Tuesday, October 24, 2006

सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाकात

http://web.archive.org/web/20110925220138/http://hindini.com/fursatiya/archives/204

सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाकात

ऐसा बहुत कम होता है कि हम सबेरे सोने के अलावा और कोई काम करें। हमें इसीलिये सारे योगासनों में शवासन /निद्रासन बहुत भाता है। इसे हम तब से करते आ रहे हैं जब इस देश में बाबा रामदेव का हल्ला/हमला भी नहीं हुआ था। एक बार आसन जमाया तो घंटे भर से पहले उससे बाहर नहीं आते। इसीलिये हम चुस्त-दुरुस्त रहने का दावा भले न करें लेकिन रहते टिचन्न हैं।
एक दिन हम सबेरे उठे तो ऐसा उठे कि शवासन का ध्यान ही नहीं रहा और पता नहीं किस आवेश में सड़क पर आकर मार्निंग वाक के हथकंडे में फंस गये और टहलने लगे। देखा लोग सड़क पर लपकते चल रहे हैं। लोग अपने को उछालते हुये घर से बाहर जा रहे हैं, वापस लपककर घर जा रहे हैं। डर न लगे इसलिये कुछ लोग अपने साथ डंडा थामे हुये हैं। वातावरण की सारी आक्सीजन लोग अपने पेट में जमा करके घर ले जा रहे हैं। कार्बन डाई आक्साइड को जहां तहां छितराते हुये चल रहे हैं।
कोने में कुछ रिटायर्ड बुजुर्गवार पता नहीं किसपर ठहाका लगा रहे हैं। जिंदगी जिनकी रोते हुये बीती वे भी अट्टहास कर रहे हैं। जो घर से रुआंसी सूरत लेकर आये हैं और वैसी ही वापस ले जायेंगे वे भी खिलखिला रहे हैं। यह संगत का ही असर है। आचार्य रामचंद्र शुकुल जी (ये सीनियर ब्लागर नहीं थे हिंदी साहित्य का इतिहास के लेखक थे)कहिन हैं- कुसंग का ज्वर भयानक होता है लेकिन इस सत्संग के ज्वर के बारे में कुछ नहीं बताइन उई तो हम काहे पचड़े में पड़ें।
हम बढ़े चले जा रहे थे सड़क पर। मन में कविता गुनगुना रहे थे:-

