Tuesday, May 26, 2026

सबेरे की चाय और ब्लिंकिट


ब्लिंकिट डिलीवरी करने वाले भाई 


 सबेरे चाय बना रहे थे। पानी चढ़ाया। गैस जलाई। चीनी डाली। बाहर जाकर तुलसी की पत्ती तोड़कर लाए। डाल दी गरम होते पानी में। इसके बाद दूध का नंबर था।

दूध निकालने के लिए फ्रिज खोला। देखा दूध जमा हुआ था। कल काफ़ी देर खुले में रखा रहा। गर्मी में। अपनी अनदेखी से उसका मूड उखड़ गया होगा। फ्रिज में रखे-रखें जम गया। चाय के लिए अपने को अनुपलब्ध घोषित कर दिया। मानो बयान जारी कर दिया -' तुम हमारी बेइज्जती करोगे, हम तुम्हारा काम (चाय) बिगाड़ेंगे।'
दूध न होने पर गैस बंद कर दी। पहले सोचा बिना दूध की चाय पी जाये। लेकिन फिर दूध का इंतजाम करने की सोची। सबसे आसान विकल्प ब्लिंकिट पर आर्डर करना लगा। दूध का पैकेट 72 रुपए का आता है। अगर केवल दूध आर्डर करते तो 30 रुपए डिलीवरी के पड़ते। साथ में कुछ और मंगा लिया। 614 रुपए का आर्डर हुआ। 72 रुपए का दूध मंगाने में 30 रुपए का डिलीवरी खर्च बचाने के लिए पाँच सौ से ऊपर का और खर्च।
बाजार की शातिर हरकतें हैं। इतनी सफ़ाई से आपकी जेब काटता है कि खर्च करने को आप अपनी समझदारी मानते हैं। बेवक़ूफ़ी की बातों को 'मास्टर स्ट्रोक' बताने के देश व्यापी चलन के मुताबिक़ हमने इसे अपना 'मास्टर स्ट्रोक' समझने की कोशिश की। लेकिन फिर लगा इतनी बेवक़ूफ़ी भी ठीक नहीं।
ब्लिंकिट वाले भाई आठ मिनट में आ गए। पिछले दिनों डिलीवरी टाइम पर बड़ा हल्ला मचा था। केंद्रीय मंत्री की सलाह के बाद ब्लिंकिट ने अपने ब्रांड प्लेटफॉर्म से 10-मिनट डिलीवरी का दावा हटा दिया था । इसका मतलब है कि अब कंपनी डिलीवरी के लिए किसी तय समयसीमा को फिक्स नहीं करेगी। लेकिन डिलीवरी उसी हिसाब से हो रही है। आठ मिनट, दस मिनट।
हमने ब्लिंकिट वाले भाई साहब से पूछा -'इत्ती सबेरे आ गए ड्यूटी पर।'
ब्लिंकिट भाई बोले -' हाँ, सबेरे तीन घंटे 'ब्लिंकिट निपटाते' हैं। 150-200 रुपए मिल जाते हैं। पचास रुपये का पेट्रोल। बाक़ी बच जाते हैं।'
" 'ब्लिंकिट निपटाने' के बाद क्या करते हैं? " -मैंने पूछा।
एक ऑफ़िस में काम करते हैं। मोटर साइकिल स्टार्ट करके जाते हुए ब्लिंकिट ब्रदर ने बताया।
ब्लिंकिट से आए सामान को खोल कर डब्बों में भरा। गैस ऑन करके 'चाय-यज्ञ' दुबारा शुरू किया। चाय बनाई। चाय पीते हुए सोचने लगे -' निठल्ले बैठे-बैठे समय बर्बाद करने की बजाय अपन भी कुछ देर ब्लिंकिट निपटायें तो कैसा रहे? कुछ कमाई ही होगी।'
यहाँ कमाई का मतलब अनुभव की कमाई। लोगों ने मिलना, बातचीत करना अपने आप में रोचक बात है। पैसे भी आयेंगे ही। आजकल कई काम करने की सोचते हैं। लेकिन सोच पर अमल करने में आलस्य हमेशा हावी हो जाता है। आलस्य के साथ कुछ नया काम करने में हिचक भी बड़ी बाधा है। लंबी सरकारी नौकरी के बाद पेंशन शुदा इंसान कुछ नया करने लायक नहीं रहता शायद। लफ्फाजी के सिवा कुछ कर नहीं पाता निठल्ला रिटायर्ड इंसान।
आपका क्या सोचना है इस बारे में?