Monday, May 22, 2006

अति सर्वत्र वर्जयेत्‌

http://web.archive.org/web/20110926075800/http://hindini.com/fursatiya/archives/133

अति सर्वत्र वर्जयेत्‌

मैं कई बार सुन चुके राहत इन्दौरी के शेर फिर से सुन रहा था-
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नींम की पत्तियां को चबाया करो।
तब तक जीतेंदर फिर नमूदार हुये गूगल टाक पर। मिलते ही हमें हड़काने लगे।हड़काने में स्वाभाविकता लाने के लिये वो हकला भी रहे थे। बोले- बच्चों को हड़काते हो?
एक बारगी तो हम सही में हड़क गये। हमारी जानकारी के अनुसार जीतेंदर एक बच्ची के पिता हैं। ये झटके से ‘बच्चे’ कहां से आ गये। हमने सोचा शायद इसी का तनाव हो कि हकलाते हुये हड़काने का अभ्यास कर रहे हों।
खैर ,हमने पूछा- किसको हड़काया?
जीतेंदर बोले -अतुल को हड़काया।उसकी पोस्ट उड़वा दी।
हम बोले -लाहौलविला कूवत। हड़काने के लिये हमें अतुल ही मिले हैं?
इसके बाद हमने जो सवाल पूछने शुरू किये तो जीतू तुरंत हे हे हे मोड में आ गये। बोले-दिल पर मत लेना। गुस्सा मत करो। गाली दे लो। जो करो लेकिन मामला सेटल कर लो।
हम बोले -हमारा दिल तो हमारी बेगम लेकर टहलने गयीं हैं। दिल पर कैसे लेगें तुम्हारा हेहेहे! इसे तो वहीं परिचर्चा के किसी टापिक पर सेटल करो।
परिचर्चा का नाम लेते ही जीतेंदर ने हमें दुबारा पकड़ लिया जैसे किसी टोकरी से उछलते किसी मेढक उसके बाकी साथी मेढक जकड़ लेते हैं,बाहर नहीं जाने देते।बोले -यार,आओ उधर परिचर्चा में कविता-सविता कराओ। लिखाओ।
कविता के साथ सविता का कापीराइट स्वामीजी का है। हम यह सोच कर किनारा करने के लिये टरकाऊ डायलाग मार दिये- सोचकर बतायेंगे।
अब जीतेंदर पुराने सेल्समैन रहे हैं। गंजों को कंघी बेचते रहे हैं। सो कैसे हमें छोड़ दें। दूसरी बात इन्हें सोच-विचार से बहुत डर लगता है। हमारे सोचने की बात सोच के भी घबरा गये। घबराहट दबा के बोले -क्या भाभी से पूछोगे?
हम बोले-उनसे पूछेंगे तो ये ब्लागिंग भी बंद हो जायेगी। वो पहले ही कहतीं हैं -तुम्हें और कुछ कायदे का काम नहीं सूझता जो दिन भर खुटुर-पुटुर करते रहते हो।
जीतेंदर को हम कैसे समझायें कि कविता की मौज लेना और बात है कविता लिखना-लिखवाना और बात है। वो तो कहो कि उनको परिचर्चा का काम याद आ गया तो वे बोले -आओ उधर ही बतियाते हैं परिचर्चा मंच पर। हमें बचने का तरीका समझ में आ गया-हम बोले तुम चलो हम आते हैं।
इस तरह जीतू को तू चल मैं आया कहकर मैंने नेट से नाता तोड़ा तथा इधर खुटुर-पुटुर शुरू कर दी।
इस बातचीत के बीच तमाम हाँ-हूँ भी हुई। इसी दौरान हमने पूछा -किसने बताया कि मैंने अतुल को हड़काया?
जीतेंदर ने खुलासा किया- स्वामी ने बताया कि तुमने अतुल की पोस्ट पर कुछ कमेंट किया। फिर जी नहीं भरा तो मेल
लिखी इससे अतुल ने दुखी होकर पोस्ट को उड़न तस्तरी बना कर गलती संख्या ४०४ में तब्दील कर दिया।
हमें लगा कि स्वामी लोग देश का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। खबरें इधर-उधर कर रहे हैं।बहरहाल ,बात अतुल की की जाये।
ये जो हमारे अतुल हैं उनका ‘सेंसिटिविटी इन्डेक्स’ बहुत ऊंचा है। जो लोग कहते हैं कि दुनिया की सबसे ऊंची चीज एवरेस्ट शिखर है वो गलतफहमी में हैं। उन्होंने हमारे अतुल का ‘सेंसिटिविटी इन्डेक्स’ नहीं देखा। देखा होता तो एवरेस्ट को दूसरे नंबर पर रखते।
तो हुआ कुछ यूं कि अतुल ने एक पोस्ट लिखी अक्षरग्राम पर। उस पोस्ट में जानकारी दी गयी थी कि कैसे कुछ शरारती लोगों ने भारत में स्थित देबाशीष के नाम से अमेरिका में स्थित रमण कौल के फोन से अमेरिका में ही डेरा जमाये स्वामीजी को फोन किया।
अब पोस्ट करने के बाद हमें दिखाई गयी तो हमें लगा कि कुछ कमेंट करना जरूरी है। सो हमने अपना टिप्पणी धर्म निभाया। टिप्पणी कुछ ऐसी ही थी सलाहनुमा जिससे कुछ बुरा लगा होगा अतुल को।लिहाजा उन्होंने प्रतिटिप्पणी की । हमें लगा कि अब उपदेश मुद्रा में आया जाय ।लिहाजा हमने मेल लिख मारी। वैसे भी हमारी टाइपिंग स्पीड रविरतलामी के आसपास ही हो रही होगी।
हमारी मेल मिली तो हमारे अतुल जी का ‘ सेंसटिविटी इंडेक्स ‘ आपरेटिव हो गया। उन पर लक्ष्मीगुप्तजी के उन गुरू जी की आत्मा आ गयी जो चेलों की गलती पर खुद को पीटने लगते थे।
और अतुल ने अपने ब्लागजगत के अनुभवों की दूसरी पोस्ट का कत्ल कर दिया।नये लोगों की जानकारी के लिये बता दें कि पहले भी अतुल पोस्ट करने के बाद अपनी एक बेहतरीन पोस्ट उड़ा चुके हैं।
इनकी पोस्ट के साथ हमारे भी एक कमेंट का खून हो गया। हमने सोचा किसी थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखायें लेकिन फिर यह सोचकर कि जमानत भी हमें ही लेनी पड़ेगी ,हम रुक गये।जानकारी के लिये यह भी बता दें कि अतुल दो अनूप के बीच घिरे रहते हैं। इनके साथ विडम्बना है कि इनके छोटे भाई का नाम भी अनूप है तथा हमें ये भाई साहब कहते हैं वो भी अनूप हैं।
हमने यह भी सोचा कि इस विषय पर अनुगूँज का आयोजन किया जाय या परिचर्चा पर बिना बात के बहस की जाय कि पोस्ट लिखने के बाद उसे कमेंट के सहित उड़ा देना कहां तक जायज है?
मुझे लगता है कि पोस्ट कितनी भी खराब हो,उडा़ई नहीं जानी चाहिये। यहाँ तो खराबी की बात ही नहीं सोच का फरक था। खराब पोस्ट भी रहनी चाहिये ताकि सनद रहे ।
बहरहाल पोस्ट के चक्कर में मुख्य बात तो रह ही गयी।
तो जैसा कि बताया गया कि रमन के फोन से किसी ने स्वामी को फोन किया जिसमें परिचय दिया गया कि वो देबाशीष बोल रहा है।देबाशीष पूना में रहते हैं। वे अमेरिका में नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका में रहने वाले रमन के फोन से स्वामी को देबाशीष के नाम से फोन करने वाला कौन हो सकता है?
भारत में तो आम बात है कि झुमरी तलैया का फोन रामनगर लग जाये । लेकिन अमेरिका में भी ऐसा होना लगा -कमाल की बात है! लेकिन यहां फोन ही नहीं लगा बात भी हुई। तब माज़रा क्या है?
अब रमन,स्वामी,देबाशीष इतनी प्रसिद्ध हस्तियाँ तो हैं नहीं कि इनके फोन के पीछे दुनिया भर के हैकर पड़ जायें तथा इनके फोन से बतियाने का जुगाड़ करें। न इससे कुछ आर्थिक लाभ होने वाला है किसी को।
जैसा कि अतुल ,स्वामी,रमन का सोचना है शायद यह काम किसी सयाने बनने वाले किसी ब्लागर का है जो अपनी तकनीकी काबिलियत की धाक जमाना चाहता है।
अगर मामला ऐसा ही है तो यह काबिलियत प्रदर्शन की हरकत बाजार में कपड़े उतार के ध्यान आकर्षित करने तथा साथ में ‘बोल्डनेस’ की ट्राफी जीतने की इच्छा रखने जैसा है मामला।
जो भी यह बचपना कर रहा है उससे यही कहा जा सकता है-ये अच्छी बात नहीं है।कहा भी गया है-अति सर्वत्र वर्जयेत्‌।
हैकिंग तो चोरी है। सेंधमार के किसी के घर में घुसने कोई बहादुरी है क्या ?
हो सकता है कि कल को हमारे ब्लाग का पासवर्ड उड़ा के कोई बहादुर चोर हमारे नाम से लिखने लगे। लोग कहने लगें कि क्या लिखते हो यार!
हम फिर भी कहेंगे लिखो बबुआ,हमसे अच्छा लिख सकते हो ,हमसे खराब लिख सकते हो लेकिन हमारे जइसा कैसे लिखोगे?
लेकिन यह इतना आसान नहीं है। चोर कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है।
हम गैर तकनीकी ब्लागर तो ऐसे भोले भंडारी हैं कि जाने कितनो को अपना पासवर्ड दिये हैं हमें खुद ही याद नहीं। फकीरों को क्या चोरी का डर!
बात कुछ खास नहीं है लेकिन कहना चाहता हूँ कि सयानापन खतरनाक भी हो सकता है।
बकौल स्वामीजी-
मै अपने शब्द आपके मूह मे डालने की गुस्ताखी नही कर रहा और बिना मांगी सलाह देने से भी बचना चाहता हूं – लेकिन हमारी प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए की हम विस्मित या प्रभावित होने के बजाए दु:खी हैं की कोई हिंदीप्रेमी अपना समय हिंदी की सेवा मे लगाने के बजाए इस तरह के गिमिक्स में लगा रहा है. कोड क्रैक करने से ज्यादा मज़ा किसी नए ब्लागर को पहली बार हिंदी लिखत देखने से मिलती है और उन्हे सहायता करने से मिलती है – सो नए प्रोग्रामर्स को अपनी उर्जा सही जगह लगानी चाहिए. इसका मतलब ये नही की हैकिंग-क्रैकिंग मत करो – करो लेकिन अलग सर्वर बनाओ उस पर करो. जो सीखना चाहें उन्हे सिखाओ – गैरकानूनी काम मत करो. अभी हाल ही में एक जवान पट्ठा पांच साल के लिए अंदर हो गया – ज्यादा श्याणपत या ओवर स्मार्टनेस भारी पड जाती है! तीन और हाल ही में फ़िर धरा गए हैं – इन बेवकूफ़ों को पता नही है की किस आग से खेल रहे हैं.
हम और कुछ नहीं कहेंगे सिवा इस बात के कि अतुल अपना गुस्सा अपनी पोस्टों पर मत उतारा करो। तुम्हारी पोस्टें वैसे भी भारत में कन्याओं की संख्या की तरह कम होती जा रही हैं। कन्याओं की संख्या कम होने से आशीष जैसे बालक अन्ना को पीछे लगाये हुये हैं।और तुम्हारी पोस्टों की संख्या कम होने से इस तरह की फालतू पोस्टें बढ़ रही हैं। अगर गुस्सा उतर गया हो तो फिर से लिखो अपना सारा वार्तालाप जो होगा देखा जायेगा।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “अति सर्वत्र वर्जयेत्‌”