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर हटो नहीं
तुम निडर डटो वहीं।
हम बढ़े तो चले ही जा रहे थे। धीरज भी धारण किये थे। एक ‘स्पीड ब्रेकर’ को पहाड़ समझकर पार किया और सीना फुला लिया। लेकिन कहीं सिंह की दहाड़ नहीं मिल रही थी। पहले तो सोचा कि पास में रहने वाले मित्र समर पाल सिंह के यहां चले जायें और कविता का चित्रांकन पूरा करें लेकिन यह सोचकर कि घर में तो सिंह बाबू दहाड़ते नहीं मिमियाते हैं, हमने अपना इरादा त्याग दिया। त्याग का फल तुरंत मिला। सामने से एक टैंपो धड़धड़ाता, धुआं उगलता हुआ निकल गया। टेम्पो आधुनिक सड़क सिंह हैं। जिस तरह किसी जंगल में ग्घूमते हुये शेर किसी भी रास्ते आकर आपको चौंका सकता है, सिट्टी-पिट्टी गुम कर सकता है वैसे ही टेम्पो किसी भी सड़क अचानक आपके सामने प्रकट होकर आपको चिहुंका सकता है। टेम्पो का टेम्पो हर सड़क पर हाई रहता है। ये घरघराते हुये जिस रास्ते निकल जाते हैं वहां भीड़ काई की तरह फट जाती है। कविता का चित्रांकन पूरा करते ही हम याहू कहते हुये उछलने ही वाले थे कि यह सोचकर रुक गये कि कोई हमें जंगली न कह दे। सनीमा और शम्मी कपूर की बात अलग है लेकिन शहर में जंगली की वही दशा होता है जो कन्याऒं में मंगली की होती है-लोग कटते हैं।
बहरहाल हम कविता की अंतिम पंक्ति के अनुसार एक जगह खड़े हो गये, डट गये। मुझे अपने पैरों के पास सरसराहट सी हुयी और हम ‘नो टामी नो’, नो टामी कहने ही वाले थे कि याद आया कि टामी तो सामने वाले शर्माजी के कुत्ते का नाम है और नो टामी नो तो श्रीमती शर्मा का तकिया कलाम है जिसे वे अक्सर तब बोलती हैं जब उनका प्यारा टामी हमारे बगीचे में पर्याप्त उछलकूद करने के बाद वहां खिले फूलों को क्यारियों समेत रौंद चुका होता है।(एक डायलाग का स्कोप है— रौंदने वाला रौंदते समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता ) तो क्या हम अकेलेपन का फायदा उठाकर श्रीमती शर्मा को याद करने इस वीरान सड़क पर आये हैं। तो क्या पैरों के पास की सरसराहट का यही कारण है? क्या इसके बाद चिनचिनाहट भी होगी?
लेकिन जल्दी ही हमें श्रीमती शर्मा की याद का साथ त्यागना पड़ा। पाया कि हमारे पैरों से एक पालीथीन सटी हुयी थी। हमें लगा कि क्या ये कोई कलयुगी अहिल्याजी है क्या जो हमारे चरणों के प्रताप से अपना उद्धार कराने के लिये सटी हैं। हम सोच ही रहे थे कि पालीथीन हवा के सहयोग से सीटी से बजाती हुयी बोली- मैं पालीथीन हूं।
मुझे पालीथीन की आवाज की नजाकत के बावजूद महाभारत सीरियल का गंभीर आवाज में बोला गया डायलाग याद आ गया- मैं समय हूं।
मैंने कहा वो तो मैं देख रहा हूं। घर-घर वासी, गली-निवासी, नाली-प्रवासी, मैदान-विलासी पालीथीन की महिमा से कौन अभागा परिचित नहीं है? दसो दिशाऒं में आपकी पताका फहरा रही है। मैदान की सारी घास के ऊपर आपका उसी तरह से कब्जा है जैसे पूरे देश को जड़ता और भ्रष्टाचार ने अपने चंगुल में कर रखा है। बतायें देवी मैं आपके लिये क्या कर सकता हूं?
पालीथीन थोड़ी चिकनी, ‘ग्रेसफुल’ टाइप की लग रही थी सो हमने अपने सवाल को अंग्रेजिया भी दिया -व्हाट कैन आई डू फ़ार यू?(प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने के पहले कहा तो मैंने माई डीयर पालीथीन भी था लेकिन तमाम ऊंच-नीच और अनुवाद की शुद्धता का विचार करते हुये आपको बता नहीं पा रहे हैं, शरमा से रहे हैं)।
पालीथीन ने थोड़ा इठलाते हुये और बहुत सारा लहराते हुये कहा- आप मेरे बारे में कुछ लिखिये न!
मैंने कहा- क्या लिखूं?
वो बोली- जैसे समीर लाल जी ने लिखा। झोले जी के बारे में।
हमने चौंके- आपको कैसे पता कि समीरजी ने झोले के बारे में लिखा? क्या आप भी ब्लागर हैं? और तरकश नियमित पढ़ती हैं?
पालीथीन हवा के सहारे दायें-बायें हिलती हुयी बोली -नहीं, नहीं। मैं ऐसी वैसी नहीं हूं। भले घर की पालीथीन हूं। हमारी भी कोई इज्जत है हम क्यों करेंगी ऐसा कोई काम जिससे हमारे बारे में किसी को कुछ कहने का मौका मिले। हम ब्लाग-फ्लाग के चक्कर में नहीं पड़ते।
हमने पूछा- फिर तुमको झोले वाले लेख के बारे में कैसे पता?
