Thursday, July 27, 2006

सीढियों के पास वाला कमरा

http://web.archive.org/web/20140419051159/http://hindini.com/fursatiya/archives/181

सीढियों के पास वाला कमरा

[हमने बताया था कि हिंदी की प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के अगस्त ,२००६ अंक में हमारे ब्लागजगत की जानी-पहचानी लेखिका तथा निरंतर की संपादक मंडली की सदस्या प्रत्यक्षा की कहानी छपी है। कुछ लोगों ने इसे पढ़ना चाहा है। वैसे कहने को तो वागर्थ कहने को तो आनलाइन पत्रिका है लेकिन महीनों से पुराना अंक लगा है वहाँ। बहरहाल यहाँ पेश है प्रत्यक्षा जी कहानी-सीढियों के पास वाला कमरा। जानकारी के लिये बता दें कि कहानी में एक जगह अमलताश के फूल लाल बताये गये हैं जिसे वागर्थ वालों ने लाल ही रहने दिया है। यह नमूना है इस बात का कि प्रूफ की गलतियाँकरने का अधिकार सबको है।]
प्रत्यक्षा
प्रत्यक्षा
पीछे से तो बकुल दी ही लगीं . मिती हैरान. इतने सालों बाद , ऐसे ही अचानक . गाडी एकदम उनके बगल में रोकी .
” बकुल दी ”
आवाज़ मे उत्साह छलका पड रहा था . वो अचकचा कर मुडी थीं .
“अरे”
अचानक से जैसे पहचान नहीं पाईं हों . मिती गाडी से उतर गई थी .
“आईये न , बैठ कर बातें करते हैं “, बकुलदी के चेहरे पर असमंजस का भाव तैर गया . फ़िर उसने ही बाँह पकड कर , दूसरी तरफ़ का दरवाज़ा खोल कर उन्हें बैठा दिया . हँसते हुये कहा ,
“क्या अभी भी नहीं पहचाना . मैं मिती ” .
“तू कितनी बडी हो गई है मिती ” बकुल दी उसका हाथ पकड कर हँस दीं .
“लेकिन आप बिलकुल नहीं बदलीं ”
प्रत्यक्षा: २६ अक्टूबर,गया(बिहार)। स्कूली और कालेज की शिक्षा रांची और पटना में। संप्रति-पावरग्रिड कार्पोरेशन,मुख्य प्रबंधक वित्त के रूप में कार्यरत।संपर्क:फ्लैट नं.बी-१/ ४०२,पी.डब्ल्यू. ओ.हाउसिंग काम्प्लेक्स,प्लाट नं.जी.एच.१ए,सेक्टर-४३ ,गुड़गाँव(हरियाणा)
पर ऐसा कहाँ था . बदल तो गई थीं बकुल दी . सस्ती ताँत की साडी ,कलफ़ की हुई. बैगनी रंग का मेल खाता एकदम खराब फ़िटिंग का ब्लाउज़ . पतली कलाईयाँ , उभरी नसें , मोटा लाह का कँगन उनके पतली कलाईयों पर एकदम बेमेल लग रहा था . बाल खींचकर छोटा जूडा बनाया हुआ. गुलाबी लिपस्टिक होंठों के बाहर बह आया था . गोद में भूरे रंग का सस्ता पर्स .एक ही निगाह मे मिती ने सब देख लिया .
“चलिये बकुल दी , आपको घर छोड दूँ . रास्ते में बात भी हो जायेगी “. मिती ने गाडी स्टार्ट करते हुये कहा .
“तू कहाँ है मिती , आजकल “? बकुल दी ने आग्रह किया .
“बस, अ?भी कुछ दिन पहले ही आई हूँ . बैंक में हूँ. शादी हो गई है .
अब आप अपनी बताईये ” एक साँस में मिती कह गई .
बकुल दी चुप .
“बस ,हम तो यहीं हैं ” एक हल्की सी उसाँस लेकर धीरे से उन्होंने कहा .
हाँ , बकुल दी तो यहीं हैं . मिती को याद आ गया . कितने साल बीत गये . उँगलियों पर गिने बिना बताना एकदम सही ,मुश्किल .
उसे याद है जब पापा का तबादला इस शहर में हुआ था. पापा पहले आकर घर तय कर गये थे.
“घर तुमलोग को पसंद आयेगा ”
और घर सचमुच सबको पसंद आया था. खूब बडे बडे कमरे, ऊँची छतें , सामने खूब चौडा बरामदा , बडा सा अहाता, लॊन . गेट के पास दो अमलतास के पेड, जिनके नीचे गर्मियों में ढेर सारे लाल पीले फ़ूल गिरते रह्ते ,फ़िर धीरे धीरे सूख जाते.
पीछे की ओर आँगन और आँगन में अमरूद का पेड . जाली से घिरा पीछे का बरामदा इसी आँगन में खुलता था. आँगन के दूर वाले सिरे पर चार कमरे एक लगातार में ,रेल के डब्बों से. दो परिवार थे ,चपरासियों के जो मकान मालिक सान्याल साहब के दफ़्तर में काम करते थे .
शायद अमलतास के पेडों की वजह से घर का नाम भी अमलतास पडा था . मिती को अच्छी तरह याद है गर्मियों के दिन थे ,जब वे लोग इस मकान में आये थे. ऊपर वाले तल्ले पर सान्याल साहब का परिवार था. खुद सान्याल साहब वकील थे . उनकी पत्नी , दुबली पतली, खूब गोरी, एकदम पीली सी . बाल एकदम चट काले. एक बेटा था खोकोन, शायद मिती के ही उम्र का. बेहद शर्मीला. बकुल दी ,सान्याल साहब की बेटी थीं. शादी शुदा, ससुराल में. पर तब बकुल दी से कहाँ परिचय था. परिचय तो तब दीदी से भी नहीं था . दीदी सान्याल साहब की विधवा बडी बहन थीं. सब उन्हें दीदी ही कहते थे.
दीदी से पहला परिचय भी मिती का ही हुआ था.मकान में शिफ़्ट करने के एक दो दिन बाद दीदी बाहर वाले बरामदे के सीढियों पर बैठी मिली थीं . मटमैली सी साडी , बदरंग ब्लाउज़ ,खिचडी बाल कंधे तक , उजाड फ़हराये हुये . निर्विकार चेहरे पर झुर्रियों का जाल . बाद में पता चला था सान्याल साहब से उनका रिश्ता .
शुरु के कुछ दिन तो उनको नये घर में व्यवस्थित होने में लगे .पापा का दफ़्तर शुरु हो गया था . घर में माँ थीं , सरू दी थीं और मिती थी .गर्मी की छुट्टियाँ थीं .स्कूल में एडमिशन छुट्टियों के बाद होता . मिती के मज़े थे . मज़े तो सरू दी के भी थे . इन्टर की परीक्षा देकर आईं थीं इसलिये अभी तो छुट्टी ही थी . अगल बगल की सारी खबरें घर में पहले मिती ही लाती . पीछे आउटहाउस था जिसमें मंडल नामका चपरासी अपने बेटे के साथ एक कमरे में रहता.दो कमरे दूसरे परिवार को मिले हुये थे . बाप सान्याल साहब के दफ़्तर में था . बेटा किसी प्राइवेट दफ़्तर में. घर में सास थी , बहु थी और दो बच्चे . चौथा कमरा ताला लगा हुआ था .
मिती ने ही एकाध बार खोज करते दरारों से झाँक कर जरा मायूस होते रिपोर्ट दी कि कुछ खास नहीं सिर्फ़ सामान भरा पडा है, शायद सब कबाड .
पीछे जो बूढी थी वो काफ़ी दबंग किस्म की सास थी . खूब लंबी चौडी , साफ़ खुलता रंग ,पर चेचक के निशान से भरा . खूब बडा टीका लगाती , माँग में लहलह सिंदूर. पैरों में बिछिया आलता. बडे रंगीन छापे वाली साडी पहनती . बहू बेचारी एक हाथ के घूँघट में छिपी , सास से त्रस्त रहती . साडी में लिपटी जो ज़रा सा दिखता वो खूब गोरा. लंबी छरहरी . मिती को लगता कि वो बहुत सुंदर होगी.
बहु का रूपरंग भी चर्चा का विषय रहता . सरू दी का कहना था कि बस भरपेट गोरी ही है. जरूर शक्ल अच्छी नहीं तभी छुपाये रखती है . बेचारी सरू दी जो खुद साँवली थीं , उन्हें गोरे रंग का बडा काम्प्लेक्स था .
बहु के रूप का अन्वेषण भी मिती ने ही किया . चूल्हे की आग पर बैंगन भरता पकाने के लिये मिती उनके घर से घिरे बरामदे के कोने में, जहाँ उनकी रसोई पकती , गई थी .
“इसे ज़रा आग पर पका दीजिये . माँ ने कहा है ”
बहु ने खट से पहले चेहरे को आँचल से ढका था फ़िर अपनी कढाई उतार कर बैंगन पकाने लगी थी .मिती ने ही बाद में सरू दी को हँसते हुये बताया था ,
