Sunday, November 20, 2005

बड़े तेज चैनेल हैं…

http://web.archive.org/web/20110101185823/http://hindini.com/fursatiya/archives/66
बड़े तेज चैनेल हैं…


पत्रकार एक सनसनीखेज प्राणी होता है। वह सनसनी ओढ़ता है,सनसनी बिछाता है। सनसनाते हुये सांस लेता है सनसनाते हुये छोड़ता है। पत्रकार के जीवन से अगर सनसनी निकाल ले तो वह परकटे पक्षी की मानिंद असहाय हो जाता है।
पिछले कुछ दिनों से मैं अपने देश की पत्रकारिता का अंदाज पकड़ने का प्रयास कर रहा हूं। इस सिलसिले में कुछ एकदम ताजे से अनुभव जो याद आ रहे हैं वे प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
करवाचौथ के दिन जब पूरे भारत देश की हिंदू महिलायें अपने पति के दीर्घायु होने की कामना में निर्जला व्रत रखें थीं तथा अमेरिका में स्वामीजी श्रीमती अतुल अरोरा से पहलीबार प्रेमपूर्वक बतियाते हुये प्यारे देवर का दर्जा पाने के लिये पसीना बहा रहा थे उसी दिन स्वामीजी के गृहराज्य मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में एक व्यक्ति को देश के सारे प्रमुख टीवी चैनेलों ने घेर रखा था। उसके बारे में बार-बार सूचनायें प्रसारित हो रही थीं। उसने घोषणा कर रखी कि उस दिन शाम को पांच बजे उसकी मौत हो जायेगी। शाम तक पूरा देश टकटकी लगाये उसके बारे में समाचार देखता रहा।
बेरोजगारी,बलात्कार,भ्रष्टाचार की तमाम नियमित खबरों को ज्योतिष के चमत्कार ने किनारे कर दिया। जितने आत्मविश्वास से वह व्यक्ति अपने मरने की घोषणा कर रहा था उतने आत्मविश्वास से बहुतेरे लोग अपना नाम तक नहीं बता पाते।
विशेषज्ञों के भी बयान होते जा रहे थे। क्या आपको सच में लगता है कि आप मर जायेंगे? कैसा लग रहा है मरते हुये? मरने के बाद क्या करेंगे? इस तरह के तमाम सवाल भी पूछे जा रहे थे। शाम को ‘काउन्टडाउन’ शुरु हुआ। पांच बज गये। वह व्यक्ति नहीं मरा। लोगों ने सोचा कि शायद उनकी घड़ियां गलत हों लिहाजा लोगों ने कुछ देर और इंतजार किया। इसके बावजूद भी जब वह नहीं मरा तो टीवी चैनेल वाले उसे जिंदा छोड़कर दूसरे कार्यक्रम कवर करने चले गये। दिन भर की सनसनी का क्रेन्द्र बना वह व्यक्ति टीवी चैनेलों के लिये अचानक गन्ने की चुसी हुई गंडेरी हो गया।
देश के करोड़ों लोगों के अरबों घंटे बरबाद करके सारे चैनेल बिना किसी अपराध बोध के दूसरे कार्यक्रमों में मशगूल हो गये। किसी चैनेल ने इस मनोवृत्ति पर चर्चा करने में समय बरबाद करना उचित नहीं माना। ज्योतिष में विश्वास रखने वाले शायद कहेंगे कि कुंडली गलत बनी होगी। अविश्वास करने वाले कहेंगे यह सब बकवास है। तमाम लोग बीच की स्थिति में रहेंगे।
लेकिन यह सोचने की बात है कि जो देश एक आदमी के मरने की भविष्यवाणी के सही-गलत ठहरने की बात का सच जानने के लिये करोड़ों घंटे बरवाद कर दे तथा भविष्यवाणी गलत साबित होने पर उस बारे में सोचे तक नहीं ,चर्चा तक न करे वह देश कैसे आगे बढ़ेगा?
ऐन दीवाली के पहले धनतेरस के दिन दिल्ली में कुछ आतंकवादियों ने विस्फोट किये। दिल्ली दहल उठी। मैं टेलीविजन देख रहा था। एक चैनेल में उसका संवाददाता विस्फोट की ‘रनिंग कमेंट्री’ कर रहा था। उसके एक कान में मोबाइल चिपका था। दूसरे हाथ में कैमरा माइक था। वह घायलों को सीधे दिखा रहा था। हर क्षण अगल-बगल वाले से पूछताछ करते हुये मृतकों – घायलों की संख्या तुरंत घोषित करता जा रहा था। बिना किसी दुविधा के यह संख्या गलत भी हो सकती है। उसके बयान जो मुझे याद हैं:-
ये आप देख रहे हैं यहां धमाके हुये। अभी तक २० लोग मर चुके हैं। ४० घायल हो चुके हैं। क्या कह रहे हैं? तीस लोग मरे हैं? अच्छा पैंतीस और घायल ६० लोग हुये हैं। यह संख्या अभी और बढ़नी चाहिये।जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है मृतकों-घायलों की संख्या बढ़ रही है।अभी तक ४० लोग मर चुके हैं ७० लोग घायल हुये हैं।अभी तक इस घटना की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है।
संवाददाता के चेहरे पर दुर्धटना के चलते किसी उदासी की छाया नहीं है। उल्टे आवाज में घटना के सबसे पहले प्रसारण का आत्मविश्वास चमक रहा था। वह तीसरे अंपायर की तरह इधर-उधर भागते हुये कमेंटरी में पसीना बहा रहा था।वह वीर बालक वीर रस के कवि की तरह सनसना रहा था। सनसनी दिखा रहा था। सनसनी का क्लोज अप दिखा रहा था। उसके चेहरे पर गर्व का भाव था वह सबसे पहले इसे दिखा रहा था।
घटना की किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली” सुनकर लगता है कि ये लोग किसी आतंकवादी गुट से संपर्क करते होंगे-
यार, तुमने बहुत दिन से कोई जिम्मेदारी का काम नहीं किया। इसकी जिम्मेदारी ले लो। वह कहता होगा- भइया पुरानी ही जिम्मेदारी नहीं पूरी कर पाये हैं। ये नई कैसे लेलें। दूसरे गुट के लोग भी कुछ ऐसा ही कहते होंगे – क्या सारी जिम्मेदारी हमी लेंगे? किसी और को भी दो कुछ!
सवाल-जवाब भी मजेदार होते हैं। पहले से तय सा होता है कि सवाल ऐसे किये जायें कि बताने वाला हड़बड़ाकर उसी निष्कर्ष पर पहुंच जाये जिस पर वे पहले ही पहुंच चुके हैं।
दिल्ली दुर्धटना के बाद दीवाली वाले दिन संवाददाता लोगों से सवाल-जवाब कर रहा था-
सवाल-इस दुर्घटना के बाद अब दो दिन बाद कैसा महसूस कर रही हैं?
जवाब-बहुत खराब लग रहा है। जिसका इतना अच्छा पड़ोसी मारा गया हो वह अच्छा कैसे महसूस कर सकता है?
सवाल:- दीवाली कैसे मनायेंगीं? क्या पटाखे छुटायेंगी?
जवाब:- पटाखे की हमारी उम्र कहां रहीं? और अच्छा भी नहीं लगता दुख के माहौल में यह सब कुछ। बस खाली पूजा कर लेंगे। बच्चे हैं वे कुछ करेंगे कैसे रोकें उन्हें?
सवाल:-आपको क्या लगता है कि ये काम किन लोगों ने किया होगा?
जवाब- जिन लोगों ने भी किया वे बहुत खराब लोग हैं। पता नहीं क्या मिलता है उन्हें ऐसा करके? पता नहीं क्यों करते हैं वे ऐसा।
पत्रकार इस तरह के तीन-चार इंटरव्यू लेकर निष्कर्ष देता है:-
इस तरह आपने देखा कि दिल्लीवालों के हौसले आतंकवादियों की नापाक हरकतों से पस्त नहीं हुये हैं। दो दिन पहले हुये विस्फोटों से सहमी दिल्ली धीरे-धीरे अपनी लय में लौट रही है। दिल्ली के लोगों ने दिखा दिया है कि उनमें भाईचारे,उत्साह का कितना जज्बा है। शायद इसीलिये इसे दिल वालों की नगरी कहते हैं – नई दिल्ली के चांदनी चौक इलाके से कैमरामैन अलाने के साथ मैं फलाने।
ये निष्कर्ष श्रीमान फलाने लोगों से बातचीत के बाद नहीं निकालते। पहले से तय निष्कर्ष के अनुरूप जवाब पाने के लिये कवायद करते हैं। यह जड़ से फुनगी की स्वाभाविक यात्रा के उलट फुनगी से जड़ की यात्रा है। अंग्रेजी में इसे ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ कहते हैं। उल्टी यात्रा।
हर चैनेल खबर को सबसे पहले दिखाना चाहता है। सच दिखाना उतना जरूरी नहीं जितना अहम है सबसे पहले दिखाना। कभी-कभी तो चैनेल इतने तेज होते हैं कि खबरें प्रसारित होने के बाद घटती हैं। भूतपूर्व राष्ट्रपति की मृत्यु की सूचना भी किसी चैनेल ने पहले से ही दे दी। ‘काल करे सो आजकर आजकरे सो अब’।
आज सूचना ताकत बन गई है। समाचार चैनेलों की संख्या बढ़ती जा रही है। उनके लिये संवाददाता का चुनाव लोग शकल देख कर करते हैं। अच्छी शकल और आवाज वाले लोग भर्ती किये जा रहे हैं। समाचार की संवेदनशीलता ,भाषा पर पकड़ तो आ ही जाता है सोचकर भर्ती किये गये लोग जो भाषा बोलते हैं वो सुनकर कभी-कभी लगता है कि किस लोक के लोग हैं ये लोग जो ऐसी समझ में आने वाली भाषा बोल लेते हैं।
समाचारों का सबसे त्रासद पहलू यह हो रहा है कि उससे विचार नदारद हो रहा है। व्यक्तिगत ऊलजलूलपन समाज के सरोकारों से ज्यादा अहम है। महिलायें क्यों बाध्य हों करवाचौथ का व्रत रखने के लिये इस बात पर बहस के बजाय सारे देश को मजबूर किया जाता है कि एक अदद आदमी नियत समय पर मरता है कि नहीं। सारे देश की महिलाओं की जिंदगी के मुकाबले एक आदमी की मौत का तमाशा ज्यादा महत्वपूर्ण है।
यह सलाह फिजूल है कि उस आदमी की सारे दिन की रिकार्डिंग करके जरूरी होता तो बाद में दिखा देते। बाद में सनसनी कहां से लाते?
सानिया मिर्जा नई सनसनी हैं। उसकी अपनी जिंदगी है? वह टेनिस खेलती है। खूबसूरत है। कायदे से जवान भी नहीं हुई । टेनिस खेलने के अलावा शरमाने-इठलाने के दौर से गुजर रही उस लड़की से यह पूछना क्या मायने रखता है कि विवाहपूर्व यौन संबंध जायज है या नाजायज। क्या लोग विवाह पूर्व यौन संबंध सर्वे रिपोर्ट देखकर बनाते हैं? पता नहीं किन हालात में इस तरह के इंटरव्यू होते हैं कि सनसनी के छौंक के बिना काम ही नहीं चलता ।
टीवी पत्रकारिता अभी शुरुआती दौर से गुजर रही है। जिस तरह वाई२के के दौर में जो भी बच्चे मानीटर के सामने की बोर्ड पर हाथ रखे बरामद हुये वे अमेरिका भेज दिये गये उसी तरह हर चिकना-चुपड़ा बेरोजगार चेहरा मीडिया में धंस रहा है। जिस तरह कम्पयूटर में प्रोसेसर ,मानीटर तथा की बोर्ड के मुकाबले कम अहमनहीं होता वैसे ही शायद मीडिया को भी कुछ दिन बाद पता चले कि पत्रकारिता के लिये खूबसूरत शकल,स्मार्टनेस से भी ज्यादा जरूरी है संवेदना तथा भाषा पर पकड़।
क्या पता जिस दिन पता चले भी तो दूसरी कोई सनसनी इस खबर को नेपथ्य में डाल दे!
मेरी पसंद
अगर तू इश्क में बरबाद नहीं हो सकता,
जा तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता।
दिल के सहरा में कोई फूल खिला दीवाने
वर्ना ये शहर तो आबाद नहीं हो सकता ।
टूटना मेरा मुकद्दर है कि मैं शीशा हूं
और शीशा कभी फौलाद नहीं हो सकता।
मेरी आवाज तो मुमकिन है दबा दी जाये,
मेरा लहजा कभी फरियाद नहीं हो सकता।
मैं तुझे भूल भी जाऊं तो यकीं है मुझको,
तू मेरी फिक्र से आजाद नहीं हो सकता।
-स्व.वाली असी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “बड़े तेज चैनेल हैं…”

