Saturday, May 28, 2005

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ



मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।
खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।
गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।
कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।
दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।
जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।
कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “ऐसा पहले कभी नहीं हुआ”

  1. neha

  2. ringtone
    ringtone
    ringtone And what a snow-pass vestures it, ringtone and secret-place to be target-shooting danger from frasers gray-stone people! It has
  3. फुरसतिया » मोहल्ले की प्रकृति और नारद
    [...] आज मेरी पसंद में, महिला दिवस के अवसर पर, अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट कर रहा हूं। यह कविता मैंने करीब बीस साल पहले लिखी थी लेकिन मुझे लगता है कि आज भी यह समाज के एक बड़े हिस्से का सच है। मेरी पसंद मैं , अक्सर, एक गौरैया के बारे में सोचता हूं, वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं। [...]
  4. गौतम राजरिशी
    प्रविष्टि की तारीख देखता हूँ, मई २००५….और फिर कविता पढ़ने लगता हूँ। वैसे आज मुझे पढ़ना नहीं चाहिये था इसे, क्योंकि अभी “ओस की बूंद” का जादू घेरे हुये है। लेकिन फुरसत से हूँ अभी “फुरसतिय” पे।
    और अब इस कविता को पढ़कर सोच रहा हूँ कि हर हमेशा मौज लेने वाले, परसाई के व्यंग्य और हँसी-मजाक के जुमले बिखेरने वाले फुरसतिया के इस रूप की जानकारी जाने कितने लोगों को होगी…???
    …वो अभी जो “पत्नि” वाला लिंक था, वो कोई दूसरा ब्लौग है क्या आपका? क्योंकि उसका ले-आउट कुछ दूसरा था
  5. ghughutibasuti
    हाँ, आज भी यही सच है।
    घुघूती बासूती
  6. …कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस
    [...] इस पर गौरैया उसे, झपटकर डपट देती होगी- खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अनूप शुक्ल [...]

Wednesday, May 25, 2005

चिट्ठी चिट्ठाकारों को बमार्फत रवि रतलामी

Akshargram Anugunj

प्रिय रतलामीजी,
मैं चिट्ठी बहुत पहले लिखना चाह रहा था।पर लिखना टलता गया। हुआ कुछ ऐसा कि मैंने पहले तय किया कि लिखूँगा पूरी दुनिया की हालत पर और संबोधन होगा भगवान को ।बताऊँगा उनको:-

देख तेरे सँसार की हालत ,क्या हो गयी भगवान...

इसमें पहले दुनिया का रोना-गाना बताकर फिर भगवान को धिक्कारने की बात थी कि हे भगवान,आप तो भारतीय नौकरशाही की तरह कान में तेल डाले बैठे हो-कब चेतेगो? अनुरोध भी करने का प्लान था कि अपना चिट्ठा-विट्ठा शुरु करो देवभाषा में। चूँकि मसाला तय हो गया और रूपरेखा तय हो गयी तो शुरु भी कर दिया ।दो लाइन लिख दिये ।अब चूँकि आधा शुरुआत हो गयी तो समझो आधा काम हो गया। अब मैं इसी चक्कर में था कि आधा हो गया तो पूरा होने में क्या समय लगेगा!इसी चक्कर में समय सरकता रहा हथेली में जकड़ी बालू की तरह।

फिर कुछ दिन बाद भगवान का आकर्षण कम होता गया। मेरे साथ कुछ लफड़ा है कि जो मैं समझता हूँ कि ये तो हो ही जायेगा वो मैं कभी नहीं कर पाता हूँ। फिर कुछ दिन वे गैरमुकम्मल मादा तस्वीरें सामने टहलती रहीं जिनसे कभी जिंदगी में साबिका पड़ा है। सोचा यह था कि सारे नारी पात्रों को एक साथ लेकर उनके बारे में लेख लिखा जाये। नाम सोचा था -भानुमती को चिट्ठी। भानुमती के कुनबे की तरह सारे लोगों के बारे में लिखने का विचार था-जोड़-तोड़ करके। उसमें सुन्दरता के पक्ष पर भी हाथ आजमाने का विचार था। पर कुछ ऐसा होता गया कि यह विचार भी परवान नहीं चढ़ पाया। कुछ हिचक रही कुछ यादों का बेतरतीब होना।हड़बड़ी में समेटने में बिखरने का खतरा था।हालाँकि जब से मैंने इस पर लिखने का विचार किया तब से लगभग हर मादा पात्र नजरों के सामने से गुजरी गोया याद दिला रही हो -हमें याद करते हो या भूल गये।अच्छा मजेदार बात यह है कि अब समय के साथ कोई पूरी याद बची ही नहीं। जो बहुत खूबसूरत लगती थी उसका नाम याद है पर वह नत्थी हो जाता है किसी कम खूबसूरत अच्छी आवाज वाली वाली लड़की के साथ। पढ़ने में बहुत अच्छी लड़की मिलती है उस खाने में जिनमें पढ़ाई की दुश्मन लड़कियां इकट्ठा हैं।स्मृतियां भी किसी गठबंधन सरकार की निर्दलीय विधायक हो गयी -जिधर मन आता है उधर चल देती हैं।इस पर किसी कवि ने बहुत पहले लिखा था:-

धोबी के साथ गदहे भी चल दिये मटककर,
धोबिन बिचारी रोती,पत्थर पे सर पटककर।


कुल मिलाकर हुआ यह कि दोनों इरादे अमल में लाये नहीं जा सके।अमल में न ला पाने का कारण यह भी रहा शायद कि यह पत्र उन लोगों को लिखने की सोची जा रही थी जिनके संपर्क में मैं नहीं हूँ आजकल।फिर अब जब तारीख निकल चुकी है अनुगूँज की तो फिर यह सोचा जा रहा है कि क्या करूँ ? लिखूँ कि मटिया दूँ! बीच में यह विचार किया था अखिलेशजी की कहानी पूरी कर लूँगा और उसी में अतुल की तरह अनुगूँज का लोगो लगा के जै सियाराम कर लूँगा।

बहरहाल अब जब पानी सर से ऊपर गुजर चुका है तो यह सोचा जब किसी को लिखना ही है तो आप ही क्या बुरे हो!आप ही को चिट्ठी क्यों न लिखी जाये? आप के माध्यम से सबको लिख रहा हूँ। आपको संबोधित इसलिये कर रहा हूँ कि अगर किसी को कुछ बुरा लगे तो मैं कह सकता हूँ कि भाई हम लोगों का आपस का मामला है।यह विश्वास है कि आप बुरा मानोगे नहीं । हम लोग हर हाल में बुरा न मानने के लिये अभिशप्त हैं।

हां तो मैं यह कह रहा था कि लगभग ९ महीने हो गये हमें लिखना शुरु किये। हमने जितना इतने दिनों में लिखा उतना जिंदगी भर में नहीं लिखा। लिखा होता तो किताबें छप चुकी होतीं और हर पांचवे सातवें दिन पूँछ की तरह हिल रही होतीं चिट्ठा विश्व में। चोरी-चोरी,चुपके-चुपके भी काम में अपने का यकीन कभी नहीं रहा जिसके अप्रूवल जैसी प्रकिया से गुजरना पड़े। शुरु में लिखने के समय सारा कच्चा माल खप गया। अब हर पोस्ट पर दिमाग में जोर लगाना पड़ता है।अच्छा,बीच -बीच में यह अहसास भी अपना नामुराद सर उठाता है कि हम कुछ खास लिखते हैं। 'समथिंग डिफरेंट' टाइप का।हम यथासंभव इस अहसास को कुचल देते हैं पर कभी-कभी ये दिल है कि मानता नहीं।तब अंतिम हथियार के रूप में मैं किसी अंग्रेजीलेखक की लिखी हुई पंक्तियां दोहराता हूँ:-

"दुनिया में आधा नुकसान उन लोगों के कारण होता है जो यह समझते हैं कि वे बहुत खास लोग हैं।"
यह डायलाग आपात चिकित्सा के लिये बहुत मुफीद दवा है। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसने असर न किया हो।
कारण शायद यह हो कि हम लोग घोटाले भले करोंड़ो-अरबों के पचा लें पर 'लास टु द स्टेट' पचाने में हवा सरकती है।पचास हजार रुपये तनख्वाह पाने वाला भी पाँच रुपये का नुकसान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं- नुकसान को निपटा भले दे(सेटल कर दे)

बहरहाल इधर कुछ दिन से जब से निरंतर निकलना शुरु हुयी तबसे हम और व्यस्त हो गये। खालीपूछिये फुरसतिया से लिखना रहता है पर लगता है कि सारी गाड़ी हमीं खींच रहे हों।उसमें भी बड़ा लफड़ा है।एक तो सवाल बहुत कम पूछते हैंलोग। जो पूछते हैं उनके जवाब नहीं सूझते। जो सूझते हैं भी उसके लिये सम्पादक से फोन पर पूछो तो कहेंगे महाराज -अनूप भाई,सच बात तो यह है कि कुछ गम्भीर हो गये जवाब।अब पता नहीं कब झूठी तारीफ करना सीखेगा यह हमारा प्रधान सम्पादक।इस पर एक मजेदार किस्सा सुना जाये:-