  1. अतुल
    भाई साहब क्या गजब कर रहे हैं, आशीष भी सच्चे हिंदी प्रेमी है, तेजी से मात्रासुधार की ओर प्रयासरत है, अब इतनी भी रैगिंग न करिये कि ब्लागिंग छोड़ के भाग जाये।
    आशीष भाई तुम लगे रहो, कमेंटियाने के लिये हम और जीतू हैं ।
  2. eswami
    यह पूरा प्रकरण एक साथ बहुत मनोरंजक समझदारियों और बेवकूफ़ियों से लद-फ़द रहा है! मामला गंभीर है पर मनोरंजक भी है – लेकिन जैसा आपने कहा “अति सर्वत्र वर्जयेत!”
  3. समीर लाल
    मामला कुछ गंभीर टाइप का दिख रहा है, मगर विवरण के आभाव मे, सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा, लिखा अच्छा है और मामला तूल ना पकडे, इसलिये शुभकामनाऎं.
  4. नारद मुनि
    तुम बाज नही आए, शुकुल। जब तुमको हड़काया था और तुम हड़क गये तो फिर गाना गाने की का जरुरत? काहे दुनिया को बता रहे हो कि हड़का दिया।तुम तो कल गच्चा देकर निकल गये, अब आना बेटा आनलाइन।
    और भौजी तुम्हारा दिल वापस लेकर आ गयी होंगी,उनसे दिल वापस लेकर साफ़ सूफ़ कर लेना और दिल से पूछ लेना कि अब का करना है?
    अरे यार, वो कानपुर मे रिक्शे और ट्रकों के पीछे बहुत गजब गजब के शेर लिखे होते है, यार एक पोस्ट उस पर भी लिखो, फ़ोटू के साथ।
  5. आशीष
    माना कि हम हैंकिंग के उस्ताद है, लेकिन हमारी जिंदगी मे आयी कन्याओ की कसम “ये कारनामा हमारा नही है !”
    रही बात हम और कन्याओ कि आज हम भी राज खोल ही देते है कि हमारी जिन्दगी मे कन्या आते आते एन मौके पर भाग क्यो खडी होती है.. बस इंतजार किजीये …..
  6. debashish
    गुरुजी मज़ाक मज़ाक में गहरी बात करने की आप की कला का कोई सानी नहीं!
  7. एक महाब्लॉगर से मुलाकात at नुक्ताचीनी
    [...] कुछ दिन पहले अनूप का ईमेल आया, बोले जिन किताबों को भेंट करने का वायदा किया था वो देने स्वयं आ रहा हूँ। ज़ाहिर है जिन चिट्ठा मित्र से अब तक केवल फोन पर बातचीत हुई या फिर चित्रों में ही जिन्हें देखा हो उनसे मिलने की बात पर मन उत्साहित तो था ही, पर बड़भैया से मुलाकात के पहले थोड़ा सहमा भी था। जीवन और साहित्य के निचोड़ से ओतप्रोत उनके लेख तो कई मर्तबा इस तुच्छ बुद्धि के सर से चार इंच उपर ही तिरते रह जाते हैं, उन पर टिप्पणी करने का माद्दा हमेशा नहीं जुट पाता, अब भई जिनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने पर भी डर लगता हो और जिनकी हल्की डपट से अतुल अपनी पोस्ट हटा देते हों, ऐसे महाब्लॉगर से मिलने के लिये थोड़ा साहस तो जुटाना ही पड़ता है। पर जब मुलाकात हुई तो अपेक्षा से भी अधिक मन को भा गये अनूप। दो दिनों में कई बार भेंट हुई और वस्तुतः अनूप ने मेजबान की ही जम कर मेहमान नवाज़ी कर डाली। [...]
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना [...]