“तुम ठीक कहती थी दी , बस गोरी है . आँख नाक भी तीखे , नुकीले . बस ज़रा सा दाँत ही तो ” उसने आँख मटकायी थी बडी बूढियों की तरह .
दीदी के बारे में , उन्हें बूढी सास ने बताया था . कभी कभी बरामदे की सीढी पर आ बैठ जातीं . दीदी ब्याही थीं किसी बहुत बडे खानदानी परिवार में . खूब सुखी जीवन था . एक बेटी थी . एक बार रात कहीं से लौटते , किसी भिखारी के शव पर पैर पड गया था . बस शायद तभी से दिमाग गडबडा गया था . पति बाद में नहीं रहे . बेटी का अपना घर संसार है . पगली बहन की देखभाल ,सान्याल साहब ही कर रहे हैं .
मिती आँखें फ़ाडे, हैरान कहानियों की तरह किस्से सुनती . माँ कभी कभी बहुत गुस्सा होतीं
“तुम इन चीज़ों में क्यों पडती हो . छोटी हो. जाओ, अपने कमरे में पढाई करो ” पर मिती को इन किस्से कहानियों में बहुत मज़ा आता .
सान्याल साहब और उनकी पत्नी अपनी दुनिया में मगन रहते . कभी कभार ही नीचे दिखते . दीदी ही थीं जो सुबह , दोपहर , शाम सामने के बरामदे पर बैठी रहतीं . उनका कमरा नीचे ही था, सीढियों के बगल में. मिती देख आई थी . एक पलंग , एक टूटा सा बक्सा , टेबल पर कुछ बरतन वगैरह . तीनों समय ऊपर से दीदी का खाना नीचे आ जाता . इसके अलावा ऊपर और दीदी की दुनिया में कोई और संपर्क का तार नहीं था . बी?च बीच में कभी उनको दौरा पडता तब एकदम वायलैंट हो जातीं .सूई देकर उन्हें सुलाया जाता . डाक्टर आता . बाकी समय एकदम चुपचाप बाहर बैठी रहतीं .
मिती उनके पास बैठती कभी कभार . अपनी टूटी फ़ूटी बांगला मिश्रित हिंदी में दीदी उससे बात करती. कुछ पूछने पर ज़रा सा मुस्कुरा कर सिर्फ़ हैं गो, कहतीं . कभी मूड में रहतीं तो अपने ससुराल के वैभव के किस्से सुनाती . पर ऐसा कभी कभी ही होता .
मिती बैठकर बहुत सोचती . दीदी पर उसे बहुत दया आती और सान्याल परिवार पर गुस्सा . अगर वो लोग इनको साथ रखें तो शायद वे ठीक हो जाएं . उसका किशोर मन द्वंद मचाता .
कभी श्रीमति सान्याल ने ही माँ के सामने दुखडा रोया था .
“हमारे माथे पड गईं . बेटी को ज़रा भी ख्याल नहीं इनका . अडोस पडोस में जाकर चाय खाना माँगती रहती हैं , जैसे हम देते नहीं . जीवन भर निभाना पडे तब लोगों को पता चले ”
उनका स्वर कडवा हो गया था . कभी-कभी दीदी उनका दरवाज़ा भी समय-कुसमय खटखटा देतीं,
“सुबह से कुछ खाया नहीं . एक कप चाय देगा “? वो कातर स्वर में विनती करती . सान्याल साहब आकर पकड कर ले जाते.
” माफ़ करिये, आपको तकलीफ़ हुई . अभी खाना खाया है .इन्हें याद नहीं रहता “.
छुट्टियाँ खत्म हो गई थीं . मिती स्कूल जाने लगी थी . सरू दी ने भी बी. ए . में नाम लिखा कर कालेज जाना शुरु कर दिया था. माँ ने बोरियत से बचने के लिये पास में ही एक स्कूल ज्वाइन कर लिया था बतौर हेडमिस्ट्रेस . किसी के पास अब दीदी से बात करने या पीछे की सास बहु के बारे में चर्चा करने का समय नहीं था . जीवन एक निश्चित गति से चल रहा था .
इसी बीच एक रात , लगभग तीन चार बजे अल्ल सुबह को खूब आवाज़ें , बहुत शोर . पापा उठ कर गये थे देखने . मिती डर कर माँ के पास आ गई थी . पापा लौट आये थे
“सो जाओ , कुछ खास नहीं ”
बाहर शोर थम गया था . माँ से सट कर मिती फ़िर सो गई थी . अगले दिन पापा माँ की बातचीत से पता चला कि सान्याल साहब की शादी शुदा बेटी को उसके ससुराल वाले मायके पटक गये थे .
ऊपर एक दम सन्नाटा था . हफ़्ते दस दिन तक एक पत्ता भी नहीं खडका . आमतौर पर खोकोन दोपहर में , स्कूल से लौट कर रौलर स्केट्स चलाता , जिससे नीचे एक अजब से खरड -खरड की आवाज़ होती . बडा नागावार लगता पर मकान उनका था, कुछ कहा भी नहीं जा सकता था . इधर वो आवाज़ भी बंद थी .
फ़िर एक दिन बकुल दी ही नीचे आईं थीं , फ़ोन करने . उनका फ़ोन खराब था . मिती को बकुल दी बहुत प्यारी लगी थीं . चेहरे पर पानी था . खूब बडी बडी तरल आँखें. छोटी सी , दुबली पतली थीं . एकदम बच्ची सी लगतीं . दिन महीने बीत रहे थे . बकुल दी कभी कभी नीचे आ जातीं . बातें करतीं पर अपने पति या ससुराल का कोई ज़िक्र नहीं करतीं .
फ़िर आया था , तलाक का कागज़ . उस दिन नीचे ही बैठी थीं .लिफ़ाफ़ा खोलते ही उनका चेहरा सफ़ेद पड गया था . मिती एकदम घबडा गई थी . सरू दी ने पानी लाने भेजा था . पानी का ग्लास लेकर लौटी तो बकुल दी को सरू दी के कँधे पर सर रख कर फ़फ़क ,फ़फ़क कर रोते देखा था , मिती ने . टूटे अस्फ़ुट स्वर थे . चरित्रहीनता का लाँछन था , बाँझ होने का भी दोष लगाया था उन्होंने .
“ईश्वर गवाह है , लोगों ने तो सीता को भी नहीं बख्शा था ”
उनकी आवाज़ अंदर से टूट कर आ रही थी . इतने दिनों तक ऊपर से शांत स्थिर बनी रही थीं . पर अंदर, दुख का लावा फ़ट रहा था .
मिती बहुत कुछ नहीं समझ पाई थी पर ये जरूर समझा था कि कहीं बहुत गलत हुआ है बकुल दी के साथ . पर उस दिन के बाद फ़िर कभी ,मिती ने बकुल दी को उदास या दुखी नहीं देखा . वो गाहे बगाहे नीचे आतीं सरू दी से गप करने , मिती से किताबें माँग कर पढने . मिती भी जब तब बकुल दी का सहारा लेकर ऊपर चली जाती , ” बकुल दी , आज कुछ अच्छी सी किताब दीजिये ” . और बकुल दी भी खोज खोज कर कभी अगाथा क्रिस्टी , कभी वुड हाउस , कभी विक्टोरिया होल्ट ,निकाल? कर उसे देतीं .
उसी घर से? सरू दी की शादी हुई . घर में अब सिर्फ़ तीन प्राणी रह गये थे . मिती सरू दी को बेतरह मिस करती . इसी बीच पापा का तबादला हो गया . शहर छूटने का जितना दुख था उससे ज्यादा बकुल दी छूट जायेंगी , इसका मलाल था . सरू दी की शादी के बाद बकुल दी ही मिती की राजदार थीं .
शहर छूटा और बकुल दी भी छूट गईं .
आज इतने सालों बाद मिती यहीं , इसी शहर आ? जायेगी तब कहाँ सोचा था . यहाँ ज्वायन किये महीना भर ही तो हुआ है . बीरेन का तबादला भी लगभग थ्रू ही है . तब तक? अकेले रहना है .
” बकुल दी आप? अब भी उसी मकान में हैं ?”
“हाँ , खोकोन की शादी हो गई? , नौकरी हो गई . बाबा , माँ नहीं रहे . दीदी भी “.
उनकी अवाज़ में अजीब सी उदासी थी .
“स्कूल में पढाती हूँ . अपने लिये खर्च निकल जाता है . अब जीवन में और रखा क्या है ” हल्की उसाँस लेकर उन्होंने कहा .
“बस मिती यहीं उतार दे मुझे . आगे रोड बन रहा है . गाडी शायद नहीं जा पायेगी ”
उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हल्का सा दबा दिया .
” आना जरूर ”
बकुल दी उतर गईं थी . उसके माथे को सहलाया, हँसी और फ़िर तेज़ी से मुड कर बढ गईं . दो कदम चलकर फ़िर लौटीं .
“मिती , आना तो नीचे ही आना . दीदी वाला कमरा अब मेरा है “.
मिती उन्हें तब तक? देखती रही जबतक कि अगली मोड से मुडकर वो ओझल नहीं हो गई. अनायास अमलतास के सूखे नीचे गिरे फ़ूलों की याद मिती के मन को दहका गई.
प्रत्यक्षा