वो बोली -ऐसे ही। हम लोगों का खानदान एक ही है न! वो झोला जी हमारे पूर्वज हैं न! दादा, परदादा टाइप का रिलेशनशिप है हमारा। वे भी सामान रखने के काम आते थे मैं भी सामान रखने के काम आती हूं। हमारे और उनकी पीढ़ी में मुख्य अंतर यह है कि वो पूरे घर से जुड़े थे मैं केवल सामान से जुड़ी होती हूं। वे घर का ‘स्टेटस‘ बताते थे जबकि मैं सामान की औकात बताती हूं। वे घर से बाजार और फिर वापस घर आते-जाते रहते थे जबकि मैं आमतौर पर सिर्फ दुकान से घर की ड्यूटी बजा कर फ्री हो जाती हूं।
मैंने पूछा – तो क्या उन्होंने बताया तुमको मेरा मतलब आपको उस लेख के बारे में?
वह इठलाते हुई बोली- आप मुझे आप मत बोलिये। मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है मैं बहुत बड़ी हो गयी हो गयी हूं। आप मुझ तुम ही कहिये। मुझे अच्छा लगेगा।
मैंने कहा- अच्छा,अच्छा ये बताऒ तुमको कैसे पता चला समीरजी के लेख के बारे में?
वह बोली- वैसे तो मैं कह सकती हूं कि जाऒ नहीं बताती आपको लेकिन बेकार समय बरबाद होगा यह सोचकर बता देती हूं क्योंकि आप पूछे बिना मानेंगे नहीं और मुझे बताये बिना चैन नहीं पड़ेगा। मैं पिछ्ले हफ्ते एक किताब को अपने में लपेटकर लायी थी इस सामने वाले घर में। पता नहीं कैसे हैं ये लोग! किताब लाकर मुझको उसके साथ मेज पर पटक दिया। मैं पूरे हफ्ते भर पड़ी रही मेज पर किताब को अपने अंदर समेटे। मुझे लग रहा था कि ये अपनी किताब निकाले और मुझे भेजे कूड़ेदान में जहां मैं दूसरी पालीथीन के साथ मजे करूं। बतियाऊं, गंदगी समेटूं, उड़ाऊं। लेकिन मुझे लगता है कि वो किताब को अपने कामधाम की तरह भूल गया था और उसने उसे नहीं खोला तो नहीं ही खोला।
हमने थोड़ा झुंझलाते हुये कहा- तुम जल्दी बताऒ। कहानी मत सुनाऒ फ़ुरसतिया की तरह।
वह बोली- तो उसी मेज पर पड़े-पड़े मैं ऊब गयी। एक दिन देखा कि घर वाला आकर बैठा और मेज पर पड़ा कम्प्यूटर खोलकर न जाने क्या पढ़कर हंसने लगा। मैंने सोचा कि शायद वह मेंटल है। लेकिन बाद में जब उसने अपनी पत्नी को भी पढ़ाया/सुनाया और दोनों हंसने लगे तब मुझे लगा कि ऐसा नहीं है। उसी दिन से लगा कि काश कोई मेरी भी कहानी लिखता। इसी तमन्ना में मैं बाबरी घूम रही हूं।
मैंने कहा- ये कैसी अजीब तमन्ना है तुम्हारी?
लगता है वह पालीथीन कुछ ज्यादा ही ब्लाग पढ़ चुकी थी। वह बोली- ये वैसी ही तमन्ना है जैसी जीतेंदर जी की है कि कोई उनका कच्चा चिट्ठा लिखे । एक बार लिखे – बार-बार लिखे।
हमें लगा कि यह तो अंदर की बातें जानती है सो टालने के लिहाज से बोले- तुम समीरजी से कहो न! वे ही बढि़या सा लिखेंगे तुम्हारे बारे में।
वो बोली – अब हम कनाडा जाने का पैसा कहां से लायें? और कौन ले जायेगा मुझे वहां? वहां तो इतनी गंदगी भी नहीं जहां आराम से रह सकूं। अकेलेपन से मुझे बहुत डर लगता है।
अच्छा मैं लिखने की कोशिश करूंगा। लेकिन तब जबकि समीरजी एक कुंडलिया लिखेंगे इस पर और राकेश खंडेलवालजी चार लाइन की कविता।
आप भी एकदम मिडिलची बुद्धिजीवियों की तरह बात करते हैं जो कि यह चाहते हैं कि पहले देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये, भाई-भतीजा वाद खत्म हो जाये, सारी स्थितियां सुधर जायें तब वे देश सेवा के काम में जुटें। देश के लिये कुछ करने की सोचें। अरे समीरजी को, राकेशजी को जो लिखना होगा वो तो लिखेंगे ही। आप अपना काम करिये न! लिखिये न कुछ मेरे बारे में।
मैंने पूछा- मानो मैंने लिखा भी तो तुम्हें कैसे पता चलेगा?
वह बोली- चल जायेगा उसकी आप चिंता न करें।
हमने कहा- कैसे बताऒ तो भला!
पालीथीन ने बताया- जो आप लिखेंगे वह उसका प्रिंट आउट लेंगे। फिर किसी दूसरे को दिखाने के लिये फोटोकापी करायेंगे। जो भी करायेंगे अंतत: आयेगा वह नाली में ही, जुड़ेगा वह कूड़े से ही। और जहां कोई चीज कूड़े या नाली से जुड़ी तो वह हम तक पहुंच ही जायेगी।
हमने कहा- अच्छा ठीक है। मैं कोशिश करूंगा। फिलहाल तो मैं चलता हूं आफिस की देर हो रही है। तुम क्या करोगी?
पालीथीन ने बताया-कुछ नहीं। बस कुछ देर इधर-उधर उड़ती फिरूंगी। मन किया त्तो थोड़ा कीचड़ में नहाउंगी सामने की नाली में। तब तक हो सकता है कि सामने वाले घर से कुछ और पालीथीन सहेलियां आ गिरें। वो रोज फेंकती हैं न ऊपर से सबेरे अपने घर का कूड़ा मय पालीथीन नीचे। अगर उसमें कुछ पालीथीन सहेलियां आईं तो उनसे गलबहियां करके बतियाउंगी और फिर आगे जैसा होगा वैसा तय करूंगी।
हम घर लौट आये। हमें मुस्काते देख पत्नी ने गुनगुनाया-