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Sunday, May 21, 2006

आवारा भीड़ के खतरे

http://web.archive.org/web/20120826145743/http://hindini.com/fursatiya/archives/132

आवारा भीड़ के खतरे

हमारे देश में युवाओं की आबादी सबसे ज्यादा है। युवा ऊर्जा के प्रतीक होते हैं। इस ऊर्जा के सार्थक उपयोग से देश का बहुमुखी विकास हो सकता है। वहीं उनका गलत इस्तेमाल किये जाने की संभावना भी बनी रहती है। नये उमर के लोगों के लिये सही-गलत की पहचान के खतरे हमेशा रहते हैं।
प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी इस समस्या के बारे में कहते हैं:-
नयी उम्रों की खुदमुख्तारियों को कौन समझाये,
कहां से बच के चलना है कहां जाना जरूरी है।

हमारे पसंदीदा लेखक हरिशंकर परसाई का लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ इसी बात पर विचार करता है। यह लेख मैं अपने दोस्तों के लिये पेश कर रहा हूँ:-
हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर माडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया।आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया-हरामजादी बहुत खूबसूरत है।
हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ये सवाल दुनिया में भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं-पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी। अमेरिका से आवारा हिप्पी और’हरे राम हरे कृण्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का काम मिले,अमेरिका में रहूँ । ‘स्टेट्स’ जाना है यानि चौबीस घंटे गंगा नहाना है। ये अपवाद है। भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है,जो हताश,बेकार और कुद्ध हैं। संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार और भारत के युवकों के व्यवहार में अंतर हैं।
सवाल है-उस युवक ने सुंदर माडल के चेहरे पर पत्थर क्यों फेंका? हरामजादी बहुत खूबसूरत है-यह उस गुस्से का कारण क्यों है? वाह ,कितनी सुंदर है-ऐसा इस तरह के युवक क्यों नहीं कहते?
युवक साधारण कुर्ता पाजाम पहने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त । शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिये भटकता रहा था।धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान बाहर अवहेलना। वह आत्म ग्लानि से क्षुब्ध।घुटन और गुस्सा। एक नकारात्मक भावना। सबसे शिकायत । ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है। खिले हुये बुरे फूल बुरे लगते हैं। किसी के अच्छे घर से घृणा होती है।सुंदर कार पर थूकने का मन होता है। मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है। अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है। जिस चीज से ,खुशी ,सुंदरता, संपन्नता,सफलता,प्रतिष्ठा का बोध होता है,उस पर गुस्सा आता है।
बूढ़े-सयाने लोगों को लड़का जब मिडिल स्कूल में होता है,तभी से शिकायतें होने लगती हैं। वे कहते हैं- ये लड़के कैसे हो गये ? हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। हम पिता ,गुरू समाज के आदरणीयों की बात सिर झुका के मानते थे। अब ये लड़के बहस करते हैं। किसी की नहीं मानते ।मैं याद करता हूँ कि जब मैं छात्र था,तब मुझे पिता की बात गलत तो लगती थी,पर मैं प्रतिवाद नहीं करता था। गुरू का भी प्रतिवाद नहीं करता ।समाज के नेताओं का भी नहीं। मगर तब हम किशोरावस्था में थे,जानकारी ही क्या थी? हमारे कस्बे में दस-बारह अखबार आते थे। रेडियो नहीं । स्वतंत्रता संग्राम का जमाना था।सब नेता हमारे हीरो थे-स्थानीय भी और जवाहरलाल नेहरू भी। हम पिता,गुरू,समाज के नेता आदि की कमजोरियाँ नहीं जानते थे। मुझे बाद में समझ में आया कि मेरे आया कि मेरे पिता कोयले के भट्टों पर काम करनेवाले गोंडों का शोषण करते थे।
पर अब मेरा ग्यारह साल का नाती पाँचवीं कक्षा का छात्र है। वह सबेरे अखबार पढ़ता है,टेलीविजन देखता है,रेडियो सुनता है। वह तमाम नेताओं की पोलें जानता है। देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की आलोचना करता है। घर में कुछ ऐसा करने को कहो तो प्रतिरोध करता है-मेरी बात भी तो सुनो। दिन भर पढ़कर आया हूँ। अब फिर कहते हो कि पढ़ने बैठ जाऊँ। थोड़ी देर नहीं खेलूँगा नहीं तो पढ़ाई भी नहीं होगी। हमारी पुस्तक में लिखा है। वह जानता है कि घर में बड़े कब-कब झूठ बोलते हैं।
ऊँची पढ़ाईवाले विश्वविद्यालय के छात्र सबेरे अखबार पढ़ते हैं, तो तमाम राजनीति और समाज के नेताओं के भ्रष्टाचार , पतन शीलता के किस्से पढ़ते हैं। अखबार देश को चलाने वालों और समाज के नियामकों के छल,कपट,प्रपंच ,दुराचार की खबरों से भरे रहते हैं। धर्माचार्यों की चरित्र हीनता उजागर होती है। यही नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं-युवकों ,तुम्हें देश का निर्माण करना है( क्योंकि हमने नाश कर दिया)तुम्हें चरित्रवान बनना है(क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है-(हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा) इन नेताओं पर छात्रों-युवक की आस्था कैसे जमें? छात्र अपने प्रोफेसरों के बारे में सब जानते हैं। उनका ऊँचा वेतन लेना और पढ़ाना नहीं। उनकी गुटबंदी ,एक दूसरे की टांग खींचना,नीच कृत्य,द्वेषवश छात्रों को फेल करना,पक्षपात ,छात्रों का गुटबंदी में उपयोग। छात्रों से कुछ भी नहीं छिपा रहता अब। वे घरेलू मामले भी जानते हैं ।ऐसे गुरुओं पर छात्र कैसे आस्था जमायें।ये गुरू कहते हैं-छात्रों को क्रांति करना है। वे क्रांति करने लगे तो सबसे पहले अपने गुरुओं को साफ करेंगे। अधिकतर छात्र अपने गुरुओं से नफरत करते हैं।
बड़े लड़के अपने पिता को भी जानते हैं। वे देखते हैं कि पिता का वेतन तो तीन हजार है ,पर घर का ठाठ-बाट आठ हजार रुपयों का है। मेरा बाप घूस खाता है। मुझे ईमानदारी के उपदेश देता है। हमारे समय के लड़के-लड़कियों के लिये सूचना और जानकारी के इतने माध्यम खुले हैं, कि वे सब क्षेत्रों में अपने बड़ों के बारे में सब कुछ जानते हैं। इसलिये युवाओं से ही नहीं बच्चों से भी अंधआज्ञाकारिता की आशा नहीं की जा सकती।हमारे यहां ज्ञानी ने बहुत पहले कहा था-
प्राप्तेषु षोडसे वर्षे पुत्र मित्र समाचरेत।
उनसे बात की जा सकती है,उन्हें समझाया जा सकता है। कल परसों मेरा बारह साल का नाती बाहर खेल रहा था। उसकी परीक्षा हो चुकी है और लंबी छुट्टी है। उससे घर आने के लिये उसके चाचा ने दो तीन बार कहा। डाँटा। वह आ गया और रोते हुये चिल्लाया -हम क्या करें? ऐसी तैसी सरकार की जिसने छुट्टी कर दी। छुट्टी काटना उसकी समस्या है। वह कुछ तो करेगा ही। दबाओगे तो विद्रोह कर देगा। जब बच्चे का यह हाल है तो तरुणों की प्रतिक्रियाएँ क्या होंगी।
युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है। सब बड़े उसके सामने नंगे हैं। आदर्शों ,सिद्धातों,नैतिकताओं की धज्जियाँ उड़ते वे देखते हैं। वे धूर्तता ,अनैतिकता, बेईमानी,नीचता को अपने सामने सफल और सार्थक होते देखते हैं। मूल्यों का संकट भी उनके सामने हैं।सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है। बाजार से लेकर धर्मस्थल तक। वे किस पर आस्था जमाएँ और किसके पदचिन्हों पर चले? किन मूल्यों को माने?
यूरोप में दूसरे महायुद्ध के दौरान जो पीढ़ी पैदा हुई उसे ‘लास्ट जनरेशन’(खोई हुई पीढ़ी) का कहा जाता है। युद्ध के दौरान अभाव ,भुखमरी,शिक्षा ,चिकित्सा की ठीक व्यवस्था नहीं। युद्ध में सब बड़े लगे हैं, तो बच्चों की परवाह करने वाले नहीं। बच्चों के बाप और बड़े भाई युद्ध मारे गए। घर का, संपत्ति का,रोजगार का नाश हुआ। जीवन मूल्यों का नाश हुआ। ऐसे में बिना उचित शिक्षा, संस्कार,भोजन कपड़े के विनाश और मूल्यहीनता के बीच जो पीढी़ बढ़कर जवान हुई ,तो खोई हुई पीढ़ी । इसके पास निराशा ,अंधकार,असुरक्षा,अभाव,मूल्यहीनता के सिवा कुछ नहीं था। विश्वास टूट गये थे। यह पीढ़ी निराश , विध्वंसवादी,अराजक,उपद्रवी,नकारवादी हुई। अंग्रेज लेखक जार्ज ओसबर्न ने इस क्रुद्ध पीढ़ी पर नाटक लिखा था तो बहुत पढ़ा गया और उस पर फिल्म भी बनी। नाटक का नाम है-’लुक बैक इन एंगर’। मगर यह सिलसिला यूरोप के फिर से व्यवस्थित और सम्पन्न हो जाने पर भी चलता रहा। कुछ युवक समाज के ‘ड्राप आउट’ हुए। ‘बीट जनरेशन’ पैदा हुई। औद्योगीकरण
के बाद यूरोप में काफी प्रतिशत बेकारी है। ब्रिटेन में अठारह प्रतिशत बेकारी है। अमेरिका ने युद्ध नहीं भोगा। मगर व्यवस्था से असंतोष वहाँ भी पैदा हुआ। अमेरिका में भी लगभग बीस प्रतिशत बेकारी है। वहाँ एक ओर बेकारी से पीड़ित युवक हैं ,तो दूसरी ओर अतिशय सम्पन्नता से पीड़ित युवक भी। जैसे यूरोप में वैसे ही अमेरिकी युवकों ,युवतियों का असंतोष,विद्रोह, नशेबाजी,यौन स्वछंदता और विध्वंसवादिता में प्रकट हुआ। जहाँ तक नशीली वस्तुओं के सेवन का सवाल है,यह पश्चिम में तो है ही,भारत में भी खूब है। दिल्लीविश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण के अनुसार दो साल पहले(१९८९ में) सत्तावन फीसदी छात्र और पैंतीस फीसदी छात्राएँ नशे के आदी पाए गए। दिल्ली तो महानगर है। छोटे शहरों में ,कस्बों में नशे आ गये हैं। किसी-किसी पान की दुकान में नशा हर कहीं मिल जाता है। ‘स्मैक’ और’पाट’ टाफी की तरह उपलब्ध हैं।
छात्रों-युवकों को क्रांति की,सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानते हैं। सही मानते हैं। अगर छात्रों युवकों में विचार हो,दिशा हो,संगठन हो और सकारात्मक उत्साह हो। वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें तो उन्हीं बुराइयों के उत्तराधिकारी न बनें,उनमें अपनी ओर से दूसरी बुराइयां मिलाकर पतन की परंपरा को गे नहीं बढ़ाएँ। सिर्फ आक्रोश तो आत्मक्षय करता है।
एक हर्बर्ट मार्क्यूस चिंतक हो गये हैं,जो सदी के छठे दशक में बहुत लोकप्रिय हो गये थे। वे ‘स्टूडेंट पावर’ में बहुत विश्वास करते थे। मानते थे कि छात्र क्रांति कर सकते हैं। वैसे सही बात यह है कि अकेले छात्र क्रांति नहीं कर सकते। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित करके चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा।लक्ष्य निर्धारित करना होगा। आखिर क्या बदलना है यह तो तय हो।अमेरिका में हर्बर्ट मार्क्यूस से प्रेरणा पाकर छात्रों ने नाटक ही किये। हो ची मिन्ह और चे गुएवारा के बड़े-बड़े चित्र लेकर जुलूस निकालना और भद्दी,भौडी़,अश्लील हरकतें करना। अमेरिकी विश्वविद्यालयों की पत्रिकाओं में बेहद फूहड़ अश्लील चित्र और लेख कहानी। फ्रांस के छात्र अधिक गंभीर शिक्षित थे। राष्ट्रपति द गाल के समय छात्रों ने सोरोबोन विश्वविद्यालय में आंदोलन किया। लेखक ज्यां पाल सात्र ने उनका समर्थन किया। उनका नेता कोहने बेंडी प्रबुद्ध और गंभीर युवक था। उनके लिये राजनीतिक क्रांति करना तो संभव नहीं था। फ्रांस के श्रमिक संगठनों ने उनका साथ नहीं दिया। पर उनकी मांगें ठोस थीं जैसे शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन। अपने यहाँ जैसी नकल करने की छूट की क्रांतिकारी मांग उनकी नहीं थी।पाकिस्तान में भी एक छात्र नेता तारिक अली ने क्रांति की धूम मचाई। फिर वह लंदन चला गया।
युवकों का यह तर्क सही नहीं है कि जब सब पतित हैं ,तो हम क्यों नहीं हों। सब दलदल में फँसे हैं,तो जो लोग नये हैं,उन्हें उन लोगों को वहाँ से निकालना चाहिये। यह नहीं कि वे भी उसी दलदल में फँस जाएँ। दुनिया में जो क्रांतियाँ हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुये हैं,उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है। मगर जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले क्योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। ऐसे युवक हैं,जो क्रांतिकारिता का नाटक बहुत करते हैं,पर दहेज भरपूर लेते हैं।कारण बताते हैं-मैं तो दहेज को ठोकर मारता हूँ ।पर पिताजी के सामने झुकना पड़ा। यदि युवकों के पास दिशा हो,विचारधारा हो,संकल्पशीलता हो,संगठित संघर्ष हो तो वे परिवर्तन ला सकते हैं।
पर मैं देख रहा हूँ एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दकियानूस हो गई है। यह शायद हताशा से उत्पन्न भाग्यवाद के कारण हुआ है। अपने पिता से अधिक तत्ववादी ,बुनियाद परस्त(फंडामेंटलिस्ट) लड़का है।
दिशाहीन,बेकार,हताश,नकारवादी,विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है।इसका उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन,हिटलर और मुसोलिनी ने किया। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दे।फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्योंके विनाश के लिये ,लोकतंत्र के नाश के लिये करवाया जा सकता है।
-हरिशंकर परसाई
जून १९९१
मेरी पसन्द
उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो।
जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो।
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नींम की पत्तियां को चबाया करो।
चाँद,सूरज कहाँ,अपनी मंजिल कहाँ
ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो।
-राहत इन्दौरी