10 responses to “सीढियों के पास वाला कमरा”

  1. जगदीश भटिया
    बहुत ही अच्छी कहानी है प्रत्यक्षा जी की।
    धन्यवाद अनुप जी इस तरह की सामग्री देने के लिये।
  2. समीर लाल
    पुन: अनूप भाई, आपको यह कहानी यहां पेश करने के लिये धन्यवाद और प्रत्यक्षा जी को बेहतरीन कहानी के लिये बधाई.
  3. सागर चन्द नाहर
    ये फ़ुरसतिया जी का टाईप किया हुआ नहीं हो सकता! प्रूफ़ में इतनी सारी गल्तियाँ की कहानी पढ़ने का मन ही नहीं हुआ। पढ़ी भी नहीं
  4. प्रेमलता पांडे
    अच्छी कहानी है।
  5. फ़ुरसतिया » प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत
    [...] हिंदी ब्लाग जगत में प्रत्यक्षा के बारे में कुछ बताना तो सूरज को दिया दिखाना है या फिर ऐसा कहें कि पूरे पढ़े लेख के नीचे उसका लिंक देना है। वे कवियत्री है, कथाकार है, चित्रकार हैं, मूर्तिकार हैं, धुरंधर पाठिका हैं, संगीतप्रेमी हैं और चिट्ठाकार तो खैर हैं हीं। उनकी रुचियों और क्षमताऒं की सूची बड़ी लंबी है। वो तो कहो उनके ऊपर आलस्य का ठिठौना लगा है वर्ना मानव सभ्यता के सबसे काबिल लोगों में उनका नाम शामिल करने की मुहिम शुरू हो गयी होती। प्रत्यक्षा की कहानियां-कवितायें, लेख नेट पर तो अर्से से उपलब्ध हैं लेकिन अब पिछले माह से वे प्रिंट मीडिया की भी धाकड़ लेखिका बनने की राह पर चल डगरी हैं। संपादकगण उनसे कहानी मांगकर छाप रहे हैं यह सब प्रत्यक्षा को नया-नया और खुशनुमा लग रहा है आजकल। [...]
  6. फुरसतिया » प्रत्यक्षा-जन्मदिन मुबारक
    [...] आप यह भी पढ़ें:- १.मरना तो सबको है,जी के भी देख लें २. प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत ३. सीढियों के पास वाला कमरा ४.अभिव्यक्ति में प्रत्यक्षा की कहानी [...]
  7. …सही बात पर स्टैंड भी लेना चाहिये-प्रत्यक्षा
    [...] आप यह भी पढ़ें:- १.मरना तो सबको है,जी के भी देख लें २. प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत ३.प्रत्यक्षा-जन्मदिन मुबारक ४.अभिव्यक्ति में प्रत्यक्षा की कहानी ५. साथी चिट्ठाकार पर एक नजर – प्रत्यक्षा –या कहूं कि प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या ६.ब्‍लॉग-चर्चा : ‘प्रत्‍यक्षा’ का हमनाम ब्‍लॉग ७. सीढियों के पास वाला कमरा [...]
  8. Alok Prakash
    प्रत्यक्षा जी को पिछले २२ वर्षों से जानता हूँ परन्तु उनको एक लेखिका के रूप में आज ही जाना . कार्यालय में हिंदी पुस्तकों की खरीद के लिए हम एक साथ गए तब भी केवल एक समझदार पाठक के रूप में ही पहचान बनी थी परन्तु वह कब एक परिपक्व लेखिका में परिवर्तित हो गयीं पता ही नहीं चला.
    आलोक प्रकाश
    मुख्य प्रबंधक पावरग्रिड
    नई दिल्ली
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] देकर हड्डियों में समा जाता है. 21. सीढियों के पास वाला कमरा 22. परदे के पीछे-कौन है बे? 23. मरना कोई [...]