तुम इतना क्यों मुस्करा रहे हो!
क्या गम है जो मुझसे छिपा रहे हो?
हम कुछ जवाब न देकर नहाने के लिये बाथरूम में घुस गये।
नल के पानी के साथ-साथ मेरे कान में सड़क पर मिली पालीथीन के शब्द गूंज रहे थे- मेरे बारे में लिखना जरूर! मजाक नहीं, सीरियसली।
हम कुछ तय नहीं कर पाये अत: गाने लगे:-


ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिये,
गाना आये या न आये गाना चाहिये।

मेरी पंसद


भीड़-भाड़ में चलना क्या?
कुछ हटके-हटके चलो वह भी क्या प्रस्थान कि जिसकी अपनी जगह न हो
हो न ज़रूरत, बेहद जिसकी, कोई वजह न हो,
एक-दूसरे को धकेलते, चले भीड़ में से-
बेहतर था, वे लोग निकलते नहीं नीड़ में से
दूर चलो तो चलो
भले कुछ भटके-भटके चलो
तुमको क्या लेना-देना ऐसे जनमत से है
खतरा जिसको रोज, स्वयं के ही बहुमत से है
जिसके पांव पराये हैं जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं
भले नहीं सुविधा से -
चाहे, अटके-अटके चलो
जिनका अपने संचालन में अपना हाथ न हो
जनम-जनम रह जायें अकेले, उनका साथ न हो
समुदायों में झुण्डों में, जो लोग नहीं घूमे
मैंने ऐसा सुना है कि उनके पांव गये चूमे
समय, संजोए नहीं आंख में,
खटके, खटके चलो.

-मुकुट बिहारी सरोज

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

11 responses to “सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाकात”

  1. bhuvnesh
    वाह शुक्लाजी कितने हल्के-फ़ुल्के ढंग से आपने पॉलीथीन से मुलाकात करा दी साथ ही आपकी पसंद का तो जवाब नहीं।
    ऐसे ही कभी-कभी मॉर्निंग वॉक पर जाया कीजिये जिससे हमें ऐसी बढ़िया पोस्ट पढ़ने को मिला करें और आप भी सेहतमंद रहें।
  2. समीर लाल
    बहुत बढ़िया मुलाकात रही आपकी. अब आगे लिखने को तैयार हो जायें, क्योंकि फरमाईशी कुण्ड़्लीनुमा रचना यह रही और राकेश भाई भी जल्द ही पधार रहे होंगे:
    झोले की पोती पॉलीथीन महिमा
    अंग्रेजी नामों का झंडा, घर घर जाकर लहराय
    झोला का बेटा तो झोला, पोती पॉली कहलाय
    पोती पॉली कहलाय कि सब उसके गायें भजन
    फल फुल सब्जी किताब, सबहि का ढ़ोये वजन
    कहे समीर कि इससे प्रदुषण फैले है मनमर्जी
    फिर भी प्रचलन में क्यूँकि, आईटम है अंग्रेजी.
    –समीर लाल ‘समीर’
  3. नितिन व्यास
    अनूप जी, आपने तो समीर जी के झोले रूपी नहले पर पालीथीनी दहला मारा!
    बहुत अच्छा लगा.. खास कर..
    “लेकिन शहर में जंगली की वही दशा होता है जो कन्याऒं में मंगली की होती है-लोग कटते हैं।”
    “रौंदने वाला रौंदते समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता”
    “हमें लगा कि क्या ये कोई कलयुगी अहिल्याजी है क्या जो हमारे चरणों के प्रताप से अपना उद्धार कराने के लिये सटी हैं।”
  4. राकेश खंडेलवाल
    पालीथीन हवा में उड़ कर सोचा बन ले उड़नतश्तरी
    और घूम ले टोरंटो की गलियां या घूमे वाशिंगटन
    पासपोर्ट, वीसा के बिन्ही छोड़े कानपुरी गलियों को
    साथ दिलाया झोले के संग, झोली का भी तो अनुमोदन
    पालीथीनी थैलियों में भी छुपी हैं अहल्यायें
    हो नजर अवधी, तभी तो ढूँढ़ पाये गौतमी को
    आपको अपना समझ, फ़रियाद के स्वर गुनगुनाये
    वरना राहों पर फिरी वह ढूँढ़ती थी आदमी को
  5. तरूण
    अनुप जी आप ही नही बल्कि ज्यादातर लोगों के साथ भी ऐसा बहुत कम ही होता है कि वो सबेरे सोने के अलावा और कोई काम करें। बल्कि कुछ लोग तो निद्रासन करते करते ही आफिस पहुँच जाते हैं। हमें थोड़ा ध्यान लगाना सिखना है जिससे हम जब भी निद्रासन करते हुऐ आफिस पहुँचने की कोशिश करें तो आपकी तरह हवा के सहयोग से सीटी बजाती किसी पालीथीन से हमारे आसन में कोई व्यवधान ना पहुँचे। ;)
    पालीथीन अभियान के बाद लगता तो यही है कि फिर से कुछ दिनों तक आप का योगासनों के शवासन /निद्रासन वाले आसनों में जोर रहेगा। :)
  6. Jagdish Bhatia
    सुबह सुबह हमें भी खूब हंसा दिया :D
  7. प्रत्यक्षा
    :-) , मज़ा आ गया । अब अगला शिकार कौन ?
  8. अनुराग श्रीवास्तव
    बहुत सटीक, सधा हुआ गुदगुदाता cयंग! पालीथीन एक ऐसी प्रेयसी है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं। यह बला One Night Stand वाली बाला नहीं हैं। एक बार चिपक गयी तो बस प्राण बाहर। इसीलिये हम बच्चों से कहते भी रहते हैं “पन्नी से मत खेलो”। देखना तो यही है अनूपजी कि हमारे शहर गले पड़ी इस बाला से कैसे बला छुड़ाते हैं!
  9. Giriraj Joshi
    :D
  10. Mitul
    काफी अच्छा लगा। हम तो बहुत हँसे। मुकुट बिहारी सरोज जी की कविता भी अच्छी है।
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पर जाकर सत्य सनेहू 9. इसे अपने तक रखना 10.सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाका… 11.प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत [...]