13 responses to “आवारा भीड़ के खतरे”

  1. नितिन
    अति सुन्दर!!
  2. सागर चन्द नाहर
    बहुत सुंदर पर कटु सत्य लिखा है आपने
  3. समीर लाल
    परसाई जी की लेखनी की तो बात ही निराली है. आपका बहुत आभार कि आपने उन्हें यहाँ उपलब्ध कराया.साधुवाद. आगे भी ऎसी ही आशा है.
  4. eswami
    परसाईं जी का लेख और उस पर राहत इन्दौरी के शेर वाह! गुरुदेव तुस्सी ग्रेट हो!! :)
    मुझे पता नही था की परसाईंजी की पूरे दुनिया के सामाजिक मनोविज्ञान पर ऐसी धांसू पकड है. बहुत बहुत धन्यवाद.
  5. आशीष
    परसाई जी की लेखनी का कोई जवाब नही है, तिलमिलाने वाले व्यंगय होते थे उनके !
  6. रजनीश मंगला
    बहुत अच्छा लेख, बहुत बढ़िया जानकारी। धन्यवाद।
  7. pe-shadow
    क्या बात है अनूप जी।
  8. भारत भूषण तिवारी
    अब इसी कडी में ‘हम,वे और भीड’ भी पोस्ट कर दें तो बडी कृपा होगी.
  9. फ़ुरसतिया » हम,वे और भीड़
    [...] हरिशंकर परसाईका लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ पढ़ने के बाद की ‘भारत भूषण तिवारीजी’ प्रतिक्रिया थी- [...]
  10. अनुराग
    एसा लगता है जैसे परसाई जी के देश और दुनिया की समस्या का इलाज है। सच में, अगर आप मुझसे पूछें कि मेरा आदर्श कौन है तो मैं अपने माँ बाप से ज्याद आगे नहीं सोच पाउँगा।
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई [...]
  12. चंदन कुमार मिश्र
    बेहतर और धारदार, जैसा कि तय है परसाई जी लिखेंगे ही। ‘नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं-युवकों ,तुम्हें देश का निर्माण करना है( क्योंकि हमने नाश कर दिया)तुम्हें चरित्रवान बनना है(क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है-(हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा)’—यह तो सत्य है भाई साहब!
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)
  13. चंदन कुमार मिश्र
    ऐसा लगता है जैसे हमने, हमारे देश ने पिछले कई दशकों से कुछ नहीं किया है और स्थितियाँ ज्यों-की-त्यों या कहिए और अधिक भयावह बनी हुई हैं।…परसाई जी के कहे का अर्थ यह भी है कि १९९१ से २०११ तक तो पक्का सुधार नहीं हुआ है, किसी तरह।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)