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Monday, July 24, 2006

ग़ज़ल का इतिहास

http://web.archive.org/web/20110907152512/http://hindini.com/fursatiya/archives/162

ग़ज़ल का इतिहास

[ग़ज़ल के बारे में लिखे लेख में मानसी ने बताया कि लेख में बह्‌र वाली बात स्पष्ट नहीं होती। तो यहां तो यही बताया गया है कि बह्‌र मुख्यतया छोटी,मध्यम और बड़ी होती है। कुल मिलाकर उन्नीस बह्‌रे होती हैं। अब इससे ज्यादा विस्तार से तो जानकार लोग बतायें।हम तो खाली टाइप कर दिये आईना-ए-ग़ज़ल से। जीतू को फोकट के लिंक की ऐसी लत लगी है कि हर चीज मुफ्त में चाहिये। जन्मदिन तक खिसका लेंगे अगर कोई इन्हें किताब दे दे। सो हम वायदा करते हैं कि इनके जन्मदिन पर आईना-ए-ग़ज़ल के दो शेर मुफ्त भेजेंगे। इस बीच चाहें तो आन लाइन खरीद लें। फिलहाल पढ़ें-ग़ज़ल का इतिहास]
फ़ारसी से ग़ज़ल उर्दू में आई। उर्दू का पहला शायर जिसका काव्य संकलन(दीवान)प्रकाशित हुआ है, वह हैं मोहम्मद क़ुली क़ुतुबशाह। आप दकन के बादशाह थे और आपकी शायरी में फ़ारसी के अलावा उर्दू और उस वक्त की दकनी बोली शामिल थी।
पिया बाज प्याला पिया जाये ना।
पिया बाज इक तिल जिया जाये ना।।
क़ुली क़ुतुबशाह के बाद के शायर हैं ग़व्वासी, वज़ही,बह्‌री और कई अन्य। इस दौर से गुज़रती हुई ग़ज़ल वली दकनी तक आ पहुंची और उस समय तक ग़ज़ल पर छाई हुई दकनी(शब्दों की) छाप काफी कम हो गई। वली ने सर्वप्रथम ग़ज़ल को अच्छी शायरी का दर्जा दिया और फ़ारसी के बराबर ला खड़ा किया। दकन के लगभग तमाम शायरों की ग़ज़लें बिल्कुल सीधी साधी और सुगम शब्दों के माध्यम से हुआ करती थीं।
पहला दौर-
वली के साथ साथ उर्दू शायरी दकन से उत्तर की ओर आई। यहां से उर्दू शायरी का पहला दौर शुरू होता है। उस वक्त के शायर आबरू, नाजी, मज्‍़नून, हातिम, इत्यादि थे। इन सब में वली की शायरी सबसे अच्छी थी। इस दौर में उर्दू शायरी में दकनी शब्द काफी़ हद तक हो गये थे। इसी दौर के आख़िर में आने वाले शायरों के नाम हैं-मज़हर जाने-जानाँ, सादुल्ला ‘गुलशन’ ,ख़ान’आरजू’ इत्यादि। यक़ीनन इन सब ने मिलकर उर्दू शायरी को अच्छी तरक्क़ी दी। मिसाल के तौर पर उनके कुछ शेर नीचे दिये गये हैं-
ये हसरत रह गई कि किस किस मजे़ से ज़िंदगी करते।
अगर होता चमन अपना, गुल अपना,बागबाँ अपना।।-मज़हर जाने-जानाँ
खुदा के वास्ते इसको न टोको।
यही एक शहर में क़ातिल रहा है।।-मज़हर जाने-जानाँ
जान,तुझपर कुछ एतबार नहीं ।
कि जिंदगानी का क्या भरोसा है।।-खान आरजू
दूसरा दौर-
इस दौर के सब से मशहूर शायर हैं’मीर’ और ‘सौदा’। इस दौर को उर्दू शायरी का ‘सुवर्णकाल’ कहा जाता है। इस दौर के अन्य शायरों में मीर’दर्द’ और मीर ग़ुलाम हसन का नाम भी काफी़ मशहूर था। इस जमाने में उच्च कोटि की ग़ज़लें लिखीं गईं जिसमें ग़ज़ल की भाषा, ग़ज़ल का उद्देश्य और उसकी नाजुकी को एक हद तक संवारा गया। मीर की शायरी में दर्द कुछ इस तरह उभरा कि उसे दिल और दिल्ली का मर्सिया कहा जाने लगा।
देखे तो दिल कि जाँ से उठता है।
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है।।
दर्द के साथ साथ मीर की शायरी में नज़ाकत भी तारीफ़ के काबिल थी।
नाजु़की उसके लब की क्या कहिये।
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।।
‘मीर’ इन नीमबाज़ आखों में।
सारी मस्ती शराब की सी है।।
इस दौर की शायरी में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ज़माने के अधिकांश शायर सूफी पंथ के थे। इसलिये इस दौर की ग़ज़लों में सूफी पंथ के पवित्र विचारों का विवरण भी मिलता है।
वक्‍़त ने करवट बदली और दिल्ली की सल्तनत का चिराग़ टिमटिमाने लगा। फैज़ाबाद और लखनऊ में ,जहां दौलत की भरमार थी, शायर दिल्ली और दूसरी जगहों को छोड़कर, इकट्ठा होने लगे। इसी समय ‘मुसहफ़ी’ और ‘इंशा’ की आपसी नोकझोंक के कारण उर्दू शायरी की गंभीरता कम हुई। ‘जुर्रअत’ ने बिल्कुल हलकी-फुलकी और कभी-कभी सस्ती और अश्लील शायरी की। इस ज़माने की शायरी का अंदाज़ा आप इन अशआर से लगा सकते हैं।
किसी के मरहमे आबे रवाँ की याद आई।
हुबाब के जो बराबर कभी हुबाब आया।।
टुपट्टे को आगे से दुहरा न ओढ़ो।
नुमुदार चीजें छुपाने से हासिल।।
लेकिन यह तो हुई ‘इंशा’, ‘मुसहफ़ी’ और ‘जुर्रअत’ की बात। जहां तक लखनवी अंदाज़ का सवाल है ,उसकी बुनियाद ‘नासिख़’ और ‘आतिश’ ने डाली। दुर्भाग्यवश इन दोनों की शायरी में हृदय और मन की कोमल तरल भावनाओं का बयान कम है और शारीरिक उतार-चढ़ाव,बनाव-सिंगार और लिबास का वर्णन ज्‍़यादा है। उर्दू शायरी अब दो अंदाज़ों में बंट गयी। ‘लखनवी’ और’देहलवी’। दिल्ली वाले जहां आशिक़ और माशूक़ के हृदय की गहराइयों में झांक रहे थे ,वहां लखनऊ वाले महबूब के जिस्म,उसकी खूबसूरती,बनाव-सिंगार और नाज़ो-अदा पर फ़िदा हो रहे थे। दिल्ली और लखनऊ की शायरी जब इस मोड़ पर थी .उसी समय दिल्ली में ‘जौ़क़’, ‘ग़ालिब’ और ‘मोमिन’ उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हुये थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘गा़लिब’ ने ग़ज़ल में दार्शनिकता भरी ,’मोमिन’ ने कोमलता पैदा की और ‘जौ़क़’ ने भाषा को साफ़-सुथरा,सुगम और आसान बनाया। लीजिये इन शायरों के कुछ शेर पढ़िये-
ग़मे हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज।
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।।-गालिब़
तुम मेरे पास हो गोया।
जब कोई दूसरा नहीं होता।।- मोमिन
लाई हयात आये,कज़ा ले चली,चले।
अपनी खु़शी न आये, न अपनी खुशी चले।।-जौ़क़
इन तीनों महान शायरों के साथ एक बदनसीब शायर भी था जिसनें जिंदगी के अंतिम क्षणों में वतन से दूर किसी जेल की अंधेरी कोठरी में लड़खड़ाती ज़बान से कहा था-
कितना बदनसीन ‘ज़फ़र’ दफ्‍़न के लिये।
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।।-बहादुरशाहज़फ़र
१८५७ में दिल्ली उजड़ी,लखनऊ बर्बाद हुआ। ऐशो-आराम और शांति के दिन ख़त्म हुये। शायर अब दिल्ली और लखनऊ छोड़कर रामपुर,भोपाल, मटियाब्रिज और हैदराबाद पहुंच वहांके दरबारों की शोभा बढ़ाने लगे। अब उर्दू शायरी में दिल्ली और लखनऊ का मिला जुला अंदाज़ नज़र आने लगा। इस दौर के दो मशहूर शायर’दा़ग’ और ‘अमीर मीनाई’ हैं।
यह वक्‍़त अंग्रेजी हुकूमत की गिरफ्‍़त का होते हुये भी भारतीय इंसान आजा़दी के लिये छटपटा रहा था और कभी कभी बगा़वत भी कर बैठता था। जन-जीवन जागृत हो रहा था। आजा़दी के सपने देखे जा रहे थे और लेखनी तलवार बन रही थी। अब ग़ज़लों में चारित्य और तत्वज्ञान की बातें उभरने लगीं। राष्ट्रीयता यानी कौ़मी भावनाओं पर कवितायें लिखीं गईं और अंग्रेजी हुकूमत एवं उसकी संस्कृति पर ढके छुपे लेकिन तीखे व्यंग्यात्मक शेर भी लिखे जाने लगे। अब ग़ज़ल में इश्क़ का केंद्र ख़ुदा या माशूक़ न होकर राष्ट्र और मातृभूमि हुई। इसका मुख्य उद्देश्य अब आजा़दी हो गया। ‘हाली’,'अकबर इलाहाबादी’ ,’चकबिस्त’, और ‘इक़बाल’ इस युग के ज्वलंत शायर हैं।
सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुले हैं इसकी ,ये गुलिस्ताँ हमारा।।
‘इक़बाल’ की यह नज्‍़म हर भारतीय की ज़बान पर थी और आज भी है। ‘अकबर’ के व्यंग्य भी इतने ही मशहूर हैं।लेकिन एक बात का उल्लेख यहाँ पर करना यहां जरूरी है कि इन शायरों ने ग़ज़लें कम और नज्‍़में अथवा कवियायें ज्यादा लिखीं।और यथार्थ में ग़ज़ल को पहला धक्का यहीं लगा। कुछ लोगों ने तो समझा कि ग़ज़ल ख़त्म की जा रही है।
लेकिन ग़ज़ल की खु़शक़िस्मती कहिये कि उसकी डगमगाती नाव को ‘हसरत’,जिगर’ ‘फा़नी’,'असग़र गोंडवी’ जैसे महान शायरों ने संभाला ,उसे नयी और अच्छी दिशा दिखलाई ,दुबारा जिंदा किया और उसे फिर से मक़बूल किया।’जिगर’ और ‘हसरत’ ने महबूब को काल्पनिक दुनिया से उतार निकालकर चलती-फिरती दुनिया में ला खड़ा किया। पुरानी शायरी में महबूब सिर्फ़ महबूब था,कभी आशिक़ न बना था। ‘हसरत’ और ‘जिगर’ ने महबूब को महबूब तो माना ही साथ ही उसे एक सर्वांग संपूर्ण इंसान भी बना दिया जिसने दूसरों को चाहा ,प्यार किया और दूसरों से भी यही अपेक्षा की।
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये।
वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।।
-हसरत
ग़ज़ल का यह रूप लोगों को बहुत भाया। ग़ज़ल अब सही अर्थ में जवान हुई। इन शायरों के बाद नई नस्ल के शायरों में फ़िराक़, नुशूर, जज्‍़बी,जाँनिशार अख्‍़तर, शकील, मजरूह,साहिर,हफ़ीज़ होशियारपुरी,क़तील शिफ़ाई,इब्ने इंशा, फ़ैज़ अहमद’फ़ैज़’,और सेवकों का जिक्र किया जा सकता है। ‘हफ़ीज जालंधरी’ और ‘जोश मलीहाबादी’ के उल्लेख के बगैर उर्दू शायरी का इतिहास अधूरा रहेगा। यह सच है कि इन दोनों शायरों ने कवितायें(नज्‍़में) ज्‍़यादा लिखीं और ग़ज़लें कम। लेकिन इनका लिखा हुआ काव्य संग्रह उच्च कोटि का है। ‘जोश’ की एक नज्‍़म, जो दूसरे महायुद्द के वक्त लिखी गई थी और जिसमें हिटलर की तारीफ़ की गई थी,अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा उनको जेल भिजवाने का कारण बनी।
फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की शायरी का जिक्र अलग से करना अनिवार्य है।यह पहले शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल में रा जनीति लाई और साथ साथ जिंदगी की सर्वसाधारण उलझनों और हकी़क़तों को बड़ी खू़बी और सफा़ई से पेश किया।