Monday, October 23, 2006

इसे अपने तक रखना

http://web.archive.org/web/20110926113005/http://hindini.com/fursatiya/archives/202

इसे अपने तक रखना

हमारे दोस्त हमारे कान से सटे थे। फिर फुसफुसाने लगे। आवाज पारसी थियेटरों सी कि पूरा हाल सुन ले लेकिन उनको यह भ्रम पालने का पूरा अधिकार है कि उनकी बात केवल मैं ही सुन रहा हूं। बहुत सामान्य सी जानकारी हमारे कान में उड़ेलने के बाद उन्होंने अपना मुंह हटा लिया। हमारे कान मुक्त हुये। उनकी आवाज फिर कान में घुसी- यार, इसे अपने तक रखना किसी को बताना मत!

हम एक बार फिर सोचने लगे। जो शख्स खुद किसी बात को अपने तक नहीं रख पाया और सब काम छोड़कर मुझे बता रहा वह कैसे आशा करता है कि आगे किसी को नहीं बतायी जायेगी।

लेकिन हमें ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ता। जो बात हमें अपने तक सीमित रखने को कही गयी थी वह अगले दिन सबको पता थी। लगता है हमारे मित्र ने और भी कुछ लोगों से बात अपने तक सीमित रखने को कही होगी। और उनका अपनापा थोड़ा फैला टाइप का होगा इसीलिये बात फैल गयी होगी।

ऐसा अक्सर होता है आपको कुछ बातें बताई जाती होंगी, साथ में अपने तक रखने का ‘टैग’ लगाकर। आपके मन में वैसे ही बहुत सारी अपने तक सीमित बातें ठुंसी पड़ी हैं आपको समझ में नहीं आता कि इस अपने तक सीमित बात को कहां रखें? आप उसी ढेर के ऊपर पटक देत हैं इसे भी।

गोया आपका मन स्विस बैंक का अकाउंट हो गया जहां लोग अपने मन की बातें जमा कर जायें। एक बार जमा कर दिया तो किसी को पता नहीं चलेगा सिवाय बैंक और खातेदार के।

अपने तक कही जाने वाली बातों में हमेशा समझौता एकतरफा होता है। सुनने वालो को आगे बताने का अधिकार नहीं होता लेकिन बताने वाला इस बंधन से मुक्त रहता है। वह दूसरों को भी उसी बंधन में बांधता हुआ बात बता सकता है। बात का ‘सोर्स कोड’ उसके पास जो है।

लेकिन मुक्ति की आकांक्षा का प्रदूषण भयानक होता है। अब किसी भी बात को अपने तक के बंधन में नहीं बांधना बड़ा मुश्किल हो गया है। पता चला जिस बात को आप अपने मन में जकड़ के बैठे हैं वही बात दूसरे के मुंह से छुट्टा सांड़ की तरह निकल रही है।

और ऐसा हो भी क्यों न! दुनिया सब कुछ खोल-खाल के नंगा करने के प्रयास में जुटी पड़ी है। ब्रिटेन में बच्चा पैदा करने का ‘लाइव टेलीकास्ट’ हो रहा है। लोगों के शरीरों से कपड़े उतरते जा रहे हैं। कुछ के फैशन में,बहुतों के मजबूरी में। कुछ के मस्ती में, बहुतों के पस्ती में।

पिछ्ले शुक्रवार को लाफ्टर चैलेंज में राजू श्रीवास्तव ने एक जींस की पीड़ा बखानते हुये कहा-

हम पहले कमर के ऊपर तक रहते थे। अब लगातार नीचे खिसकाये जा रहे हैं। पहनने वाली को डर नहीं है लेकिन हम घबड़ा रहे हैं। हम लगातार नीचे जा रहे हैं और ऊपर वाला कपड़ा लगातार ऊपर जा रहा है। हमारी कभी मुलाकात ही नहीं होती। एक दिन तो हम मैडम से बोले भी- मैडम या तो हमें पहन ही लो या उतार ही दो।

देखिये बात, बात से शुरू हुयी और कपड़े तक पहुंच गयी। इसी को कहते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। बातें आवारगी की शौकीन होती हैं। निकलती हैं तो दूर तक चली जातीं हैं। ईरान से तूरान तक।