  1. अनाम
    बहुत ही सही बात पकड़ी है आपने। और बहुत ही अच्छे शब्दों में लिखा है। भारत की मीडिया भी बरबाद होती जा रही है।
  2. सुनील
    अनूप जी, बहुत अच्छा लिखा है और सही बात भी. हालाँकि आप ने बात टेलीविजन पत्रकारिता की है, पर आजकल के अखबार वाले भी समाचार देने के बजाय सनसनी खोजने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. किसी दुर्घटना से सीधा टेलीकास्ट करके, मृत्य लोगों के परिवारों से बेहूदे सवाल करना, देख कर घिन्न आती है.
    सुनील
  3. Manoshi
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। आपकी पसंद की शायरी भी बहुत पसंद आयी।
  4. जीतू
    आजकल तो सारे चैनल वाले, सत्यकथा और मनोहर कहानिया या कहो…गरम कहानियाँ के टीवी एडीशन हो गये है। क्या वो जमाना था, टीवी बालाएं अपना पल्लू सम्भालते हुए ख़बरे पढती थी, खबर अधूरी रह जाये लेकिन पल्लू नीचे नही गिरना चाहिये, आजकल तो पल्लू नाम की चीज ही नही रही। अभी पिछले दिनो पढ रहे थे, रुस मे एक चैनेल पर खबरे पढने वाली लड़की, खबरे पढते पढते एक एक करके अपने कपड़े उतारती जाती है। लगता है भारत मे भी वो दिन जल्द ही आने वाला है। न्यूज चैनेलों की भाषा कितनी गन्दी हो गयी है इसका उदाहरण स्टार न्यूज देखकल लगाया जा सकता है। और एक्सक्लूसिव का चस्का इतना चढा हुआ है कि कल को शायद ये लोग क्राइम भी खुद करवा कर, सबसे पहले खबरे दें दें। हम तो बस इतना ही कहेंगे