Saturday, May 20, 2006

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

http://web.archive.org/web/20120730203158/http://hindini.com/fursatiya/archives/131

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

स्वामीजी मुझसे बहुत दिन से कह रहे हैं-आरक्षण पर लेख लिखने के लिये। मैं सोच रहा हूँ क्या लिखूँ! आजकल सारे देश में लगभग हर मँच पर आरक्षण पर बहस हो रही है। लोग अपने-अपने तर्क पेश कर रहे हैं। ब्लागर भाइयों ने भी अपने-अपने ब्लाग पर आरक्षण विरोध का ‘लोगो’ लगा रखा है।
आरक्षण के बारे में जब मैं अपने विचार लिखने का प्रयास कर रहा हूँ तो कोशिश यह है कि मैं किसी तार्किक जुगलबंदी से बचा रहूँ। सच तो यह है कि मैं आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में कोई तर्क नहीं पेश करने जा रहा हूँ। मेरी कोशिश है कि जो महसूस करता हूँ वह लिख सकूँ।
जैसा कि पता है कि सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के विरोध का प्रभावित लोगों द्वारा लोगों विरोध किया जा रहा है। विरोध के कारणों में प्रतिभा की उपेक्षा, गुणवत्ता में गिरावट का डर तथा समाज को पिछड़ेपन के कुयें में ढकेल देने व विकास की गति में नकारात्मक प्रभाव आदि-इत्यादि बताये गये हैं।
यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।
जो वर्ग या जाति प्रभावित होता है वह यह महसूस करने की हालत में नहीं होता कि जिस वर्ग या जाति को कुछ सुविधायें दी जा रही हैं वे कितने मजबूर हैं,कितने उपेक्षित हैं ,किस हालत में जी रहे हैं। तुलना करते समय लोग ‘संदर्भ पटल’ फ्रेम आफ रेफेरेन्स अपनी सुविधा के अनुसार चुनते हैं।
जाति तथा वर्ग तो बहुत बड़ी बात है। एक ही परिवार में पले लोग इस शिकायत से बच नहीं पाते कि दूसरे के मुकाबले उनको कम सुविधा ,तरजीह मिली। जिन लोगों ने ‘ब्लैक ‘ पिक्चर देखी है उनको शायद याद हो कि किस तरह मिशेल(रानी मुखर्जी) की बहन अपनी शादी के अवसर पर अपनी अपाहिज बहन के मुकाबले मिली उपेक्षा का जिक्र करती है। तुलना करते समय वह अपनी अपाहिज बहन की असहायता भूल जाती है, उसकी तकलीफें भूल जाती है। उसे सिर्फ यह याद रह पाता है कि उसके घर में सदा उसकी अपाहिज बहन की चर्चा होती रही।
सच तो यह है किसी भी समाज में आरक्षण होना कलंक की बात है। किसी समाज के लिये यह शर्मनाक है कि समाज की हालत ऐसी है कि आगे बढ़ने के लिये समाज के किसी वर्ग को आरक्षण देना पड़े। इस लिहाज से भारत में आरक्षण का होना शर्मनाक है । आरक्षण तुरंत खत्म हो जाना चाहिये।
लेकिन बात इतनी सरल नहीं है। न मेरे चाहने से आरक्षण पर कोई फरक पड़ेगा। लिहाजा,फिलहाल आरक्षण से जुड़े कुछ ‘मिथ’ के बारे में मैं अपने अनुभव बताना चाहूँगा।
पहला भ्रम तो यह है कि आरक्षण से आरक्षित वर्ग अपाहिज ही बना रहता है। आजकल समाज में ‘आरक्षण की बैसाखी’ के सहारे आरक्षित जातियां अनारक्षित जातियों को चुनौती देने लगी हैं। जानकारी के लिये बता दूँ कि सरकारी नौकरियों में आजकल आरक्षित जातियाँ अनारक्षित जातियों के प्रत्याशियों को चुनौती देने लगी हैं।
उदाहरण के लिये यदि किसी विभाग में कुल दस पद खाली हैं जिनमें से मान लीजिये ३ आरक्षित हैं तथा ७ पद अनारक्षित हैं। तो ऐसा संभव है कि जब अंतिम चयन हो तो आरक्षित वर्ग के कुल पाँच प्रत्याशी तथा अनारक्षित वर्ग के पाँच प्रत्याशी चुने जाय । इसका कारण यह है कि आरक्षित वर्ग के दो प्रत्याशी ऐसे रहे जिन्होंने सामान्य वर्ग की मेरिट लिस्ट के सात प्रत्याशियों में स्थान ग्रहण किया। इस तरह तीन की जगह पाँच प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के चुने गये। तीन अपने आरक्षण के कारण तथा दो अपनी प्रतिभा के कारण।
उपरोक्त उदाहरण में यह कहा जा सकता है कि यह तो प्रतिभा को हताश करना ,उसका हिस्सा मारना हुआ। इसके तमाम तर्क हो सकते हैं लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षित वर्ग के कम से कम दो प्रत्याशी ऐसे हैं जो प्रतिभा में सामान्य वर्ग से कम नहीं हैं।
सिविल सेवा २००६ के परीक्षा परिणामों के बारे में जानकारी देते हुये योजना आयोग के सदस्य ने बताया कि इस वर्ष पहले १०० में से २५% प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के थे। यह भी बताया कि हर साल आरक्षित तथा अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों के अंको का अंतर कम होता जा रहा है।
कल मैं एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में गया था । वहाँ प्रतिभावान विद्यार्थियों को पुरुस्कार दिये जा रहे थे। मैं पुकारे जा रहे नामों पर गौर कर रहा था। करीब ४०% बच्चे जिन्होंने प्रथम,द्वितीय,तृतीय स्थान पाये वे अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़े वर्गों से थे।
दिन-प्रतिदिन आरक्षित वर्ग के बच्चे आगे आते जा रहे हैं।यह बात गलत साबित हो रही है कि आरक्षित वर्ग सदा ही गैरप्रतिभावान बना रहेगा।
ऐसा संभव हो पाया आरक्षण के कारण ही। अगर इन बच्चों के माँ-बाप को आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो ये बच्चे सरपट दौड़ने के लिये अपने को तैयार न कर पाते।
तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।
आरक्षण के विरोधी तर्क देते हैं कि सरकार आरक्षित वर्ग को सुविधायें दे,स्कालरशिप दे,फीस माफ करे। लेकिन यह क्या कि भर्ती में कोटा कर दिया।काबिल हो जायें तो नौकरी तथा उच्च शिक्षा में आने दे। सरकार का सोचना है कि आरक्षण के द्वारा वंचितों का आत्मविश्वास तथा सामाजिक स्तर ऊँचा किया जा सकता है।
ये दो बातें तैरना सीखने के बाद पानी में उतारने की तथा पानी में उतरेंगे तो सीख ही जायेंगे जैसी हैं।
जिन अनुसूचित ,दलित लोगों ने अपने अनुभव लिखे हैं उनसे पता लगता है कि कितनी विषम परिस्थितियों से गुजरकर इन लोगों ने अपना रास्ता बनाया है। केवल गरीबी ही बाधक नहीं होती। अपने समाज में जो हालत दलितों की रही है उसके चलते एक गरीब दलित को गैरदलित गरीब के मुकाबले बहुत अधिक झेलना पड़ता है आगे बढ़ने के लिये। आप कितने भी प्रतिभावान हों अगर कोई आपकी क्षमता का उपहास उड़ाये तो सारी प्रतिभा कपूर बन जाती है। दयापवार,ओमप्रकाश वाल्मीक,शिवमूर्ति वगैरह की आत्मकथाओं से झलक मिलती है इस बात की कि कितना कठिन सफर है दलितों का । अगर इनको आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो जितना भी विकास हुआ है इनका ,न हुआ होता।
हरिजन उत्पीड़न एक्ट का बहुत दुरुपयोग भी होता है लेकिन यह भी सच है कि अगर इस तरह के कानून न हों तो अभी तक हरिजन गरियाये,जुतियाये,लतियाये जा रहे होते।