अपने तक रखने की बात का फलसफा बड़ा महीन टाइप का होता है। मन में रखे हुये भेद खदबदाते रहते हैं। अजीब सा तनाव रहता है मन में। दूसरे से कहने से यह तनाव कम होता है। जैसे अपना कूड़ा पड़ोसी के यहां डाल देने से घर साफ दिखता है।

लेकिन साथ-साथ दूसरा तनाव शुरू हो जाता है कि मैंने दूसरे को गुप्त बात बता दी। यह आसमान से गिरकर खजूर में अटकने की होती है। इसीलिये जिम्मेदार लोग दूसरों से गुप्त बातें बताते हुये बात के शुरू में ही कह देते हैं – आपको बता रहा हूं,इसे अपने तक ही रखना।

दुनिया में समझदारों की संख्या बढ़ रही है। सुनने वाला भी अगले से कहता है- आपको बता रहा हूं,इसे अपने तक ही रखना।

मुझे तो यह लगता है कि अगर आपने अपनी बात किसी भी दूसरे को बता दी तो आप समझिये कि वो बात आपने दुनिया भर को बता दी। आप जो बात खुद अपने तक नहीं रख पाये उसे दूसरे से कैसे आशा करते हैं कि वह अपने तक रखेगा। आप अगर खुद अपने को नहीं ढो पा रहे हैं तो आपको कोई दूसरा कैसे ढोयेगा ?

इस लिये मैं यही सोचता हूं कि जो बात मैं सबको नहीं बता सकता उसे किसी एक को बताकर उसका बोझ काहे बढ़ाऊं यह कहकर -इसे अपने तक रखना।

वैसे भी गोपनीय बातें दुनिया को पहले पता चलती हैं। मुंह से न निकले लेकिन हाव-भाव हरकतें सारी चुगली कर देती हैं। रहीमदास ने कहा है-


रहिमन अंसुवा नयन ढरि,जिय दुख प्रकट करेहि,
जाहि निकारो गेह से, क्यों न भेद कहि देइ। आंख से निकलकर आंसू मन का भेद कह देता है। जिसको (आंसू को)घर से(आंख से) निकाल दिया वह कैसे घर का भेद नहीं कहेगा!

यह मैंने आपसे तो कह दिया लेकिन आपसे अनुरोध है कि इसे अपने तक रखना।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “इसे अपने तक रखना”

  1. अनुराग श्रीवास्तव
    हम तो भैया यही सोच रहे हैं कि एक खामोश टिप्पणी कैसे करें जो सिर्फ़ आप तक ही पंहुच पाये।
    पेट में बात हजम करना आसान काम नहीं है, ऐसा करने की चेष्टा करने से लोग-बाग अकसर ही वात् रोग से ग्रसित हो जाते हैं। लक्कड़ हजम – पत्थर हजम वाले चूरन तो सदियों से सड़क के किनारे बेंचे जा रहे हैं लेकिन बात हजम करने वाला चूरन तो आज तक नहीं मिला।
    बात हजम होने के खतनाक साइड इफ़ेक्टस हो सकते हैं, अगर सारी बातें हजम हो गयीं तो भैया, यहां बैठ पर ब्लाग पर काहे की अभिcयक्ति करी जायेगी।
    हमारी तो यही कामना है कि ईश्वर सभी ब्लगोड़ों को ‘बात’ की बदहजमी का रोग दे जिससे ब्लाग जगत पर हरियाली छाई रहे।
    क्या आपने भी सुनी आकाशवाणी – “तथासु!”
  2. समीर लाल
    अनूप भाई, एक बात बताता हूँ, सिर्फ़ अपने तक रखना..”लेख बहुत शानदार और गहरा दर्शन लिये है.इसे कहीं छपवाते क्यों नहीं?”
    वैसे आपकी एक लाईन टीप ली गई है और डायरी में रख ली गई है..शायद भविष्य में कहीं इस्तेमाल करता नजर आऊँ:
    “बातें आवारगी की शौकीन होती हैं। “
    बहुत खुब…
  3. राकेश खंडेलवाल
    दीदए तर से निकल अश्क किधर जाता है
    घर से निकला हुआ आवारा कहा जाता है
  4. Laxmi N. Gupta
    वाह, वाह शुकुल जी, क्या लिखा है।
    बात ही बात में क्या बात हो गई।
    हम जिस से डर रहे थे वही बात हो गई।
    “कहना नहीं किसी से” हमने कहा था उनसे,
    सरे आम आज वही बात हो गई।
    लक्ष्मीनारायण
  5. bhuvnesh
    अनूपजी बहुत अच्छा लेख है वैसे आप चिंता न करिए इसे अपने तक ही सीमित रखूंगा।
    आपके परसाईजी पर लिखे हुए काफ़ी लेख पढे़ और उनकी पुस्तकें भी खरीदीं वाकई व्यंग्य में उनका कोई सानी नहीं वैसे आपका लेखन भी बहुत कमाल का है मैने परसाईजी का केवल नाम सुना था आपके लेख पढ़कर उन्हें पढ़ने की तीव्र उत्कंठा पैदा हुई और लीजिये वे मेरे भी प्रिय लेखक बन चुके हैं।
    एक गुजारिश है आपसे कि उनके उपन्यास ‘रानी नागफ़नी की कहानी’ के बारे में भी अपनी किसी पोस्ट में लिखिये।
  6. Nitin Vyas
    मैनें सिर्फ अपने तक ही रखी है यह कहते हुए कि गुरू जी
    आप सदा की तरह फिर बाजी मार गये! चिठ्ठाजगत आपको पा कार धन्य है।
  7. kali
    Guruji Paano do, dho dho peene hai. Hamesha ki tarah consistent Sarvotaam writer aap hi hain.
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Wednesday, October 18, 2006