    “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान…कितना बदल गया इन्सान”

  5. Nitin Bagla
    हिन्दी चिट्ठाकारों में कई लोग मीडिया(दृश्य एवं श्रव्य दोनों)से जुडे हुए हैं…इस मुद्दे पर उनके विचार जानना दिलचस्प होगा…(भविष्य में अनुगूंज का विषय भी बन सकती है)
  6. shwetank
    Aap meri deewaanagi ho
  7. निधि
    आपके पुराने लेख पढ़ रही थी । इस वाले के साथ चिट्ठे पर टिप्पणी वाली प्रविष्टी (सुभाषित) भी पढ़ी । आनंद आ गया ।

Monday, November 14, 2005

शरमायें नहीं टिप्पणी करें

http://web.archive.org/web/20110926091413/http://hindini.com/fursatiya/archives/65


जीतेंदर की फिर एक लेख की मांग थी। एक लेख लिखा जाये जिसमें नियमित न लिखने वालों और ब्लाग पढ़कर (जाहिर है जीतू का पन्ना)टिप्पणी न करने वालों से मौज ली जाये। अब जब बात मौज लेने की होती है तो सबसे आसान तरीका यही होता है कि बात जीतू से ही शुरु की जाये। सो किया गया। लेकिन कुछ ऐसा सा हुआ(साभार संदर्भ- प्रत्यक्षा) कि जितना लिखा वो सारा ‘डिलीटावस्था’ को प्राप्त हुआ।
ऐसा पता नहीं क्यों हुआ कि मेरे लगभग पूरे लिखे दो लंबे लेख मेरे पीसी से गायब हो गये। मुझे लगता है कि मेरा कम्प्यूटर नहीं चाहता कि जीतू की खिंचाई की जाये। इसके पीछे कारण शायद यह हो कि जीतू कानपुर में बहुत दिन कम्प्यूटर भी बेचते रहे। जिस दुकान से मैंने कम्प्यूटर खरीदा वे वहां भी गये होंगे। अपने कुछ समर्थक वायरस दुकान पर छोड़ गये होंगे। वही आ गये होंगे मेरे कम्प्यूटर पर तथा जीतू की खिंचाई वाली मेल मिटा दी होगी।
बहरहाल इधर जीतू ने धमकी भी दे दी कि दूसरे लिखेंगे नहीं तथा उनके ब्लाग पर टिप्पणी नहीं करेंगे तो वो लिखना बंद कर देंगे। हमें लगा शायद वे सच में ऐसा करें लेकिन जब मैंने उनके ब्लाग पर पोस्ट देखीं तो मेरी खुशी हवा हो गयी। लगता है जीतू हमें बहुत देर तक खुश नहीं देखना चाहते हैं।
वैसे हमें नहीं लगता कि जीतू से किसी का करार हुआ था कि कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखें। अपने हिंदी में लिखने का कारण भी बताते हुये उन्होंने ऐसा कोई बहाना नहीं बताया था कि लोग टिप्पणी करेंगे तब ही वो लिखेंगे। या शायद बताया हो जो कि उनके देशप्रेम, भाषाप्रेम के कोलाहल में कहीं दब गया हो।
वैसे जहां तक टिप्पणी का सवाल है तो जीतू यथासम्भव प्रयास करते हैं कि उनका लिखा सब लोग पढ़ लें। तथा वे अपनी तरफ से पढ़ा हुआ तभी मानते हैं जब लोग उसपर टिप्पणी कर दें। कुछ दिन पहले मैंने अवस्थी से पूछा -क्या बात है आजकल आनलाइन नहीं दिखते! पता लगा कि जीतू के डर से ऐसा है। वे डरते हैं कि कहीं आनलाइन आ गये तो जीतू आ जायेगा और कमेंट के लिये पकड़ लेगा।
वैसे यह सच है कि लोगों का लिखना कुछ कम हुआ है। कुछ दिन पहले तक लोग नियमित लिखते रहे। आजकल कुछ हिंदी ब्लाग-बाजार कुछ मंदी के दौर से गुजर रहा है । लेकिन यह भी लगता है कि सच यह नहीं है। लिखने वाले लोग बढ़े हैं। उसी अनुपात में लिखने वाले भी। लेकिन कमी शायद इसलिये लग रही है कि जिस हलचल के नजारे हमने देखे कुछ दिन पहले अनुगूंज,बुनोकहानी आदि में वह नदारद दिखती है। हमारे ब्लागमंडल की सबसे बेहतरीन पोस्टों में से अधिकांश अनुगूंज के माध्यम से आईं । वही अनुगंज आज बेगूंज है। बुनोकहानी की विज्ञानकथा भी देश में वैज्ञानिक प्रगति की गति की ठहरी है। निरंतर की निरंतरता तो कभी की ठप्प हो गई।
टिप्पणियां भी काफी कम हुयी हैं। जो होती भी हैं वे काफी औपचारिक सी हो गई हैं। बीच में टिप्पणियों का बाजार काफी गर्म था। खासतौर पर स्वामी,कालीचरण का अंदाज। अवस्थी भी कुछ ढीले चल रहे हैं। जीतू भी अब बड़ा समझदारी का मुजाहिरा करते हुये शराफत की डगर पर चलने की कोशिश में लगे हैं।
एक दिन स्वामी की पोस्ट पर मैंने कहा जीतू से कमेंट करने को। तो शराफत के मारे बेचारे बोले -कमेंट करेंगे स्वामी बुरा मान जायेगा। हमें लगा कि कहें बहुत याराना लगता है स्वामी से! इसी तरह एक दिन हमने स्वामी से कहा कि जीतू की तारीफ में कुछ झूठ काहे नहीं बोलते? तो स्वामी ने कहा -जीतू की पोस्ट हमें आनंद बक्शी के गानों की तरह लगती है। लेकिन हमें शैलेंद्र के गाने ज्यादा पसंद हैं। तो हमने कहा- हे धर्मराज के वंशज! आधी ही तारीफ कर दे। रहस्यवादी डायलाग मार दे। लेकिन स्वामी के इरादे को उसके आलस्य ने पटक दिया शायद ।
कुछ यह भी है कि लोग टिप्पणी में सिवा तारीफ के कुछ सुनना पसंद नहीं करते। प्रत्यक्षाजी की कविता में हमने कुछ मासूम जैसे से सवाल पूछे। तो उन्होंने कोई जवाब देने के बजाय रचनात्मक स्वतंत्रता की बात कहते हुये कहा ये ठीक नहीं है सवाल उठाना। हमने सोचा चलो मान लें बात इनकी भी। बाद में अवस्थी ने भी बाहर से समर्थन करके, जैसे नकल करायी जाती है ,मासूम सवालों के आध्यात्मिक जवाब बता दिये। यहां तक तो फिर भी ठीक। अब अगले दिन प्रत्यक्षाजी कीटिप्पणी से हमें पता लगा कि हमें धमका कर टिप्पणी वापस करायी गई। धन्य हैं ऐसे महान रचनात्मक चिट्ठाकार!
रही बात और लोगों के लिखने न लिखने की तो भइया लोगों का मन करेगा तो लोग लिखेंगे नहीं करेगा तो नहीं लिखेंगे। तुम्हें लिखना है तो लिखो नहीं लिखना है तो वाह-वाह। लोगों की समस्यायें भी समझा करो!
लोग तमाम दीगर कामों में लगे होगें। अतुल को देख ही रहे हो अपने हथियार तेज कर रहे हैं तथा प्रदूषित भाषा लिखने का अभ्यास कर रहे हैं। देबाशीष ने इंडीब्लागीज का झंडा तो अब फहराया है इसके पहले वे पत्नी वियोग का सुख लूट रहे थे। परिवार बाहर गया है सो वे वह सब करने में व्यस्त हैं जो उनके रहने पर नहीं कर पाते तथा वो सब भी करना पड़ रहा है जो उनके रहने पर करना नहीं पड़ता। तभी तो गाना गाते हैं:-
ज़िदगी की राहों में रंजोग़म के मेले हैं,
भीड़ है कयामत की, और हम अकेले हैं।