एक बार हमारे और ठेलुहा नरेश के संयुक्त चेलाधिराज अमरनाथ उपाध्याय हमारे घर पधारे । हाल ही में लंदन से छुट्टियों घर आये थे इसलिये शरीर आ गया था ,आत्मा हवा में थी। जबान से बीच-बीच में टेढ़ी होकर कुछ निकाल रही थी जिसे वो बता रहे थे कि यह ब्रिटेनिया अंग्रेजी है।बहरहाल वे पुराने गवैया हैं।आये तो गाना शुरु ही नहीं किया बहुत देर तक।तब हमारी श्रीमतीजी ने स्वागतगीत जैसा गीत गाया जिसके बोल कुछ --स्वागतम्‌,अथ स्वागतम टाइप के थे। फिर तो न पूछो।पट्ठा स्वागत से भाव विभोर हो गया।गाने ,ज्यादातर पुराने, गले से ज्वालामुखी के लावे की तरह बहने लगे।लगातार लरजती आवाज जब थमी घड़ी चार घंटे आगे सरक गयी थी।मेज पर चाय के कई खाली कप इकट्ठा हो गये थे।शाम को नेट लगाया तो दूसरी तरफ ठेलुहा नरेश हाजिर थे।जो बातचीत हुई दोनों में वो नीचे दी जा रही है:-

उपाध्याय:-प्रणाम सरजी!

ठेलुहा:- मस्त रहो बच्चा।

उपाध्याय:- आपके चरण छूने का मन कर रहा है।

ठेलुहा:-चिन्ता न करो । हम ई-मेल में अटैच करके भेज रहे हैं।छू लेना ।भक्तिभाव के अनुसार फल मिल जायेगा।और क्या हो रहा है?

उपाध्याय:-आप ही को याद कर रहे थे।

ठेलुहा:-जरूर हमारा गुणगान कर रहे होगे।

उपाध्याय:- अब आपका जिक्र आता है तो इतना झूठ तो बोलना ही पड़ता है-आपकी इज्जत रखने के लिये।

ठेलुहा:-लेकिन यह झूठ कितना सच लग रहा होगा।ऐसे सच लगने वाले झूठ बोलने में कभी कंजूसी नहीं करनी चाहिये।किसी से डरना नहीं चाहिये।भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता ऐसे आभासी सच बोलने वाले का।तुम जम के तारीफ करो मेरी ।जो होगा हम देख लेंगें।और हां,शुकुल से मेरा संदेश कह देना। (संदेश था:-उपाध्याय के गाने की हूटिंग जरूर कर देना ।हूटिंग न होने से ये नाराज हो जाते हैं।)


लब्बोलुआब यह कि अक्सर आप सच बोलके जितना अपना परलोक सुधार रहे होते हैं ।उससे ज्यादा अपना लोक बिगाड़ रहे होते हैं। बात, चल रही रही थी फुरसतिया से पूछिये की।तो कोई कहता है कि मामला गंभीर हो गया।कोई कहता है चिकाई कम करो।क्या करें कुछ समझ में नहीं आता।

निरंतर के तीन अंक निकल चुके हैं।वाह-वाह तो काफी हुआ।पर निकालने वाले आह-आह करने लगे। कोई कह रहा है कि भाई लोग अब आप लोग देखो,हम तो चले। देवाशीष कहते हैं रमन कौल चलायेंगे पत्रिका।हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं। जीतेन्दर बताते हैं देवाशीष के बिना निरंतर विधवा की मांग हो जायेगी।अतुल कुछ कहते हैं।पंकज कहते हैं आखिर यह सब हम कर किस लिये रहे हैं?आखिर क्या लक्ष्य हैं हमारे। फिर वह कहते हैं अनूपजी आप कुछ बोलते क्यों नहीं!तो भैया हमारे भी नामाराशि आ गये हैं।बताओअनूपजी ,बोलते क्यों नहीं।बोलो तो कम से कम अमेरिका में पंकज तो सुन ही लेंगे।

इधर की कुछ बात करूँ इसके पहले कुछ पुरानी बातें।मैं जितने दिन से जुड़ा यहां तब से देख रहा हूँ कि दो तरह के लफड़े आते रहे बीच-बीच में।कुछ तकनीकी कुछ गैर तकनीकी।गैर तकनीकी मुद्दे तो मैं समझता रहा। तकनीकी मुद्दे बहुत कम आये मेरी समझ में-अच्छा ही रहा।तकनीकी मुद्दों के पीछे भी कभी-कभी बचकानापन ज्यादा हावी रहा।ब्लागनाद ,हिंदी में टिप्पणी की सुविधा के लिये स्वामी के प्रयास के प्रकरण ने काफी आहत किया मुझे तथा सोचने के लिये मजबूर किया कि हमारे योद्धा आपस में यदुवंशियों की तरह लड़-मर रहे हैं।खैर ,जल्दी ही ऊब गये लोग तथा चुप हो गये।फिर अभी नारद प्रकरण।
मुझे इसकी महत्ता नहीं पता लेकिन यह जरूर लगा कि चिट्ठाविश्व कितना समय ज्यादा लगाता है! मैंने किसी अंग्रजी चिट्ठा में भी यह नारद देखा पता नहीं क्या लफड़ा है!स्वामीजी भी कह रहे थे कि 'इट सक्स टाईम'। कितना 'सक्स'?दो सेकेन्ड चार सेकेन्ड।क्या कर लेते हो इतनी देर में।खूबसूरती गजगामिनी होती है,हड़बड़ी में नहीं देखी जाती। फिर इससे देवाशीष को भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये। अरे जो बढ़िया दिखेगा वहीं लोग जायेंगे। मुझे तो चिट्ठाविश्व की खूबसूरती पसन्द है मैं उसी को देखूँगा। काहे को परेशान होता है यार! पर कुछ बात है जरूर।

इस तेज दुनिया में आयडिया बहुत तेजी से उछालते हैं लोग।अक्सर यह भी जाने बिना कि उसका मतलब क्या है?अगर अतुल के यह कहने पर कि चिट्ठाविश्व को निरंतर में समाहित कर दिया जाये ,देवाशीष उखड़ते हैं तो कतई गलत नहीं करते।ये कोई ब्लाग तो है नहीं भाई कि दो मिनट में बन गया दूसरा। फिर स्वाभाविक तौर पर जिसमें आदमी मेहनत करता है उससे लगाव तो होगा ही। हां, यह मेरे साथ होता तो मैं इस पर एक लम्बी पोस्ट लिखता और मजा लेता।लिया ही है पहले भी। देवाशीष चूक गये इस आनंद से।इसीलिये कहते हैं कि लिखते रहा करो देवाशीष।

तमाम बातें हैं वो फिर कभी।फिलहाल हिंदी ब्लाग तथा निरंतर के बारे में। एक तो पहले मैं बता दूँ कि यहां जो करना पड़ेगा वह खुद हमें करना पड़ेगा।नामचीन लोगों चाहें वे पूर्णिमावर्मनजी हों,रति सक्सेना हों या व्योमजी इनसे कुछ आशायें रखने के पहले हमें यह भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि इनके पहले से ही कमिटमेंट हैं।इनका सहयोग किसी साझे काम में स्वयंसेवक की तरह नहीं मिलेगा।रचनायें मिल सकतीं हैं प्रसाद के रूप में।हम कृतार्थ होते रहेंगे -बस।

निरंतर का स्वरूप क्या रहेगा यह तो समय बतायेगा।पर यह सच है कि मैं किसी भी रूप में इसे बंद करने का पक्षधर नहीं हूँ। न बंद करने का न आवृत्ति कम करने का।मैं आखिरी व्यक्ति हूँगा इसे बँद करने ले लिये कोई निर्णय लेने के लिये हाथ उठाने वाला।हमसे जो चाहा जायेगा मैं कर दूँगा पर तकनीकी तौर पर मेरा हाथ जरा तंग है।सो उधर हाथ नहीं डालना चाहता ।पर यह तय है कि पत्रिका निकलेगी चाहे कुछ कमतर होकर निकले।

यह भ्रम भी किसी को नहीं होना चाहिये कि वह हिंदी पर कोई उपकार कर रहा है। भाषायें किसी की मोहताज नहीं होतीं।न किसी के आने-जाने कोई फर्क पड़ता है।वास्तव में यह तो हम अपने परिष्कार के लिये करते हैं।हम अगर एक दिन कोई बढ़िया लेख लिख लेते हैं तो पूरा हफ्ता निकल जाता है उसके नशे से छूटने में।निरंतर बंद हो जायेगी तो ऐतिहासिक हो जायेगी। और आजकल ऐतिहासिक चीजोंकी बहुत पूछ हैं। लोग यहाँ नहीं लिखेंगे तो कहीं और लिखेंगे।यहां नहीं पढ़ेंगे कहीं
और पढ़ेंगे।पर यह कसक सबके मन में होगी कि यार,हम भी निकालते थे पत्रिका।