मता-ए- लौहो क़लम छिन गई तो क्या ग़म है।
कि खू़ने दिल में डुबो ली हैं उंगलियाँ मैंने।।
जेल की सीखचों के पीछे क़ैद ‘फ़ैज़’ के आजा़द क़लम का नमूना ऊपर लिखी बात को पूर्णत: सिद्ध करता है।
ग़ज़ल का इतिहास रोज़ लिखा जा रहा है। नये शायर ग़ज़ल के क्षितिज पर रोज़ उभर रहे हैं ,और उभरते रहेंगे। अपने फ़न से और अपनी शायरी से ये कलाकार ग़ज़ल की दुनिया को रोशन कर रहे हैं।
कुछ शायरों ने ग़ज़ल को एक नया मोड़ दिया है। इन ग़ज़लों में अलामती रुझान यानी सांकेतिक प्रवृत्ति प्रमुख रूप से होता है। उदाहरण के लिये निम्न अशआर पढ़िये-
वो तो बता रहा था बहोत दूर का सफ़र।
जंजीर खींचकर जो मुशाफ़िर उतर गया।।
साहिल की सारी रेत इमारत में लग गई।
अब लोग कैसे अपने घरौंदे बनायेंगे।।
-मिद्‌ह‌तुल अख्‍़तर
इन शायरों में कुछ शायरों के नाम हैं- कुंवर महिंदर सिंह बेदी, ज़िया फ़तेहबादी, प्रेम वारबरटनी,मज़हर इमाम, अहमद फ़राज़,निदा फ़ाज़ली,सुदर्शन फ़ाकिर, नासिर काज़मी, परवीन शाकिर, अब्दुल हमीद अदम,सूफी़ तबस्सुम, ज़रीना सानी, मिद्‌हतुल अख्‍़तर, अब्दुल रहीम नश्तर, प्रो.युनुस, ख़लिश क़ादरी, ज़फ़र कलीम,शाहिद कबीर, प्रो. मंशा, जलील साज़, शहरयार, बशीर बद्र, शाज तम्कनत, वहीद अख्‍़तर, महबूब राही, इफ्‍़ितख़ार इमाम सिद्धीकी़,शबाब ललित, कृष्ण मोहन, याद देहलवी,ज़हीर गा़ज़ीपुरी, यूसुफ़ जमाल, राज नारायण राज़,गोपाल मित्तल,उमर अंशारी,करामत अली करामत, उनवान चिश्ती, मलिक़ जा़दा मंज़ूर,ग़ुलाम रब्बानी,ताबाँ,जज्‍़बी इत्यादि।
ग़ज़ल लेखन में एक और नया प्रयोग शुरू किया गया है जिसका उल्लेख यहाँ करना अनुचित न होगा। इन प्रायोगिक ग़ज़लों में शेर की दोनों पंक्तियों से मीटर की पाबंदी हटा दी गई है,लेकिन रदीफ़ और क़ाफिये की पाबंदी रखी गई है। इन ग़ज़लों को ‘आजा़द ग़ज़ल’ कहा जाता है।
फूल हो ,ज़हर में डूबा हुआ पत्थर न सही।
दोस्तों मेरा भी कुछ हक़ तो है,छुपकर सहीम खुलकर न सही।
यूं भी जीवन जी लेते हैं जीने वाले।
कोई तस्वीर सही,आपका पैकर न सही।
-मज़हर इमाम
शक्‍ल धुंधली सी है,शीशे में निखर जायेगी।
मेरे एहसास की गर्मी से संवर जायेगी।।
आज वो काली घटाओं पे हैं नाजाँ लेकिन।
चांद सी रोशनी बालों में उतर जायेगी।।
-ज़रीना सानी
फ़िलहाल यह ग़ज़लें प्रारंभिक अवस्था में हैं। ग़ज़ल के रसिया और ग़ज़ल गायक इन ग़ज़लों को पसंद करते हैं या नहीं यह भविष्य ही बतायेगा।निम्नलिखित शायर’ आजाद़ ग़ज़ल’के समर्थक हैं।ज़हीर ग़ाजीपुरी, मज़हर इमाम, युसुफ़ जमाल, डा.ज़रीना सानी,अलीम सबा नवीदी,मनाज़िर आशिक़ इत्यादि।
संगीत को त्रिवेणी संगम कहा जाता है। इस संगम में तीन बातें अनिवार्य हैं,शब्द,तर्ज़ और आवाज़। ग़ज़ल की लोकप्रियता इस बात की पुष्टि करती है कि अच्छे शब्द के साथ अच्छी तर्ज़ और मधुर आवाज़ अत्यंत अनिवार्य है। इसीलिये यह निसंकोच कहा जा सकता है कि ग़ज़ल को दिलकश संगीत में ढालने वाले संगीतकार और उसे बेहतरीन ढंग से रसिकों के आगे पेश करने वाले कलाकार गायक अगर नहीं होते तो ग़ज़ल यकीनन किताबों में ही बंद रह कर घुट जाती,सिमट जाती।
-डा.अर्शद जमाल
आईना-ए-ग़ज़ल से साभार