पंकज, हां भाई से मिर्ची सेठ में तब्दील हो गये। मानसी ढोल बजाकर लोगों को कनाडा से दूर भगाने में लगी हैं। स्वामी क्यूबिकल में घुसे हैं। अवस्थी स्पैम की खेती कर रहे हैं। फुरसतिया के बारे में हम कुछ नहीं कहेंगे।
वैसे भी ज्यादातर ब्लाग लिखने वाले बड़े जोश से शुरु करते हैं कुछ ही दिन में होश में आ जाते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो लंबे समय तक मदहोश रहते हैं। परिवारी जन भी कहते हैं- क्या टाइम बरबाद करते रहते हो?इतनी देर बच्चे को पढ़ाओ-लिखाओ/खिलाओ बहलाओ तो कोई बात बने।( इसकी चौथाई भी मेहनत करते तो हम भी पोलियो भगाने में सहयोग करते टाईप के कमेंट हम नहीं बता रहे)।
कुछ लोग तमाम ब्लाग बना लेते हैं जैसे आय से अधिक सम्पत्ति रखने वाले लोग पत्नी,बच्चों ,कुत्तों,पिल्लों के नाम जमीन खरीद के डाल देते हैं या जैसे पुराने जमाने में राजा लोग जिस जगह शिकार खेलने जाते थे वहीं एक अदद रानी बना लेते थे। बाद में जैसे रानियां अंगूंठिया खो देती थीं वैसे ही आज लोग ब्लाग का पासवर्ड भूल जाते हैं।लोग चिंता भी नहीं करते। केवल एक मेल की दूरी पर रहने वालों से मीलों दूर रहते हैं।
जो लोग नियमित लिख सकते हैं वे या तो खुद पत्रिकायें निकाल रहे हैं या दूसरों का लिखा टाइप कर रहे हैं। हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान दे रहे हैं। लेकिन अक्सर होता यह है कि पाठक का भी लेखक से जब ताल्लुक नहीं होता तो अक्सर टाइपिस्ट के अलावा लोग कम ही पढ़ने का मन करते हैं।
टिप्पणियों का सवाल कुछ पेचीदा है। जीतू ने शायद इस विधा पर सबसे ज्यादा शोध किया है लेकिन सबसे ज्यादा दुखी भी वही हैं लोगों की चुप्पी से। मुझे हालांकि दुखी होने का कोई बहाना नहीं है फिर भी लगता है कि पाठक बहुत शरीफ हैं। टिप्पणी करने में लोग कुछ कतराते से हैं। तारीफ के अलावा कुछ लिखने में लोग संकोच करते हैं- पता नहीं क्या सोचेगा लिखने वाला। समय के साथ लोगों की झिझक खुलती है।
नये लिखने वाले के लिये टिप्पणियों का अहम रोल होता है। मुझे लगता है कि खाली-पीली ,कालीचरन,दिल्ली ब्लाग,देश-दुनिया, संजय विद्रोही,शशि सिंह तथा अन्य की कुछ बहुत अच्छी पोस्टों पर लोग उतना ध्यान नहीं दे पाये (टिप्पणी) जितना देना चाहिये। आजकल सबसे ज्यादा आकर्षक लिखने -दिखाने वाले दीपक जी भी अक्सर कमेंट विहीन रहते हैं। रविरतलामी जी ने शायद सबसे ज्यादा उपयोगी पोस्टें लिखीं होगी लेकिन उपयोगी पोस्टों पर लोगों की टिप्पणियां शायद सबसे कम रहीं।
जिनको मनमाफिक/अपेक्षित टिप्पणियां न मिलें वे श्रीकांत वर्मा की इस कविता से संतोष कर सकते हैं:-
डोम मणिकर्णिका से अक्सर कहता है,
दु:खी मत होओ
मणिकर्णिका,
दु:ख तुम्हें शोभा नहीं देता
ऐसे भी श्मशान हैं
जहां एक भी शव नहीं आता
आता भी है ,
तो गंगा में नहलाया नहीं जाता।

लिखना शुरु करने वालों का पहले झन्नाटेदार स्वागत करते थे लोग।चिट्ठाविश्व में काफी दिन खास जगह लगा रहता ब्लाग पता। अब जैसे लोग बढ़ रहे हैं कौन नया है कौन पुराना अक्सर पता नहीं लगता।
कलाम किसी का नाम किसी का की तर्ज पर नारद जी भी लोगों का नाम बदल रहे हैं। आशीष गर्ग की लिखी पोस्ट आशीष तिवारी की बता रहे हैं।
इधर लिखो उधर छापो की तर्ज पर चिट्ठाकारी का साल भर का सफर बहुत लगता है । प्रिंट मीडिया में तो साल भर में भी लोग जान तक नहीं पाते। कहते हैं -अच्छा ये भी लिखते हैं। क्या लिखा है मियां जरा सुनाओ।
वैसे ये पोस्ट मैंने यथासम्भव बेतरतीब लिखने की कोशिश की है। ब्लागिंग के सूत्रों की अधकचरी सी व्याख्या टाइप। वास्तव में कुछ ब्लाग नुमा जैसी सी इस पोस्ट का जीतेंद्र ने शीर्षक सुझाया था -कमेंट का तकादगीर। हमारा ऐसा कोई तकादा नहीं है। लेकिन अगर आपके कोई विचार हों तो प्रकट करने में सकुचायें नहीं। सच बोलने से डरना नहीं चाहिये क्योंकि झूठ के पैर नहीं होते।
यह सुझाव भी देना चाहूंगा कि जिसके ब्लाग पर अपेक्षित टिप्पणियां न आ रहीं हों वे अपने ब्लाग का जन्मविवरण मानसी के पास भेज दें। वे ब्लाग की कुंडली देखकर शायद कुछ उपाय बता सकें।
इंडीब्लागीज का शंखनाद देबाशीष ने इसबार खुलेआम कर दिया है।सब लोग देबाशीष को यथा संभव इसमें सहायता करके उनके हाथ मजबूत करें। लिखने की जरूरत नहीं फिर भी लिखने में कोई हर्ज भी नहीं कि हमारी तरफ से हर तरह का सहयोग रहेगा ।
मेरी पसंद
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।
जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।
जिंदगी चाहिए मुझको मानी* भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।
लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।
जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर** चाहिए।
*- सार्थक
**-नम आँख
-डा.कन्हैयालाल नंदन
नई दिल्ली
०३.१०.२००५