जेहि पर जाकर सत्य सनेहू

http://web.archive.org/web/20110926074657/http://hindini.com/fursatiya/archives/201

जेहि पर जाकर सत्य सनेहू

हां तो हम लखनऊ यात्रा की बात कर रहे थे। श्रीलाल शुक्ल जी से जब मुलाकात नहीं हुयी तो हम पास के घर के पास के साइबर कैफ़े चले गये। पूछा किसी में विंडो एक्सपी है? जवाब मिला- सबमें है। और हम बैठ गये बिना आगे कुछ सोचे एक कुर्सी पर। कैफे के सेवा-दाम हम पढ़ ही चुके थे -दस रुपया प्रति घंटा।
जब तक मेल देखने के लिये खुटुर-पुटुर करें तब तक यह भी सोच डाला कि सागर के तट पर होते तो अब तक चाय के लिये आर्डर हो गया होता। बहरहाल,हमने अपने जीमेल अकाउंट का दरवाजा खोला तो समीरलाल जी की मेल चमक रही थी कि चर्चा कर दी है और अगली बात यह कि टिप्पणी प्रकाशित नहीं हो रही हैं। यह भी बता दें क्या कि हम जाते-जाते अपना शनिवार का चिट्ठाचर्चा का काम समीरजी को टिकाकर चले गये थे जिसे उन्होंने खुशी-खुशी (हम तो यही न कहेंगे) स्वीकार किया और किया भी।
असल में देबाशीष ने अभी तक चिट्ठाचर्चा में यह व्यवस्था की थी कि टिप्पणी तभी प्रकाशित हों जब वे अनुमोदित बोले तो अप्रूव हो जायें। इससे कमेंट करने वाले को जब अपना कमेंट काफ़ी देर तक दिखता नहीं तो वह सोचता है- गई भैंस पानी में। अब हमने देबाशीष से कहा है कि भैये, ये बैरियर हटा दो। जो भी टिप्पणी करे तुरंत उसे देख भी सके। शायद अब तक हो गया होगा ऐसा नहीं होगा तो आज हो जायेगा।
हमने जैसे ही अपना मेल बाक्स खोला वैसे ही उधर से कविराज जोशी जी अपनी एफ.आई.आर. लिये खड़े थे। बोले हमारी टिप्पणी अभी तक नहीं दिखी। हमने उनको ठाड़े रहियो मेरे कवि यार कहकर स्टेचू बोला और उनकी टिप्पणी तलाशने लगा। टिप्पणी मुई ओसामा बिन लादेन हो गयी-दिखी ही नहीं। कविराज का धैर्य जवाब दे गया। वैसे भी कवि होने के लिये जरूरी है कि धैर्य को तलाक देकर तब बिस्मिल्ला किया जाये वर्ना आप मुंह सिये बैठे रहेंगे और कविता आपके मन में घुटकर मर जायेगी। कहा भी गया है एक कविता को अपने मन में मारने से अच्छा है कि पचास लोगों को उसके वार से मारा जाये।
नारा प्रधान देश में अगर इस बात को सजा संवारकर नारे के कपड़े पहनायें जायें तो कह सकते हैं- एक कविता की भ्रूणहत्या पचास जीव हत्याऒं के बराबर हैं। इसीलिये जैसे ही हमारे कोई भी कवि मित्र कहते हैं कविता लिखी है सुनायें तो हम हां सुनाइये के साथ-साथ बहुत अच्छी लिखी है इसे पोस्ट कर दो भाई तुरंत लिखकर पसीना पोछने लगते हैं। कभी-कभी हड़बड़ी में हम बहुत अच्छी है, पोस्ट कर दीजिये पहले टाइप कर देते हैं और कविता बाद में आती है लेकिन कवि कविता की तारीफ से मेरी इस चूक को क्षमा करके अपने पोस्ट अभियान पर निकल लेता है और हमारे लिये मौसम आशिकाना, सुहाना हो जाता है।
तो कविराज बोले दुबारा करूं टिप्पणी? हम जब तक हां बोलें तब तक वे टिपिया चुके थे और बोले- कर दी। जब तक हम बोले- अच्छा, तब तक चैट बाक्स में भी उनकी टिप्पणी आ गयी। हम हैरान कि टिप्पणी अगम, अगोचर कैसे हो गयी। बहरहाल, बात समझ में आ गयी। हम अपना मेल बाक्स टटोल रहे थे और टिप्पणी थी चिट्ठाचर्चा के खाते में।
खैर, हमने चिट्ठाचर्चा का मेल बाक्स खोलने का प्रयास किया। माउस किसी पियक्कड़ की तरह लहरा के चल रहा था। हर दो मिनट में लहरा के रुक जा रहा था।
मुझे अनायास शोले सिनेमा का आखिरी सीन याद आ रहा था जिसमें अभिताभ बच्चन पूरे पुल में लहराने के बाद एक बम पर निशाना लगा पाता है। ऐसे ही हमारे कैफ़े का माउस भी बहुत देर इधर-उधर टहलने के बाद काम की जगह पर क्लिक कर पा रहा था।
अपने देश में हर जगह सार्वजनिक उपयोग के लिये उपलब्ध चीज के साथ अइसाइच होता है। वह चाहे सरकारी सम्पत्ति हो, अभिव्यक्ति का अधिकार हो, सार्वजनिक शौचालय हो, रेलवे प्लेटफार्म या फिर किसी साइबर कैफे का माउस।
बावजूद तमाम अड़चनों के हमने सफलता हासिल कर ही ली और सारी टिप्पणियॊं को प्रकाशित कर दिया। इससे हमें यह भी लगा कि जो काम आप मनसे करना चाहते हैं वह होकर ही रहता है- जेहि पर जाकर सत्य सनेहू, मिलहि सो तेहि नहिं कछु संदेहू।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “जेहि पर जाकर सत्य सनेहू”