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “ग़ज़ल का इतिहास”

  1. फ़ुरसतिया » ग़ज़ल क्या है…
    [...] अगली पोस्ट में पढ़िये -ग़ज़ल का इतिहास [...]
  2. अन्तर्मन
    फ़ुरसतिया जी,
    आपने तो माहौल वाक़ई ग़ज़ल मय कर दिया है…इससे प्रेरित होकर हमने भी कुछ कोशिश की है, हमारे चिट्ठे पर देखिये।
  3. फ़ुरसतिया » फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा 2.कन्हैयालाल नंदन की कवितायें 3.बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं 4.अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता 5.थोड़ा कहा बहुत समझना 6.एक पत्रकार दो अखबार 7.देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर- 8.अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले 9.एक मीट ब्लागर और संभावित ब्लागर की 10.उखड़े खम्भे 11.ग़ज़ल क्या है… 12.ग़ज़ल का इतिहास 13.अनन्य उर्फ छोटू उर्फ हर्ष-जन्मदिन मुबारक 14.पहाड़ का सीना चीरता हौसला [...]
  4. ak thakur
    aaz ke daur ke sair, nida fajli,munawwar rana,rahat indori,najar etavi, ana dehlvi, dr kalim qaiser ke bare me bhi likhen
  5. anant
    good article..although one must mention the contributions of Siraj Auarangabadi,probably the first important poet of urdu gazal.The period of siraj lies between that of wali and meer..many poets including meer have written in the various JAMEENS of siraj..siraj said :
    CHALEE SAMTE GHAIB SE EEK HAWA KE CHAMAN SUROOR KA JAL GAYA
    MAGAR EK SHAKH-E-NIHAL-E-GHAM ,JISE DIL KAHEN SO HAREE RAHEE…
    Regards,
    anant dhavale
    anant307@yahoo.com
    98230 89674
  6. Anonymous
    didar ki tammanna hai to nazrein zamayerakh chilman ho ya naqab sarakti jaroor hai
  7. Benaam
    Waah waah !!! Kya baat hai. Dil khush ho gaya….
  8. maikash ansari
    aadab,” gazal ki tareekh” mazmoon bahut pasand aaya.lekin aap aaj ke ahad ke shayron ke baare mein bhi likhein jaise anwar jalalpuri, rahat indori, munawwar rana, wagairah.
    AAP KA KHAIRKHWAH,
    maikash ansari
    022-23061289
  9. sandeep kumar
    sir apki sayary padhkar bahut achchha lga aur mai bhi sayary likhne laga hu
  10. sandeep kumar
    very fantastic
  11. प्रदीप कांत
    बेहतरीन आलेख …..
  12. प्रदीप कांत
    बेहतरीन आलेख
  13. zuhiab
    hi good side
  14. Mukesh Kumar Giri
    वाह हुजूर………
    क्या लिखा है आपने, दिल बाग़ बाग़ हो गया मेरा.
    आपके इस लेख के लिए हम आपकी शुक्रिया अदा करते हैं.कृपया हो सके तो मेरे मेल पे भी दो, चार शेर थोक ही डालियेगा. आपकी बरी मेहरबानी होगी.
  15. subhash kaushik
    बहुत बहुत साधुवाद इस जानकारी के लिए.

Friday, July 21, 2006

ग़ज़ल क्या है…

http://web.archive.org/web/20110118012537/http://hindini.com/fursatiya/archives/161

ग़ज़ल क्या है…

[कानपुर में जब समीरलाल जी से मुलाकात हुई तो वे ग़जल के बारे में जानकारी के लिये कोई सामग्री खोज रहे थे। हमारे पास उस समय तो कुछ नहीं मिला लेकिन खोजने पर बाद में हमारे पास 'आइना-ए-ग़ज़ल' किताब मिली। इस किताब को हमने नेट पर देबाशीष के ब्लाग 'नुक्ताचीनी' में भी देखा था तथा अपने ब्लाग पर भी लगाया था। इसमें रोज शेर अपने आप बदल जाता था। इसी से हमने ग़ज़ल के बारे में यह लेख लिखा। वैसे पहले भी हमारे रमण कौल ग़ज़ल के बारे में लिख चुके हैं। इस लेख में भी कुछ नया नहीं है लेकिन फिर से इसे टाइप किया क्योंकि इस लेख में कुछ विस्तार से जानकारी दी गयी है। जानकारी के लिये बता दें कि यह लेख डा.अर्शद जमाल ने 'आइना-ए-ग़ज़ल' के लिये लिखा था।
आईना-ए-ग़ज़ल में उर्दू के करीब साढ़े चार हजार शब्दों के हिन्दी-मराठी -अंग्रेजी अर्थ तथा समुचित शेर के माध्यम से हर शब्द का भाव समझाया गया है। 'आईना-ए-ग़ज़ल' डा.ज़रीना सानी तथा डा.विनय वाईकर की साझा मेहनत का नतीजा है।
डा. ज़रीना सानी विदर्भ की एक निहायत ज़हीन और पारखी महिला थीं। बेहद रुचि के साथ उन्होंने नागपुर के ग़ज़लप्रेमी डा.विनय वाईकर के साथ मिलकर इस ऊर्दू-हिंदी-मराठी-अंग्रेजी शब्दकोष का काम शुरू किया। दो साल के बाद उनका आकस्मिक निधन हो गया।
उर्दू और इस शब्दकोष से उनकी लगन का यह आलम था कि मरने से पहले उन्होंने डा. वाईकर से कहा ,'डाक्टर साहब,ग़ज़ल डिक्शनरी पूरी कर लीजियेगा।' यह उनके मुंह से निकला अंतिम वाक्य था। बाद में उनके शौहर जनाब अब्दुल हलीम सानी की कोशिशों तथा डा.विनय वाईकर के सक्रिय सहयोग से उर्दू डिक्शनरी का काम पूरा हुआ जिसे 'आईना-ए-ग़ज़ल' नाम दिया गया।
डा.विनय वाईकर ने 'आईना-ए-ग़ज़ल' के अलावा 'ग़ज़ल दर्पण' का भी प्रकाशन किया है। ग़ज़ल दर्पण में चुनिंदा ग़ज़लें तथा उनके मराठी में अर्थ दिये गये हैं। इसके अलावा उसमें तमाम सर्वकालीन शेर शामिल हैं।]
समालोचन
जब कभी यह प्रश्न पूछा जाता है कि ग़ज़ल क्या है तो सवाल सुन कर मन कुछ उलझन में पड़ जाता है। क्या यह कहना ठीक होगा कि ग़ज़ल जज्‍़बात और अलफ़ाज़ का एक बेहतरीन गंचा या मज्मुआ है? या यह कहें कि ग़ज़ल उर्दू शायरी की इज्‍़ज़त है,आबरू है? लेकिन यह सब कहते वक्‍़त मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि क्या यह सच है! माना कि ग़ज़ल उर्दू काव्य का एक अत्यंत लोकप्रिय ,मधुर, दिलकश और रसीला अंदाज़ है मगर यह भी उतना ही सच है कि उर्दू साहित्य में ग़ज़ल हमेशा चर्चा का विषय भी रही है। एक तरफ तो ग़ज़ल इतनी मधुर है कि लोगों के दिलों के नाजु़क तारों को छेड़ देती है और दूसरी ओर वही ग़ज़ल कुछ लोगों में ऐसी भावनाएं पैदा करती है कि जनाब कलीमुद्दीन अहमद साहब इस ‘नंगे शायरी’ यानी बेहूदी शायरी कहते हैं। जनाब शमीम अहमद इसे मनहूस शैली की शायरी कहते हैं, और जनाब अज्‍़मतुल्लाखान साहब तो यह कहने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते कि ,’ग़ज़ल क़ाबिले गर्दन ज़दनी है’,यानी इसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिये। वैसे तो ‘ग़ालिब’
भी यह कहते हैं -
बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे़ तंगना-ए-ग़ज़ल,
कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाँ के लिये।