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

10 responses to “शरमायें नहीं टिप्पणी करें”

  1. Atul
    टिप्पणी के बिना ब्लाग अधूरा है, टिप्पणी लेख की सूनी माँग में भरी लाली है, टिप्पणी नवजात शिशु के माथे पर लगा कजरौटा है पर अत्यधिक दुःख का विषय है कि टिप्पणीकर्ता ही सबसे उपेक्षित वर्ग है ब्लागिंग में । कही किसी ने स्पैम के नाम पर जबरिया नाम पता दर्ज कराने की ज्यादती पेल रखी है तो कहीं किसी के यहाँ टिपियाने के लिए ऐसी तिर्यक लिखाई देख कर , उसे चीन्ह कर फिर से टाईप करना पड़ता है जैसी हम बचपन में लिखते थे। लोग लेख देखकर वाह वाह करते हैं पर कोई टिप्पणी देख कर नही कहता कि वाह क्या टिपियाया है। और तो और इंडिब्लागिज अवार्ड भी टिप्पसकला की उपेक्षा में बराबार का साझीदार है। ब्लाग लेखन पर बीसीयों श्रेणियाँ , दसियों पुरस्कार पर टिप्पणी को कोई पूछने वाला नहीं? मेरे हिसाब से
    इंडिब्लागिज में दो श्रेणीयाँ और होनी चाहिए।
    सर्वश्रेष्ठ टिप्पसबाज
    सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी
  2. eswami
    इस मे कोई शक नही है की ब्लाग-मंडल मे अभी मद्धी का दौर है और ये तेजी-मँदी का क्रम तो चलता रहता है.
    जीतू के प्रयास मौज लेने लायक नही तारीफ करने लायक हैं. हर ब्लाग पर लगातार टिप्पणी करना भी संभव नही हो पाता. अब मैं उनकी लिखी हर पोस्ट पढता जरूर हूँ – पसँद करता हूँ तभी ना!
    और वो मुझे “गुरु-घंटाल” बुलाते है प्यार से – आप अँदर की बात समझो ना! अब सब के सामने सायास प्रेम्-प्रदर्शन हमारी सँस्कृति के खिलाफ है! ;-)
  3. खुशबू
    अच्छा लिखा है।
  4. kali
    Dekho jyaada khinchai maat karo jitu ki. Narad ki feed main tumhare post nahi aa rahe hain. Woh to hum soche ki fursat ke bazaar se kuch nikla nahi bahut dino se to tum tehlte hue aa gaye is chaupal per. Jara Gariyao Jitu bhai per aur narad ki feed main aao.
    J
  5. जीतू
    ई का है शुकुल? हर समय नहा धोकर हमारे पीछे पड़े रहते हो। रजिया गुन्डों से तो बच आई यहाँ अपनो के बीच फ़ंस गयी।वैसे भाई लोगों शुक्ला जी भी आजकल तुलसीदास की तरह हो गये है, जो कहना होता है, खुद नही कहते, अपने पात्रों(जैसे मैं) से कहलवाते है।
    रही बात टिप्पणी की, तो भईया, हम तो पहले ही कहे है, हम तो रवि भाई की तरह है, कदम कदम बढाये जा, जो मन मे आये लिखे जा।कोई जरुरी नही कि हर चौराहे फूल मालाओं से स्वागत हो।
    बाकी लेख तो अच्छा लिखे हो। अब हम कमेन्ट कर दिया हूँ, अब तगादा मत करना।
  6. मिर्ची सेठ
    अनुगूँज, की गूँज फिर से होगी। अतुल जी अरोड़ा जो कि पंजाबी नहीं हैं से बात होती रहती है। इन्हीं बातों में एक बात निकली थी कि यहाँ विदेशों में पहले करवाचौथ की कहानी मजेदार होती है। सास तो पास होती नहीं इसलिए कुछ न कुछ नया होता हैं। चांद भी इंडिया में औवर-डयूटी करने के बाद यहाँ लेट निकलता है तो क्यूँ न इसी पर एक अनुगूँज हो जाए। पर उसके लिए तो लेट हो चुके हैं।
    दिल्ली ब्लॉग व देश दुनिया वाकई बेहतरीन लिखते हैं व हम लोगों के अनौपचारिक लिखने के तरीके से अलग है। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में लिखा नहीं जा रहा नारद के पुरालेखों पर देखिए अभी तक २००० से ज्यादा प्रविष्टियाँ हैं। अक्तूबर में ही ३८८ थीं।
    फुरसतिया जी आपने नारद के नए वस्त्रों के बारे में नहीं लिखा। जाओ हम आप से बात नहीं करते :D
    मिर्ची सेठ
  7. सुनील
    कुछ लिखिये और कोई उस पर कुछ कहे तो अच्छा लगता है. पर चिट्ठा लिखना, पढ़ना और टिप्पड़ियाँ लिखना तीन अलग अलग काम हैं जिनके लिए समय चाहिये.
    इसलिए अगर समय कम है तो आप केवल चिट्ठे लिखते या पढ़ते हैं और टिप्पड़ियाँ नहीं लिख पाते तो मुझे कोई शिकायत नहीं. मैं स्वयं भी तो अगर १० चिट्ठे पढ़ता हूँ तो शायद एक टिप्पड़ीं लिख पाता हूँ.
    यह बात अवश्य है कि शुरु शुरु में टिप्पड़ियों का प्रोत्साहन बहुत काम का है.
    मुझे सबसे अच्छा तब लगता है जब मेरे लिखे से उसी बात पर कोई अन्य अपनी बात लिखता है, जैसा कालीचरण जी के टीबी वाले लेख के साथ हुआ. सुनील
  8. Shashi Singh
    हमारे जीतू भैया हर किसी के निशाने पर होते हैं… ये अच्छी बात नहीं. भई कोई तो उनके गोलमटोल सुदर्शन चेहरे पर रहम करो.
    रही बात टिप्पणियों कि तो नये लोगों (पुराने भी) के लिए यह सबसे बड़ा सम्बल है. इस क्षेत्र में आई मंदी मौसमी है.
    वैसे सभी ब्लॉगरों को आइना दिखा ने वाला यह अध्ययन सराहनीय है.
    शशि सिंह

Tuesday, November 08, 2005

तुम मेरे होकर रहो कहीं…

http://web.archive.org/web/20110925232749/http://hindini.com/fursatiya/archives/64