  1. गिरिराज जोशी
    अब हमारी हालत तो “ना इधर के ना उधर के” वाली हो गई। इधर हमने अपने चिट्ठे पर आपसे क्षमा मांगते हुए ब्लॉग जगत के हितो को देखते हुए आगे से बिना अनुमति के अपना नाम छापने की बात कही और इधर आपने हमें पचास जीवों का हत्यारा बना दिया “एक कविता की भ्रूणहत्या पचास जीव हत्याऒं के बराबर हैं” लिखकर, खैर ब्लॉग जगत के हित में हम यह भी कबूल करते है। :-)
  2. प्रत्यक्षा
    ‘कहा भी गया है एक कविता को अपने मन में मारने से अच्छा है कि पचास लोगों को उसके वार से मारा जाये। ‘
    यही तो हम कर रहे हैं ;-)
  3. SHUAIB
    क्षमा चाहता हूं, ये आपका लेख पढलिया मगर किस्सा क्या है कुछ पल्ले नही पडा :( ;) रही नेट केफे की बात, तो भाई यहां साठ रुपया (भारती) प्रति घंटा है :( ;)
  4. समीर लाल
    हा हा, अभी कल ही जो कविता हम पढ़वाये थे, उसकी बात कर रहें हैं? :)
    एक कविता की भ्रूणहत्या पचास जीव हत्याऒं के बराबर हैं।
    इतना बड़ा पाप तो हम अपने सिर नहीं ले सकते, हम तो सुनाते चलेंगे.
  5. राकेश खंडेलवाल
    यह भ्रम है समीर भाई को, आप ज़िक्र उनका हैं करते
    हमसे, और कहां हैं ? जो बस कविता में ही बातें करते
    यह जो बात लिखी है, निश्चित हम ही उसके एक लक्ष्य हैं
    कब तक झेलें कविता आखिर, जो मरते वो क्या न करते
  6. ड़ा प्रभात टन्डन
    अरे अनूप जी , आप और लखनऊ मे , बस हुक्म दिया होता तो फ़ौरन हाजिर हो जाता और आपके 10 रूपये भी बच जाते।
  7. छुट्टियों का चांद « शुऐब
    [...] दिवाली की मुबारकबाद कल जब ये तीनों चिट्ठे गिरिराज जोशी, समीर जी और फुरसतिया जी को पढा तो कुछ भी समझ नही आया जैसे कोड वर्ड मे बात चीत हो रही है अपना छोटा दिमाग है बडी बातें नहीं घुसतीं सुबह दफ्तर मे कुछ काम करलेने के बाद नारद और चिट्ठाचर्चा को सलाम करता हूं जिसके बगैर जैसे पूरा दिन अधूरा है। मगर ये हिन्दी चिट्ठे जो ब्लॉगस्पाट पर हैं, मैं वो सब चिट्ठे पढ तो सकता हूं लेकिन मेरी मजबूरी है कि उन पर टिप्पणी लिख नही सकता सिर्फ वर्ड प्रेस डाट कॉम वाले चिट्ठों को टिप्पणी दे सकता हूं। जहां तक हो सका मैं ने बहुत सारे हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की मुबारकबाद दिया, फिर भी उन लोगों के लिए जिन का चिट्ठा ब्लॉगस्पाट पर है, मैं अपनी इस पोस्ट के से सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की शुभकामनाएँ और मुबारकबाद पेश करता हूं। [...]
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