टाइल में। उनको देखकर लगा कि जानवर भी इंसानों की तरह अपने निठल्लेपन को अनुशासन बताना सीख गये हैं। संगत का असर ।
हम उनकी बगल से होते हुए निकले, उनकी फोटो खींची तब भी वे ऐसे ही चुपचाप खड़े रहे। इससे लगा कि वे शायद धूप सेंकने के लिए खड़े हो गए हों। टैनिंग के मूड से। उनसे कुछ पूछना ठीक नहीं लगा। किसी की निजता में उल्लंघन क्या करना।
आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए हम मार्निंग वाकर ग्रुप की बेच के बगल से होते हुए वापस गेस्ट हाउस आ गए। अगले दिन फिर गए सुबह तो वहां मिश्र जी ने शेरो-शाइरी भी सुनी गई।

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Sunday, October 08, 2023

प्रोटोकॉल का हल्ला और सुबह की चाय

 



मार्निंग वाकर ग्रूप मतलब ‘सुबह टहलुआ समूह’ के सदस्यों के साथ काफी देर तक बतियाये। गपियाये। कोई भी नया साथी आये उससे नए सिरे से मुलाक़ात। सीतापुर वाले मुंशी जी के बारे में पता चला कि बहुत दिन से दिखे नहीं। चने बेचने वाला बच्चा भी नहीं दिखा।
अपन बेंच नंबर सात वाली फुटपाथ की तरफ थे। सामने की तरफ वाली फुटपाथ पर लगी बेंचों पर लोग बैठे थे। कसरत कर रहे थे। बतिया रहे थे। सड़क पर आते-जाते लोगों को देख रहे थे। बदले में लोग भी उनको देखते हुए गुजर रहे थे। किसी ने कहा भी है –‘आप जो व्यवहार लोगों के साथ करेंगे, लोग भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे।‘
कुछ देर बाद तय हुआ कि चाय पी जाए। सबेरे बिना दूध की पी हुई आधी चाय यादों में कसक रही थी। मंदिर के पीछे बनी चाय की दूकान की तरफ जाते हुए तिराहे पर नया खुला ‘भारत ढाबा’ दिखा। लोगों ने बताया कि काफी गुलजार रहता है। लोग आते हैं। बैठते हैं। खाते-पीते हैं। बतियाते हैं। मीटिंग प्वाइंट जैसा कुछ। तिराहे के पास खाली पडी जमीन को जंगले से घेरकर बने ढाबे में मेज-कुर्सी रखी हुई थी। सुबह नहीं खुलता है ढाबा।
ढाबे को देखकर हमको याद आया कि पहले यहां ठेले वाले फल, सब्जी , भुट्टे और तमाम चीजें बेंचा करते थे। अब ढाबा खुल जाने के बाद वे कहाँ खड़े होते होंगे। पहले सुरक्षा कारणों से यहाँ किसी दूकान चलाने की अनुमति देने की बात सोची भी नहीं जाती थी। बदली परिस्थितियों में आमदनी के सभी संभावित मौके भुनाए जाने के समय में जहाँ से भी संभव हो, पैसा आना चाहिए।
चाय की दूकान की तरफ जाते हुए साथ के एक सज्जन ने पूछा –“ढाबे में बैठकर चाय पीने में आपके लिए प्रोटोकाल की कोई समस्या तो नहीं होगी?’
हमने कहा –‘ढाबे में चाय पीने में क्या प्रोटोकाल?’ दोस्तों के साथ ढाबे में बैठकर चाय पीने से भी क्या किसी प्रोटोकाल का उल्लंधन होता है? इंसान के साथ इंसान की मुलाक़ात का भी कोई प्रोटोकाल होता है क्या ?
होता नहीं है लेकिन आधुनिक होते समाज में प्रोटोकाल का हल्ला बड़ी तेजी से बढ़ा है। लोग अपने जनप्रतिनिधियों , बड़े अधिकारियों से सहज रूप में मिल नहीं सकते। यह प्रोटोकाल कभी सुरक्षा कारणों से लगता है और बाकिया पद के चलते। ऊँचे पद के साथ लोगों के यह एहसास होता है कि आम लोगों से मिलने-जुलने से उनके रुतबे में कभी हो जायेगी। अक्सर उनको उनके मातहत अपने साहब को यह एहसास दिलाते हैं कि आम लोगों से मिलने आपका रुआब कम हो जाएगा।
कल भी ऐसा हुआ। शाम को कुछ लोग मिलने आये तो बताया कि वे आ तो पहले गए थे लेकिन दरबान ने बताया कि साहब आराम कर रहे हैं। हमको ताज्जुब हुआ। हम तो दिन भर निठल्ले बैठे थे। न किसी को आने से रोकने के लिए कहा था । न आराम करने की बात । लेकिन मिलने वालों को इन्तजार कराया गया। प्रोटोकाल की महिमा अनंत हैं।
प्रोटोकाल की बात से जावेद अख्तर जी का सुनाया एक संस्मरण याद आया। छात्र जीवन में नेहरु जी उनके संस्थान आये थे। नेहरू जी के विदा होते समय जावेद साहब भागते हुए उनकी कार के फुटरेस्ट पर चढ़ गए और अपनी आटोग्राफ बुक नेहरू जी के सामने करके बोले –‘आटोग्राफ प्लीज।‘ नेहरू जी ने अचकचा कर उनको देखा और उनकी आटोग्राफ बुक में दस्तखत कर दिए। आज के समय दुनिया के किसी भी देश के प्रधानमत्री/राष्ट्रपति से इतनी सुगमता से मिलना और दस्तखत लेने की सोच भी नहीं सकते।
चाय की दूकान चाय आई। ग्लास में दूध की चाय देखकर मन खुश हुआ। खुशी में इजाफा करते हुए पकौड़ियाँ भी आयीं। बतरस के बीच सब चाय और पकौड़ी को आनंद के साथ उदरस्थ किया गया। वहां फोटोग्राफी और विडियोग्राफी भी हुई। वीडियो कमेंट्री के साथ यहाँ लगा है।
चलते समय हमने लपककर चाय के पैसे दे दिए। हिसाब नहीं पूछा इस लिए कि अगर हिसाब पूछेंगे तो फिर पैसे देने से रह जायेंगे। एतराज हुआ भी। चाय वाला भी इधर-उधर ताकता हुआ लेने , न लेने की मुद्रा में खड़ा रहा। हमने जबरियन पैसे उसकी कमीज की ऊपर की जेब में ठूस दिए। जेब में पैसे ठूंसने से नोट थोड़ा भुनभुनाया होगा। थोड़ी सलवटें भी आ गयीं उसके ठूंसे जाने से। उसको अपनी बेइज्जती भी खराब होती लगी होगी कि आज की तारीख में सबसे बड़ा नोट होने के बावजूद उसके साथ सुबह-सुबह इतनी जबरदस्ती हो।
चाय पीने के दौरान दूकान वाले ने बताया कि इसी महीने से किराया बढ़ गया है। पचास रूपया रोज हो गया है। किराए की बढ़ोत्तरी की सूचना देने के साथ ही उसने दूकान की छत से दिखते आसमान को दिखाया। हमने कहा –‘हो जाएगी मरम्मत भी। चिंता न करो।‘ वह कुछ बोला नहीं लेकिन हमारे कहने के बावजूद उसके चेहरे से चिंता के भाव गए नहीं।
चिंता जहाँ भी जाती है, वहां तसल्ली से रहती है। वापस आने की हडबडी नहीं रहती उसको। उसको इस बात की कोई फिकर नहीं रहती कि उसकी रिहायश से किसी को कोई तकलीफ है कि नहीं। चिंता की ख़ासियत है कि वो आती तेज़ी से है लेकिन जाती बहुत धीमे से है।
पैसे देकर अपन दूकान के बाहर आ गए। बाकी पैसे भी –‘चिल्लर धरे रहो’ वाले अंदाज में उससे लिए नहीं।
चाय की दूकान से निकलकर मार्निंग वाकर तो अपने-अपने घरों की तरफ प्रयाण कर गए । अपन सैफ Saif Aslam Khan की मोटर साइकिल पर बैठकर कैंट में पर्यावरण दिवस के मौके पर उनकी बनाई कृति देखने चल दिए ।