[स्व.रमानाथ अवस्थीजी उन गीतकारों में से थे जिनको सुनते समय लगता था मानों समय ठहर गया है। आज उनका जन्मदिन है। उन्हीं की स्मृति में यह लेख लिखकर मैं अपनी जिंदगी के उन दुर्लभ क्षणों दुबारा महसूस करने का प्रयास कर रहा हूं जो मैंने रमानाथ जी के साथ या उनकी कविता सुनते हुये जिये। लेख की कवितायें रमानाथजी की कविताओं के संकलन आखिर यह मौसम भी आया से ली गई हैं। लेख की सामग्री भी काफी कुछ इसी पुस्तक की कन्हैयालाल नंदन जी द्वारा लिखित भूमिका से जस की तस ली गई है। बाकी के कुछ अंश मेरी स्मृतियों के हैं। अगर रमानाथजी की झलक मैं अपने पाठकों को दिखाने में सफल हो सका तो अपने को खुशनसीब समझूंगा।]
रमानाथ अवस्थी
रमानाथ अवस्थी
सन्‌ १९८५-८६ की बात होगी शायद। मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.टेक. कर रहा था। शायद काशी यात्रा का मौका था। कवि सम्मेलन हो रहा था। काफी कवि पढ़ चुके थे। फिर संचालक ने तमाम तारीफ के साथ एक कवि को बुलाया। भीड़ तथा तारीफ इतनी हो गई कि मुझे कवि का नाम ठीक से सुनाई न दिया। कवि ने भी बिना किसी ताम-झाम तथा लटके-झटके के केवल ,कविता प्रस्तुत कर रहा हूं कहकर ,शुरु किया:-
सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात ।

गीत के बोल हमें चमत्कृत करते से लगे ।आगे की पंक्तियां लगा कि जिंदगी का व्याकरण समझा रहीं हों:-
गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने।

गीत के साथ हैसियत की जानकारी बढ़ी:-
रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना ।

लेकिन जीत का सुख भी मिला:-
मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे।

यह कविता तब से सैकड़ों बार सुन चुका हूं। कविता की कशिश कुछ ऐसी है कि खत्म होते ही दुबारा गुनगुनाने का मन करता है।बाद में पता चला कि गीतकार थे स्व.रमानाथ अवस्थी।जिन्होंने उनके गीत सुने है वे ही उनको महसूस कर सकते हैं। बाकी लोग केवल कल्पना कर सकते हैं।रमानाथ जी की स्मृतियों के बारे में बताते हुये डा.कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं:-
अजब रसायन की रचना लगते हैं मुझे पंडित रमानाथ अवस्थी,जिसमें पांच ग्राम निराला,सात ग्राम बाबा तुलसीदास,दो ग्राम कबीर और डेढ़ ग्राम रविदास के साथ आधा ग्राम ‘ठाकुरजी’ को खूब बारीक कपड़े से कपड़छान करके आधा पाव इलाचंद्र जोशी में मिलाया जाए तथा इस सबको अंदाज से बच्चनजी में घोलकर खूब पकाया जाए। रमानाथजी का मानसिक रचाव कुछ ऐसे ही रसायन से हुआ है।वे निराला के स्वाभिमान को अपने अंतर्मन में इतना गहरे जीते हैं कि अनेक लोग सकते मेंआ जाते हैं।
रमानाथ जी की कविता की खासियत है कि लगता है जैसे बतियाते अंदाज में वाक्य उठाकर कविता पंक्ति बना दिये गये हैं। उनकी एक कविता है:-
तुमने मुझे बुलाया है ,मैं आऊँगा
बंद न करना द्वार देर हो जाये तो

उसी में आगे है:
मेरे आने तक मन में धीरज धरना
चाँद देख लेना मन घबराये तो।

इसी के साथ अंतिम संकल्प विश्वास भी है:
मेरा और तुम्हारा मिलना तो तय है
शंकित मत होना यदि जग बहकाये तो।

बंद न करना द्वार के नाम से कविता संग्रह भी छपा था रमानाथ जी का। धर्मयुग में एक बार होली पर प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम की पैरोडी छपी थीं। तब लिखा गया:-
बंद न करना द्वार -चाहे सो भले जाना।
सहज विश्वासी-आस्तिक रमानाथ जी कहते हैं:-
करने वाला और है,किसी को क्यों पुकारूँ
जीवन की नाव किसी घाट क्यों उतारूँ।

वे पराजित-मन जरूर नहीं जीते,लेकिन योद्धा-मन होकर समर भी नहीं करते। रडियो के अपने कार्यकाल में उन्हें प्रशासन के हाथों अन्यायवश अपमान की स्थितियों तक भी पहुंचा दिया, तब भी वे इसी पर डटे रहे कि:-
टूटने का दर्द जहाँ समझा न जाये
ऐसी दुनिया को किस वास्ते सँवारूँ।

दुनियावी चाल-चलन का उनको बखूबी अंदाजा है:-
चंदन के वन में आग लगी
खुशबू उड़ कर पहले चल दी
दुर्दिन में अपनों के जाने की
होती है कितनी जल्दी

उनकी सहज स्वीकारोक्तियां सहज विश्वसनीय हैं:-

देवता तो हूं नहीं स्वीकार करता हूं।
आदमी हूं क्योंकि मैं तो आदमी को प्यार करता हूं।

…और प्यार करते हैं तो इतना करते हैं कि अपने प्रेयस के बिना कोई सपना मुकम्मल नहीं मानते और बिना ऐसे सपने के कोई रात बिताना नहीं चाहते :-

बीते सपनों में आये बिना तुम्हारे
ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में।

उनकी मान्यता है कि ऐसी प्रीति के लिये प्रेयस का पास होना जरूरी नहीं है,मन की नजदीकी बहुत है:-
तन की दूरी क्या कर लेगी
मन से पास रहो तुम मेरे।

इसी विश्वास और अधिकारभाव को शब्द देती उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता है:-
तुम मेरे होकर रहो कहीं
मैं बहुत -बहुत खुश
तनिक-तनिक नाराज ।

तुम शीतल शीतल छांह
प्रीति के झुलसे झुलसे वन में
तुम चांदी के से फूल
धुएं से काले-काले घन में।
तुम मेरे होकर खिलो कहीं,
मैं बहुत-बहुत खुश
तनिक-तनिक नाराज।

प्यार के इस समूचे जीवन -व्यापार में दर्द ही ज्यादा मिलता है । उसे भी वे धनात्मक रूप में लेते हैं:-

दुनिया बेपहचानी ही रह जाती
यदि दर्द न होता मेरे जीवन मे।

रमानाथ जी कविता में तात्कालिकता से परहेज करते थे। लेकिन उनकी तमाम सार्वभौमिक कवितायें लोगों को अपनी ही बात कहती दिखती हैं। जब चन्द्रशेखरजी प्रधानमंत्री थे तो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने लालकिले से कविता पढ़ी:-
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

जब उन्होंने पढ़ा:-
वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूं।

मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

तो चन्द्रशेखरजी को लगा तथा बाद में उन्होंने पूछा भी रमानाथ जी से क्या ये पंक्तियां खासतौर से उनके लिये लिखीं गई हैं। बाद में उनकी सरकार गिर गई थी।
उनकी कविता धुयें का रंग है:-
चाहे हवन का हो
या कफन का हो
धुयें का रंग एक है!