मैं कल्पना करता हूं कि मान लो कल को देवाशीष और रमन कौल समय देने में असमर्थ होने के कारण अलग हो जाते हैं।मैं या मेरे जैसा को तकनीकी रूप से सिफर आदमी कहता है भावुक होकर कि लाओ मैं निकलता हूँ पत्रिका।तो हमारे ये दो साथी क्या करेंगे? मेरे सामने खटाक से भारत-पाकिस्तान के उस मैच की तस्वीर सामने आ जाती है जिसमें आखिरी ओवरों में पाकिस्तान को कुछ रन बनाने थे।रन रेट दरकार ज्यादा था।ड्रेसिंगरूम से जावेद मियांदाद बराबर खिलाड़ियों को हर गेंद पर एक्टिंग करके बता रहे थे कि शाट ऐसे खेलो-वैसे खेलो।कुछ ऐसे ही ये दोनों दिग्गज बतायेंगे कि अनूप भाई अइसा करो-वइसा करो।पर करेंगे तो अपन तब जब उतना अकल होगी।अपने दिल के टुकड़े की हालत देखकर भावुक हृदय के स्वामी देवाशीष जी की नैनकटोंरो से आँसू निकलेंगे -एक इधर से एक उधर से।कितने रूमाल मिलेंगे श्रीमतीजी से महाराज!

देवाशीष की तकलीफें जायज हैं।यह पत्रिका सबको मिलकर चलानी होगी।सबको अपने हिस्से की मेहनत करनी होगी।यह नहीं कि जैसे देवता पुष्पवर्षा करते हैं वैसे 'लिंक' छितरा के चल दो।यह भी मेरा मानना कि अगर कोई काम नहीं हो पा रहा है तो उसके लिये हाय-तोबा मचाने के बजाय उसे अगले अंक के लिये छोड़ दिया जाये।अति उत्साहित होकर दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से बचा जाये।

यह तो हुयी निरंतर की बात।मेरा विचार है कि इसकी निरंतरता बनी रहे।आशा है बनी भी रहेगी।पर यह तय है किजिम्मेदारियां को फिर से देखा जाये कि किससे क्या सहयोग मिल सकता है।निठल्लों को भी कुछ काम सौंपे जायें।जुलाई तक तो तय ही है निकलना इसका आगे भी निकलेगी-यह मेरा विश्वास है।जब आप अपनी आसन्नमौत को बुत्ता देकर यहां हाजिर हो तो
इस पत्रिका की सांसे कैसे बंद हो सकती हैं!-हम सबके साथ रहते।कैसे जायेंगे दूर सर्टिफाइड नास्तिक वीर तथालाइलाज आशावादी


इसके बाद कुछ लिखने को बचा नहीं पर समेटने के पहले लगता है कुछ और लिख लिया जाये।पता नहीं कब मौका मिले फिर लिखने का पत्र। चूँकि बात हो रही है साथियों की जिनके बीच कुछ समझ का फेर स्वाभाविक है।ऐसा न हो तो दो लोगों के होने का मतलब क्या हो फिर? इस हालत में मतभेद हो सकते हैं।मतभेद होना अच्छी बात है पर मनभेद नहीं होना चाहिये।आपस में न्यूततम साझा ईमानदारी तथा अधिकतम सहयोग की भावना बहुत जरूरी है समूह में।मतभेद जितनी जल्दी सुलट जायें
उतना बेहतर।समय के साथ यह समझ भी बन जाती है कि अगला किस चीज से दुखी होगा तथा किससे खुश।हर आदमी खास 'टेलर मेड'होता है।उससे निपटने का तरीका भी उसी के अनुरूप होता है।यह हम जितनी जल्दी जान जाते हैं उतना खुशनुमा मामलाहोता है।

बहरहाल ,अब इतना लंबा पत्र लिख गया कि कुछ और समझ नहीं समझ आ रहा है।थोड़ा कहा ,बहुत समझना।यह पत्र मैंने रविरतलामी के लिये लिखना शुरु किया था ।पता नहीं कैसे दूसरे साथी अनायास आते चले गये।अपने एक दोस्त से बहुत
समय बाद मिलने पर मैंने उससे कहा कि मैं तुमको अक्सर याद करता हूँ। उसने जवाब दिया -याद करते हो तो कोई अहसान तो नहीं करते।याद करना तुम्हारी मजबूरी है।हमारे साथी कैसे हैं यह तो समय-समय पर लिखता रहता हूँ पर अगर किसी में कुछ कमी है तो उसके अपनी एक टुकड़ा भानुमती से सुना शेर अर्ज करता करके बात खत्म करता हूँ:-

वो जब इतना बेवफा है तो दिल उस पर मरता है,
गर खुदा वो बावफा होता तो क्या सितम होता।


आशा है छुट्टियां अच्छी बीती होंगी।
शुभकामनाओं सहित,
अनूप शुक्ला

Tuesday, May 17, 2005

आज मेरे यार की शादी है



बनारस हमें कई तरह से आकर्षित करता रहा है।वहां के लोगों के अलमस्त तबियत को बयान करने के सैकड़ो किस्से प्रचलित हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक कुलपति बनारस के बारे में कहा करते थे-बनारस इज अ सिटी व्हिच हैज रिफ्यूज्ड टु माडर्नाइज इटसेल्फ . काशीनाथ सिंह ने अपने तमाम संस्मरणों में बनारस को चित्रित किया है।उनके बहुचर्चित लेख ‘देख तमाशा लकड़ी का’ एक अंश के देखें:-
  • तो ,सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर सा बायोडाटा-कमर में गमछा, कंधे पर लंगोट और बदन पर जनेऊ- यह यूनीफार्म है अस्सी का ! हालांकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है।पैंट-शर्ट,जीन्स,सफारी और भी जाने कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग!लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो!वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लंगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो,गमछा अपनी जगह अडिग है!
  • खड़ाऊं पहनकर पांव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरु से एक आदमी बोला- “किस दुनिया में हो गुरु!अमरीका रोज-रोज आदमी चांद पर भेज रहा है और तुम घंटे भर से पान घुला रहे हो?” मोरी में ‘पच्’से पान की पीक थूककर गुरु बोले-”देखौ!एक बात नोट कर लो!चन्द्रमा हो या सूरज-साले कि जिसको गरज होगी ,खुदै यहां आयेगा।तन्नी गुरु टस-से-मस नहीं होंगे हियां से!समझे कुछ?”
    ‘जो मजा बनारस में ;न पेरिस में न फारस में’-इस्तहार है इसका।
    यह इस्तहार दीवारों पर नहीं ,लोगों की आंखों और ललाटों पर लिखा रहता है!
    ‘गुरु’यहां की नागरिकता का सरनेम है।
    न कोई सिंह ,न पांड़े,न जादो ,न राम!सब गुरु!जो पैदा भया ,वह भी गुरु.जो मरा वह भी गुरु!
    वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतंत्र है यह।
बनारसी आदमी हमेशा सर उठा के बात करता है। तमाम अन्य कारणों के अलावा इसका सबसे बड़ा कारण पान है।बनारस का पान मशहूर है।मुंह में पान आम बनारसी का पहचान है।जब मैं बनारस में हायर स्टडी(एम टेक) करने गया तो एक दिन हमारे गुरुजी हमको चाय की दुकान पर पकड़ लिये।चाय पान कराया फिर बोले आओ पान खिलाते हैं।मैं बोला गुरुजी मैंतो पान खाता नहीं।वे बोले-अबे यहां पान खाता कौन है ? बनारस में तो पान फेरा (बदला) जाता है। लेओ खाओ। हम निहायत शरम ओढ़ के विनम्रता से मना कर दिये यह कह के कि गुरुजी जब हमारी शादी होगी तब हम पहला पान खायेंगे।गुरुजी शायद हड़बड़ी में थे -मान गये। फिर हमारी शादी हो गयी । पान भी शायद एक ही खाया आज तक।एक शादी-एक पान।
शादी भले ही हमारी एक ही हुयी है पर गवाह मैं सैकड़ों शादियों का रहा।हालांकि मैं यह अक्सर कहता हूं कि अपनी शादी के अलावा किसी दूसरे की शादी में जाना निहायत बेवकूफाना हरकत है।पर फिर भी जाना पड़ता है दुनियादारी निभाने के लिये।इसी दुनियादारी के चक्कर में मैंने पिछले कुछ दिनों में सैकड़ों दूल्हों तथा हजारों बारातियों का दीदार किया है।हालांकि कोई आंकड़ा नहीं है(इसीलिये मैं दावे के साथ कह सकता हूं )पर हमारे देश में सड़कों पर शाम के बाद होने वाले सबसे ज्यादा जाम जुलूसों के कारण होते हैं।तथा इन जुलुसों में सबसे ज्यादा संख्या बारातों की होती है।जब भी मैं ऐसे किसी जाम में फंसता हूं तो कभी दायें-बायें से होकर निकलने की कोशिश नहीं करता।पूरे इत्मिनान और सम्मान के साथ दूल्हे तथा बारातियों का दर्शन-लाभ करता हूं।
पिछले दिनों मैं एक शादी में गया।बारात आम बरात की तरह चली। वही बैंड ।वही बाजा। गाने भी वही -यह देश है वीर जवानों का,अलबेलों का मस्तानों का तथा आज मेरे यार की शादी है। इन दो गानों की बल्ली के बिना किसी की शादी का तम्बू गड़ता आज भी।किसी बरात की नैया पार नहीं लगती बिना इन दो पतवारों के।
पर बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।
सजधज में मामूली परिवर्तन हो सकता है। संभव है कि सर पर मुकुट की जगह पगड़ी हो,नवाबी पोशाक की जगह टाईयुक्त सूट हो जो दूल्हे को इक्कीसवीं सदी की तरफ घसीटने की कोशिश करें पर इस साजिश को विफल करने के लिये हो सकता है कि घोड़ों की संख्या एक से सात हो जाये तथा लगे कि साक्षात सूर्यदेव रश्मिरथ पर सवार होकर तिमिरनाश के लिये निकल पड़े हों।कुल मिलाकर सारा गठबंधन मिलकर दूल्हे को बांगड़ूपने से बचाने की हर साजिश को विफल कर देता है।
मुझे लगता है कि भारत में तलाक का औसत कम होने का कारण भी यही है कि खुद को दूल्हे के रूप में दुबारा देखने की हिम्मत नहीं कर पाते होंगे लोग।कहां से लाये इतनी शताब्दियां समेट कर बार-बार!
दूल्हा तो हंडिया का चावल होता है।उसको देखकर बारातियों का अंदाज लगाया जा सकता है-‘जस दूलहु तस सजी बराता’ ।रास्ते भर बाराती अपने शरीर के सारे अंगों को एक दूसरे से दूर फेंकने की कोशिश में पसीने-पसीने होते हैं।कुछ आधुनिकता के चपेटे में आकर तथा कुछ पसीने की गंध से आकर्षित होकर अब तो दूल्हे भी मेहनत करने लगे हैं।इससे कुढ़ के अपनी शादी में नाचने से वंचित रह गये कोई गुजरा हुआ दूल्हा कहता है:-
दूल्हे भी करने लगे निज बारात में डांस,
हो सकता कल शुरु हो मंडप में रोमांस।
मंडप में रोमांस,जमाने की बलिहारी,
शर्म-हया इन नचकइयों के सम्मुख हारी।
पी शराब ‘प्रियभाष’हिलाते जब ये कूल्हे,
बैंड मास्टर या जोकर लगते तब दूल्हे।