कोई भी समाज केवल सदिच्छा से हरिजनों की थाली में रोटी नहीं डालता। अगर कानून न हो तो समर्थ वर्ग उनको पहाड़ा पढ़ाता रहता।
जहाँ तक मुझे जानकारी है कि कुछ सालों तक यह होता रहा कि नौकरियों में चयन के लिये आरक्षित वर्ग के समुचित प्रतिनिधि न पाये जाने की स्थिति में सामान्य वर्ग के लोग लिये जाते रहे। आरक्षित वर्ग के लोग रह जाते रहे। जब इसका विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि आरक्षित की सीटों पर सामान्य वर्ग के लोगों का चयन नहीं होगा।अगर यह व्यवस्था न होती तो शायद अभी भी समुचित प्रत्याशी न मिलने की बात कहकर सामान्य लोग चयनित किये जाते रहते।
अब इसे चाहे भला कहें या बुरा लेकिन यह सच है कि अगर कोटा न होता तो आज जितने आगे आये हैं आरक्षित वर्ग के लोग उतने आगे नहीं होते।
प्रोफेशनल कालेज में आरक्षण के कारण सामान्य छात्रों का हक मारे जाने का हौवा खड़ा करने वालों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूँ कि आज से बीस साल पहले उप्र में केवल आठ इंजीनियरिंग कालेज थे। आज कम से कम अस्सी इंजीनियरिंग कालेज हैं उप्र में। दस गुना कालजे बढ़े हैं। सीटें तो कम से कम बीस गुना बढ़ी होंगी। भारत भर का आंकड़ा लिया जाय तो यह गुना कम से कम पचीस से ज्यादा ही होगा।
जिस सामान्य वर्ग के बच्चे आतंकित हैं आरक्षण से उनके माता-पिता ने भी बच्चे घास-पतवार की तरह नहीं पैदा किये।वे बहुत पहले ही छोटे परिवार का महत्व समझ गये हैं।तो ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट रहा है अगर कुछ सीटें बंट रहीं हैं।जितनी घटिया शिक्षा तुम पाओगे उतनी घटिया वे भी पायेंगे। शिक्षा का स्तर गिर रहा है- हर जगह। जो बच्चे बमुश्किल इंटर की परीक्षा पास कर पाते हैं वे किसी न किसी इंजीनियरिंग कालेज में घुस जाते हैं किसी न किसी तरह से।
आरक्षण के द्वारा गैरप्रतिभावान लोगों के द्वारा जबरदस्ती काबिल लोगों का हक मारने की बात करते समय यह भी सोचना जरूरी है कि अनारक्षित वर्ग के वे बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं जिनकी फौज डोनेशन वाले कालेजों से निकल रही है?
आरक्षण हर देश-काल में किसी न किसी रूप में रहा है। अपने देश में ही प्राइवेट कंपनियाँ सरकार से इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की गुजारिश करती हैं। विकसित देश अपने किसानों कोसब्सिडी देते हैं। तमाम तरह से अपने लोगों के हक सुरक्षित रखे जाते हैं। विकसित देशों में भी काले लोगों की सुविधाओं के लिये जरूर कुछ कानून होंगे। वे भी तो जन्म के आधार पर होते हैं।
जिन तमाम लोगों के ब्लाग पर आरक्षण विरोध का लोगो चिपका है वे सरकार की ही मेहरबानी से बेहदकम पैसों में अभियंता/डाक्टर होकर बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। यह भी एक किस्म का आरक्षण ही है। प्रतिभा को फलने-फूलने का मौका देने का। सरकार अगर अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है तो कौन बड़ा अपराध करती है।
कहा जाता है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं होना चाहिये। दूसरे देशों के हवाले दिये जाते हैं। अब चूंकि यहां जाति है इसलिये जाति ही आधार माना गया। जाति अपने यहां डी.एन.ए. टेस्ट की तरह होती है। कभी पीछा नहीं छोड़ती। आप भले ही न मानो जात-पाँत लेकिन जाति आपसे चिपकी रहेगी। बहुत कम लोग अपने को जाति से अलग कर पाते हैं।
हर जाति का अपनी सभा होती है। ब्राह्मण सभा, कान्यकुब्ज सभा, कायस्थ सभा, ठाकुर सभा ,सिंधी समाज तथा और न जाने क्या-क्या। सब अपने-अपने जाति कुल के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करतीं हैं। तो सरकार अगर अपना कल्याणकारी रूप बनाये रखने के लिये अपने देश की आबादी के एक हिस्से के लिये आरक्षण करती है तो क्या बुरा करती है!
यह वास्तव में अपने समाज की बड़ी विडम्बना है कि आजादी के साठ साल बाद भी समाज में सामाजिक,आर्थिक समानता लाने के लिये आरक्षण का सहारा लिया जा रहा है।शायद हमारे नीति-निर्माता सही आकलन नहीं कर पाये होंगे-समाज का। यह भी सही है कि जितने प्रयास होने चाहिये समानता लाने के लिये वे नहीं हो पाये होंगे।
आरक्षण की प्रक्रिया के लागू करने के प्रयास में भी तमाम गड़बड़ियां हुईं। जिस तरह तमाम लुटियाचोर आजादी के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गये उसी तरह तमाम संपन्न, विकसित जातियां भी आरक्षित वर्ग में घुस गयीं। राजस्थान की कुछ जातियाँ जो राजकाज में थीं तथा जिनके पास सैंकड़ों बीघे जमीन थी वे पिछवाड़े से जनजाति के चबूतरे पर जा बैठे ।वे दूसरों का हक मार रहे हैं तथा वंचितों का माखौल उड़ा रहे हैं।
पिछड़ी जातियों का भी मामला निराला है। सुनते हैं कि पिछड़ी जातियों का निर्धारण सन् १९३१ की जनगणना के आधार पर हुआ है । एक समाचार(एनएसएस द्वारा कराये एक सर्वे के मुताबिक) के अनुसार देश में पिछड़ों की कुल आबादी की ३६%फीसदी (अगर मुस्लिम ओबीसी को निकाल दें ३२%) है।जबकि प्रस्तावित २७% प्रतिशत आरक्षण का आधार यह है कि पिछड़ों की आबादी कुल आबादी की ५२% है।देश की ३२ फीसदी आबादी के लिये २७% आरक्षण का क्या औचित्य है?
इस पिछड़ी जातियों की आबादी में तमाम संपन्न जातियां शामिल हैं जिनके लिये शिक्षा कभी मुश्किल नहीं रही। न पढ़ाई-लिखाई की उनको कोई जरूरत ही नहीं थी ऐसे ही खाते-पीते मस्त थे। पिछड़ेपन के नाम पर जब तोंदवाले आरक्षण पायेंगे ,चाहें वे मात्रा में कितने ही कम क्यों न हों तो आरक्षण से वंचित वर्ग का खीझना स्वाभाविक है।
वैसे भी किसी वस्तु को पाने वाले के सुख से कई गुना ज्यादा दुख वस्तु से वंचित रह जाने वाले को होता है।
यह सही में बहुत भ्रामक धारणा है कि आरक्षित जाति के लोग काम के मामले में कमतर या कामचोर होते हैं। मेरे साथ तमाम लोग काम करते हैं। कामचोरी,काबिलियत का जाति से कुछ लेना देना नहीं होता। खासतौर से रूटीन के काम में। कई मामलों में तो सामान्य जातियों के लोग असामान्य रूप से काहिली का मुजाहिरा करते हैं।जबकि आरक्षित जाति के लोग अपनी कमजोरी को मेहनत से पाटने का प्रयास करते हैं।
मजे की बात है कि आरक्षित वर्ग में भी ब्राह्मणवादी संस्कार होते हैं। जैसे ही वह आरक्षण की बैसाखी लगाकर ऊपर उठ जाता है फिर वह अपने वर्ग से दूर हटने का प्रयास करता है। अपने को किसी ऊँची जाति के वंशज से जोड़ने का प्रयास करता है। यह स्वाभाविक हीनभावना से ऊबरने का प्रयास होता है।यह बिडम्बना है कि वह उस वर्ग के उत्थान के लिये सार्थक प्रयास नहीं करता है जिससे वह आया है। वह अपनी जाति पर तमाम ऊँची जातियों का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करता है।