किसी का अलगाव क्या
किसी का पछताव क्या
अभी तो और सहना है!
चाहे हो महलों में
चाहे हो चकलों में
नशे की चाल एकहै!
किसी को कुछ दोष क्या!
किसी को कुछ होश क्या!
अभी तो और ढलना है!

शाहजहांपुर में दशहरे के बाद हमेशा कवि सम्मेलन-मुशायरा कराया जाता है। एक बार मन किया कि रमानाथ जी को बुलाया जाये। संपर्क करने पर मंजूरी तो दे दी लेकिन यह भी शर्त कि साथ में नंदन जी को बुलाओगे तो आयेंगे। दोनों लोग आये । उन्हीं दिनों बायपास सर्जरी हुई थीं। काफी देखभाल की जरूरत थी सो हमारे घर में ही ठहरे।हमारा घर पुराना टाइप का बंगला था वहां। चारो तरफ पेड़ ,हरियाली देखकर खूब खुश हुये। जाड़े के दिन थे। धूप में बैठे रहे काफी देर।
नंदनजी को तो पत्रकार घेरे रहे साक्षात्कार के लिये। रमानाथ जी शाम को हमें समझाते हुये बोले :-
आप लोग रोज थोड़ी देर यूं ही अपने आसपास प्रकृति को देखा करें। बादलों को देखा करें। हवा को महसूस किया करें। मन बहुत अच्छा महसूस करेगा।
बायपास सर्जरी के कारण गाकर कविता पढ़ने से वो परहेज करने लगे थे। हमने उनसे कवितायें सुनाने का अनुरोध किया। पहले तो उन्होंने ऐसे ही पढ़कर कुछ सुनाया। फिर जब हमारी श्रीमतीजी ने ये पीला वासंतिया चांद गाकर सुनाया तो वे खुश हो गये। तथा कविताओं की कुछ पंक्तियां गाकर सुनाईं।
रात को कवि सम्मेलन में जब वे पढ़ने को खड़े हुये। तो आम आशीर्वाद मांगने के बहाने तालियों की मांग करने वाले कवियों के विपरीत वे बोले:-
आप अपने हाथों को बिल्कुल कष्ट न दें। गले पर बिल्कुल जोर न डालें। आप सिर्फ सुनें। कविता से जुड़ेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा।
यह कहकर उन्होंने गुनगुनाना शुरु किया:-
आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

सारे श्रोता शान्त हो गये। आगे उन्होंने सुनाया तो लगा कोई सन्त कह रहा हो:-
वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।

जिसको जो होना है वही होगा
जो भी होगा वही सही होगा।
किसलिये होते हो उदास यहाँ
जो नहीं होना है नहीं होगा।

हमारे कान तृप्त हो गये।
महानगर उनको रास न आते थे। वे कहते थे:-
सड़कों पर मेरे पांव हुये कितने घायल
यह बात गाँव की पगडण्डी बतलायेगी
सम्मान सहित हम कितने अपमानित हैं
यह चोट हमें जाने कब तक तड़पायेगी।

शहरों में रहने के बारे में कहते थे:-
भीड़ में भी रहता हूं वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गांव के सहारे।

सन् १९४७ में जब देश की धरती का बंटवारा हो गया तो भी उनका स्वर सार्वभौम तत्व से अलग नहीं हुआ।उसी समय दिल्ली में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें इसी विषय पर कविता पढ़नी थी। रमानाथ जी ने पढ़ा:-
धरती तो बंट जायेगी
पर नीलगगन का क्या होगा?
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे
तो महामिलन का क्या होगा?

कविता को सुनकर कहते हैं मंच पर अनेक लोगों की आंखे भर आयी थीं,खासकर पाकिस्तान से आये शायरों की। यह थी रमानाथ जी के शब्दों की शक्ति।
रमानाथ जी को लोग गीत ऋषि कहते थे। वे बहुत सरल हृदय,बहुत सहज आत्मा थे। सिर्फ दो दिन मेरे घर रहे थे लेकिन जब भी कभी बात करता तो सारे घर का हालचाल पूछते थे। वायदा किया था कि अगले साल जाड़े में आऊंगा धूप सेंकने कुछ दिन तुम्हारे यहां।
लेकिन वे सशरीर आ न पाये। शायद इसी दिन के लिये उन्होंने कहा था:-
आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

आगे फिर न आ पाने की चेतावनी भी दे गये थे:-
आपने चाहा, हम चले आए
आप कह देंगे,हम लौट जाएँगे।
एक दिन होगा,हम नहीं होंगे
आप चाहेंगे ,हम न आएँगे।

उनका शरीर भले चला गया हो लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। इसी विश्वास से मैं उन्हें आज ८ नवंबर को उनके जन्मदिन उन्हीं की कविता-पंक्तियों के माध्यम से श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूं:-
मैं पुकारूंगा तुम्हें हर बोल में ,बोलो न बोलो।
मेरी पसंद
मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं
जो भी तुमसे लग जाये लगा लेना।
मैं गीत लुटाता हूं उन लोगों पर
दुनिया में जिनका कोई आधार नहीं
मैं आंख मिलाता हूं उन आंखों से
जिनका कोई भी पहरेदार नहीं ।
आंखों की भाषायें तो अनगिन हैं
जो भी सुंदर हो समझा देना।
पूजा करता हूं उस कमजोरी की
जो जीने को मजबूर कर रही है
मन ऊब रहा है अब उस दुनिया से
जो मुझको तुमसे दूर कर रही है।
दूरी का दुख बढ़ता ही जाता है
जो भी तुमसे घट जाये घटा लेना।
कहता है मुझसे उड़ता हुआ धुआँ
रुकने का नाम न ले तू उड़ता जा
संकेत कर रहा नभ वाला घन
प्यासे प्राणों पर मुझ सा गलता जा।
पर मैं खुद ही प्यासा हूं मरुथल सा
यह बात समंदर को समझा देना।
चांदनी चढ़ाता हूं उन चरणों पर
जो अपनी राहें आप बनाते हैं
आवाज लगाता हूं उन गीतों को
जिनको मधुवन में भौंरे गाते हैं।
मधुवन में सोये गीत हजारों हैं
जो भी तुमसे जग जायँ जगा लेना।
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

19 responses to “तुम मेरे होकर रहो कहीं…”