मेरे एक जानने वाले स्लिम-ट्रिम ,स्मार्टनुमा अधिकारी , जिनको मैंने कभी सूट-टाई-बूट के बिना कभी नहीं देखा था ,वे अचानक ऐसी ही किसी बारात में पगड़ी पहने पकड़े गये।उनको पगड़ी में देखकर लगा कि गोदान का होरी बेगार करने आया है।पर पगड़ी के नीचे चेहरा-गरदन तथा शेरवानी देखकर मुझे लगा कि शायद ये शहनाई बजायें।पर मेरी दोनो धारणायें बेकार हो गयीं जब वे कन्या के पिता से समधौर करते पाये पाये गये।पता चला कि दूल्हा उन्हीं का लड़का था।
महिलाओं का जिक्र करना उचित न होगा क्योंकि वे सौन्दर्य की प्रतीक मानी जाती हैं। सुन्दरता को अपने इजाफे के लिये हर लटका-झटका करने की छूट सदियों से है। कभी-कभी कुछ महिलाओं को बारातों में देखकर लगता है कि सर्राफा बाजार टहल रहा है।
रवीन्द्रनाथ त्यागीजी की तर्ज पर कहें तो-इस सर्राफा बाजार से घिरे सौन्दर्य -समुद्र को हम थक जाने तक निरखते हैं(खारे समुद्र का पान नहीं किया जाता ) तथा बाकी छोड़ देते हैं दूसरों के लिये।
शादी में बढ़ते दहेज की बात करना अब ‘आउट आफ फैशन’ हो गया है।भ्रष्टाचार की तरह यह बहुत पहले से समाज में मान्यता प्राप्त है।यह जरूर विकास हुआ है कि अब लड़कियां भी कोशिश में रहती हैं कि उनको पति को खूब दहेज मिले ताकि जिंदगी चीजों का इंतजाम करने में न जाया हो जाये।उनकी समझदारी बढ़ गयी है। दूल्हों ने भी अनावश्यक संकोच को झटक दिया है तथा भारत के राष्ट्रपतिजी से प्रेरणा पाकर ऊंचे लक्ष्य रखना सीख लिया है।कल तक बेरोजगार लड़के जो साइकिल का पंचर बनवाने में पंचर से हो जाते थे वे क्लर्क की नौकरी लगते ही दहेज में कार की मांग करने लगते हैं-मय जिंदगी भर पेट्रोल के खर्चे के।इसीलिये हरिशंकर परसाईजी कहते थे–इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी में जा रही है।
हमारे पिताजी बड़े बतरसिया थे ।उनके एक गुजराती मित्र थे।वे भी खूब बतरसिया थे।वे एक बारात का किस्सा सुनाते थे:-
एक गांव से बारात गयी।जब बारात लड़की के गांव पहुंच गयी तो पता चला कि दूल्हे के कपड़े नहीं मिल रहे हैं।लोग परेशान।बारात चलने का समय होने वाला था।लोगों ने सोच-विचार कर एक दूल्हे जैसी ही कद-काठी के लड़के के कपड़े बारात की इज्जत का हवाला देकर दूल्हे को दिला दिये।लड़के ने कपड़े तो दे दिये पर उसे खल रहा था। किसी ने उत्सुकता वश उससे पूछा-दूल्हा कहां है ? वो बोला-दूल्हा वो बैठा है लेकिन जो पायजाम वो पहने है वो मेरा है।लोग हंसने लगे दूल्हे तथा बारात पर।इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांटा -ये बताने की क्या जरूरत है कि पायजामा तुम्हारा है?बारात की बेइज्जती होती है।कुछ देर बाद फिर किसी ने दूल्हे के बारे में पूछा तो वह बोला-दूल्हा तो वो बैठा है लेकिन जो पायजामा वो पहने है वो भी उसी का है।लोग फिर हंसे।दूल्हा शरमाया।बुजुर्गों ने फिर उसे डांटा-क्या जरूरत है तुमको पायजामें के बारे में बताने की?इस पर वह बहुत देर तक चुप रहा ।फिर कुछ लोगों ने जब उसे बार-बार दूल्हे के बारे में पूछा तो वह झल्लाकर बोला-दूल्हा तो वो बैठा है लेकिन उसके पायजामें के बारे में मैं कुछ नहीं बताऊंगा।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “आज मेरे यार की शादी है”

  1. eswami
    “दुल्हे की सजधज मे शताब्दियां सिमटी होती हैं!” क्या ओब्ज़रवेशन है गुरुदेव, क्या रेखांकन है – हंसते हंसते हवा छूट गई. अभी थोडे दिन पहले एक नया ब्लागची पूछ रहा था ब्लोग कैसे लिखते हैं – तो देख लो भईये ब्लाग ऐसे लिखते हैं.
  2. ई-स्वामी » भूत-बेताल नाचे बे-ताल!
    [...] �� सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है। - फ़ुरसतिया सजीव बाँगडू कोलाज यही सजीव बाँग़ [...]
  3. अथ बारात कथा
    [...] पेश है। लेकिन इसके पहिले अगर मन करे तो एक और बारात के किस्से बांच लिये जायें जिसमें हमने लिखा था: [...]
  4. anitakumar
    excellent analysis …….interesting presentation
  5. Lovely
    :-) :-) :-D
  6. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    अपने विवाह की याद आ रही है – मंगनी की टाई पहनने से बिल्कुल इन्कार पर पिताजी का रोष। नया काटता जूता और मेहरारुओं की ठिठोली!
    कान पकड़ता हूं – फिर कभी दुल्हा जो बना!