यह कुछ इसी तरह से है जैसे कि हरिजन कल्याण विकास कार्यक्रम के तहत सस्ते मकान लेने के लिये तमाम तथाकथित ऊँची जाति वाले लोग अपनी जाति का टाईटल उखाड़ के फेंक देते हैं।
यह भी विवाद का विषय है कि आरक्षण आखिर कब तक? यह पता नहीं कब थमेगा। लेकिन यह तय है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जितना क्रीमी लेयर का क्यों न हो तब तक आरक्षण का फायदा लेना नहीं छोड़ेगा जब तक कि इस पर पाबंदी न लगा दी जाये।
यह विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता है उनके लिये कि वे बिना बैसाखी के चल पायेंगे। वैसे भी किसी को भी अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा नहीं होता कि बिना सुरक्षित हुये चलने का जोखिम खुशी-खुशी उठाना चाहे।यहाँ तक की आई.आई.टी. का टापर भी पहले आई.आई.टी. में टाप करता है। फिर एम.बी.ए. करता है। फिर किसी कम्पनी में बिक्री करता है। इस प्रक्रिया में वह उस विषय को भूलता है जिसमें उसने टाप किया होता है।अगर प्रतिभा को अपने पर इतना ही भरोसा होता तो किसी दूसरे की एक सीट न मारकर सीधे एम.बी.ए. की परीक्षा देता। लेकिन फैशन के दौर में गारण्टी की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अक्सर आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात की जाती है। यह होना चाहिये। लेकिन कौन गरीब है इसकी पहचान बहुत मुश्किल काम है। सरकारी नौकरी में तो तनख्वाह के आधार पर बताया जा सकता है कि कितना गरीब है व्यक्ति लेकिन इसके अलावा गरीबी के बारे में तय करना बहुत मुश्किल है। फिर तमाम लखपति भी अपने को गरीब साबित कर देंगे। जैसा काले धन की पहचान नहीं हो पाती ,गरीबों की पहचान में भी घालमेल होने का खतरा है। कुछ ऐसा ही जैसा कि ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ लागू होने पर तमाम जमींदारों ने अपनी हजारों एकड़ जमीन अपने अपने कुत्ते,बिल्लियों तक के नाम करा दी तथा भूदान आन्दोलन में तमाम लोगों ने अपनी बंजर जमीन दान में दे दी। अपना पाया अधिकार छोड़ दे, ऐसा बिरले लोग करते हैं।
यह भी एक विडम्बना ही है कि पिछड़ी जातियों के आरक्षण के बारे में जब भी विचार हुआ,उसमें पिछड़ों को आगे बढ़ाने का विचार कम ,तात्कालिक राजनीति ज्यादा हावी रही।
जैसा कि मैंने कहा कि आरक्षण का मुद्दा ऐसा है कि इसके पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जा सकता है। अंतहीन बहस की जा सकती है।
लब्बोलुआबन मेरे विचार निम्नवत हैं:-
१.आरक्षण देश के वंचित लोगों को आगे लाने के लिये जरूरी है। दलित,वंचित लोग अभी भी बहुत पिछ़डे हैं।अभी भी देश में अन्याय,अत्याचार का शिकार दलित ही सबसे ज्यादा हैं। देश में बलात्कार, मारपीट की सबसे ज्यादा घटनायें अनुसूचित जातियों,जनजातियों के साथ ही होती हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति की स्कूलों से ‘ड्रापआउट’ दर ९०% से अधिक है। गाँवों में रहने वाले तमाम दलित लोगों को अभी तक उनके लिये मिलने वाली सुविधाओं के बारे में ही नहीं पता।
२. आरक्षण के प्रतिशत पर पुनर्विचार होना चाहिये। जिन लोगों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल चुका है उनको पहचानने तथा उनको आरक्षण से बाहर रखने की प्रक्रिया पर विचार तथा अमल होना चाहिये। अगर क्रीमी लेयर वाले लोग आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जायें तो अनारक्षित वर्ग का आक्रोश बहुत कम हो जायेगा। शहरों में रहने वाले आरक्षित वर्ग के डाक्टर,इंजीनियर,अधिकारी जब अपने बच्चों के लिये आरक्षण का फायदा लेते हैं तो समाज के दूसरे वर्ग की कुंठा सहज है।
३. जो जातियाँ आरक्षण का नाजायज फायदा ले रहीं हैं उनकी पहचान के प्रयास तथा उनको बाहर करने के उपाय होने चाहिये। यह बहुत कठिन काम है। लेकिन जरूरत है इसकी।
४.पिछड़ी जातियों की गणना आज के परिप्रेक्ष्य में होनी चाहिये। जो जातियाँ सम्पन्न हैं उनको इसका फायदा नहीं मिलना चाहिये। यह मुद्दा सबसे ज्यादा संवेदनशील है। हरियाणा,उ.प्र.,बिहार,म.प्र. की जो तमाम जातियाँ पिछड़ी जातियों मे शामिल हैं उनमें से बहुत सी जातियाँ बहुत सम्पन्न तथा प्रभावशाली हैं।इनको आरक्षण देने से समाज में वैमनस्यता तथा भेदभाव बढे़गा।अनारक्षित वर्ग के लिये यह पचा पाना मुश्किल हो जाता है कि हर तरह से उसके बराबर तथा कहीं से ऊँची सामाजिक स्थिति वाला उसका साथी आरक्षण के नाम पर उसके आगे निकल जाता है।
आगे के लिये मुझे लगता है कि जैसी कि अपने देश की परम्परा रही है उससे मुझे नहीं लगता कि कुछ खास फरक पड़ेगा-आरक्षण विरोधयों के हल्ले-गुल्ले से। सरकार ने नौकरियों में आरक्षण कर ही दिया है।शिक्षा में भी कर ही देगी। आज नहीं तो कल,कल नहीं तो परसों। कुछ विरोध होगा लेकिन आरक्षण होकर रहेगा। शायद कुछ आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पर भी हो जाय।
इससे अनारक्षित वर्ग में आक्रोश होगा। कुछ दिन धरना,आन्दोलन होगा फिर सब शान्त हो जायेगा। ज्यादा दिन कुछ नहीं होगा क्योंकि माँग तथा आपूर्ति के नियम का पालन करते हुये धुँआधार इंजीनियरिंग मेडिकल कालेज खुलते जायेंगे। सीटें बढाने का विकल्प अच्छा है लेकिन वह उस दर्द का इलाज नहीं कर पायेगा जिसमें कोई अनारक्षित बच्चा अपने से कम अंक वाले आरक्षित बच्चे को चयनिते होते देखेगा।
नौकरी के स्तर पर कुछ खास फरक नहीं पड़ेगा। सरकारी नौकरियाँ लगातार कम हो रहीं हैं ।निजी कंपनियों में नौकरी में एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट की कीमत आज कुछ हजार रुपये प्रति माह से लेकर लाखों रुपये प्रतिमाह है। वहाँ प्रतिभा का कोई विकल्प नहीं है। प्राइवेट कंपनियाँ अपना घाटा उठा के आरक्षण नहीं करेंगीं। वे हर सरकारी व्यवस्था की काट खोज के केवल उन्हीं लोगों को चुनेंगी जो उनके काम का हो। कान्ट्रैक्ट पर नौकरियाँ शुरू हो ही गयी हैं।
यह लेख मैंने चार दिन पहले लिखा था। नेट के नखरे के कारण पोस्ट न कर सका। इस बीच आरक्षण समर्थक भी सड़क पर आ गये हैं। विरोधी तथा समर्थकों को पुलिस समान भाव से पीट रही है। बवाल बढ़ता जा रहा है। देश के कर्णधार सोच रहे हैं कि क्या किया जाय।
बहरहाल,हमारे विचार जैसे थे वैसे ही हैं। उनमें कोई बदलाव नहीं आया है ।
मुझे तो जो लगता है मैंने बता दिया अब आगे-आगे देखिये क्या होता है ।
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14 responses to “आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार”