https://www.facebook.com/share/p/KqiAr1YgYp6hNBxn/

Saturday, October 07, 2023

रागिनी टाइम्स से बातचीत

 कल शाहजहांपुर में Ragini Srivastava , Saif Aslam Khan और Anoop Kumar Adv से मुलाक़ात हुई। सैफ़ से तो सुबह भी मिल चुके थे। रागिनी और अनूप दोपहर बाद सैफ़ के साथ आए मिलने। थोड़ी देर की इधर-उधर की बातचीत के रागिनी ने मोबाइल आन करके सामने बैठे अनूप कुमार को थमा दिया और बातचीत शुरू कर दी। मजाक-मजाक में इंटरव्यू टाइप हो गया। रागिनी ने इस अनौपचारिक इंटरव्यू को आज साझा भी किया।

बताते चलें कि रागिनी शाहजहांपुर की अकेली पंजीकृत महिला पत्रकार हैं । अपना चैनल रागिनी टाइम्स लगभग साल भर पहले शुरू किया था इस चैनल में मुख्य रूप से शाहजहाँपुर के आसपास से जुड़ी खबरें रहती हैं। चैनल से कुछ कमाई भी होने लगी है , ऐसा रागिनी ने बताया। उनके चैनल का लिंक कमेंट बॉक्स में दिया है। उनके चैनल को देखें और सब्सक्राइब करके रागिनी का हौसला आफ़ज़ाई करें। इस बीच हमारी अनौपचारिक बातचीत भी सुनें ।

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