मेरे मन की उत्कट भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने के लिये ग़ज़ल का पटल बड़ा ही संकीर्ण है। मुझे साफ़ -साफ़ कहने के लिये किसी और विस्तृत माध्यम की आवश्यकता है।’
उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यिक एवं आलोचक रशीद अहमद सिद्धीकी़ साहब ग़ज़ल को ‘आबरू-ए-शायरी’ बड़े फ़क्र के साथ कहते हैं। शायद यही सब बातें हैं कि ग़ज़ल आज तक क़ायम है और सामान्यत: सभी वर्गों में काफ़ी हद तक पसंद की जाती है।
ग़ज़ल पर्शियन और अरबी भाषाओं से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब है औरतों से बातचीत अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता है कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण मतलब है माशूक़ से बातचीत का माध्यम। उर्दू के प्रख्यात साहित्यिक स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी साहब ने ग़ज़ल की बड़ी ही भावपूर्ण परिभाषा लिखी है। आप कहते
हैं कि,’ जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता है और हिरन भागते समय किसी झाड़ी में फंस जाता है जहां से वह निकल नहीं पाता ,उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती है। उसी करुण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवसता का दिव्यतम रूप प्रकट होना ,स्वर का करुणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श है।’
शुरुआत की ग़ज़लें कुछ इसी अंदाज़ की थीं। लगता था मानो वे स्त्रियों के बारे में ही लिखी गई हों। जैसे-
ख़बरू ख़ूब काम करते हैं,
इक निगाह सू ग़ुलाम करते हैं। -वली दकनी
या
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये
पंखुड़ी एक गुलाब की सी है।- मीर
लेकिन जैसे जैसे समय बीता ग़ज़ल का लेखन पटल बदला,विस्तृत हुआ और अब तो ज़िन्दगी का कोई पहलू ऐसा नहीं है जिस पर ग़ज़ल न लिखी गई हो।

सिगरेट जला के मैं जो ज़रा मुत्मइन हुआ,
चारों तरफ से उसको बुझाने चली हवा।- मिद्हतुल अख्‍़तर
या

सिगरेट ,गिलास,चाय का कप और नन्हा लैंप
सामाने -शौक़ है ये बहम मेरी मेज पर।- ज़हीर ग़ाजीपुरी
ग़ज़ल का विष्लेषण
ग़ज़ल शेरों से बनती है। हर शेर में दो पंक्तियाँ होती हैं। शेर की हर पंक्ति को मिसरा कहते हैं। ग़ज़ल की खा़स बात यह है कि उसका प्रत्येक शेर अपने आप में एक सम्पूर्ण कविता होता है और उसका संबंध ग़ज़ल में आने वाले अगले,पिछले अथवा अन्य शेरों से हो ,यह ज़रुरी नहीं। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी ग़ज़ल में अगर २५ शेर हों तो यह कहना गलत न होगा कि
उसमें २५ स्वतंत्र कवितायें हैं। शेर के पहले मिसरे को ‘मिसर-ए-ऊला’ और दूसरे शेर को ‘मिसर-ए-सानी’ कहते हैं।
मत्ला
ग़ज़ल के पहले शेर को ‘मत्ला’ कहते हैं। इसके दोनो मिसरों में यानि पंक्तियों में ‘काफिया’ होता है। अगर ग़ज़ल के दूसरे
शेर की दोनों पंक्तियों में का़फ़िया तो उसे ‘हुस्ने मत्‍ला’ या ‘मत्ला-ए-सानी’ कहा जाता है।
क़ाफिया
वह शब्द जो मत्ले की दोनों पंक्तियों में और हर शेर की दूसरी पंक्ति में रदीफ़ के पहले आये उसे ‘क़ाफ़िया’ कहते हैं। क़ाफ़िया बदले हुये रूप में आ सकता है। लेकिन यह ज़रूरी है कि उसका उच्चारण समान हो, जैसे बर, गर, तर, मर, डर, अथवा मकाँ,जहाँ,समाँ इत्यादि।
रदीफ़
प्रत्येक शेर में ‘का़फ़िये’ के बाद जो शब्द आता है उसे ‘रदीफ’ कहते हैं। पूरी ग़ज़ल में रदीफ़ एक होती है। ऐसी ग़ज़लों को ‘ग़ैर-मुरद्दफ़-ग़ज़ल’ कहा जाता है।
मक्‍़ता
ग़ज़ल के आख़री शेर को जिसमें शायर का नाम अथवा उपनाम हो उसे ‘मक्‍़ता’ कहते हैं। अगर नाम न हो तो उसे केवल ग़ज़ल का ‘आखरी शेर’ ही कहा जाता है। शायर के उपनाम को ‘तख़ल्लुस’ कहते हैं। निम्नलिखित ग़ज़ल के माध्यम से अभी तक ग़ज़ल के बारे में लिखी गयी बातें आसान हो जायेंगी।


कोई उम्मीद बर नहीं आती।
कोई सूरत नज़र नहीं आती।।१
मौत का एक दिन मुअय्यन है।
नींद क्यों रात भर नहीं आती।।२
आगे आती थी हाले दिल पे हंसी।
अब किसी बात पर नहीं आती।।३
हम वहां हैं जहां से हमको भी।
कुछ हमारी खबर नहीं आती।।४
काबा किस मुंह से जाओगे ‘गा़लिब’।
शर्म तुमको मगर नहीं आती।।५