Monday, May 02, 2005

ठेलुहई की परम्परा


HPIM0090
डा.अरुण प्रकाश अवस्थी
दुनिया को अपने ठेंगे पर रखकर मस्त रहने के तेवर अवध के लोगों की खासियत है ।इस ठेलुहई के अंदाज से लोग बमार्फत इंद्र अवस्थी तो परिचित हैं।कुछ दिन पूर्व इनके पिताजी डा.अरुण प्रकाश अवस्थी से काफी दिन बाद मुलाकात हुई । कलकत्ते के किसी भी साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेख-कविता-संस्मरण छपते रहते हैं।कविता संग्रह रावीतट,क्रांति का देवता ,महाराणा का पत्र,असुवन जल सींचि-सींचि,राम-श्याम शतक तथा उपन्यास सिन्धु शार्दूल दाहिरसेन सबसे ऊपर कौन प्रकाशित प्रकाशित।सेंट्रल बैंक से अवकाश प्राप्ति के बाद आजकल अपने गांव मौरावां में शैक्षणिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।उनको जब इंद्र अवस्थी उर्फ ‘पुत्तन’के लेख पढ़ाये तो उन्होंने अपनी ठेलुहई की वंश परम्परा के बारे में बातें की।जो कुछ बताया वह जस का तस यहां प्रस्तुत है।
लल्ला पर जो पुत्तन का जो लेख पढ़ा वह वास्तव में बड़ा सशक्त रेखाचित्र है. -रेखैचित्र कहा जायेगा इसे ,हय कि नहीं !.लल्ला भी एक अद्वितीय जीव हैं।जैसे जीवन में कुछ बुराइयां होती हैं लेकिन वे अनिवार्य बुराइयां होती हैं जैसे हमारे मौरावां के फकीरे हैं।वैसे ही लल्ला में चाहे जो बुराई हों लेकिन लल्ला की उपस्थिति हर मौके पर अनिवार्य रहती है।पुत्तन का लेख मैंने पढ़ा और पढ़कर मुझे लगा जैसे जो वंश परम्परा में ठेलुहई के कीटाणु होते हैं वे पुत्तन में मौजूद हैं।
पुत्तन के बाबा पंडित जगदीश शरण अवस्थी उर्फ गुरुजी अपने जमाने के नामी ठेलुहा थे.एक बार पोरबंदर,गुजरात के नामी विद्वान महंतजी मौरावां आये थे.वो कहीं दो-चार दिन से ज्यादा रुकते नहीं थे ,लेकिन जब मौरावां आये तो छह महीने रहे थे ।जब उनका विदाई समारोह हुआ तो उसकी अध्यक्षता गुरुजी ने की थी.हम लोग भी थे वहां. तो महंतजी ने कहा-जिस व्यक्ति ने सारा संसार देख घूम लिया लेकिन अगर भारतवर्ष नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा भारतवर्ष घूम लिया लेकिन अगर उत्तरप्रदेश नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और पूरा उत्तरप्रदेश घूमने के बाद अगर वह उन्नाव जिला नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा उन्नाव घूम लिया लेकिन अगर मौरावां नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और मौरावां आकर जो गुरुजी से नहीं मिला तो समझ लो उसने कुछ नहीं देखा.यद्यपि पुत्तन और गुरुजी में ठेलुहई के गुण तो मिलते हैं लेकिन पुत्तन में बौद्धिकता थोड़ा ज्यादा है(नेपथ्य से आवाज आती है बरबाद हो गया लड़का).
Mrs and Mr Awathi
इंद्र अवस्थी के माता-पिता
पुत्तन ज्यादा पढ़ गये हैं.जबकि गुरुजी पढ़ने में जी चुराते थे.स्कूल नहीं जाते थे.सबेरे घर से स्कूल के लिये निकलते तो फुलवारियों,बगीचों में घूमा करते.फल -फूल तोड़ा करते थे.शाम को कपड़ों मे स्याही गिरा के घर आ जाते थे.ताकि लगे स्कूल होकर आये हैं.बड़े होने तक मां की गोद में घुस जाते रहे.रोज आकर अपनी मां से पूछते थे – हमारा नाम कब कालेज से कटेगा?तो उनकी मां बोलती थीं – जब तुम्हारा विवाह हो जायेगा तब तुम्हारी पढ़ाई छूट जायेगी.तो गुरुजी का संयोग से विवाह तय हुआ ,हो गया.पुरवा बारात गयी.जैसे ही बारात पुरवा से लौटकर मौरावां वापस आयी ,गुरुजी तमाम रस्मों को छोड़कर डोली से कूदकर अपनी मां की गोद में घुस गये और बोले -कल से स्कूल तो नहीं जाना पड़ेगा?
गुरुजी बहुत ऊंची चीज थे.एक बार हमारी भाभी के ऊपर भूत आ गया.गांव का मामला .एक तंत्र-मंत्र वाले थे .वे झाड़-फूक के लिये बुलाये गये.वे झाड़ने लगे.अंत में भूत ने कहा-(भूत जिसके ऊपर आता है उसी के माध्यम से बोलता है)कि हम लंबरदार हलवाई के यहां की रबड़ी खायेंगे.लंबरदार हलवाई की दुकान मशहूर मिठाई की दुकानों में थी मौरावां में.तो भइया खड़े थे वहीं.उन्होंने झट से पचास का नोट निकला और अपने लड़के से कहा-जाओ ओमी भाग के रबड़ी ले आओ.तो गुरुजी उस जगह हाजिर थे.गुरुजी ने कहा-रुक जाओ ओमिया(ओमी)और भाभी (अपनी बहू)के सामने हाथ जोड़ के खड़े हो गये. बोले-भूत बाबा ,अगर लंबरदार हलवाई के यहांकी रबड़ी खतम हो गयी होगी तो क्या बाबू हलवाई के यहां की रबड़ी ले लेंगे.तो भाभी ने हां में सिर हिला दिया लेकिन सर पर घूंघट कर लिया.तो गुरुजी बोले-तुम्हारी तो अइसी की तइसी भूत की.अगर रबड़ी ही खाने का शौक है तो जाके लंबरदार की दाढ़ी काहे नहीं हिलाते हो?
HPIM0086
डा.अवस्थी अपने साले डा.त्रिपाठी के साथ
गुरुजी स्वगत संवाद ज्यादा बोलते थे.अपने आप को संबोधित करके कुछ कहते थे फिर उसका जवाब भी खुद ही देते थे.मैं शुरु-शुरु मे कलकत्ता से मौरावां आया तो इस बारे में जानता नहीं था.गुरुजी के बगल वाले कमरे में लेटा था.सबेरे चार बजे नींद खुली तो सुना वो अपने को जगा रहे थे:-उठो जगदीश नारायन सबेरा हो गया .उठ जाओ नहीं तो पड़ेगी लात तो होश ठिकाने आ जायेंगे.मुझे लगा कि शायद बाबू के पास कोई और लेटा है.पूछने जाता था कि और कोई लेटा है क्या यहां ?वे गुस्से में कहते -यहां कौन है?फिर थोड़ी देर बाद नींद मुझे लगने लगे तो फिर गुरुजी के संवाद सुनायी देते:-जगदीश नारायण ये कलकत्ता से आये हैं.तुम्हारा जीना मुहाल कर देंगे.किसी तरह अपने दिन काटो लेकिन तुम भी कम नहीं हो.पूरी ताजी राते हिंद (कानून की किताब)तुम्हें जबानी याद है.तुम इनकी कविता-अविता निकाल दोगे सब एक ही झटके में.
गुरुजी हेमामालिनी की रोज पूजा करते थे.फोटो लगा रखी थी.आता-जाता कुछ नहीं था.धूप बत्ती जलाकर रोज जय देवीजी, जयदेवीजी रोज करते थे.गुरुजी का जब भोजन रखा जाता था तो थाली की आवाज होती थी.गुरुजी पीछे घूम के देखते थे.कहते -जगदीश नारायण खाना खा लेव नहीं तो कुत्ता खा जायेगा बैठे रहोगे रात भर भूखे.ये देवी तो कहीं जायेंगी नहीं. इनको फिर धूप बत्ती दिखा देना.
अद्भुत थे गुरुजी महीने में आठ दस बार बाल्टी कुयें में फेंक आते.जैसे पानी मांगा-एक गिलास पानी देव.गिलास जूठा होता तो धोने में दो मिनट लग जाता है.पर इतनी ही देर में गुरुजी की भौंहें चढ़ जाती थीं.पानी लाया जाता तो गुस्से में कहते-अब जगदीश नारायण पानी के लिये नहीं तरसेंगे.उठा के गिलास सड़क पर फेंक देते.और घर की सबसे भारी वजन की बाल्टी लेकर कुयें की तरफ चल पानी भरने के लिये.घर में पाइप है,बोरिंग है सब है लेकिन वो कुंये जाते थे.अब इतनी भारी बाल्टी उठा कहां पाते बीस-पचीस किलो वजन की.उसे वहीं कुयें में डाल के घर चले आते थे.महीने में पन्द्रह-बीस बार बाल्टी निकलवानी पड़ती थी.
गुरुजी बहुत जल्द नाराज होते थे.खुश भी.जब वे खुश या नाराज होते तो इजहार भी करते.तरीका यह कि तब वे अपनी धोती समेट के नितम्ब खुजलाने लगते.ऐसे ही किसी मौके पर आनन्दातिरेक में वे नितम्ब-घर्षण कर रहे थे.अचानक उनको अपने हाथ के अलावा कुछ खुरदुरा गीलापन भी महसूस हुआ .देखा तो पाया कि एक भैंस का बच्चा उनके नितम्ब-घर्षण में अपनी जीभ का योगदान कर रहा था.वे गुस्से में फिर नितम्ब-घर्षण में जुट गये.
ठेलुहई की यह परंपरा आगे की पीढ़ियों को भी हस्तान्तरित होती रही.जब देहावसान हुआ गुरुबाबा का तो उनके पोते का स्वत: स्फूर्त बयान था:-”आज पंद्रह अगस्त है.आज के ही दिन देश आजाद हुआ था.आज ही गुरुबाबा भी आजाद हो गये”.
अनगिनत यादें हैं गुरुजी से जुड़ी.वे ठेलुहई के चलते-फिरते स्कूल थे.अब ऐसे अद्भुत लोग कम होते जा रहे हैं.

