![]() |
| अरमापुर की नाई की दुकान |
कल शाम को कटिंग करवाने गए। जाने से पहले सोचा बाल काटने वाले से कन्फ़र्म कर लें। दुकान खुली है कि नहीं। वह दुकान पर है या नहीं।
मोबाइल में जिस नाम के आगे 'हेयरकट' लिखा था उसको फ़ोन किया। पूछने पर जबाब आया -'अभी आते आपके यहाँ। घर पर ही करवायेंगे न कटिंग?' फ़ोन गलती से कानपुर में बाल काटने वाले के पास लग गया था। वो घर में आकर बाल काटते हैं। अरमापुर इस्टेट में कई अधिकारी इनसे बाल कटवाते हैं। कटिंग के साथ तमाम ख़बरें भी मिल जाती हैं लोगों को। जातीं भी होंगी। खबरची का काम दोतरफ़ा होता है। संयोग ऐसा कि हमने कभी इनके सेवायें भी नहीं लीं थीं।
फ़ोन गलती से लगा था। लेकिन बात हो गई इसी बहाने। तमाम बातें इसी तरह हो जाती हैं।
बाद में फ़ोन करके कटिंग सैलून गए। पता चला जिस जगह उसका सैलून था वह बंद हो गया था। बगल में चालू था सैलून। कारण पूछने पर बताया कि दुकान मालिक ने ज़्यादा किराया बढ़ा दिया था। खाली करना पड़ा।
कटिंग कराने के बाद डाई कराई। डाई धुलने के बीच के आधे घंटे का समय उपयोग करने के लिए कुछ फ़ोन किए। एक इलेक्ट्रॉनिक सामान लेने के लिए दुकान का नाम देखकर फ़ोन किया। फ़ोन में असामिया में पूछा गया -'क्या चाहिए?' आसाम में भी उसी नाम से दुकान रही होगी। हमने -'कुछ न ' कहते हुए फ़ोन काट दिया।
दुकान पर मौजूद लोग तमाम तरह की बातें कर रहे थे। धुरंधर फ़िल्म की बात हुई। कटिंग कराने आए ग्राहक ने बताया -' मैं देखने गया हाल में। थोड़ी देर बाद सो गया। घर आकर फिर OTT पर देखी। तीन चार बारे में।' वह धुरंधर -1 के बारे में बता रहा था।
दुकान का काम-काज देखने वाली महिला ने कहा -'पहले मैं रोमांटिक फ़िल्में देखती थी। खूब सारी। लेकिन अब मुझे मार-धाड़ वाली फ़िल्में पसंद हैं। मैंने तो धुरंधर की बुकिंग फरवरी में ही करा ली थी।'
मुझसे किसी ने पूछा नहीं। कोई पूछता तो कहता -'मुझे हर तरह की फ़िल्में पसंद हैं।' जबकि सचाई यह है कि मार-धाड़ वाली फिल्मों से अपन परहेज करते हैं। यही कारण है धुरंधर जैसी धुँआधार फ़िल्म देखने से बचे हुए हैं आजकल। अभी तक फ़िल्में बहुत कम देखी हैं। जो दोस्त लोग बताते हैं उनको देख लेते हैं। इसके अलावा मुझे रोमांटिक फ़िल्में पसंद हैं। पिछले दिनों कई फ़िल्में देखीं। एक दिन में एक के हिसाब से। आपने कौन सी फ़िल्म देखी पिछले दिनों?
![]() |
| दो कौड़ी की चाय |
सैलून में आशियाना की एक चाय की दुकान की भी चर्चा हुई। दुकान का नाम है -'दो कौड़ी की चाय।' आजकल ध्यान खींचने के लिए लोग अजब-अजब तरह के नाम रखने लगे हैं। जाएँगे कभी 'दो कौड़ी की चाय' पीने।
कटिंग और डाई के 550/- रुपए पड़े। नोयडा में इसके दोगुने पड़ते हैं। लखनऊ नोयडा से सस्ता है कटिंग के मामले में। कानपुर में भी 500/- में काम हो जाता था।
मुझे याद है कि छुटपन में हमारे पिताजी घर के पास लेनिन पार्क के सामने की फुटपाथ पर दाढ़ी- बाल बनवाने जाते थे। हम लोगों को भी ले जाते कटिंग कटवाने के लिये। वहां धूप में जमीन पर बिछी चादर पर बैठा कर नाई कटिंग करते। बैठाने के लिये चादर के नीचे या ऊपर ही एकाध ईंट रख लेते ताकि बैठने में आसानी रहे। कम पैसे में बाल कट जाते। उन दिनों हमारे घर के सामने स्थित ‘रंगीला हेयर ड्रेसर’ के मुकाबले ये फुटपाथिया कटिंग सैलून आधे पैसे लेता। खाली कुर्सी पर बैठकर बाल कटवाने के लिये दुगुने पैसे देने के मुकाबले जमीन से जुड़कर बाल कटवाना पिताजी को समझदारी लगती । इसमें कोई हीन भावना नहीं थी बस अनावश्यक फिजूलखर्ची से बचने की बात थी। अपने फुटपाथिया नाई की दुकान का नाम पिताजी बताते थे- गुम्मा हेयर कटिंग सैलून। गुम्मा ईंट को कहते हैं। ईंट पर बैठकर बाल बनवाने के कारण गुम्मा हेयर कटिंग सैलून कहते। कुछ लोग ईटैलियन कटिंग सैलून भी कहते।
'गुम्मा हेयर कटिंग' से शुरू करके 'लुक्स सैलून' तक की यात्रा में अनगिनत यादें जमा हैं। समय-समय पर उचकते हुए निकल आती हैं।


No comments:
Post a Comment