  1. सृजन शिल्पी
    बहुत संतुलित और सहज भाव से आपने यह लेख लिखा है अनूप भाई। बिना उत्तेजित हुए सच बयान कर सकने और विरोधी पक्ष को भी सहमत कर लेने की क्षमता है आपके लेखन में। आप तो जानते ही हैं कि ‘परिचर्चा’ पर जीतू भाई इस विषय पर बहस छेड़े हुए हैं। मेरा खयाल है कि आपका यह लेख सबको आरक्षण के संदर्भ में संतुलित रूप से सोचने के लिए प्रेरित करेगा।
  2. प्रेमलता पांडे
    सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ लेख सधा हुआ है, तथ्यात्मक है। तेज जलते चूल्हे में सीली लकड़ी का कार्य करेगा जिसकी बहुत ज़रुरत है। नौजवान भिड़ने की मुद्रा में हैं जबकि आवश्यकता मिलकर प्रगति करने की है। गतानुगतः लोकः से दूर ले जाएगा। सभी को सोचने को विवश करेगा। धंयवाद।
    प्रेमलता पांडे
  3. anunad
    अनूप भाई, आप जितने विशालहृदय हैं, उतने ही महामना भी हैं | मेरा भी यही विचार है कि आरक्षण का विरोध न किया जाय बल्कि आरक्षण को लागू करने के तरीके में सुधार की माँग की जानी चाहिये | आरक्षण का फायदा यदि सम्पन्न जातियाँ और पिछडी जातियों के सम्पन्न लोग लेते हैं तो यह दोहरा संकट है – इससे अनारक्षितों को तो घाटा होता ही है, असली घाटा असल में पिछडे लोगों को ही होता है; क्योंकि आरक्षण के बावजूद वे बंचित रह जाते हैं |
    इसलिये आरक्षण लागू करते समय “क्रीमी लेयर” और सम्पन्न जातियों को इसके दायरे से बाहर रखा ही हजाना चाहिये |
  4. मनीष
    आरक्षण के विविध पहलुओं पर बेहद संतुलित लहजे में आपने अपने विचार रखे हैं . आपके इस लेख के निचोड़ से मैं पूरी तरह सहमत हूँ । पर एक सवाल मन को परेशान करता रहता है कि क्या कभी हमारी भावी पीढ़ियाँ आरक्षण मुक्त समाज में जन्म ले सकेंगी ?
  5. जीतू
    अनूप भाई के अपने विचार है, कोई जरुरी नही है कि हम एक दूसरे के विचारों से सहमत हों।अनूप भाई ने अपने विचार प्रभावशाली तरीके से रखे है, हो सकता है जीवन से उनके जो साक्षात्कार हुए हो, मेरे ना हुए हों। मेरा अब भी मानना है, आरक्षण सही नही है।जब आप उन्हे शिक्षा मे आरक्षण दे रहे है, नौकरियों मे आरक्षण दे रहे है तो पेन्शन भी शुरु करवा दीजिए, मै तो कहता हो, चमम्च से मूँह मे निवाला देने से तो अच्छा है उन्हे अपनी जीविका चलाने लायक बनाइये, जब तक आरक्षण रहेगा तब तक उन्हे प्रतियोगी नही बनाया जा सकता। हाँ यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।
    सरकारी नीतियां कितनी नीचे के लेवल तक पहुँचती है, वो हम सभी जानते है, इस प्रोपोस्ड आरक्षण का भी क्रीमी लेयर ही फायदा उठाएगी, ये पक्का है।
    स्रूजनशिल्पी जी,रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है।
  6. समीर लाल
    बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है, अनूप जी.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो…
  7. ratna
    मैं जीतू जी के विचारों से सहमत हूँ ।
  8. eswami
    “तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।”
    गुरुदेव,
    मेरे अनुरोध पर यह लेख लिखने के लिए आभारी हूं! आपके संतुलित विचार पढ कर बहुत प्रसन्न भी हूं!
    मोटे तौर पे लाजिकल टेबिल बनाने पर आठ तरह के केंडिडेट हैं आपके पास –
    १) सामान्य वर्ग वाला संपन्न गुणी
    २) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ३) सामान्य वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ४) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    ५) पिछडे वर्ग वाला संपन्न गुणी
    ६) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ७) पिछडे वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ८) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    यदी गुणवत्ता जन्मजात नही होती तो आरक्षण का आधार जातियां तो होना ही नही चाहिए – गुणी चाहे असंपन्न हो चाहे संपन्न हो, वो चाहे सामान्य वर्ग मे हो या पिछडे वाले में – वो अपना स्थान बना लेगा!चाहो तो पिछडे वर्ग के असंपन्न गुणी को छात्रवृत्तीयां दो ना हम विरोध कहां कर रहे हैं?
    अब रही की कम गुणी को मौका देने की बात – तो आरक्षण के आधार पर पिछडा संपन्नवर्ग जो है वो सामान्य वर्ग के असंपन्न गुणी का हक क्यों छीन रहा है?
    बाकी आसान कांबिनेशन आप भी इंजीनियर हो – लगा के देख लो की आरक्षण के तौर तरीके अन्यायपूर्ण हैं और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति को बढावा देने के लिए ही गढे गए हैं.
    ओवर आल मैं जीतू की बात का समर्थन करता हूं!
  9. रजनीश मंगला
    ये सारी चर्चा बहुत शिक्षाप्रद रही। क्या आरक्षण की चर्चा नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है?
  10. सृजन शिल्पी
    जीतू जी की इस टिप्पणी के संदर्भ में कि
    “सृजनशिल्पी जी, रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है”
    मेरा उनसे यह स्पष्टीकरण है कि स्वस्थ चर्चा में मेरा भी विश्वास है। मुझे कतई शिकायत नहीं है आरक्षण पर किसी बहस से। इसीलिए मैंने उत्साहपूर्वक परिचर्चा में भाग भी लिया और उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से टिप्पणी भी की। ऊपर मैंने सिर्फ उस बहस का जिक्र भर किया था। आप तो नाहक ही नाराज हो गए।
  11. e-shadow
    जीतू भैया को मेरा भी पूरा समर्थन।
  12. अशोक
    सर्वप्रथम मैं श्रीमान् जीतू एवं श्रीमान् ईस्‍वामी को उनके ज्‍वलंत एवं तथ्‍यात्‍मक विचारों को प्रस्‍तुत करने हेतु धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा। वहीं श्रीमान् अनूप जी भी इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि इस मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में कहने को उनके पास भी बहुत कुछ है। मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ। आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)। अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए। यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है। न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।
    सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ? और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते। बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था। यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।
    अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।
    (लेखक स्‍वयं अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है एवं आरक्षण के लाभ से कोसों दूर रहने में ही देशहित को देखता है)
  13. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
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