  1. Manoshi
    बहुत सुँदर लेख आपका और रमानाथ जी की कवितायेँ यहाँ भेज कर आपने उनकी सुँदर कविताओँ को हम तक पहुँचाया, इसके लिये धन्यवाद|
    “तन की दूरी क्या कर लेगी
    मन से पास रहो तुम मेरे।”
    “तुम मेरे होकर रहो कहीं
    मैं बहुत -बहुत खुश
    तनिक-तनिक नाराज ।”
    “चाहे हवन का हो
    या कफन का हो
    धुयें का रंग एक है!”
    क्या बात है| धन्यवाद फिर से…
  2. eswami
    अवस्थीजी को हमारा भी नमन्!
    ऐसे कद्दावर रचनाकारों का सानिध्य पाया है – बढभागी हैं आप.
    आशा है आगे भी आप अपने लेखों के माध्यम से हमें श्रेष्ट रचनाकारों को और नजदीक से जानने का सुअवसर देंगे.
  3. विनय
    अवस्थी जी को हमारे शहर में होली के अवसर पर होने वाले वार्षिक कवि सम्मेलनों में सुनने का मौका मिलता था। गाकर कविता पढ़ने का अपना अलग अंदाज़ था उनका। पर उनकी कविताओं में सबसे ज़्यादा प्रभावित करती थी कथन की सरलता। नंदन जी ने बहुत अच्छा रसायन विश्लेषण किया है उनके विचारों का। भाग्यशाली हैं आप कि उनके साथ समय गुज़ार पाये। इस संस्मरणात्मक परिचय के लिए धन्यवाद।
  4. प्रत्यक्षा
    तुम मेरे होकर खिलो कहीं,
    मैं बहुत-बहुत खुश
    तनिक-तनिक नाराज।
    चंदन के वन में आग लगी
    खुशबू उड़ कर पहले चल दी
    सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
    और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात ।
    अब इनके आगे और क्या लिखा जाये . बस शुक्रिया ही कहा जा सकता है कि हम ये कवितायें आपके सौजन्य से पढ पाये.
    प्रत्यक्षा
  5. प्रत्यक्षा
    तुम मेरे होकर खिलो कहीं,
    मैं बहुत-बहुत खुश
    तनिक-तनिक नाराज।
    चंदन के वन में आग लगी
    खुशबू उड़ कर पहले चल दी
    सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
    और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात ।
    अब इनके आगे और क्या लिखा जाये . बस शुक्रिया ही कहा जा सकता है कि हम ये कवितायें आपके सौजन्य से पढ पाये.
    प्रत्यक्षा
  6. प्रत्यक्षा
    अगर स्पैम कर्मा से पन्ना मुक्त नहीं कराया तो ऐसे ही टिप्पणियाँ दो दो बार झेलनी पडेगी :-)
  7. जीतू
    बहुत सुन्दर! मुझे बोल बहुत अच्छे लगे
    जैसे:
    भीड़ में भी रहता हूं वीरान के सहारे
    जैसे कोई मंदिर किसी गांव के सहारे।
    मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं
    जो भी तुमसे लग जाये लगा लेना।
    दूरी का दुख बढ़ता ही जाता है
    जो भी तुमसे घट जाये घटा लेना।
    बहुत बहुत सुन्दर रचनायें है, क्या कोई इनका संकलन मिल सकता है क्या? आनलाइन या आफ़लाइन।
  8. sarika
    “आपने चाहा हम चले आये ….
    पहले भी सुनी थी और बहुत पसन्द है हमें पर कवि का नाम याद नहीं था।
    आज आपकी वजह से कवि का परिचय भी जानने को मिल गया। धन्यवाद!
  9. सुनील
    अनूप जी, यह लेख दिल को छू गया. बहुत धन्यवाद.
    आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
    कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
    जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
    देर तक साथ बह नहीं सकते।
    यह पंक्तियाँ बहुत भायीं. सुनील
  10. Laxmi N. Gupta
    फुरसतिया जी,
    बहुत ही सुन्दर लेख है। अवस्थी जी की कुछ कवितायें पढ़ रखी थीं किन्तु उनके बारे में अधिक नहीं मालुम था। आपने उनसे परिचय कराके बड़ा शुभ काम किया है। धन्यवाद।
  11. फ़ुरसतिया » मिस़रा उठाओ यार…
    [...] इन सबसे अलग गीतऋषि के रूप में जाने जाने वाले स्व.रमानाथ अवस्थी जी डूबकर कविता पढ़ते थे। लगता है कि पूजा कर रहे हों। जब उन्होंने मंच यात्रा शुरू की थी तो उनके रागात्मकत गीतों की धूम थी:- सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात । [...]
  12. फुरसतिया » एक और कनपुरिया मुलाकात
    [...] लेकिन टंडनजी का रुख आधा भरा गिलास वाला था। वे लगता है रमानाथ अवस्थी जी कविता आत्मसात कर चुके हैं- जो भी होना है वही होगा, जो भी होगा वही सही होगा। क्योंकि होते हो उदास यहां, जो नहीं होना है, नहीं होना। [...]
  13. anita kumar
    आपने चाहा, हम चले आए
    आप कह देंगे,हम लौट जाएँगे।
    एक दिन होगा,हम नहीं होंगे
    आप चाहेंगे ,हम न आएँगे।
    “चाहे हवन का हो
    या कफन का हो
    धुयें का रंग एक है!”
    सड़कों पर मेरे पांव हुये कितने घायल
    यह बात गाँव की पगडण्डी बतलायेगी
    सम्मान सहित हम कितने अपमानित हैं
    यह चोट हमें जाने कब तक तड़पायेगी।
    वाह, बहुत सुन्दर कविताएं है। आप सच में बहुत भाग्यशाली हैं कि आप को ऐसे दिग्गज कवियों का सानिध्य मिला। कृपया ऐसी ही यादें हमसे बाटंते रहिए।
  14. फुरसतिया » आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में
    [...] तो अनायास स्व.रमानाथ अवस्थीजी आजादी के बाद बंटवारे की त्रासदी पर अपनी टीस व्यक्त करती हुयी कविता पंक्तियां याद आ गयीं- धरती तो बंट जायेगी पर नीलगगन का क्या होगा? हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे तो महामिलन का क्या होगा? [...]
  15. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] है 2.ढोल,गंवार,शूद्र,पशु,नारी… 3.तुम मेरे होकर रहो कहीं… 4.शरमायें नहीं टिप्पणी करें 5.बड़े तेज [...]
  16. …मेरी पोस्ट के अर्थ अनेकों हैं
    [...] स्व: रमानाथ अवस्थी [...]
  17. सतीश पंचम
    शायद इसी को कहते हैं गहरी ब्लॉगिंग। एकदम डूबकर लिखी गई पोस्ट।
    बहुत सरल और सुंदर रचनाएं हैं अवस्थी जी की। पिछली पोस्ट वरना मैं गगन को गाता से यहां का लिंक मिला। मजा आ गया।
  18. …जिन्दगी ऐसी नदी है जिसमें देर तक साथ बह नहीं सकते
    [...] भर पुराने कैसेट खोजकर कवितायें सुनी। स्व. रमानाथ अवस्थी जी की एक कविता मैं बहुत दिनों से खोज [...]
  19. anitakumar
    यूं तो हर शब्द दिल को भेदता आर पार हो जाता है क्या चुन लूं और क्या छोड़ूं सब ही सहेज ली हैं। ऐसे ही अपने यादों के पिटारे खोलते रहिए। आभार
    मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
    लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे।
    मेरे पंख कट गये हैं
    वरना मैं गगन को गाता।
    आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
    कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
    जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
    देर तक साथ बह नहीं सकते।