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

4 responses to “ठेलुहई की परम्परा”

  1. विजय ठाकुर
    अहोभाग्य उन्नाव के, अब तो लगता है उन्नाव से गुजरने ही पड़ेगा।
  2. फ़ुरसतिया » जहां का रावण कभी नहीं मरता
    [...] के अवसर पर ठेलुहा नरेश के पिताश्री डा.अरुण प्रकाश अवस्थी से सुने मौरावां के � [...]
  3. फुरसतिया » याद तो हमें भी आती है
    [...] इंद्र अवस्थी खानदानी ठेलुहा हैं। आलस्य से इनका चिरस्थायी गठबंधन है। इंद्र अवस्थी में ठेलुहई के कीटाणु होने की बात की ठेलुहई को पुष्टि करते हुये उनके पिताजी ने कहा- लल्ला पर जो पुत्तन का जो लेख पढ़ा वह वास्तव में बड़ा सशक्त रेखाचित्र है. -रेखैचित्र कहा जायेगा इसे ,हय कि नहीं !.लल्ला भी एक अद्वितीय जीव हैं।जैसे जीवन में कुछ बुराइयां होती हैं लेकिन वे अनिवार्य बुराइयां होती हैं जैसे हमारे मौरावां के फकीरे हैं।वैसे ही लल्ला में चाहे जो बुराई हों लेकिन लल्ला की उपस्थिति हर मौके पर अनिवार्य रहती है।पुत्तन का लेख मैंने पढ़ा और पढ़कर मुझे लगा जैसे जो वंश परम्परा में ठेलुहई के कीटाणु होते हैं वे पुत्तन में मौजूद हैं। [...]

Saturday, April 30, 2005

आशा ही जीवन है

वैसे तो यह मान लेने में मुझे कोई एतराज नहीं होना चाहिये कि आशा ही जीवन है.पर जहां मैं सोचता हूं वहीं मामला गड़बड़ा जाता है.आशा ही जीवन है कहना ठीक नहीं लगता.आशा -आशा है,जीवन -जीवन .यह सच है कि आशा का जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है.पर आशा ही जीवन है कहना जीवन के बाकी तत्वों की उपेक्षा करना है.जीवन का तो ऐसा है कि जो भी चीज जरूरी दिखी उसी को कह दिया कि वही जीवन है.जल की कमी हो रही है तो जल बचत करने वाले जलपरियोजना से जुड़े लोग कहते हैं जल ही जीवन है.जो लोग देशप्रेम का झंडा ऊंचा किये रहते हैं जो लोग देश को प्यार नहीं करते वे मरे के समान हैं मतलब देश प्रेम ही जीवन है.लब्बो-लुआब यह कि जिस किसी को भी महत्वपूर्ण बताना हुआ तो कह दिया कि वही जीवन है.
Akshargram Anugunj
आशा ही जीवन है कहना कुछ वैसा ही है जैसे कि कुछ सालों पहले बरुआजी ने इंदिरागांधीजी के लिये कहा था -इंदिरा इज इंडिया.अब इंदिराजी नहीं पर देश टनाटन चल रहा है-वाबजूद तमाम उखाड़-पछाड़ के सो इंदिरा इज इंडिया तो सही नहीं रहा होगा.
आशा जीवन के लिये महत्वपूर्ण हो सकती है.ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जीवन की गाड़ी की दिशा निर्धारित कर सकती है पर भइये जैसे ड्राइवर और गाड़ी दो अलग इकाई हैं वैसे ही आशा अलग है जीवन अलग.बहुत लोग बिना किसी आशा के जीवन बिता देते हैं यह कहते हुये:-
सुबह होती है,शाम होती है
जिंदगी तमाम होती है.

बहुत लोग निराशा में ही जीवन बिता देते हैं उनके लिये निराशा ही जीवन है.आप लाख कहते रहो पर कि उनका जीना जीना नहीं है पर अगर वे कहते हैं हमारे लिये निराशा ही जीवन है तो आप अपनी आशा का कितना रंदा चलाओगे उन पर ?तो महाराज पहले तो मेरा यह बयान नोट किया जाये कि आशा ही जीवन है यह बात पूरी तरह सच नहीं है.जीवन में आशा के अलावा भी बहुत कुछ होता है.
यह तो हुआ मंगलाचरण.अब यह बतियाया जाये कि आशा है क्या ? हम बहुत पहले कह चुके हैं कि आशा हमारी पत्नी का नाम नहीं है. पर उस समय हम यह बताना छोड़ दिये थे कि आशा कौन है -किसका नाम है?तो अब वह बताने के प्रयास किया जाये.
आशा स्त्रीलिंग है.खूबसूरत है.आकर्षक है.बिना किसी उम्र-लिंग के भेदभाव के सबकी चहेती है.जीवन को अगर संसद कहा जाये तो आशा मंत्रिमंडल है.जीवन अगर कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो आशा वह शेयरधारक है जिसके पास इस कंपनी के सबसे ज्यादा शेयर हैं.जीवन अगर कोई गाड़ी है तो आशा उसकी ड्राईवर.जीवन अगर कोई इंजन है तो आशा उसका ईंधन.
आशा का स्थान बहुत जरूरी है जीवन में.बहुत कुछ होता है जीवन में जब मनचाहा नहीं होता.निराशा होती है.ऐसे समय में आशा एक संजीवनी होती है जिससे जीवन फिर उठ खड़ा होता है.आशा वह बतासा है जो जीवन के मुंह में घुल कर कड़वाहट दूर करता है.मिठाई में केवड़े की सुगन्ध की तरह है आशा की महक .
हमेशा से दुनिया में निराश होने का फैशन रहा है.आप देखिये अगर तो बहुतायत निराश लोगों की है.ये बहुसंख्यक निराश लोग भी अपने आसपास किसी आशा के दीप को जलते देखते हैं तो इनकी भी आंखें रोशनी की मीनार हो जाती हैं.आशा यह तेवर देती है कि हम किसी असफलता से सामना होने पर कह सकें:-
पराजित हैं हम
किंतु सदा के लिये नहीं
कल हम फिर उठेंगे
अधिक शक्तिऔर विवेक के साथ
!
आशा हमें यह खिलंदड़ा उत्साह देती है जो पराजयों के इतिहास को भी अनदेखा करके कह सकें:-
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते ,
दे शूल को संकल्प सारे.