इस ग़ज़ल का ‘क़ाफ़िया’ बर,नज़र,भर,ख़बर,मगर है। इस ग़ज़ल की ‘रदीफ़”नहीं आती’ है। यह हर शेर की दूसरी पंक्ति के आख़िर में आयी है। ग़ज़ल के लिये यह अनिवार्य है। इस ग़ज़ल के प्रथम शेर को ‘मत्ला’ कहेंगे क्योंकि इसकी दोनों पंक्तियों में ‘रदीफ़’ और ‘क़ाफ़िया’ है। सब से आख़री शेर ग़ज़ल का ‘मक्‍़ता’ कहलायेगा क्योंकि इसमें ‘तख़ल्लुस’ है।
बह्‌र,वज्‍़न या मीटर(meter)
शेर की पंक्तियों की लंबाई के अनुसार ग़ज़ल की बह्‌र नापी जाती है। इसे वज्‍़न या मीटर भी कहते हैं। हर ग़ज़ल उन्नीस प्रचलित प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती है। बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण ग़ज़ल तीन बह्‌रों में से किसी एक में होती है-
(१)छोटी बह्‌र-

अहले दैरो-हरम रह गये।
तेरे दीवाने कम रह गये।
(२) मध्यम बह्‌र-
उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं।
हर शबे-ग़म की सहर हो ज़रूरी तो नहीं।।

(३) लंबी बह्‌र-
ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं।
बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो कांटों पे भी हक़ हमारा नहीं।।
हासिले-ग़ज़ल शेर-ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर ‘हासिले-ग़ज़ल-शेर’ कहलाता है।
हासिले-मुशायरा ग़जल-मुशायरे में जो सब से अच्छी ग़जल हो उसे ‘हासिले-मुशायरा ग़जल’ कहते हैं।
मेरी पसन्द


सब रिश्ते नाते छूट गये, जब यार ने मुझसे रुख्‍सत ली।
अल्फ़ाज़ मेरे खा़मोश रहे,अश्कों ने बगावत कर डाली।।१ सोचा कि रिहा हो गुलशन की हर शाख नुकीले काँटों से।
पत्तों ने मुझसे नफ़रत की,कलियों ने बगावत कर डाली।।२
तपते हुये दिल के ज़ख्‍़मों ने जब चांद से कुछ राहत मांगी।
इक चांद अकेला क्या करता,किरणों ने बगावत कर डाली।।३
दुख दर्द भरी इस दुनिया को सोचा कि जलाकर ख़ाक करूं।
ये बात भला मैं कैसे कहूं,शोलों ने बगावत कर डाली ।।४
जब कश्ती साबितो-सालिम थी और मंज़िल चार कदम पर थी।
मल्लाह बेचारे क्या करते, मौजों ने बगावत कर डाली ।।५
जब अम्नो-अमाँ का आलम था और आहो-फ़ग़ाँ का नाम न था।
तब ऐसे सुकूँ से उकताकर, लोगों ने बगावत कर डाली।।६
-विनय वाईकर
अगली पोस्ट में पढ़िये -ग़ज़ल का इतिहास

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “ग़ज़ल क्या है…”

  1. Manoshi
    is lekh se bahar vaali baat spasht nahin hoti. R.P. Sharma ‘Maharshi’ dwara likhi ‘ghazal nirdeshika’ naam kee kitaab hai jismein bahut acche se samjhaaya hai unhone bahar ko. Mahavir ji, jo ki hamaare blogger hain, ne bhi ghazal kee bahar par ek accha lekh likha hai, agar wo ise padh rahe hain to jald hee prakashit karein, bahut logon ko laabh hoga.
    (roman mein likhne ke liye kshmaa yachna)
    –Manoshi
  2. भारत भूषण तिवारी
    ‘आईना-ए-ग़ज़ल’ की एक प्रति मेरे पास भी हुआ करती थी. डॉ. वाईकर मेरे गृह-प्रदेश विदर्भ के मशहूर साहित्यकार है और हिन्दी,मराठी,उर्दू और अंग्रेज़ी पर समान प्रभुत्व रखते हैं.कुछ सालों पहले एक साहित्यिक परिचर्चा में डॉ. वाईकर का ‘ग़ज़ल’ ही के विषय पर व्याख्यान भी सुना था. बडे प्रभावशाली वक्ता हैं.अपनी बातों में विनोद का पुट बनाए रखते हैं. वहाँ उन्होनें कही हुई कुछ बातें याद हैं. कहने लगे, ‘कोई जब मुझसे पूछता है कि तुम काम क्या करते हो, तो मैं जवाब देता हूँ कि लोगों को बेहोश करता हूँ.सामने वाला हैरान होने लगे तब बताता हूँ कि एनेस्थेटिस्ट हूँ.’ भाषाओं के सह-अस्तित्व और आवश्यक सामंजस्य के बारे में बोलते हुए कहा, ‘मराठी मेरी माँ है, हिन्दी मेरी मौसी है और अंग्रेज़ी मेरी आण्टी है और मैं तीनों का यथोचित सम्मान करता हूँ.’
    स्थानीय अखबारों में छपने वाले, भारतीय सेना में गुज़ारे दिनों के, उनके संस्मरण बडे रोचक हुआ करते थे.
  3. जीतू
    वाह जनाब! क्या बात है। इस जानकारी से बहुत सारे लोगों का ज्ञानवर्धन होगा।
    यार आइना ए गज़ल तो हम भी ढूंढ रहे है, ये हमारी विश लिस्ट में है और हमारा जन्मदिन सितम्बर मे आता है।(यदि किसी की इच्छा है तो इसी महीने भी मना लेंगे)
  4. फ़ुरसतिया » ग़ज़ल का इतिहास
    [...] [ग़ज़ल के बारे में लिखे लेख में मानसी ने बताया कि लेख में बह्‌र वाली बात स्पष्ट नहीं होती। तो यहां तो यही बताया गया है कि बह्‌र मुख्यतया छोटी,मध्यम और बड़ी होती है। कुल मिलाकर उन्नीस बह्‌रे होती हैं। अब इससे ज्यादा विस्तार से तो जानकार लोग बतायें।हम तो खाली टाइप कर दिये आईना-ए-ग़ज़ल से। जीतू को फोकट के लिंक की ऐसी लत लगी है कि हर चीज मुफ्त में चाहिये। जन्मदिन तक खिसका लेंगे अगर कोई इन्हें किताब दे दे। सो हम वायदा करते हैं कि इनके जन्मदिन पर आईना-ए-ग़ज़ल के दो शेर मुफ्त भेजेंगे। इस बीच चाहें तो आन लाइन खरीद लें। फिलहाल पढ़ें-ग़ज़ल का इतिहास] [...]
  5. अन्तर्मन
    फ़ुरसतिया जी,
    शुक्रिया। हमने ऐसी ही कुछ पोस्ट पहले भी यहीं कहीं पढ़ी थी…शायद आपके ही चिट्ठे पर काफ़ी पहले..पर याद ताज़ा करने के लिये शुक्रिया
  6. मनीष
    गजल के बारे में पढ़ने के साथ साथ कुछ अच्छे शेर भी पढ़ने को मिले ! शुक्रिया इस जानकारी से हम सब को अवगत कराने का !
  7. narendranath
    bahut sunder precise aalekah pahli bar dekha
  8. Dr. Adhura
    adhura kya gazal aapne hme aaj he sunai
    aaine ke samne pichke galo per karim lagai
    sunte sunte khi aesa na ho jaye
    balo ka rang sfed se kala na ho jaye
  9. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] और संभावित ब्लागर की 10.उखड़े खम्भे 11.ग़ज़ल क्या है… 12.ग़ज़ल का इतिहास 13.अनन्य उर्फ छोटू [...]