हमारे एक कर्मचारी थे-वजीर अंजुम.वे डायबिटीज से पीड़ित थे.तमाम मध्यवर्गीय बीमारियां उनकी मेहमाननवाजी करतीं थीं. पर वे जब तरन्नुम में गाते :-
हादसे राह भूल जायेंगे,कोई मेरे साथ चले तो सही.
तो लगता कि तमाम अंधेरे में रोशनी की मीनार जल रही हो.वे आज नहीं हैं पर यह गीत उस मंत्र की तरह कानों में गूंजता है जिसको सुनते निराशा के भूत सर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह हो लेते हैं.
बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे जो आशा का झंडा फहराते हैं.तमाम सूत्र वाक्य मिल जायेंगे पर एक दिन मैंने किसी बोर्ड पर लिखा देखा- सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है. इससे बेहतर आशा का मंत्र मुझे नहीं मिला आजतक.
जीवन में हम तमाम परेशानियों से दो चार होते हैं.जिनसे हम पहले निपट चुके होते हैं उनसे निपटने के तरीके भी हमें पता होते हैं.पर जो नयी चुनौतियां आती हैं उनसे निपटने के नये तरीके भी खोजने होते हैं.पर आशा का लंगर वही होता है .यह स्थायी भाव है .
अब यहां तक काम भर का हो गया.अब लेख समेटा जा सकता है.पर सबसे पहले जो मैंने स्वामीजी का लेख पढ़ा था उसकी पढ़ताल करने का मन कर रहा है.ये बताते हैं आशा कुछ नहीं है.जो कुछ है वह महिमा प्रपंच की है.स्वामीजी बताते हैं आशा ही जीवन नहीं है बल्कि प्रपंच ही जीवन है.सच तो यह है कि न आशा ही जीवन है न प्रपंच ही जीवन हैं.आशा व प्रपंच एक दूसरे की ‘मिरर इमेज’ हैं.आशा किसी शिखर की तरफ बढ़ते हुये के धनात्मक भाव हैं तो प्रपंच शिखर से रपटते हुये किसी के वे कलाबाजियां हैं जो शिखर-पतित येन-केन-प्रकारेण शिखर पर बने रहने के लिये करता है.
आशा का झंडा लहराते शिखर पर चढ़ते के लिये दुनिया वाह-वाह करती है.जबकि शिखर बचाये रखने के लिये प्रपंचरत के लिये दुनिया कहती है-देखो इनकी हवस नहीं गयी.आशावादी के प्रयास हनुमान के प्रयास के प्रयास होते हैं जिनकी सुरसा तक तारीफ करती है जिसे वे धता बताकर निकल आते है.प्रपंचरत के प्रयास को स्वामीजी तक धूर्तता बताते हैं.आशा वरेण्य है,प्रपंच चुभता है.आशा तो सबको साथ लेकर चल सकती है.पर प्रपंच की त्रासदी होती है कि वह अकेला होता है.तमाम छल करने पड़ते हैं प्रपंच को.और जब वह बेनकाब होता है तो सदियों तक हाय वे भी क्या दिन थे कहने के लिये बाध्य होता है.प्रपंच तभी तक कामयाब होता है जब तक आशायें अलग-थलग रहती हैं.आशाओं के गठबंधन को देखकर प्रपंच पतली गली से निकल लेता है .
तो मतलब मेरा यही है कि अगर कोई कहता है आशा ही जीवन है तो आई बेग टु डिफर.पर यह भी सच है कि आशा बहुत बड़ी ताकत है जीवन को दिशा देने में.अगर डायलागियाया जाये तो कहा जा सकता है-आशा जीवन तो नहीं पर जीवन की कसम यह जीवन से कम भी नहीं.
बाकी तो तुलसी बाबा के शब्दों में:-
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत तिन्ह देखी तैसी
.

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “आशा ही जीवन है”

  1. eswami
    हां सही बात है, आशा धनात्मक है और प्रपन्च नकारात्मक का नकारात्मक है नीचे नही जाना इस डर से उपर चढते रहने का जुगाड! आज कल प्रपंच फेशन मे क्यों है?
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Thursday, April 21, 2005

वियोगी होगा पहला कवि

मैं आमतौर पर खुशमिज़ाज इंसान के रूप में बदनाम हूं.किसी किसिम की चिरकुट-चिंता से मुक्त.पर कभी-कभी कुछ-कुछ होने लगता है.क्या होता है बताना मुश्किल है. पर ‘ट्राई’मारने में क्या हर्जा ?
जब कभी मैं अपने तकनीकी वीरों को खुल्लमखुल्ला तकनीकी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते देखता हूं तो अफसोस होता है कि मैं उनको बूझने लायक भी नहीं.आगे सुझाव देना तो दूर.जब कोई नया तकनीकी सगूफा उछलता है तो मुझे वह बाउन्सर की तरह लगता है जिसे मैं हड़बड़ाकर डग कर देता हूं.कभी-कभी लगता है कि मैं भी सीखूं यह सब तो तमाम किताबें उठा के शुरु हो जाता हूं पर जल्द ही सोचता हूं यार आराम से देखेंगे.यह आराम पता नहीं कब नसीब होगा.पर होगा यह लगता है.
दूसरा अफसोस मुझे होता जब मैं तमाम स्वानमधन्य साथियों की कवितायें देखता हूं.मैं शर्म महसूस करता कि हाय हम काहे न लिख पाये.कविता-कानन में हम क्यों न टहल पाये?इतनी धांसू कवितायें देखता हूं कि शर्म से जमीन में धंस जाता हूं.कोशिश करता हूं कि मैं भी लिखूं पर वे प्रयास इतने बचकाने लगते हैं कि मैं सोचता हूं कि इससे तो हम बिना कविता के ही अच्छे.
एक बार परसाईजी के पास एक उम्रदराज युवा कवि आये.अपनी कवितायें दिखाईं.कहा -मैं जीवन में सब कुछ कर चुका हूं. अब साहित्य सेवा करना चाहता हूं.ये देखें मैंने कुछ लिखा है.बतायें मैं कैसे साहित्य सेवा कर सकता हूं?परसाईजी ने रचनायें देखीं और कहा-यदि आप सचमुच साहित्य सेवा करना चाहते हैं तो अनुरोध है कि आप इन कविताओं को छपाने की इच्छा का त्याग कर दें तथा संभव हो लिखना भी छोड़ दें.
यह बात तो मजाक में कही गयी होगी पर मैं जब भी कभी लिखता हूं-खासकर कविता तो लगता है कि शायद यह मेरे जैसों के लिये ही कही गई होगी.
बहरहाल मैं जब भी कोई कविता देखता हूं किसी ब्लाग में तो मन बहुतबेचैन होता है.हूक सी उठती है मन में-काश हम भी लिख पाते कुछ कविता -सविता.पर उस हूक को हम समझदारी से जबरियन दबा देते हैं.तब हमें अहसास होता है कि विद्रोह कैसे कुचले जाते होंगे.
पर सब कुछ अपने हाथ में नहीं होता.आजकल बच्चे बड़े समझदार हो गये हैं.मेरा बच्चा रोज मुझे देखता रहता.कोई नई कविता पढ़ने के बाद झोले की लटक जाता मुंह देखता.एक दिन उसने मुझे उदास होते रंगे हाथों पकड़ लिया.पूछा-पापा,आप उदास क्यों हैं?क्या कोई कविता पढ़ी.हमें लगा कि जिस बात को हम खुद से छिपाते रहे उसे मेरा बच्चा बता रहा है.हमने किसी घपले का खुलासा होते ही उसे दबाने के के प्रयासों की तत्परता से कहा -नहीं बेटा,ऐसी कोई बात नहीं है.पर वह माना नहीं.बोला-आप छुपा रहें हैं.पर मैं जानता हूं कि इसके पीछे कविता का दुख है.मैं बोला-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है.पर वह माना नहीं तो मुझे उसकी बात माननी पड़ी.मैंने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया.कहा-हां,मैं कविता के कारण दुखी हूं.
फिर तो वह मौज लेने लगा.बोला-यह आप उल्टी गंगा बहा रहे हैं.मैंने तो पढ़ा है कि कविता दुख से उपजती है.पहली कविता का जन्म ही आह से हुआ था.कहा गया है:-
वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान,
उमड़कर आखों से चुपचाप,बही होगी कविता अनजान.

बहरहाल हमें हमारे बच्चे ने आगे समझाया कि अगर आपको इस बात से दुख होता है कि आप कविता लिख नहीं पाते तो फटाक से शुरु कर दीजिये लिखना.कुछ दिन में हाथ रवां हो जायेगा तो धक्काड़े से लिखने लगेंगे फिर आपको रोकना पड़ेगा. मैंने कहा -नहीं यार नहीं होता अपुन से.
पर वह तुल गया समझाने पर.बोला -पहले जब आपने ब्लाग लिखना शुरु किया था तो कहां लिख पाते थे ?धीरे-धीरे सीखे न.वैसा ही यह भी होगा.मेरी हिचक देख के वह बोला अच्छा लाइये मैं बताता हूं कैसे लिखते है.दिखाइये वे ब्लाग जिनकी कवितायें पढ़कर मन बेचैन हो जाता है.मैंने सारे कविता-रस पगे ब्लाग उसे दिखाये.एक जगह वह चौंका -पापा ,यह क्या यहां पूंछ ऊपर है,मूंछ नीचे.मेरे मुंह से निकल गया-हर आदमी अपनी सबसे खास चीज को सबसे ऊपर रखता है.यहां क्या बुरा है.वह ,पापा आप भी हमेशा अपनी अकल लगाते हो, कहते हुये सारे कविता से लदे-फदे ब्लाग सरसरी तौर पर देख गया . फिर बोला -आप ,इन कविताओं की नकल करके कुछ लिखिये.पुत्र की सलाह मानने पर मजबूर होना पड़ा मुझे.मैंने जो लिखा वह नीचे दिया जा रहा है.अच्छा लगे तो मेरे प्रयास की तारीफ करियेगा.बुरा लगे तो उनको कोसियेगा जिनकी कविता की देखा-देखी हमने यहां शब्दों की गठबंधन सरकार बनायी:-
मैं
हवाई जहाज में
खाने के इंतजार में हूं
एअर होस्टेस आती है
पूंछती है -क्या लेंगे आप ?
मैं कहता हूं
मेरी मां के हाथ की बनी
बुकनू ले आओ.
वह चौंककर कहती है-
यहां हवाई जहाज में बुकनू कहां?
यहां तो इम्पोर्टेड नमक मिलता है.
मैं कैसे बताऊं-कितना जरूरी है मेरे लिये
इम्पोर्टेड नमक के मुकाबले
भोजन में मां के हाथ की बुकनू होना.

लड़के ने चार-पांच बार वाह-वाह किया फिर बोला अब एक इंकलाबी गजल लिख मारिये.हम बोले -कहां हम,कहां इंकलाब!पर वह जिद पर अड़ा रहा.मुझे लिखना पड़ा:-
या खुदा ये कैसे-कैसे मंजर नजर आने लगे,
जो रुकने को आये थे,उठ -उठ के जाने लगे.

बात तो साथ हरहाल में निभाने की हुई थी लेकिन
ये क्या हुआ कि खास अपने आंखें चुराने लगे.
जिनके हाथों में था रहबरी का आलिम खिताब,
वे सरे राह रहजनों के साथ नजर आने लगे.
देश की अब क्या सुनायें दास्तां ऐ मेरे दोस्त,
जो बहुत जागरूक थे वे भी तो जम्हुआने लगे.

यह इंकलाबी तेवर वाली गजल हम पांच मिनट में टाइप करके हांफने लगे तब तक लड़के ने वाह-वाह करके हमें चौंका दिया. वो तारीफ की हमें मजा आने लगा.अब हम भी सोचे कि एक प्रेम कविता पर भी ट्राई मारें नहीं तो पंकज बोलेंगे -हमारे लिये कुछ नहीं लिखा.तो जो ट्राई मारा वह यह है:-
ये खिला हुआ चांद कहां कुछ कहता है,
पर कुछ है यह जो मेरे मन में बहता है.

वैसे तो हमेशा ही हंसते रहते हैं हम,
अब कैसे कहूं दिल कितना दुखता है.
फिर देखने का मन है तुमको लेकिन,
लंबा बहुत तुम्हारे घर का रस्ता है.
औरों के तो नखरे भी होंगे लेकिन,
ले लेना दिल मेरा ये सबसे सस्ता है.

लड़का बोला -थोड़ा और जरा लुटा-पिटा लिखो.मैं बोला -क्या कारवां गुजार दूं ?नीरज की तरह लिखूं.वह नीरज को जानता नहीं है फिर भी बोला -तब क्या.बेवकूफी करना है तो कायदे से करें.मैंने फिर अर्ज किया:-
आंसू,जिल्लत,गम-न जाने क्या-क्या पी गये?
मजाक ही मजाक में हम जिंदगी जी गये.

सोचा था कभी सुकून से गुजारेंगे जिंदगी,
पर बेकरार,हड़बड़ी में जिंदगी जी गये.
ख्वाब में हमनें तुमको था देखना शुरु किया,
क्या हो रहा गुरु,सुना और हम सिहर गये.
कैसे बतायें थी जिंदगी कितनी कामयाब,
बेकरार- बेखुदी में सब हिसाब भूल गये.

पांच मिनट प्रति कविता की दर से चार कविता लिखने के बाद हमने गरदन अकड़ाकर लड़के की तरफ देखा.सोचा अब यह और तारीफ करेगा.पर वह तारीफ छोड़कर चुनौती वाले अंदाज में बोला.कोई व्यंग्य कविता लिख के दिखायें.मैंने कहा -कैसे लिखूं.बोला -जैसे ये लिखी.मैंने चुनौती स्वीकार की.लिखा:-
प्रेम विवाह करके
दंपति गति को प्राप्त पत्नी
बुढ़ापे में पति से बोली -
ये मुई जुड़वां लड़कियों की शादी कैसे होगी ?
पति चिंता मुक्त होकर बोला,
अभी भी लड़के काफी वेबकूफ हैं
जैसे तुमने भागकर शादी की थी
वैसे ये भी कर लेगी
हमें इस चिंता से मुक्त कर देगी.

मैंने कविता की खेती के कारण उपजे श्रम सीकर सुखाते हुये अपने लड़के की तरफ देखा.वह मुस्कराता हुआ बोला -पिकअप तो अच्छा है पर अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं लोग आपकी तुकबंदियों की तारीफ न करने लगें और आप गलतफहमी के शिकार न हो जायें.

10 responses to “वियोगी होगा पहला कवि”

  1. पंकज नरुला
    छा गए शुक्ली जी। हर कविता में एक नया शटाईल क्या बात है। मेरी पसंद
    जैसे तुमने भागकर शादी की थी
    वैसे ये भी कर लेगी
    हमें इस चिंता से मुक्त कर देगी.
    पंकज
  2. eswami
    मजेदार बात तो ये है की आपकी पाँच मिनिट में एक की गति से छापी गई तुकबंदी, स्वयंभू कवियों की “कविता” से ज्यादा सही जा रही है.
    मेरी पसंद –
    देश की अब क्या सुनायें दास्तां ऐ मेरे दोस्त,
    जो बहुत जागरूक थे वे भी तो जम्हुआने लगे.
    रवि भाई मेरे विचार में इस वाले की जमीन पे एक घाकड व्यंजल बन सकती है! :)
  3. जीतू
    “या खुदा ये कैसे-कैसे मंजर नजर आने लगे,
    जो रुकने को आये थे,उठ -उठ के जाने लगे.
    बात तो साथ हरहाल में निभाने की हुई थी लेकिन
    ये क्या हुआ कि खास अपने आंखें चुराने लगे.”
    मेरे ख्याल से फुरसतिया जी,आपने ने ये गजल अपने पाठको और श्रोताओ का रियेक्शन देखकर लिखी होगी,क्यों है ना सही?
    हा हा…अरे भई मै तो मजाक कर रहा था, वैसे गुरु मान गये, हर विद्या मे माहिर हो, फिर ये गीत,कविता,गज़ल क्या चीज है, आपके सामने. बहुत अच्छा लिखे हो, दो चार बार पढूँगा तो समझ मे भी आ ही जायेगा, नही भी समझ मे आयेगा तो, आप तो ही व्याख्या करके बताने वाले.आगे भी आपकी कविताओ का इन्तजार रहेगा, बस हाइकू वगैरहा मत लिखना
  4. Debashish
    हाईकू को लेक मुझे टॉंट मार रहे हैं जीतू भाई ;) रवि की व्यंजल का इंतज़ार रहेगा।
  5. जीतू
    अरे नही देबू भाई,
    ये तो फुरसतिया से इतना प्रेम है कि इनकी पोस्ट पर कमेन्ट मे, मै कोई लिहाज नही करता, आखिर फुरसतिया जी हमारे शहर के ही है, आज से पचास सौ साल बाद, इनका नाम कानपुर के इतिहास मे अमर रहेगा
    अब हाइकु का भी समझ लो, अमां जब तक कविता समझ मे आये, कविता ही खत्म हो जाती है, फिर पढो, फिर खत्त्म, ये सिलसिला चलता ही रहता है. हाइकु कविता तो एकदम ऐसी लगती है, जैसे सुक्खी दारू पी कर स्कूटर चला रहा हो और मै उसके पीछे दुबक के बैठा हूँ, कहाँ मोड़ेगा, कहाँ ब्रेक लगायेगा पता ही नही चलता.
  6. फुरसतिया » नियमित ब्लागिंग करने के कुछ सुगम उपाय
    [...] ५.कविता-सविता सिद्धान्त: नियमित कविता लेखन करते हुये आप नियमित ब्लाग लेखन कर सकते हैं। कविता लिखने का एक फ़ायदा यह भी है कि न उसका मतलब न लिखने वाले को समझने की जरूरत जरूरत होती है न पड़ने वाले की। आप कुछ भी लिखिये उसे कविता कहकर पोस्ट कर दीजिये। अगर आप कविता लिखने में बिल्कुल अपाहिज हैं जैसे की फ़ुरसतिया कोई भी कायदे की बात नहीं कर सकते तो आप अपने गद्य को ही खूबसूरत कविता का रूप दे सकते हैं। इसके तरीके यहां बताये गये हैं। इस तरह की पोस्ट आजकल प्रख्यात हिंदी ब्लागर दिलीप भारतीय इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। [...]
  7. puja upadhyay
    पहले तो आप सच्ची सच्ची बताइए कि कविता नहीं आपने बच्चे से तो नहीं लिखवाई थी? वाकई कवितायेँ बहुत अच्छी हैं.
  8. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.अति सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है 5.मेरे अब्बा मुझे चैन से पढ़ने नहीं देते 6.जेहि पर जाकर सत्य सनेहू [...]
  9. J. L. SINGH
    बहुत अच्छा लगा और प्रेरणा भी मिली!
    धन्यवाद.